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Dr D K गर्ग

ये लेख तीन भागो में है ,कृपया ज्ञानवर्धन के लिए पूरा पढ़े और शेयर भी करे। विनम्र निवेदन है।
भाग-१

हिंदू धर्म में कुछ महत्वपूर्ण पशु पक्षियों को भी पूजा जाता हैं.जैसे गणेश की सवारी चूहा,शिव की सवारी बैल,इसी तरह विष्णु की सवारी गरुड़ पक्षी है।
ये गरुड़ पक्षी पूर्णतया मांसाहारी है। जो चील और बाज से बड़ा होता है, और इसकी चोंच चील से बड़ी होती है। इसका प्रिय भोजन नाग सर्प है।गरुड़ पक्षियों की प्रजातियां विदेशों के साथ साथ भारत में हिमालय उत्तराखंड उत्तर प्रदेश बिहार , झारखंड,छत्तीसगढ़ में है। किन्तु मनुष्य के लालच के कारण गरुड़ पक्षियों की संख्या कम होती जा रही है।

गरुड़ से संबंधित पौराणिक कथाएं:
गरुड़ प्रजापति कश्यप और उनकी पत्नी विनता की सन्तान और अरुण के छोटे भाई हैं। त्रेतायुग में गरुड़ ने श्रीराम के छोटे भाई और राजा दशरथ के दूसरे स्थान के पुत्र भरत के रूप में अवतार लिया था।
अन्य कथाये भी मिलेंगी जैसे कि गरुड़ की माता को शाप, दक्ष प्रजापति की ८४ कन्याएँ उनमें १७ का विवाह महर्षि कश्यप के साथ , कश्यप के वरदान स्वरूप कद्रू ने एक हजार अंडे और विनता ने दो अंडे प्रसव किये ,विनता ने एक अंडे को फोड़ डाला उसमें से निकलने वाला बच्चा अरुण था और उसका का ऊपरी अंग पूर्ण हो चुका था किन्तु नीचे के अंग नहीं बन पाये थे। उस बच्चे ने क्रोधित होकर अपनी माता को शाप दे दिया कि माता! तुमने कच्चे अंडे को तोड़ दिया है इसलिये तुझे पाँच सौ वर्षों तक अपनी उसी बहन तथा सपत्नी की दासी बनकर रहना होगा। इतना कहकर अरुण नामक वह बालक आकाश में उड़ गया और सूर्य नारायण के रथ का सारथी बन गया।समय आने पर विनता के दूसरे अंडे से महातेजस्वी गरुड़ की उत्पत्ति हुई। उनकी शक्ति और गति अद्वितीय थी। और गरुड़ ने ही अमृत घट को नागों को देकर अपनी माता विनता को दासता से मुक्ति दिलाई।
गरुड़ और उनके बड़े भाई अरुण का विवाह पक्षी कुल में दो बहनों से हुआ ।गरुड़ की पत्नी का नाम उन्नति और अरुण की पत्नी का नाम श्येनी है तथा अरुण के दो पुत्र जटायु और सम्पाती हुए और गरुड़ के पुत्र सुमुख हुए ।
इस प्रकार की अनेकों परी कथाये मिलेंगी जिनके विषय में चर्चा करने से मूल विषयखो जायेगा ,उपरोक्त चर्चा केवल ये बताने के लिए है की किस प्रकार से अज्ञानी और विधर्मियो ने हिंदू धर्म को पाखंड की तरफ धकेला है जिससे बाहर निकलना चाहिए।
गरुड़ और गरुड़ पुराण विश्लेषण :
जिसका भोजन जीवित जीव का शिकार करके उनका मांस खाना है। ये तो बेचारे पक्षी को भी नहीं मालूम की उसका नाम गरुड़ है , वह ईश्वर (विष्णु) की सवारी है ,और इसकी पूजा करने से मोक्ष्य मिल जाता है। ये पक्षी अपने कर्मो का फल भोग रहा है। लें हमारे पौराणिक लेखक इतनी बढ़ी खोज गरुड़ के विषय में कर लेंगे ,और एक पुराण गरुड़ के नाम पर भी लिख दिया जायेगा ,परिवार में मृत्यु के बाद मोक्ष्य तक ले जाने की जिम्मेदारी गरुड़ की होगी ,इसके लिए पण्डे जी गरुड़ पाठ करेंगे ,फी लेंगे ,कपडे लेंगे लेकिन गरुड़ को इसमें से कुछ नहीं मिलेगा। ये तो वैसे ही आकाश में शिकार के लिए भटकता रहेगा या पकडे जाने पर किसी का अरब के शेख का पालतू जीव बन जायेगा या किसी चिड़ियाघर में कैद हो जाएगा ।
झूठ व पाखंड का पुलिंदा : गरुड़ पूजा और गरुड़ पुराण
