मेरे मार्गदर्शक एवं प्रेरणास्रोत्र: डॉ रामप्रकाश

Screenshot_20231217_075536_WhatsApp

#डॉ_ विवेक_आर्य
शिशु रोग विशेषज्ञ, दिल्ली

आज प्रात:समाचार मिला कि आर्यसमाज के महान विद्वान डॉ रामप्रकाश जी का देहांत हो गया। आप वर्षों से बिस्तर पर थे। आपका शरीर शिथिल हो गया था पर मस्तिष्क कार्य कर रहा था। आपसे प्राय: हर माह फोन से सत्संग होता था। 15 दिन पूर्व ही आपके मेरी फोन पर चर्चा अंतिम बार हुई थीं। आपने मुझे मेरी नवीन पुस्तकें आर्यसमाज और शुद्धि आंदोलन (हिंदी) एवं Aryasamaj and Shuddhi movement ( अंग्रेजी) के लिए बहुत बहुत बधाई दी। आपने पुस्तक के विषय में आवश्यक सुझाव दिए। आपने कहा था कि आप यह पुस्तक लिखकर सदा के लिए आर्यसमाज में अमर हो गए। डॉ जी ने दण्डी स्वामी जी एवं पं गुरुदत्त विद्यार्थी जी की जीवनियों को शोध पुस्तक शैली में प्रकाशित किया था। आप कुरुक्षेत्र से दिल्ली आते तो मुझे हरियाणा भवन में बुला लेते थे, राज्य सभा सदस्य रहते हुए आप मुझे अपने आवास पर फोन करके आमंत्रित करते थे। वहां हमारी चर्चा का विषय आर्यसमाज का साहित्य और लेखन होता था। आपने मुझे शोध परक शैली को और सकारात्मक लेखन अपनाने की सलाह दी थीं। आपका कहना था कि लेखन 100 वर्ष के लिए हो। आप जो लिखे प्रामाणिक एवं सन्दर्भ के साथ लिखें। किसी को आलोचना एवं स्वमहिमा मंडन के लिए न लिखें। जो लोग ऐसा करते हैं, वो कमजोर व्यक्तित्व और असुरक्षा की भावना से ग्रसित होते हैं एवं ऐसा लेखन चिरस्थायी नहीं होता। मैंने उनके कथन का अनुसरण करते हुए मनुस्मृति की जानें, वेदों को जानें (प्रेस में) , सनातन को जानें( प्रेस में) एवं शुद्धि आंदोलन का इतिहास जैसी पुस्तकों का लेखन किया हैं। आप मेरी प्रेस में गई पुस्तकों की प्रतीक्षा कर रहे थे।

डॉ जी से मेरा परिचय 20 वर्ष हुआ था। तब मैं MBBS का विद्यार्थी था। मेरा एक लेख स्वामी विवेकानंद पर जींद से निकलने वाली मासिक पत्रिका शांतिधर्मी में प्रकाशित हुआ था। आपने उस लेख को पढ़कर मेरी प्रशंसा की और मुझे कुरुक्षेत्र आने का निमंत्रण दिया। तब तक मैं आपके नाम और व्यक्तित्व से परिचित नहीं था। आप मुझे प्यार से बच्चू कहते थे। मैं 2005 में चंडीगढ़ PGI में परीक्षा देने गया तो रामप्रकाश जी ने पंजाब यूनिवर्सिटी में केमिस्ट्री विभाग में अपने पूर्व ऑफिस को देखने को कहा और उन्हीं के डिपार्टमेंट के प्रोफेसर के घर पर ठहराया। परीक्षा देकर मैं कुरुक्षेत्र आ गया और उनके निवास पर रुका। आपसे देर रात तक चर्चा हुई। आपने मुझे अनेक संस्मरण स्वामी सम्पूर्णानन्द, भीष्म जी महाराज और अन्य विद्वानों के रोचक संस्मरण सुनाएँ। जब आप पंजाब यूनिवर्सिटी से केमिस्ट्री में Msc कर रहे थे तब आपने स्वामी सम्पूर्णानन्द जी को पंजाब विश्व विद्यालय में वक्तव्य के लिए बुलाया था। स्वामी जी ट्रेन से देर रात पहुंचे और उन्हें लेने कोई स्टेशन नहीं गया था। आप किसी आर्यसमाज में रात्रि को पैदल पहुंचे तो किसी ने द्वार नहीं खोला। आप सुबह तक सर्दियों में रात को आर्यसमाज के दरवाजे पर विश्राम कर सुबह विश्वविद्यालय पहुंच गए। डॉ जी को अपनी गलती का बोध हुआ तो आप स्वामी जी की नजरों से बचते रहे। अंत में स्वामी जी ने विश्वविद्यालय के प्रोफेसरों के समक्ष स्वामी दयानन्द के वेद भाष्य और सायण महीधर के विकृत भाष्य की तुलना कर उन्हें ललकारा कि क्यों पढ़ाते हो आप लोग यह वेदों की प्रतिष्ठा को धूमिल करने वाले ग्रन्थ? स्वामी जी की गर्जना पर कोई भी उपस्थित जान उत्तर नहीं दे पाया था। आपने डॉ जी को कुछ नहीं कहा। स्वामी जी प्यार से कहते थे कि मुझे अब मरने का कोई गम नहीं हैं। मेरे राम ( रामप्रकाश जी) और श्याम ( स्वामी अग्निवेश) मेरा कार्य आगे बढ़ाएंगे।

