पाखंड और आर्य समाज के पुरोहित, भाग 2 आर्य समाज एक साबुन है

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आर्य समाज एक ऐसी साबुन है जो समाज के प्रत्येक दाग धब्बे को धोने का काम करती है। स्वामी दयानंद जी महाराज ने दीर्घकाल के परिश्रम के उपरांत यह निर्णय लिया था कि देश को निरंतर शुद्ध बनाए रखने के लिए किसी ऐसे संगठन की आवश्यकता है जो चौबीसों घंटे समाज और राष्ट्र की आराधना में लगा रहे। स्वामी जी महाराज ने बड़ी गंभीरता से यह अनुभव किया था कि निकम्मे लोग समाज के लिए बोझ होते हैं। उनके रहने से सारी व्यवस्था धुंधली होती चली जाती है। अनेक प्रकार की विसंगतियां समाज में जन्म लेने लगती हैं । रूढ़िवाद को पैर फैलाने का अवसर उपलब्ध होता है। उनके कारण समाज की दशा बिगड़ती चली जाती है।

वही नर निकम्मे होत हैं, करें व्यवस्था भंग।
बीमार करें सब देश को, रह जाते सब दंग।।

स्वामी जी महाराज जिस समय इस धरती पर विचरण कर रहे थे, यदि उस समय के भारतीय समाज के बारे में विचार करें तो उस समय भारतीय धर्म और संस्कृति के प्रति लोगों की उदासीनता चरम सीमा पर थी। उस उदासीनता के परिणाम स्वरूप पराधीनता की रात्रि और भी अधिक गहराती जा रही थी। माना जा सकता है कि अनेक स्थानों पर लोग संघर्ष कर अपनी स्वाधीनता के लिए लड़ रहे थे, उन्हें अपने धर्म और अपनी संस्कृति की चिंता भी थी, पर अधिकांश लोग जड़ता और रूढ़िवाद में फंसे हुए थे। जिनके कारण भारतीय समाज और राष्ट्र दोनों ही रुग्णावस्था में थे ।
स्वामी जी ने इस रुग्णावस्था से समाज और राष्ट्र को उभारने के लिए उपचार के रूप में महौषधि बनाकर आर्य समाज को प्रस्तुत किया। स्वामी जी ने जैसा रोगी देखा उसको वैसा ही उपचार बताया । किसी के लिए आर्य समाज टैबलेट बन गया, किसी के लिए लेपन बना, किसी के लिए इसे चूर्ण बनाकर दिया गया । इसके फलस्वरुप बड़ी संख्या में समाज और राष्ट्र के लोग स्वस्थ होने लगे । उन्हें अपने वास्तविक स्वरूप का बोध हुआ। नई ऊर्जा , नए जोश और नई शक्ति का संचार उनके शरीर में होता हुआ दिखाई दिया।

आज की भयावह स्थिति

पर आज क्या हो गया है ? आज फिर जड़ता और रूढ़िवाद ऊर्जावान संस्था आर्य समाज के भीतर समाप्त हो जाती है , वह अपनी सारी शक्ति को गंवा बैठता है। हमें नहीं कहना चाहिए कि आर्य समाज कभी शक्तिहीन होकर अपनी ऊर्जा को गंवा बैठेगा, पर इतना अवश्य कहना चाहेंगे कि स्थितियां इतनी उत्साहजनक नहीं है, जितनी होनी चाहिए थीं। यदि हम वर्तमान को रूढ़िवाद और जंगली पान की सीमाओं से बाहर लाने में सफल हो गई तो यह है समाज के लिए बहुत उपयोगी होगा।
आर्य समाज आगे चिरकाल तक समाज और राष्ट्र को नई गति देता रहेगा और समाज और राष्ट्र के भीतर किसी भी प्रकार की ऐसी विषमताओं या विसंगतियों को जन्म नहीं लेने देगा जिससे जड़ता को पैर पसारने का अवसर उपलब्ध हो। इसी सोच और उद्देश्य से प्रेरित होकर स्वामी दयानंद जी महाराज ने आर्य समाज की स्थापना की थी । आर्य समाज संसार के लिए एक ज्योति स्तंभ है । समाज के लिए एक धुलाई करने वाली साबुन है और एक इकाई के रूप में प्रत्येक व्यक्ति के लिए यह उसके बहुमुखी विकास की पूर्ण गारंटी है। पर यह स्थिति तब तक ही रह सकती है जब तक कि ऋषि दयानंद जी महाराज के द्वारा इसे स्थापित करने के उद्देश्य को आगे रखकर यह संस्था काम करने में अपने आपको किसी भी प्रकार से असमर्थ नहीं मानेगी। यदि स्वामी दयानंद जी महाराज के सपनों के आधार पर कार्य को निरंतरता देने में संगठन दुर्बल सिद्ध हो रहा है तो मानना पड़ेगा कि व्यवस्था में कहीं ना कहीं दोष है।

