स्वामी दयानंद और वर्तमान समाज – 1

आर्य समाज ऋषि दयानंद जी की विचारधारा का ध्वजवाहक है। पिछले लगभग डेढ़ सौ वर्ष में इस संस्था ने भारत को ही नहीं संपूर्ण भूमंडल के निवासियों को बहुत कुछ दिया है। देश-विदेश के अनेक विद्वानों ने इस क्रांतिकारी संगठन के महत्वपूर्ण योगदान की मुक्त कंठ से प्रशंसा की है। भारत की लुप्त वैदिक संपदा को फिर से संसार की दृष्टि में लाने का महत्वपूर्ण कार्य स्वामी दयानंद जी महाराज ने किया। जिसे समझ कर अनेक लोग आज यह अनुभव करते हैं कि संसार में शांति केवल वैदिक चिंतन के माध्यम से ही आ सकती है। इसके उपरांत भी हमें आज भी अनेक प्रकार की चुनौतियां खड़ी दिखाई दे रही हैं।
आर्य समाज की आवाज कभी हमारे देश की सरकार की आवाज नहीं बनी। धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत ने वैदिक चिंतन धारा को सरकारी कार्यालयों में फटकने तक नहीं दिया। जिससे देश के भीतर इस्लाम और ईसाइयत की चिंतनधारा भी तेजी से प्रवाहित होटी रही है। इन दोनों की चिंतनधारा को सुरक्षा कवच प्रदान करते हुए सरकारी स्तर पर इस्लाम, ईसाइयत और वैदिक संस्कृति या वैदिक चिंतनधारा तीनों को ही बराबर करके तोल दिया जाता है। दु:ख तब और भी अधिक होता है जब वैदिक चिंतनधारा को सरकारी मान्यता प्राप्त न होकर इस्लाम को भाईचारे का और ईसाइयत को शांति का प्रतीक कह दिया जाता है। यह दुर्भाग्य का विषय है कि ऋषि दयानंद जी महाराज ने देश को स्वराष्ट्र , स्वदेश, स्वभाषा , स्वसंस्कृति और स्वराज्य का बोध तो कराया पर जब देश आजाद हुआ तो देश की सरकारों ने उस बोध को आत्मसात करने से इनकार कर दिया।
स्वाधीन भारत में सरकारें बनीं तो सही परंतु उनके पास स्वबोध, इतिहास बोध और राष्ट्रबोध का सर्वथा अभाव रहा । आर्य समाज ने अपने आपको मुख्य भूमिका से हटाकर पीछे कर लिया। वह यज्ञों पर स्वाहा: स्वाहा: की आहुति देने में लग गया और उधर देश की आजादी की दुल्हन को राक्षस नोंचने में लग गए। भारत के संविधान को लेकर डॉ अंबेडकर ने 1953 संसद में कहा था कि वह इस संविधान को जलाने वाले पहले व्यक्ति होंगे, क्योंकि हमने जिस राष्ट्र मन्दिर की परिकल्पना की थी उसमें राक्षस विराजमान हो गया।

डॉ अंबेडकर का उदाहरण

डॉ भीमराव अंबेडकर जी ने अपनी बात को स्पष्ट करते हुए उस समय कहा था कि – हम एक मंदिर बनाते हैं जिससे कि भगवान उसमें आएं और रहने लगें। लेकिन, भगवान के आने से पहले यदि उसमें दानव आकर रहने लगें तो मंदिर को नष्‍ट करने के अलावा क्‍या रास्‍ता बचेगा ? यह सोचकर कोई मंदिर नहीं बनाता है कि उसमें असुर आकर वास करने लगें। सभी चाहते हैं कि उस मंदिर में देवों का वास हो। यही कारण है कि उन्‍होंने संविधान को जलाने की बात की थी।’
यह 1955 की बात है जब डॉ. अंबेडकर जी ने अपना उपरोक्त वक्तव्य राज्यसभा सांसद अनूप सिंह के द्वारा उनका ध्यान उनके द्वारा ही 1953 में दिए गए उपरोक्त वक्तव्य की ओर दिलाया था। सारी संसद उन्हें उस समय बड़े ध्यान से सुन रही थी । आश्चर्यचकित होकर उस समय एक सांसद ने उनसे कह दिया था कि मंदिर को नष्‍ट करने के बजाय दानव को ही समाप्त करने की बात क्‍यों नहीं करनी चाहिए ?
इस पर भी डॉ अंबेडकर ने बड़ा मार्मिक उत्तर दिया था। उन्होंने कहा था कि ‘यह आप नहीं कर सकते। हमारे देश के प्राचीन साहित्य में सुर – असुर संग्राम की ओर संकेत करते हुए तब उन्होंने कहा था कि जैसे उसे समय अमृत को असुर प्राप्त करने में सफल हो गए थे और देवताओं को अंत में अमृत को लेकर भागना पड़ा था, कुछ वैसी ही स्थिति इस समय पैदा हो गई है।’

आर्य समाज मौन क्यों रहा ?

निश्चित रूप से इस स्थिति को आर्य समाज जैसी क्रांतिकारी संस्था को समझना चाहिए था। स्थिति कुछ वैसी ही बन गई थी जैसी डॉ अंबेडकर बयां कर रहे थे। अमृत मंथन किसने किया और उस अमृत मंथन के फल को प्राप्त करने में कौन सफल हुआ ! यह उस समय का बहुत बड़ा प्रश्न था। जिस पर आर्य समाज मौन साध गया। राष्ट्र मंदिर बना तो उसमें वह कौन व्यक्ति था या कौन सा विचार था, जो एक राक्षस के रूप में विराजमान हो गया था ? और यदि ऐसा हो गया था तो ऐसी कौन सी मजबूरी थी जिसके चलते आर्य समाज को चुप्पी साधनी पड़ी?
माना कि उस समय के अनेक आर्य विद्वान तत्कालीन सरकार का विरोध कर रहे थे, परंतु ऐसा क्यों नहीं हुआ कि जब तत्कालीन सरकार देश के इतिहास का विकृतिकरण कर रही थी और उसमें से आर्य समाज को इस प्रकार निकाल कर फेंक रही थी जैसे कोई दूध में से मक्खी निकाल कर फेंक देता है , तब देश के वास्तविक इतिहास लेखन के लिए आर्य समाज आगे क्यों नहीं आया और जो कुछ इतिहास के साथ देश की तत्कालीन परिस्थितियों में हो रहा था, उसको लेकर आर्य समाज ने आंदोलन क्यों नहीं चलाया? हमारा मानना है कि उस समय इतिहास के विकृतिकरण और विलुप्तिकरण की कोशिशों के विरुद्ध आर्य समाज को आवाज उठानी चाहिए थी। आंदोलन खड़ा करना चाहिए था और नेहरू एंड कंपनी की धूर्तता व चालाकी को सड़कों पर लाकर नंगा करना चाहिए था।

डॉ राकेश कुमार आर्य

लेखक की पुस्तक ‘एक क्रांतिकारी संगठन आर्य समाज’से

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