आपने अपने जीवन की बहुत प्रेरणादायक घटना मुझे बताई थीं। अध्यापन करते हुए डॉ जी शुक्रवार की शाम से लेकर रविवार को शाम तक चंडीगढ़ और उसके आस पास के क्षेत्रों में प्रवचन करने जाने लगे थे। आप दक्षिणा नहीं लेते थे और किराया मात्र में प्रवचन करते थे। अम्बाला समाज के उत्सव में एक वृद्ध भजन उपदेशक को जब आपके इस व्यवहार का ज्ञात हुआ तो उन उपदेशक ने आपके कान पकड़ लिए और कहा था कि आपके इस व्यवहार से आर्यसमाजियों की दक्षिणा देने की आदत बिगड़ जाएगी। जिन विद्वानों का निर्वाह मात्र दक्षिणा से ही होता हैं। उनका क्या होगा? वो भूखे मर जायेंगे। आप दक्षिणा लीजिये और उसे किसी सामाजिक कार्य में खर्च कर दीजिये। डॉ जी ने उनके आदेश को स्वीकार किया और आगे से दक्षिणा लेने लगे। आप उस दक्षिणा से वैदिक साहित्य प्रकाशित कर उसे मुफ्त में बांटते थे। यह संस्मरण वर्तमान में सरकारी नौकरियों पर लगे आर्यसमाज के विद्वानों के लिए कितना प्रेरणादायक हैं। वे स्वयं चिंतन करें।

पंजाब यूनिवर्सिटी चंडीगढ़ में दयानन्द चेयर स्थापित करने विषयक बताएं। आपने बताया था कि कैसे उस दौर में 5 लाख रुपये आपने एकत्र किये थे और दयानन्द चेयर के लिए आर्यसमाज के घोर विरोधी रहे देवसमाज के प्रबंधक से सिफारिशी पत्र लिखवाया था। आपने भारतीय जी को अजमेर से लाकर इस चेयर पर नियुक्त करवाया था। भारतीय जी ने चेयर पर रहते हुए अनेक शोधपूर्ण ग्रंथों का लेखन किया और कई दर्जन शोध प्रबंध छात्रों को लिखवाएं। बहुत कम लोगों को पता होगा कि परोपकारिणी सभा के पूर्व मंत्री डॉ धर्मवीर जी को भी भारतीय जी ने यहाँ से शोध प्रबंध लिखवाया था। बाद में डॉ रामनाथ वेदालंकार, डॉ विक्रम कुमार विवेकी, डॉ वीरेंदर वेदालङ्कार जैसे गणमान्य विद्वानों ने इस पद को सुशोभित कर आर्यसमाज के लेखन और शोध को गति दी। आर्य जगत को डॉ रामप्रकाश के इस योगदान के लिए अत्यंत आभारी होना चाहिए।

