मेवात की सांप्रदायिक हिंसा कहीं प्रायोजित तो नहीं थी?

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ललित गर्ग

नियंत्रण से बाहर होती हमारी व्यवस्था हमारे लोक जीवन को अस्त-व्यस्त कर रही है। प्रमुख रूप से गलती राजनेताओं और सरकार की है। कहीं, क्या कोई अनुशासन या नियंत्रण है? निरंतर साम्प्रदायिकता का दावानल फटता रहता है।

हरियाणा के जिला नूंह में धार्मिक शोभायात्रा पर पथराव के बाद भड़की साम्प्रदायिक हिंसा ने जो विकराल रूप लिया है वह भयावह एवं चिन्ताजनक तो है ही, यह सवाल भी छोड़ता है कि कानून-व्यवस्था को चुनौती देते हुए साम्प्रदायिक सौहार्द को नुकसान पहुंचाने की ऐसी घटनाएं आखिर थम क्यों नहीं रही हैं? क्यों प्रशासन अराजक तत्वों के आगे इतना बेबस हो जाता है? क्यों चुनावों से पहले ही ऐसी अराजक एवं साम्प्रदायिक शक्तियां सक्रिय होकर देश की शांति एवं सौहार्द की स्थितियों को तार-तार करने लगती हैं? क्यों नफरती, घृणा एवं द्वेष के भड़काव भाषणों पर नियंत्रण का बांध नहीं बांधा जाता? क्यों बार-बार सुप्रीम कोर्ट से इस तरह की हिंसा, आगजनी एवं साम्प्रदायिकता के खिलाफ गुहार लगानी पड़ती है? अगर हर बार हिंसा रोकने के लिये गुहार न्यायपालिका से करनी पड़े, तो विधायिका एवं कार्यपालिका की सार्थकता कितनी रह जाती है? इन प्रश्नों के अलावा मूल प्रश्न है कि आखिर नूंह की घटना ने समूचे हरियाणा को हिंसा की आग में क्यों और किस तरह झोंक दिया और इसका जिम्मेदार कौन।
नूंह की साम्प्रदायिक हिंसा एक षड्यंत्र एवं सुनियोजित साजिश थी। इस हिंसा के मामले में आवश्यकता इसकी भी है कि उसके पीछे के कारणों की तह तक जाया जाए, क्योंकि इतनी भीषण हिंसा बिना किसी सुनियोजित साजिश के नहीं हो सकती। नूंह में भयावह साम्प्रदायिक उन्माद एवं हिंसा में जलाभिषेक यात्रा में शामिल श्रद्धालुओं के साथ पुलिस को निशाना बनाया गया, बड़े पैमाने पर आगजनी, गोलीबारी और लूटपाट हुई, तभी इसके प्रतिक्रियास्वरूप अन्य इलाकों में हिंसा हुई, जिससे बचा जा सकता था। एक वर्ग विशेष में इस तरह की हिंसा को जानबूझकर दावानल बनने दिया जा रहा है, जिसका विस्फोट कभी हरियाणा तो कभी दिल्ली, कभी राजस्थान तो कभी अन्य प्रांतों में होता रहता है, जिसमें राजनीतिक दलों के अलावा, बुद्धिजीवी वर्ग एवं मीडिया की सक्रिय भूमिका है। इन पर नियंत्रण के लिये जरूरत सख्त कदम उठाने की हैं। नूंह हो या दिल्ली, किसी भी दोषी को बचाने की जरूरत नहीं है। हम आज एक अराजक एवं उन्मादी तत्व को बचायेंगे तो कल ऐसे दस पैदा हो जायेंगे। इसके लिये उत्तर प्रदेश का योगी मॉडल ही कारगर है।

साम्प्रदायिक तनाव एवं हिंसा की हर घटना के बाद एहतियाती उपाय भी खूब होते हैं लेकिन इस अहम सवाल का जवाब हमेशा बहुत पीछे छूट जाता है कि आखिर दंगों की ऐसी आग, आए दिन देश के अलग-अलग हिस्सों को क्यों झुलसाने लगी है?