वैसे तो सभी पुराणों में अनाप-शनाप लिखा हुआ है, जो विज्ञान और तर्क की कसौटी पर कहीं भी खरा नहीं उतरता है। जबकि आज भारतीय वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष अनुसंधान में इतनी उन्नति कर ली है कि आज अमेरिका जैसा देश इस का लोहा मानता है। वहीं, दूसरी तरफ देश का समाज अंधविश्वासों में उलझ कर अपने आप को अंधकार में रखना चाहता है। हमारा समाज सदियों से अंधविश्वासों की बेडिय़ों में जकड़ा है। इस समाज को पथभ्रष्ट करने वाली धार्मिक पोथियों में ‘गरुड़ पुराण’ सर्वोपरि है।
यदि ग्रन्थ , पुराण और शास्त्रों की माने तो जब कोई व्यक्ति मरणासन्न अवस्था में हो और वे गरुड़ पक्षी के दर्शन कर ले तो उसके लिए वह बहुत सौभाग्य की बात होती है और उसे बैकुंठ में स्थान मिलता है।
इसका मतलब ये हुआ की गरुड़ जिस भी पशु पक्षी का शिकार करता है , उसको तो मोक्ष्य पक्का है ?
1.अंधविश्वास की परिकाष्ठा
गरुड़ पुराण में कहा गया है कि पापियों के प्राण गुदा जैसी नीचे की जननेंद्रियों से और पुण्य करने वाले व्यक्तियों के प्राण ऊपर के अंगों से निकलते हैं ,जबकि वास्तविकता यह है कि मनुष्य की मौत श्वसन तंत्र फेल हो जाने से ही होती है।
गरुड़ पुराण के प्रथम अध्याय के अनुसार, मृत्यु के बाद मनुष्य का कद एक अंगूठे के आकार जितना रह जाता है और उस को यमलोक की यात्रा करवाने के लिए निकले दूत भयानक होते हैं। पुस्तक के प्रथम अध्याय में कहा गया है कि यमदूत अंगूठे के आकार के मृत व्यक्ति को घसीटते हैं, जहरीले सांपों से डसवाते हैं, तेज कांटों से बेधते हैं, शेर व बाघ जैसे हिंसक जानवरों के सामने आहार के रूप में परोसते हैं, आग में जलाते हैं, कुत्तों से कटवाते व बिच्छुओं से डसवाते हैं। और भी पता नहीं क्या-क्या?
यहां प्रश्न उठता है कि इतनी यातनाएं देने के बाद भी अंगूठे के आकार का मनुष्य जीवित कैसे रह सकता है? और क्या विशालकाय यमदूतों को अंगूठे के आकार के व्यक्ति को घसीटने की जरूरत पड़ सकती है? वह भी एक अंगूठे के आकार के व्यक्ति को ले जाने के लिए और घसीटने के लिए कई यमदूतों की आवश्यकता पड़ती है। कहने का अर्थ है कि एक अंगूठा कई अंगूठों पर भारी पड़ता है। फिर ये यमदूत किस काम के?
सजाएं यहीं समाप्त नहीं होतीं। इतने छोटे आकार के व्यक्ति को छुरी की धार पर चलाया जाता है। अंधेरे कुओं में फेंका जाता है। जोंकों भरे कीचड़ में फेंक कर जोंकों से कटवाया जाता है। उसे आग में गिराया जाता है। तपती रेत पर चलाया जाता है। उस पर आग, पत्थरों, हथियारों, गरम पानी व खून की वर्षा भी की जाती है। अंगूठे के आकार के व्यक्ति को वैतरणी नदी जिस का किनारा हड्डियों से जोड़ा गया है व जिस में रक्त, मांस व मवाद का कीचड़ भरा है, में डुबोया जाता है। अर्थात इंसान को डराने के लिए गरुड़ पुऱाण के लेखक ने जो भी अंधाधुंध कल्पनाएं कीं, आज उन्हें 21वीं सदी में भी स्वीकार किया जा रहा है।
उस के बाद यमदूत उसे समय-समय पर भारी मुगदरों से भी पीटते हैं। मृतक की नाक व कानों में छेद कर के उसे घसीटते हैं और शरीर पर लोहे का भार लाद कर भी चलवाते हैं। इस तरह की कई कथित यातनाएं मृतक को दी जाती हैं। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से वह मरता नहीं।
इस वैज्ञानिक युग में इस तरह की बातें अविश्वसनीय व हास्यास्पद नहीं हैं तो और क्या हैं?

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