देश का विभाजन और सावरकर, अध्याय -20 ख सारे कांग्रेसी मौन हो गए थे

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उस समय नेहरू गांधी की कांग्रेस के किसी भी नेता के पास समय नहीं था कि हम लोगों की पीड़ा के विषय में कोई सोचे, सुने या समझे। जब ये लोग शिकारी कुत्ते की भांति हमारा शिकार कर रहे थे, तब भी हमारा राष्ट्रीय नेतृत्व हाथ पर हाथ धरे बैठा था। यह कर्तव्य के प्रति संवेदनहीनता की पराकाष्ठा थी। पर यह सब कुछ हो रहा था। टूटे हुए दिलों और रिसते हुए घावों पर मरहम लगाने या आंसू पोंछने का वक्त नेताओं के पास नहीं था।
कांग्रेस की इस प्रकार की नीति और सोच को देखकर लोगों को बड़ा कष्ट होता था।
उस समय लोगों का अपने नेतृत्व के प्रति भरोसा उठ चुका था। ऐसे अनेक कांग्रेसी थे जिन्हें उस समय सत्ता प्राप्त करने की शीघ्रता थी । पंडित जवाहरलाल नेहरू स्वयं भी उनमें से एक थे। उन्हें भी प्रधानमंत्री बनने की शीघ्रता थी । उस समय के बड़े कांग्रेसी नेता महात्मा गांधी के पास या नेहरू जी के पास जा जाकर अपने लिए मंत्री पद पाने , विदेश में राजदूत का पद पाने या राष्ट्रमंडल के देशों में हाई कमिश्नर नियुक्त होने या किसी प्रदेश के मुख्यमंत्री या राज्यपाल का पद पाने की लालसा में लगे हुए थे। उनके आचरण से लगता था कि उन सबको सत्ता की भूख सता रही थी।
इस समय लोगों की स्थिति क्या थी और उनके दिल पर क्या गुजर रही थी ? इस ओर उनकी संवेदनहीनता लोगों को साल रही थी। गांधीजी भी कोई निर्णायक भूमिका नहीं निभा पा रहे थे। सरदार पटेल निश्चित रूप से उस समय सराहनीय कार्य कर रहे थे। पर इसी समय सावरकर जी भी हिंदू महासभा के कार्यकर्ताओं के माध्यम से लोगों के लिए यथासंभव सहयोग करवा रहे थे। ऐसे राष्ट्रवादी लोगों के प्रति लोगों के भीतर विशेष श्रद्धा का भाव देखा जा रहा था। मैं यद्यपि उस समय बहुत छोटा था, परंतु उसके बाद पिताजी और दूसरे लोगों के माध्यम से सरदार पटेल और सावरकर जी की प्रशंसा मुझे बार-बार सुनने को मिली। पिताजी हिंदू महासभा और सावरकर जी के हिंदू हितैषी भाव के बारे में बताते रहे। उनके द्वारा सुनाए गए व्रत्तांतों के आधार पर सावरकर जी के प्रति मेरी निष्ठा जीवन भर बनी रही है। यही कारण था कि वह हम हिंदुओं के प्रति उस समय पूर्णतया मौन हो गए थे। स्वतंत्रता की प्रभात में देश के नेतृत्व का इस प्रकार मौन हो जाना बता रहा था कि वे उस समय भी हिंदुओं की अपेक्षा मुसलमानों को प्राथमिकता दे रहे थे। इस प्रकार का पक्षपाती आचरण किसी भी नेता से अपेक्षित नहीं था, पर ऐसा हो रहा था।

हम निभा रहे थे ‘कबूतरी धर्म’

