महाभारत की शिक्षाप्रद कहानियां अध्याय- १३ क ज्ञानी पुत्र का पिता को उपदेश

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( धर्मराज युधिष्ठिर भीष्म पितामह के दीर्घकालिक अनुभवों के मोतियों को बातों – बातों में ज्ञानोपदेश के माध्यम से लूट रहे थे। यह एक अद्भुत और दुर्लभ वार्तालाप है। ज्ञान मोतियों को लूटने की बड़ी भयंकर डकैती थी यह। सचमुच , एक ऐसी डकैती जिस पर प्रत्येक राष्ट्रवासी को गर्व की अनुभूति होती है। संसार के अन्य देश जहां भौतिक धन संपदा की लूट को डकैती मानते रहे वहीं भारत की अद्भुत ऋषि परंपरा में ज्ञान मोतियों की लूट को ही डकैती माना गया और इस डकैती पर सब आनंद भी मनाते रहे।
संसार के अन्य देशों के इतिहास में धर्मराज युधिष्ठिर और भीष्म जी जैसा वार्तालाप मिलना असंभव है। जिसमें एक दादा अपने पौत्र को अपने अनुभवों की सारी दौलत को लुटा देना चाहता है। यह कार्य इसके उपरांत हो रहा है कि दादा यह भली प्रकार जानता है कि यह वही पौत्र है जो उनसे उनकी मृत्यु का रहस्य जान कर गया था और फिर जैसे – जैसे मैंने अपनी मृत्यु का रहस्य बताया था वैसे-वैसे ही इसने उसे लागू किया था। इसी के कारण मैं यहां पर मृत्यु शय्या पर पड़ा हूं और अब यह पौत्र ही आकर मेरे से ज्ञान की बातें पूछ रहा है। क्या सामान्य लोगों में यह संभव है कि जिस पौत्र के कारण पितामह इस अवस्था में पड़ा हो, उसमें भी वह अपने पौत्र को गंभीर ज्ञान की बातें बता सके? कदापि नहीं।
उन दोनों को पता है कि अब एक की अर्थात दादा के जीवन की सांझ होने ही वाली है। साधारण मनुष्य इस प्रकार के क्षणों में विचलित होते हैं। रोने पीटने लगते हैं। अब क्या होगा या आपके जाने के बाद क्या होगा ? इस प्रकार के अनर्थक प्रश्न तो उनके माध्यम से आ सकते हैं, पर ज्ञान की गंभीरता को प्रकट करने वाले प्रश्न वहां पर सुनने को नहीं मिल सकते।
महाभारत को पांचवा वेद इसीलिए कहा जाता है कि इसकी हर पंक्ति में कोई ना कोई ऐसा संदेश छुपा है जिससे जीवन का कल्याण हो सकता है। भीष्म पितामह और युधिष्ठिर का यह संवाद तो अनेक जीवंत और प्रेरणास्पद कथा कहानियों से भरा पड़ा है। इन कथा- कहानियों में ज्ञान की गंभीरता है। जीवन का कल्याण करने की पवित्रता है और व्यक्ति को धर्म का निर्वाह करते हुए मोक्ष की ओर बढ़ने की अद्भुत प्रेरणा है। – लेखक)