दूसरा सवाल यह भी कि ऐसी साम्प्रदायिक हिंसा के लिए दोषी किसे ठहराया जाए? नूंह के मामले को भी बारीकी से समझा जाए तो लगता है कि प्रशासन और पुलिस ने इस धार्मिक जुलूस को लेकर सोशल मीडिया पर हो रही बयानबाजी को गंभीरता से नहीं लिया। संवेदनशील इलाकों में धार्मिक जुलूस की अनुमति देने से पहले जो पड़ताल की जानी चाहिए वह आखिर क्यों नहीं की गई? नूंह ही नहीं, बल्कि ऐसे सभी मामलों में सरकार में बैठे लोगों को इन सवालों के जवाब गंभीरता से तलाशने होंगे। एक बात और, ऐसे दंगों के बाद राजनेताओं और धर्म के ठेकेदारों के बयानों पर भी नजर रखनी होगी जो बेवजह समुदायों को उकसाने का काम करते हैं। हेट-स्पीच का बढ़ता प्रचलन ऐसी साम्प्रदायिक हिंसा को भड़काने का मूल कारण है। न जाने कितने नफरती भाषण ऐसे रहे, जिनमें किसी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। नूंह की हिंसा के मामले में इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि भड़काऊ भाषण दोनों पक्षों की ओर से दिए गए। स्पष्ट है कि दोनों पक्षों के खिलाफ बिना किसी भेदभाव कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। यह कार्रवाई ऐसी होनी चाहिए कि नफरती तत्वों को जरूरी सबक मिले। कई बार तो घोर आपत्तिजनक और भड़काऊ भाषण को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का आवरण पहना दिया जाता है। भड़काऊ भाषणों पर कार्रवाई के मामले में दोहरे मानदंड समस्या को बढ़ाने वाले ही सिद्ध हो रहे हैं। यह जो साबित करने की कोशिश हो रही है कि ऐसे भाषण केवल किसी एक विशेष समूह या विचारधारा से जुड़े लोग ही दे रहे हैं, वह एक शरारती एजेंडा है और उसे बेनकाब करने की आवश्यकता है। क्योंकि हिंसा करने वाले दोषी लोगों से ध्यान हटाने यह एक जरिया है।

देश में दंगों की आग कब और कहां भड़क जाए, यह कोई नहीं जानता। खास तौर पर धार्मिक जुलूस निकालने को लेकर छिड़ा कोई विवाद जब साम्प्रदायिक तनाव में बदल जाए तो फिर हिंसा की आग बेकाबू होते देर नहीं लगती। यह सवाल इसलिए भी जरूरी है क्योंकि ऐसी घटनाओं में हर बार जान-माल का भारी नुकसान सरकारी दस्तावेज में सिर्फ आंकड़ा बन कर ही रह जाता है। नूंह के दंगों की आग ने जो विकराल रूप लिया, उसके चलते वहां कर्फ्यू लगाने की नौबत आ गई है। हरियाणा के छह जिलों में निषेधाज्ञा लगाने के साथ-साथ हरियाणा से सटे राजस्थान के भरतपुर में भी अलर्ट जारी करना पड़ा है। नूंह दंगों की आंच गुरुग्राम तक जा पहुंची है जहां एक धार्मिक स्थल को भीड़ ने आग के हवाले कर दिया जिसमें एक जने की मौत हो गई, मौतें तो और भी हुई हैं। सब जानते हैं कि वोट बैंक पर कब्जा करने की राजनीति भी दंगों के पीछे छिपे कारणों में से एक रहती है। धर्म के नाम पर उन्माद से फायदा उठाने की चाह रखने वाले लोग ऐसे दंगों की आंच में भी अपनी सियासी रोटियां सेंकने से बाज नहीं आते हैं। दंगे भड़कने और हालात तनावपूर्ण हो जाने के बाद दंगों को दुर्भाग्यपूर्ण बताने और शांति की अपील करने मात्र से कुछ नहीं होने वाला। सरकारों को सख्त कदम उठाने ही होंगे।