 यद्यपि 1947 में हुए देश विभाजन के संबंध में यह बात भी सही है कि उससे कुछ समय पहले तक हमें गांधीजी और नेहरू जी जैसे नेताओं पर पूरा विश्वास था। साथ ही हमारा विश्वास था कि जब हम किसी संप्रदाय विशेष के व्यक्ति के साथ कोई बुरा नहीं करते हैं और ना उनका बुरा सोचते हैं तो वह भी समय आने पर हमारे लिए बुरा क्यों सोचेंगे ? जैसे हमारे भीतर मानवीय भाव थे वैसे ही भाव हम दूसरे संप्रदायों के लोगों में अपने प्रति देखते थे। बिल्ली को आते देख कर जैसे कबूतर आंखें बंद कर लेता है और वह समझ लेता है कि अब तू बिल्ली को दिखाई नहीं दे रहा है और बिल्ली कबूतर की मूर्खता के चलते ही उसे अपना शिकार बना लेती है। वास्तव में हमारी उस समय की ऐसी मानसिकता हमारे लिए 'कबूतरी धर्म' ही बन कर रह गई थी। जो हमारे लिए सबसे अधिक खतरनाक साबित हुई। हमें पहला धोखा अपने नेताओं से मिला और दूसरा धोखा हम स्वयं ही खा गए कि हमने पूर्णतया सांप्रदायिक लोगों को भी मानवीय समझ लिया।

गांधीजी का अनोखा प्रस्ताव

उस समय गांधी जी ने देश के विभाजन को टालने के उद्देश्य से प्रेरित होकर वायसराय के सामने एक अनोखा प्रस्ताव रखा था कि आप वर्तमान मंत्रिमंडल को भंग कर दें। उसके पश्चात आप जिन्नाह को सरकार बनाने का निमंत्रण दीजिए। सरकार के सभी सदस्य मुसलमान हों या न हों, इससे कोई अंतर नहीं पड़ता। यदि जिन्नाह प्रस्ताव मान लेते हैं तो कांग्रेस की ओर से मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि हम उनका सरकार चलाने में पूर्ण सहयोग करेंगे। यद्यपि गांधी जी का यह प्रस्ताव कुछ सीमा तक ठीक था, पर माउंटबेटन का अंतिम उद्देश्य देश को बांट देना था। इसी उद्देश्य से प्रेरित होकर वह भारत आया था।

सावरकर जी की मान्यता

सावरकर देश को किसी भी स्थिति में सांप्रदायिक आधार पर बांटने के पक्षधर नहीं थे। उन्हें अपनी मातृभूमि का छोटे से छोटा टुकड़ा भी विधर्मियों को देने में अत्यंत कष्ट की अनुभूति हो रही थी। सावरकर जी मातृभूमि को अपने लिए सबसे पवित्र मानते थे जबकि गांधी जी की कांग्रेस पाकिस्तान को दिए जाने वाले भूभाग को जमीन का एक टुकड़ा मात्र मानती थी।
राष्ट्रवादी सावरकर जी नहीं चाहते थे कि जो भारत भूमि युग युगों से हिंदुओं की पवित्र भूमि और पितृभूमि रही है, उसे विदेशी मजहब वाले लोग तोड़ने में सफल हों। स्वामी दयानंद जी महाराज की भांति सावरकर जी की स्पष्ट मान्यता थी कि भारत भारतीयों का है। जैसे स्वामी दयानंद जी कहते थे कि आर्यावर्त आर्यों का है वैसे ही सावरकर हिंदुस्तान को हिंदुओं का मानते थे।
वह इस पवित्र भूमि को हिंदुस्तान के रूप में नहीं बल्कि ‘हिंदू’ ‘स्थान’ के रूप में देखते थे।
हमारी छत पर उस दिन एक बहुत बड़े पात्र में खजूर भी रखी थीं। किसी भी व्यक्ति ने उस दिन एक भी खजूर को छुआ तक नहीं था। सबकी भूख प्यास समाप्त हो चुकी थी। लोग बैठे हुए सांसें गिन रहे थे। यदि हवा के झोंके से भी पत्ता हिलते थे तो भी लगता था कि ‘अल्लाह हू अकबर’ कहने वाले हथियारों और हथियारों से लैस गुंडे बदमाश कहीं निकट ही आ चुके हैं। लोगों का गुमसुम बने बैठे रहना उस समय मुझे समझ नहीं आ रहा था।
पर उनके वे चेहरे आज तक मेरे चित्त पर अंकित हैं।

डॉ राकेश कुमार आर्य

( यह लेख मेरी नवीन पुस्तक “देश का विभाजन और सावरकर” से लिया गया है। मेरी यह पुस्तक डायमंड पॉकेट बुक्स दिल्ली से प्रकाशित हुई है जिसका मूल्य ₹200 और पृष्ठ संख्या 152 है।)

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