देव से देश और राम से राष्ट्र का बना विमर्श

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 22 जनवरी को श्री राम मंदिर में हुई प्राण प्रतिष्ठा वास्तव में राष्ट्रीय चेतना का मुखर स्वरूप था। जिसे हम सबने प्रकट होते हुए देखा। संपूर्ण देश में ही नहीं, विदेश में भी जहां-जहां भारतवंशी लोग रहते हैं, लोगों ने महादीपावली का पर्व मनाया। लोगों का उत्साह देखते ही बनता था। इस अवसर पर प्रधानमंत्री श्री मोदी ने ठीक ही कहा है कि आज अयोध्या में, केवल श्रीराम के विग्रह रूप की प्राण प्रतिष्ठा नहीं हुई है, ये श्रीराम के रूप में साक्षात् भारतीय संस्कृति के प्रति अटूट विश्वास की भी प्राण प्रतिष्ठा है। ये साक्षात् मानवीय मूल्यों और सर्वोच्च आदर्शों की भी प्राण प्रतिष्ठा है।..... ये भारत की दृष्टि का, भारत के दर्शन का, भारत के दिग्दर्शन का मंदिर है। ये राम के रूप में राष्ट्र चेतना का मंदिर है। राम भारत की आस्था हैं, राम भारत का आधार हैं। राम भारत का विचार हैं, राम भारत का विधान हैं। राम भारत की चेतना हैं, राम भारत का चिंतन हैं। राम भारत की प्रतिष्ठा हैं, राम भारत का प्रताप हैं। राम प्रवाह हैं, राम प्रभाव हैं। राम नेति भी हैं। राम नीति भी हैं। राम नित्यता भी हैं। राम निरंतरता भी हैं। राम विभु हैं, विशद हैं। राम व्यापक हैं, विश्व हैं, विश्वात्मा हैं। और इसलिए, जब राम की प्रतिष्ठा होती है, तो उसका प्रभाव वर्षों या शताब्दियों तक ही नहीं होता। उसका प्रभाव हजारों वर्षों के लिए होता है। 

