संदेशखाली की भूमिका तो बहुत पहले बन चुकी थी

सन्देशखली में जो हो रहा है वह आज नहीं हुआ है। चित्र में 2019 का एक ट्वीट है जो समस्या के भयावह इतिहास को बता रहा है। वामपंथी इस पर चुप हैं। सन्देशखली में अधिकांश पीड़ित दलित हैं परन्तु जय भीम जय मीम वाले चुप हैं। बरखा दत्त चुप है। रवीश कुमार चुप है। वृन्दा करात चुप है। दलित नेता बिल्कुल चुप हैं। घर से अफजल निकलेगा का नारा देने वाले चुप हैं। हिंदुत्व से आजादी चिल्लाने वाले चुप हैं।

हिंदुस्तान के बटवारे के वक्त एक दलित लीडर हुआ करते थे, बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर से बड़े दलित लीडर …. जनाब का नाम था जोगेंद्र नाथ मंडल । बाबासाहेब से भी बड़े दलित नेता इसीलिए कहा… क्योंकि 1945-46 जब संविधान-निर्माण समिति के लिए चुनाव हुए तो बाबासाहेब बंबई से चुनाव हार गए, ऐसे मे वे जोगेंद्र नाथ मंडल ही थे जिन्होने बाबा साहेब को बंगाल के कोटे से जितवाया ।
दलित-मुस्लिम गठजोड़ और जय भीम-जय मीम का नारा देने वाले आपको कभी जोगेंद्र नाथ मंडल का नाम लेते नहीं दिखेंगे ।
आजादी से पहले मंडल डॉ. अंबेडकर की तरह दलित आंदोलन के प्रमुख चेहरा थे। पश्चिम भारत के दलितों पर जहाँ बाबा साहेब का प्रभाव था, वही पूर्वी अविभाजित भारत की सियासत में मंडल ने दलितों का नेतृत्व किया । ( एक बात स्पष्ट कर दूँ की जोगिंदर नाथ मण्डल, डॉ. अम्बेडकर के राजनैतिक गुरु भी थे )
इतिहास मे पहली बार दलित-मुस्लिम गठजोड़ का प्रयोग जोगेंद्र नाथ मंडल ने ही किया था, डॉ अंबेडकर से उलट उनका इस नए गठबंधन पर अटूट विश्वास था। मुस्लिम लीग के अहम नेता के तौर पर उभरे जोगेंद्र नाथ मंडल ने भारत विभाजन के वक्त अपने दलित अनुयायियों को पाकिस्तान के पक्ष मे वोट करने का आदेश दिया। अविभाजित भारत के पूर्वी बंगाल और सिलहट (आधुनिक बांग्लादेश) में करीब 40 प्रतिशत आबादी हिंदुओं की थी, जिन्होने पाकिस्तान के पक्ष मे वोट किया और मुस्लिम लीग मण्डल के सहयोग से भारत का एक बड़ा हिस्सा हासिल करने मे सफल हुआ ।
आज के बांग्लादेश इलाके से लाखों सवर्ण और अमीर जातियों ने हिंदुस्तान मे बसने का फैसला किया, जबकि मण्डल के दलित-मुस्लिम दोस्ती के बहकावे मे ज़्यादातर दलितों ने पूर्वी पाकिस्तान मे (आज का बांग्लादेश) ही बसने को राजी हुए ।
विभाजन के बाद मुस्लिम लीग ने दलित-मुस्लिम गठजोड़ का मान रखते हुए मंडल को पाकिस्तान का पहला कानून मंत्री बनाया, बल्कि पाकिस्तान के संविधान लिखने वाली कमेटी के अध्यक्ष भी वही रहे थे। जोगेंद्र नाथ मंडल ने वैसे ही पाकिस्तान का संविधान रचा है जैसे बाबासाहेब ने भारत का संविधान।

अब मुस्लिम लीग को वैसे भी दलित-मुस्लिम दोस्ती का ढोंग करने की जरूरत नहीं रह गयी थी । उनके लिए हर गैर-मुस्लिम काफिर है । पूर्वी पाकिस्तान मे मण्डल की अहमियत धीरे-धीरे खत्म हो चुकी थी । दलित हिंदुओं पर अत्याचार शुरू हो चुके थे । 30% दलित हिन्दू आबादी की जान-माल-इज्जत अब खतरे मे थी ।

मण्डल ने दुखी होकर जिन्ना को कई पत्र लिखे, उनके कुछ अंश पढ़िये :-

मंडल ने हिंदुओं के संग होने वाले बरताव के बारे में लिखा, “मुस्लिम, हिंदू वकीलों, डॉक्टरों, दुकानदारों और कारोबारियों का बहिष्कार करने लगे, जिसकी वजह से इन लोगों को जीविका की तलाश में पश्चिम बंगाल जाने के लिए मजबूर होना पड़ा.” । गैर-मुस्लिमों के संग नौकरियों में अक्सर भेदभाव होता है. लोग हिंदुओं के साथ खान-पान भी पसंद नहीं करते. !

पूर्वी बंगाल के हिंदुओं (दलित-सवर्ण सभी ) के घरों को आधिकारिक प्रक्रिया पूरा किए बगैर कब्जा कर लिया गया और हिंदू मकान मालिकों को मुस्लिम किरायेदारों ने किराया देना काफी पहले बंद कर दिया था.