डॉ जी कहते थे कि मेरा मुलतान जाकर पं गुरुदत्त जी की जन्म भूमि को देखने का मन हैं। आपने पंजाब यूनिवर्सिटी में रहते हुए लाहौर के विश्वविद्यालय में केमिस्ट्री के प्रोफेसर को पत्र लिखा था कि वहां के विभाग में पं गुरुदत्त जी पर कोई जानकारी हो। पर कोई उत्तर नहीं मिला था। मैं जब मथुरा गया तो आप फोन से मुझे स्वामी दयानन्द से सम्बंधित स्थानों की जानकारी दे रहे थे। आप मथुरा जाकर दंडी स्वामी जी के शिष्य परम्परा में एक पौराणिक परिवार से दण्डी जी की उनके पूर्वजों द्वारा हस्तलिखित जीवन चरित्र को ले आये थे। उसे प्रकाशित कर आपने दण्डी जी को अपनी श्रद्धांजलि दी थीं। आपने दण्डी जी की चरण पादुका जिसे उक्त परिवार गुरुपर्व के अवसर पर हर वर्ष पूजता था को प्राप्त कर उसे परोपकारी सभा को भेंट किया था। आप कहते थे कि ऋषि दयानन्द के जीवन में उनके गुरु दण्डी जी एवं उनके सबसे प्रतीभाशाली शिष्य पं गुरुदत्त विद्यार्थी पर कार्य कर मुझे बहुत आत्मसन्तुष्टि हुई हैं। मैंने कहा आपसे प्रेरणा लेकर मैं स्वामी श्रद्धानन्द जी पर कार्य करूँगा। आप ने कहा कि कार्य बहुत विस्तृत हैं। स्वामी जी का कार्य 50 वर्षों के जीवनकाल तक विस्तृत हैं। मैंने कहा कि पूरा जीवन इसी में लगाएंगे। आपने स्वामी दयानन्द जी के जन्मस्थान पर लिखी दयाल मुनि जी की जीवनी को प्रकाशित किया था। उस जीवनी के आधार पर आपका कहना था कि बनारस के दशाश्वमेध घाट जाकर स्वामी दयानन्द के कुल औदीच्य ब्राह्मणों के पुरोहितों की बहियों से उनके कुल के विषय में अधिक जानकारी मिल सकती हैं। मुझे पं गुरुदत्त विद्यार्थी द्वारा प्रकाशित वैदिक मैगज़ीन के मूल 4 अंक एक पुराने पुस्तकालय से प्राप्त हुए थे। मैंने डॉ जी को सुपात्र जानकार यह अंक भेंट किये थे। पं गुरुदत्त जी द्वारा चारों वेदों की संहिता को प्रथम बार लाहौर से प्रकाशित किया गया था। आपने मुझे मूलप्रति अपने पास दिखाई थी। आप उसे प्राप्त करने की कथा भी मुझे बताई थी। आप एक स्थान पर आर्यसमाज में वक्ता के रूप में गए। श्रोताओं में एक पुराने से कपडे पहना हुआ एक व्यक्ति बैठा था। आपके वक्तव्य के पश्चात वो व्यक्ति आपको बोला कि मैं आपको कुछ दिखाना चाहता हूँ। डॉ जी ने सोचा कि इतने साधारण व्यक्ति के पास मेरे लिए क्या होगा? आप उसे साथ गए। वो अपनी दर्जी की दुकान पर उन्हें ले गया और वहां जाकर एक कपड़े में लिपटी हुई पुस्तक उन्हें भेंट दी। यह पुस्तक थी पं गुरुदत्त विद्यार्थी द्वारा प्रकाशित चारों वेदों की मूल संहिता जो उस काल में सबसे शुद्ध समझी जाती थी और जिसकी प्रति उस व्यक्ति के परिवार की अमूल्य निधि थी। डॉ जी ने मुझे बताया कि जीवन में साधारण व्यक्ति भी कैसे कैसे उपकार कर देते हैं। यह इसका प्रमाण था।