वास्तव में श्री राम ने अपने जीवन काल में संपूर्ण विश्व में आर्यों के राज्य की स्थापना की थी। जब हम यह कहते हैं कि राम ने संपूर्ण संसार में आर्यों के साम्राज्य की स्थापना की थी तो इसका अभिप्राय यह नहीं है कि संसार के लोगों के लिए वह सिकंदर या हिटलर बन गए थे और उन्होंने बलात आर्यों का राज्य संसार पर थोप दिया था। इसके विपरीत इसका अर्थ यह है कि उन्होंने संपूर्ण भूमंडल से राक्षसी शक्तियों का अंत कर मानवीय आचरण और सदव्यवहार को प्रोत्साहित करने वाली शासन व्यवस्था को स्थापित कर ईश्वरीय व्यवस्था के अनुसार सबके लिए समान अधिकार उपलब्ध कराए थे। भारत की यह शासन व्यवस्था ही वास्तविक लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था थी। रामचंद्र जी ने इसे पूर्णत्व प्रदान किया। इसलिए उनकी वह लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था रामराज्य के एक ऐसे आदर्श के साथ संलग्न हो गई जो आज तक संसार के लिए मृग मरीचिका बना हुआ है। भारत के संविधान में रामचंद्र जी के चित्र देकर हमारी संविधान सभा ने इसी रामराज्य के प्रति अपनी आस्था प्रकट की थी।
रामचंद्र जी का आदर्श रामराज्य ही भारत का वह रामत्व है जिसे हम अपनी राष्ट्रीयता के साथ जोड़कर गौरवान्वित हो सकते हैं। यह रामत्व ही हमारा आर्यत्व है, हिंदुत्व है। इन शब्दों को किन्हीं संकीर्ण अर्थो में समझने की आवश्यकता नहीं है, इनकी गंभीरता और इनके गौरव को समझने की आवश्यकता है।
आज भारत जिस प्रकार की अंगड़ाई ले रहा है और निरंतर अपनी सही दिशा में आगे बढ़ता हुआ दिखाई दे रहा है, उसका कारण केवल एक है कि आज का भारत अपनी अस्मिता और अपनी निजता को पहचान चुका है। अभी तक हमने किसी और की पहचान को उधार ले रखा था। जिससे अपनी चाल भूल चुके थे, अपना चरित्र भूल चुके थे ,अपना चेहरा भूल चुके थे। आज के भारत के चाल ,चरित्र और चेहरे में समरूपता है। एक दिशा में आगे बढ़ने का बोध है और एक लक्ष्य को प्राप्त कर लेने की चाह है।
प्रधानमंत्री श्री मोदी ने इन शब्दों को भी ऐसे ही नहीं चुन लिया है कि श्रीराम का भव्य मंदिर तो बन गया…अब आगे क्या? सदियों का इंतजार तो खत्म हो गया…अब आगे क्या? आज के इस अवसर पर जो दैव, जो दैवीय आत्माएं हमें आशीर्वाद देने के लिए उपस्थित हुई हैं, हमें देख रही हैं, उन्हें क्या हम ऐसे ही विदा करेंगे? नहीं, कदापि नहीं। आज मैं पूरे पवित्र मन से महसूस कर रहा हूं कि कालचक्र बदल रहा है। ये सुखद संयोग है कि हमारी पीढ़ी को एक कालजयी पथ के शिल्पकार के रूप में चुना गया है। हज़ार वर्ष बाद की पीढ़ी, राष्ट्र निर्माण के हमारे आज के कार्यों को याद करेगी। इसलिए मैं कहता हूं- यही समय है, सही समय है। हमें आज से, इस पवित्र समय से, अगले एक हजार साल के भारत की नींव रखनी है। मंदिर निर्माण से आगे बढ़कर अब हम सभी देशवासी, यहीं इस पल से समर्थ-सक्षम, भव्य-दिव्य भारत के निर्माण की सौगंध लेते हैं। राम के विचार, ‘मानस के साथ ही जनमानस’ में भी हों, यही राष्ट्र निर्माण की सीढ़ी है।
राम हमारी राष्ट्रीयता के प्रतीक हैं ,हमारी चेतना के प्रतीक हैं, हमारी मौलिकता के प्रतीक हैं , हमारी पहचान हैं , हमारी शान हैं , हमारा अभिमान हैं और इन सबसे बढ़कर हमारी उस
सांस्कृतिक विरासत के प्रतीक पुरुष हैं जिसे आर्यों की गौरवशाली परंपरा कहा जाता है। जिसे वैदिक संस्कृति कहा जाता है । जिसे वैदिक विरासत कहा जाता है। जिसे वैदिक मूल्यों के नाम से जाना जाता है। हमारे देश के प्रत्येक व्यक्ति की भीतरी इच्छा इसी पहचान, इसी विरासत और इन्हीं वैदिक मूल्यों को खोजने की है। हमारी तड़प सदियों पुरानी है । जैसे किसी व्यक्ति की कोई मूल्यवान वस्तु हो जाती है और उसके लिए वह नींद को छोड़ छोड़कर भी रात को उठकर अपनी उस वस्तु को खोजने का प्रयास करता है, वैसे ही भारत सदियों से वैदिक संस्कृति के खोए हुए मूल्यों को स्थापित करने के लिए संघर्षरत रहा है। इसके लिए उसने आर्य संस्कृति के प्रतीक श्री राम के मंदिर के लिए सदियों तक संघर्ष किया है। भारत की आंतरिक इच्छा रही है कि रामचंद्र जी के मंदिर के साथ भारत की मर्यादा जुड़ी है, भारत की आस्था और श्रद्धा जुड़ी है। जिसका स्थापन भारत की वैदिक संस्कृति का स्थापन होगा।
प्रधानमंत्री मोदी के इन शब्दों पर हमें ध्यान देना चाहिए आज के युग की मांग है कि हमें अपने अंतःकरण को विस्तार देना होगा। हमारी चेतना का विस्तार… देव से देश तक, राम से राष्ट्र तक होना चाहिए। हनुमान जी की भक्ति, हनुमान जी की सेवा, हनुमान जी का समर्पण, ये ऐसे गुण हैं जिन्हें हमें बाहर नहीं खोजना पड़ता। प्रत्येक भारतीय में भक्ति, सेवा और समर्पण के ये भाव, समर्थ-सक्षम,भव्य-दिव्य भारत का आधार बनेंगे। और यही तो है देव से देश और राम से राष्ट्र की चेतना का विस्तार ! दूर-सुदूर जंगल में कुटिया में जीवन गुजारने वाली मेरी आदिवासी मां शबरी का ध्यान आते ही, अप्रतिम विश्वास जागृत होता है। मां शबरी तो कबसे कहती थीं- राम आएंगे। प्रत्येक भारतीय में जन्मा यही विश्वास, समर्थ-सक्षम, भव्य-दिव्य भारत का आधार बनेगा। और यही तो है देव से देश और राम से राष्ट्र की चेतना का विस्तार! हम सब जानते हैं कि निषादराज की मित्रता, सभी बंधनों से परे है। निषादराज का राम के प्रति सम्मोहन, प्रभु राम का निषादराज के लिए अपनापन कितना मौलिक है। सब अपने हैं, सभी समान हैं। प्रत्येक भारतीय में अपनत्व की, बंधुत्व की ये भावना, समर्थ-सक्षम, भव्य-दिव्य भारत का आधार बनेगी। और यही तो है देव से देश और राम से राष्ट्र की चेतना का विस्तार!
विपक्ष चाहे जो कह रहा हो, या राम विरोधी बने राष्ट्र विरोधी लोग चाहे जो कह रहे हों, पर आज देव से देश और राम से राष्ट्र तक के बने इस विमर्श को संजोकर रखने की आवश्यकता है।
यह दूर तक और देर तक हमारा कल्याण करेगा।

डॉ राकेश कुमार आर्य

लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता है।

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