जोगेन्द्र नाथ ने कार्यवाही हेतु बार- बार चिट्ठीयां लिखी, पर इस्लामिक सरकार को न तो कुछ करना था, न किया | आखिर उसे समझ आ गया कि उसने किसपर भरोसा करने की मूर्खता कर दी है |
एक समय ऐसा आया जब जोगेंद्र नाथ मंडल का परिवार व उसके समर्थक तथाकथित मूलनिवासी भी इस्लामिक जिहादियों की नजरो से बच न पाये ।

मंडल आखिर में इस नतीजे पर पहुंचे कि पाकिस्तान में हिंदुओं की स्थिति “संतोषजनक तो दूर बल्कि हताशाजनक है और उनका भविष्य पूरी तरह अंधकारपूर्ण है ।

1950 में बेइज्जत होकर जोगेंद्र नाथ मंडल भारत लौट आया | भारत के पश्चिम बंगाल के बनगांव में वो गुमनामी की जिन्दगी जीता रहा | अपने किये पर 18 साल पछताते हुए आखिर 5 अक्टूबर 1968 को उसने गुमनामी में ही आखरी साँसे ली ।
मण्डल तो वापस आ गया लेकिन उनके गरीब अनुयायी वहीं रह गये बहुत से मार दिये गये बाकी मुसलमान बन गये । मुसलमान बनने पर भी उनकी समस्याओं का अन्त नहीं हुआ, उन्हें मुसलमानों में अरजल जाति कहा गया, तथा उनसे मैला उठवाने जैसे काम करवाये गये जो लोग कहते है मुस्लिमों में जातिवाद नहीं वो उनसे अशरफ, अजलाफ और अरजल समुदाय के बारे मे पूछें


एक तरफ दलित-मुस्लिम गठजोड़ के जनक मण्डल का शर्मनाक अंत हुआ और दूसरी तरफ प्रखर राष्ट्रवादी, इस्लाम-कम्युनिस्ट-मिशनरी बिरोधी सच्चे दलित नेता भारत रत्न बन इतिहास मे अमर हो गए । ( बाबा साहब के इस्लाम-बामपंथ-मिशनरी बिरोधी विचार जानने के लिए इस लेख को पढ़ें :-
अब सोशल मीडिया में लाखों की तादाद में बहुजन समाज मौजूद हैं । मूलनिवासी-अंबेडकरवादी-बहुजनवादी न जाने ऐसे कई नामों से ये दलित-पिछड़े बर्ग का प्रतिनिधित्व इस प्लेटफॉर्म पर कर रहे हैं । पर इनमे बाबासाहेब डॉ अंबेडकर जैसी प्रखर राष्ट्रवाद, दूरदृष्टि, दलित-शोषित के उत्थान के लिए एक गंभीर सोच का सर्वथा अभाव है ।
अगर मिशनरी या जमात वालों ने इनके माथे पर हाथ फेर दिया तो फिर वे आपको मनुस्मृति- ब्राह्मण सहित सभी सवर्ण जतियों को ही नहीं हिन्दू धर्म- संस्कृति-देवी-देवता को गाली -गलौज कर बड़े अंबेडकरवादी बनते दिखेंगे । हैरत तो तब होती है जब शांति-प्रेम-करुणा के प्रतीक भगवान बुद्ध को एक पल नमोबुद्धाय कहने वाले नव-बौद्ध अगले ही पल हिन्दु धर्म को गाली दे भगवान बुद्ध और बाबासाहेब दोनों को शर्मिंदा करते नजर आते हैं ।
इन अंबेडकरवादियों ने न बाबासाहब को जाना, न उनको पढ़ा- न समझा । बाबा साहेब रचित कंटेन्ट को तो ये कभी हाथ नहीं लगाते । जमात-कम्युनिस्ट और मिशनरी के हाथों की कठपुतली बनने से पहले काश इनहोने बाबा साहेब के इन लोगों के बारे मे सोच पढ़ा होता ।


कम्युनिस्टों के बाबा साहेब हमेशा ही घोर विरोधी रहे क्योंकि वे व्यक्ति की स्वतन्त्रता के प्रबल पक्षधर थे जबकि कम्युनिस्ट विचारधारा व्यक्ति की स्वन्त्रता की विरोधी है। साथ ही बाबा साहेब को कम्युनिस्ट पार्टी के सारे पदाधिकारी ऊंची जाति और विशेषकर ब्राह्मण होने पर भी एतराज था । उनका मानना था कि कम्युनिस्ट सामाजिक भेदभाव और गरीबी को हटाने के मामले मे ईमानदार नहीं है । पश्चिम बंगाल, केरल और त्रिपुरा मे लंबे समय तक रहे वामपंथी शासन की कारगुजारी बाबा साहेब के इनके बारे में आंकलन को सही साबित करती है ।
25 नवम्बर 1949 को संविधान सभा में बोलते हुआ बाबा साहब ने कहा था, “वामपंथी इसलिए इस संविधान को नही मानेंगे क्योंकि यह संसदीय लोकतंत्र के अनुरूप है और वामपंथी संसदीय लोकतंत्र को मानते नही हैं।

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