नियंत्रण से बाहर होती हमारी व्यवस्था हमारे लोक जीवन को अस्त-व्यस्त कर रही है। प्रमुख रूप से गलती राजनेताओं और सरकार की है। कहीं, क्या कोई अनुशासन या नियंत्रण है? निरंतर साम्प्रदायिकता का दावानल फटता रहता है। कोई जिम्मेदारी नहीं लेता- कोई दंड नहीं पाता। राजनीति संकीर्ण एवं सम्प्रदायीकरण, इसी का चरम बिन्दु है। अपराधी केवल वे ही नहीं जिनके दिलों में सम्प्रदायिक संकीर्णता का जहर घुला है। वे भी हैं जो लोकतंत्र को तोड़ रहे हैं या जिनके दिमागों में अपराध एवं उन्माद भावना है। उन्मादी एवं अपराधी नियंत्रण से बाहर हो गये हैं। साम्प्रदायिक सोच वाले व्यक्ति नियंत्रण से बाहर हो गए हैं। और सामान्य आदमी के लिए जीवन नियंत्रण से बाहर हो गया है। अगर हम राष्ट्रीय दृष्टिकोण से विचारें तो हमें स्वीकारना होगा कि बहुत-सी बातें हमारे नियंत्रण से बाहर होती जा रही हैं।

वर्तमान दौर की सत्ता लालसा की चिंगारी इतनी प्रस्फुटित हो चुकी है कि सत्ता के रसोस्वादन के लिए जनता और व्यवस्था को पंगु बनाने की राजनीति चल रही है। प्रश्न है कि राजनीतिक पार्टियां एवं राजनेता सत्ता के नशे में डूबकर इतने आक्रामक एवं गैरजिम्मेदार कैसे हो सकते हैं? जैसे-जैसे आम चुनाव नजदीक आते जा रहे हैं साम्प्रदायिकता की जहर उगलने वाली स्थितियां ज्यादा प्रभावी होती जा रही है। बिना मेहंदी लगे ही हाथ पीले करने की फिराक में सभी राजनीतिक दल जुट चुके हैं। सवाल यह खड़ा होता है कि इस अनैतिक राजनीति का हम कब तक साथ देते रहेंगे? इस पर अंकुश लगाने का पहला दायित्व तो हम जनता पर ही है।

सत्ता से जुड़े एवं राजनीतिक स्वार्थ की रोटियां सेंकने वाले साम्प्रदायिक सौहार्द एवं सद्भावना कायम करने में नकारा साबित हो रहे हैं इसलिये सुप्रीम कोर्ट की ओर से समाज को ऐसा कोई संदेश जाना चाहिए कि घृणा का जवाब घृणा, नफरत का जवाब नफरत और हिंसा का जवाब हिंसा नहीं हो सकती। सभी को यह समझना ही होगा कि शांति और सद्भाव का वातावरण ही उनके और देश के हित में है। यदि समाज अपने नैतिक और नागरिक दायित्वों को लेकर नहीं चेतता तो फिर चप्पे-चप्पे पर सीसीटीवी कैमरे लगाने से भी बात बनने वाली नहीं। इतने बड़े देश में यह काम आसानी से संभव भी नहीं। राष्ट्रीय जीवन में सौहार्द, शांति एवं सद्भावना ऐसी सम्पदाएं हैं कि अगर उन्हें रोज नहीं संभाला जाए या रोज नया नहीं किया जाए तो वे खो जाती हैं। कुछ सम्पदाएं ऐसी हैं जो अगर पुरानी हो जाएं तो सड़ जाती हैं। कुछ सम्पदाएं ऐसी हैं कि अगर आप आश्वस्त हो जाएं कि वे आपके हाथ में हैं तो आपके हाथ रिक्त हो जाते हैं। इन्हें स्वयँ जीकर ही जीवित रखा जाता है। आज हमारे पास ऐसा एक भी राजनेता नहीं है जो नफरत, घृणा एवं द्वेष की साम्प्रदायिक स्थिति से राष्ट्र को बाहर निकाल सके, राष्ट्रीय चरित्र को जीवित रखने का भरोसा दिला सके। डेढ़ अरब की यह निराशा कितनी घातक हो सकती है।

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