रोहतक प्रवास के समय आप तत्कालीन मुख्यमंत्री हुड्डा जी से मिलने आते, तो मेरे पास आ जाते थे। आपकी मधुर शैली और सत्संग का मुझे साथ मिलता। आप मेरे विवाह और क्लीनिक के उद्घाटन में मुख्य अतिथि के रूप में सम्मिलित हुए थे। आपने चंडीगढ़ जाते हुए मुझे कुरुक्षेत्र दयानन्द कन्या महाविद्यालय में आमंत्रित किया था। वहां पर डॉ भारतीय जी का पुस्तकालय आपने व्यस्थित रूप में स्थापित किया था। आपका कहना था कि मैं यहाँ अंतर्राष्ट्रीय स्तर का शोध केंद्र स्थापित करना चाहता हूँ, जहाँ पर देश विदेश से शोधकर्ता आकर शोध कार्य करें। मैंने कहा कि एक गलती हो गई मैं दिल्ली में बस गया हूँ। अन्यथा कुरुक्षेत्र में बस जाता और इस कार्य को आगे बढ़ाता।

आपने मुझे एक बार दिल्ली के कश्मीरी गेट स्थित ईसाईयों के पुस्तकालय में उपस्थित आर्यसमाज के साहित्य को अवलोकन करने का सुझाव दिया था। आपने कभी जवानी के दिनों में उक्त पुस्तकालय में साहित्य का अध्ययन किया था। आपके निर्देशानुसार में उक्त पुस्तकालय में गया और वहां पर उपस्थित अनेक ग्रंथों में ईसाई पादरियों द्वारा स्वामी दयानन्द पर लिखी सामग्री को फोटोस्टेट करके निकाला। इस बीच डॉ भारतीय जी से पत्र व्यवहार हुआ। आपने महेश प्रसाद मौलवी अलीम फ़ाज़िल जी का एक पुराना लेख जिसमें ईसाई पादरियों के स्वामी दयानन्द से शास्त्रार्थ की सूची थीं। मुझे उपलब्ध करवाई। मैंने उस सूची के आधार पर इंटरनेट पर उपस्थित अनेक पुस्तकों की खोज की थीं। 300 पन्नों के लगभग इस सामग्री को मैंने एकत्र कर भारतीय जी को भेजा था। जिसके आधार पर स्वामी दयानन्द और इसे मत नामक पुस्तक का उन्होंने लेखन और घूड़मल ट्रस्ट हिंडौन से प्रकाशन किया गया। इस पुस्तक को पढ़कर डॉ रामप्रकाश जी ने मुझे बधाई दी थीं। इस कार्य ने मुझे आर्यसमाज और गैर आर्यसमाज के पुस्तकालयों में जाकर सामग्री खोजने की प्रेरणा दी जिसका मुझे बहुत लाभ हुआ।

एक षड़यंत्र के तहत अजमेर से निकलने वाली एक पत्रिका में मेरे विषय में अनर्गल प्रलाप प्रकाशित होने लगा तो मैंने उसकी शिकायत आपसे की थीं। आपने पत्रिका के संपादक को फोन कर समझाया था। ऐसी नीति निपुणता और दूरदृष्टि आजकल के स्वय्मभू नेताओं में नहीं दिखती। एक उभरते हुए लेखक की कलम की हत्या के षड़यंत्र को आपने अपनी सूझ-बुझ से विफल कर दिया था। मैं आपका इस कृपा के लिए जीवन भर आभारी रहूँगा। डॉ जी को मैंने आर्यसमाजी राजनेता होते हुए अपवाद रूप में आर्यसमाज का प्रयोग अपनी राजनीति के लिए करते नहीं देखा। प्राय: हमारे राजनेता पिछले कई दशकों से आर्यसमाज का प्रयोग अपनी राजनीति के लिए करते हैं। यह निश्चित रूप से चिंतन का विषय हैं।