ऋषिवर तेरे देश में, बढ़ते जाते दोष।
नियम संयम भंग हैं, फैल रहा है रोष।।

संगठन में प्रवेश पा रहे दोषों की ओर जिम्मेदार लोगों का ध्यान जाना चाहिए । यदि समय रहते उपाय और उपचार नहीं किया गया तो परिणाम समाज और राष्ट्र के हित में नहीं आएंगे।

आर्य समाजी ही करते हैं परस्पर उन्मादी शास्त्रार्थ

आज एक आर्य समाजी ही आर्य समाजी को शास्त्रार्थ की चुनौती देता है। शास्त्र चर्चा और शास्त्रार्थ की मुठभेड़ दोनों में अंतर है। पर लंगर लंगोट कसकर और जंघाओं पर हाथ मारकर दूसरे के स्वाभिमान को चोट पहुंचाते हुए शास्त्रार्थ का आवाहन किया जाता है। निर्णायक मंडल ऐसी स्थिति को देखकर असमंजस में फंस जाता है। हम मान सकते हैं कि शास्त्रार्थ दो विद्वानों के मध्य ही होता है और उनके लिए यह आवश्यक नहीं कि उनमें से कोई एक विपरीत मत या संप्रदाय का हो, तभी शास्त्रार्थ होगा। हमारे विद्वानों के मध्य प्राचीन काल में भी शास्त्रार्थ होते रहे हैं, पर उनकी एक दूसरे के प्रति संबोधन की भाषा शैली बड़ी पवित्र और ऊंची होती थी। क्रोध नाम का शत्रु तो वहां पर फटकता तक भी नहीं था। किसी आवेश या उग्रवाद या उन्माद की स्थिति में चर्चा करना उचित नहीं माना जाता था। क्योंकि जहां पर यह शत्रु प्रवेश कर जाते हैं वहां चर्चा विरोध में परिवर्तित हो जाती है । जिसका परिणाम चर्चा में भाषा स्तर के गिरने में देखा जाता है। जिसे किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं कहा जा सकता।

भाषा संयम है नहीं, करें नियम की बात।
शास्त्र पढ़े पर ना गुने, मिले रावण की जात।।

शास्त्रार्थ के लिए आवश्यक है कि भाषा स्तर ऊंचे दर्जे का होना चाहिए। अपने से विपरीत मत रखने वाले के प्रति भी सम्मान के शब्द वाणी से निकलने चाहिए। जिससे शास्त्र चर्चा या शास्त्रार्थ के स्थल पर किसी भी प्रकार की उत्तेजना ना फैलने पाए । शास्त्रार्थ में भाग लेने वाले प्रत्येक सहभागी या प्रतियोगी की विद्वत्ता उसकी भाषा से स्पष्ट होनी चाहिए। इसके अतिरिक्त जब शास्त्र चर्चा या शास्त्रार्थ के लिए बैठा जाए तो उस समय इस बात का पूरा ध्यान रखना चाहिए कि हम किसी तर्कसंगत, बुद्धि संगत, सृष्टि नियमों के अनुकूल सत्य निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए इस चर्चा या शास्त्रार्थ का आयोजन कर रहे हैं। जैसे ही हम अपने बुद्धि संगत निष्कर्ष पर पहुंच जाए तो उस समय दूसरे पक्ष को सत्य के पक्ष में तुरंत आत्म समर्पण कर देना चाहिए और स्वयं यह घोषणा करनी चाहिए कि मेरी अपनी शंका का समाधान हो गया है। मैं इस शास्त्र चर्चा को यहीं पर पूर्णविराम देता हूं। ऐसी सकारात्मक सोच शास्त्रार्थ के स्थल के परिवेश को सृजनात्मक शक्ति से भर देती है।

डॉ राकेश कुमार आर्य

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