शिक्षाप्रद संवाद को जारी रखते हुए धर्मराज युधिष्ठिर ने भीष्म जी से पूछ लिया कि “पितामह ! समस्त प्राणियों का संहार करने वाला यह काल निरंतर व्यतीत हो रहा है । ऐसी स्थिति में मनुष्य को ऐसा क्या करना चाहिए जिससे उसका कल्याण हो सकता है?”
धर्मराज युधिष्ठिर के मुखारविंद से इस प्रकार के निश्छल प्रश्न को सुनकर भीष्म जी को फिर प्राचीन काल में संपन्न हुए पिता पुत्र के एक संवाद का स्मरण हो आया। उन्होंने पिता एवं पुत्र के इस संवाद को युधिष्ठिर के प्रश्न के उत्तर के रूप में सुनाना आरंभ कर दिया।
भीष्म जी ने उस संवाद को सुनाते हुए युधिष्ठिर से कहा कि “कुंतीकुमार ! प्राचीन काल में वेदशास्त्रों के प्रति अगाध श्रद्धा रखने वाले एक स्वाध्यायशील ब्राह्मण हुआ करते थे। ब्राह्मण देवता ईश्वर के प्रति भी गहरी आस्था रखते थे। उनके घर में एक पुत्र ने जन्म लिया। उनका वह पुत्र महामेधा संपन्न था। जैसी उसकी बुद्धि थी, वैसे ही उसके भीतर गुणों का खजाना छिपा हुआ था। पिता ऐसे पुत्र को पाकर अपने आपको परम सौभाग्यशाली समझता था। वह पुत्र धर्म ,अर्थ और मोक्ष के संबंध में तो गहरा ज्ञान रखता ही था साथ-साथ लोक व्यवहार के बारे में भी उसकी बुद्धि का कोई जवाब नहीं था।
उस बालक के पिता भी अक्सर अध्ययनरत रहते थे। वेदादि ग्रंथों का अध्ययन करना उनके स्वभाव में सम्मिलित था । पिता की शास्त्रों के प्रति इस श्रद्धा भावना को देखकर एक दिन उस मेधावी बालक ने कहा कि “पिताजी ! मनुष्यों की आयु बड़ी तेज गति से बीतती जा रही है। इस बात को ध्यान में रखते हुए एक समझदार पुरुष को क्या करना चाहिए ? आप मुझे कृपया इसके बारे में विस्तार से बताने का कष्ट करें। जिससे मैं धर्म मार्ग को अपना सकूं।”
बच्चे ने पिता के समक्ष एक गंभीर प्रश्न खड़ा कर दिया था। वास्तव में इस प्रश्न के उत्तर में जीवन का कल्याण मार्ग स्पष्ट हो जाना था । बच्चे के इस गंभीर प्रश्न को सुनकर ज्ञानी पिता ने कहा कि “वत्स! जीवन के कल्याण मार्ग को अपनाने की अभिलाषा रखने वाले व्यक्ति को चाहिए कि वह ब्रह्मचर्य व्रत पूर्वक वेदों का अध्ययन करे। उनके मर्म को पहचाने और अपने धर्म को पहचाने। फिर उसी के अनुसार अपने जीवन का निर्माण करे। जब अध्ययन काल अर्थात ब्रह्मचर्य आश्रम पूर्ण हो जाए तो उसके पश्चात गृहस्थ आश्रम में प्रवेश कर संतान उत्पत्ति करनी चाहिए। जिससे माता-पिता आदि को प्रसन्नता प्राप्त हो। अपने इस धर्म के निर्वाह में भी अति नहीं करनी चाहिए। क्योंकि यह शरीर ऊर्जा के अपव्यय के लिए नहीं बल्कि संसार के भवसागर को पार करने के लिए एक नैया के रूप में मिला है।
जिन तीन अग्नियों का उल्लेख एक सदगृहस्थ के लिए किया गया है, उनकी स्थापना करे और यज्ञों का अनुष्ठान करता रहे। इसके पश्चात वानप्रस्थ आश्रम और संन्यास आश्रम के धर्म का निर्वाह करे। वानप्रस्थ जीवन जीते हुए गुणात्मक रूप से ज्ञान वृद्धि करे और उसके पश्चात संन्यासी होकर जीवन के अनुभवों को और अर्जित किए गए ज्ञान को संसार के कल्याण के लिए बांटने का पवित्र कार्य करे । हमारे ऋषियों ने आश्रम व्यवस्था का विधान इसीलिए किया है कि जीवन को उत्तमता से जिया जा सके । जिस प्रकार से हमारी आयु तेजी से घटती जा रही है उसके पल-पल का उपयोग करने के लिए प्रत्येक आश्रम के धर्म का भी विधान किया गया है।”
उस मेधावी बालक ने पिता के दिए अभी तक के उपदेश को अपर्याप्त मानते हुए फिर एक प्रश्न उछाल दिया। उसने कहा कि “पिताजी ! जब यह सारा संसार मृत्यु के द्वारा मारा जा रहा है और वृद्धावस्था के द्वारा मनुष्य चारों ओर से घेर लिया गया है, दिन और रात्रि प्रतिदिन जीवन की डोर को काट रहे हैं, ऐसी स्थिति में भी आप धीर की भांति मुझे कैसी बातें बता रहे हो?”
बालक की इस प्रकार की बातों को सुनकर पिता ने उससे पूछा कि “पुत्र ! ऐसे प्रश्न दागकर तुम मुझे डरा क्यों रहे हो ? यदि मेरी बातों से तुम्हारा समाधान नहीं हुआ है तो तुम ही मुझे बताओ कि यह लोक किसके द्वारा मारा जा रहा है ? वह क्या है जिसने इसे चारों ओर से घेर रखा है और ऐसे व्यक्ति कौन हैं जो सफलतापूर्वक अपना कार्य करके जा रहे हैं?”
वह बालक अपने पिता से कुछ व्यावहारिक बातें करने का मन बना चुका था। वह शास्त्र की गूढ़ बातों से बाहर निकल कर कुछ ऐसी सहज और सरल बातों के माध्यम से अपने समाधान तक जाना चाहता था जिन्हें अपनाकर मनुष्य अपना कल्याण कर सकता है। इस दृष्टिकोण से प्रेरित होकर उसने अपने पिता के पूछे गए प्रश्नों का जवाब देते हुए कहा कि “पिता श्री ! यह सारा संसार केवल मृत्यु के द्वारा ही मारा जा रहा है। मृत्यु मानो झोली बनाए घूम रही है। जिसमें वह नित्य प्रति अनेक प्राणियों के जीवन का हरण कर ले जाती है। उसके इस प्रकार के रूप को देखकर सभी प्राणियों को उससे डर लगता है। एकमात्र बुढ़ापा ऐसी चीज है जिसने समस्त संसार को चारों ओर से घेर लिया है और दिन-रात ही वे व्यक्ति हैं जो सफलतापूर्वक प्राणियों की आयु का हरण करके अपना कार्य करके व्यतीत हो रहे हैं । आप जैसे ज्ञानी पुरुष के मस्तिष्क में यह बात सहज रूप में आ जानी चाहिए, ऐसा मेरा विश्वास है।”

डॉ राकेश कुमार आर्य

( यह कहानी मेरी अभी हाल ही में प्रकाशित हुई पुस्तक “महाभारत की शिक्षाप्रद कहानियां” से ली गई है . मेरी यह पुस्तक ‘जाह्नवी प्रकाशन’ ए 71 विवेक विहार फेस टू दिल्ली 110095 से प्रकाशित हुई है. जिसका मूल्य ₹400 है।)

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