आपने दण्डी जी की कुटिया के विषय में मुझे जानकारी दी थीं कि इसका स्वरुप अब मूल नहीं हैं। प्रकाशवीर शास्त्री जी ने इस भूमि को प्राप्त कर नवीन भवन बना दिया था। यह मूल रूप के जैसा होना चाहिए। दण्डी जी की पाठशाला का मूल स्वरुप का चित्र मुझे एक माह पहले ही गुरुकुल कांगड़ी से प्रकाशित होने वाली वैदिक मैगज़ीन के 1908 के अंक में मिला और साथ में विश्राम घाट, मथुरा का मूल चित्र भी मिला जहाँ स्वामी जी स्नान करने और प्रयोग के लिए पानी लेने जाते थे। यह चित्र एक माह पहले मैंने डॉ जी को भेजे तो आप अत्यंत प्रसन्न हुए और बोले कि आपने बहुत अच्छी खोज की हैं। मेरा उनसे कहना था कि आपकी पुस्तकों के आगामी संस्करण में इन्हें संलग्न किया जाना चाहिए।

आपने 6 माह पहले कई हजार प्रतियों की संख्या में छपे अपने समस्त साहित्य को आर्य जगत में भेंट रूप में मेरे माध्यम से भेजा था। आप कहते थे कि पता नहीं आगे भेने का समय मिलेगा अथवा नहीं मिलेगा। आपको संभवत आगे का कुछ पूर्वानुमान हो गया था। इतने बड़े व्यक्तित्व के सत्संग और मार्गदर्शन से मेरी लेखनी को दिशा निर्धारण करने में जो सहयोग मिला उसके लिए मैं जीवन भर उनका आभारी रहूँगा। यह छोटा सा लेख मैंने उन्हें अपनी छोटी सी श्रद्धांजलि के रूप में लिखा हैं। इस लेख के साथ मैं दण्डी जी की शिक्षा कुटिया, स्वामी दयानन्द जी की आवास कुटिया और मथुरा के विश्राम घाट जिन स्थानों का स्वामी दयानन्द जी के जीवन से अटूट सम्बन्ध हैं। उनका चित्र पाठकों के लिए सलंग्न कर रहा हूँ।

डॉ रामप्रकाश जी आजीवन मेरे लिए प्रेरणा स्रोत्र एवं मार्गदर्शक बने रहेंगे। पुण्य आत्मा को विनम्र श्रद्धांजलि।

Comment:

norabahis giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
Betgaranti Giriş
betgaranti girş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
hititbet giriş
imajbet giriş
betasus giriş
jojobet giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
norabahis giriş
meritking giriş
meritking giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
hiltonbet giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
hiltonbet giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
hiltonbet giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
betpark giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
betpark giriş
bettilt giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
hiltonbet giriş
hiltonbet giriş
meritking giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
meritking giriş
meritking giriş
betorder giriş
betorder giriş
betorder giriş
betorder giriş
imajbet giriş
hiltonbet giriş
roketbet giriş
hiltonbet giriş
betnano giriş
betnano
betnano giriş
holiganbet giriş
bets10 giriş
romabet giriş
romabet giriş
betnano
betpark giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
betorder giriş
betorder giriş
bettilt giriş
vdcasino giriş
betpark
betpark giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
elexbet giriş
betgaranti giriş
vdcasino giriş
betgaranti giriş
vdcasino giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
bets10 giriş
betnano giriş
betnano giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
betnano giriş
betpark giriş
holiganbet giriş
roketbet giriş
roketbet giriş
roketbet giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
vdcasino giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
vdcasino giriş
betpark giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
marsbahis giriş
marsbahis giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
marsbahis giriş
galabet giriş
vdcasino giriş
betgaranti giriş
vdcasino
vdcasino giriş
vaycasino giriş
Noktabet giriş
noktabet giriş
betgaranti
betpark giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
Noktabet giriş
noktabet giriş
Noktabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betnano giriş
bettilt giriş
roketbet giriş
roketbet giriş
betnano giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
vdcasino giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
vdcasino giriş
vaycasino giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
vaycasino
vdcasino giriş
betpark giriş
betpark giriş