वर्तमान परिप्रेक्ष्य में लक्ष्य से भटकती पौराणिक कांवर यात्राएं

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डॉ. राधे श्याम द्विवेदी

कांवड़ को शिव जी का स्वरूप कहा गया है :-
कांवड़ शिव की आराधना का ही एक रूप है। इस यात्रा के जरिए जो शिव की आराधना कर लेता है, वह धन्य हो जाता है। कांवड़ का अर्थ है परात्पर शिव के साथ विहार। अर्थात ब्रह्म यानी परात्पर शिव, जो उनमें रमन करे वह कांवरिया। “कस्य आवरः कावरः” ‘अर्थात परमात्मा का सर्वश्रेष्ठ वरदान।’ एक अन्य मीमांसा के अनुसार ‘क’ का अर्थ जीव और ‘अ’ का अर्थ विष्णु है, वर अर्थात जीव और सगुण परमात्मा का उत्तम धाम। इसी तरह ‘कां’ का अर्थ जल माना गया है और आवर का अर्थ उसकी व्यवस्था। जलपूर्ण घटों को व्यवस्थित करके विश्वात्मा शिव को अर्पित कर परमात्मा की व्यवस्था का स्मरण किया जाता है। ‘क’ का अर्थ सिर भी है, जो सारे अंगों में प्रधान है, वैसे ही शिव के लिए कांवड़ का महत्व है जिससे ज्ञान की श्रेष्ठता का प्रतिपादन होता है। ‘ क’ का अर्थ समीप और आवर का अर्थ सम्यक रूप से धारण करना भी है। जैसे वायु सबको सुख, आनंद देती हुई परम पावन बना देती है वैसे ही साधक अपने वातावरण को पावन बना सकता है।
कांवड़ के व्युत्पत्ति परक जो अर्थ किए गए हैं, उनमें एक के अनुसार ‘ क’ अक्षर अग्नि को द्योतक है और आवर का अर्थ ठीक से वरण करना। प्रार्थना यह है कि अग्नि अर्थात स्रष्टा, पालक एवं संहार कर्ता परमात्मा हमारा मार्गदर्शक बने और वही हमारे जीवन का लक्ष्य हो तथा हम अपने राष्ट्र और समाज को अपनी शक्ति से सक्षम बनाएं।
इन तमाम अर्थों के साथ कांवड़ यात्रा का उल्लेख एक रूपक के तौर पर भी करते हैं। गंगा शिव की जटाओं से निकली हुई हैं। उसका मूल स्रोत विष्णु के पैर है। भगीरथ के तप से प्रसन्न होकर विष्णु ने गंगा से जब पृथ्वी पर जाने के लिए कहा तो वह अपने इष्ट के पैर छूती हुई स्वर्ग से पृथ्वी की ओर चली। वहां उसके वेग को धारण करने के शिव ने अपनी जटाएं खोल दी और गंगा को अपने सिर पर धारण किया।
वहां से गंगा सगर पुत्रों का उद्धार करने के लिए बहने लगी। कांवड़ यात्रा के दौरान साधक या यात्री वही गंगाजल लेकर अभीष्ट शिवालय तक जाते हैं और शिवलिंग का अभिषेक करते हैं। शिव महिमा स्तोत्र के रचयिता आचार्य पुष्पदंत के अनुसार यह यात्रा गंगा का शिव के माध्यम से प्रत्यावर्तन है- अभीष्ट मनोरथ पूरा होने के बाद उस अनुग्रह को सादर श्रद्धा पूर्वक वापस करना , कांवर से गंगाजल ले जाने और अभिषेक द्वारा शिव को सौंपने का अनुष्ठान शिव और गंगा की समवेत आराधना भी है।
कम से कम श्रद्धालु जन तो यही मानते हैं कि शिव परमात्मा के रूप में तो सर्वव्यापी हैं, कण कण में विराजमान हैं पर पार्थिव रूप में वे इसी क्षेत्र में यहीं रहते हैं। उनसे संबंधित पुराण प्रसिद्ध घटनाओं का रंगमंच यही क्षेत्र रहा है। महाकवि कालिदास ने हिमालय को शिव का प्रतिरूप बताते हुए इसके सांस्कृतिक, भौगोलिक और धार्मिक महत्त्व को रेखांकित किया है।
उनके अनुसार हिमालय को देखें तो समाधि में बैठे महादेव, बर्फ के समान गौर उनका शरीर, चोटियों से बहते नद, नदी ग्लेशियर, झरने उनकी जटाएं, रात में चन्द्रोदय के समय सिर पर स्थित चन्द्रकला, गंगानदी का धरती पर आता अक्स खुद-ब-खुद दिमाग में उभरता जाता है।
शिव भूतनाथ, पशुपतिनाथ, अमरनाथ आदि सब रूपों में कहीं न कहीं जल, मिट्टी, रेत, शिला, फल, पेड़ के रूप में पूजनीय हैं। जल साक्षात् शिव है, तो जल के ही जमे रूप में अमरनाथ हैं। बेल शिव वृक्ष है तो मिट्टी में पार्थिव लिंग है। गंगाजल, पारद, पाषाण, धतूरा फल आदि सबमें शिव सत्ता मानी गई है। अतः सब प्राणियों, जड़-जंगम पदार्थों में स्वयं भूतनाथ पशुपतिनाथ की सुगमता और सुलभता ही तो आपको देवाधिदेव महादेव सिद्ध करती है।

देवाधिदेव महादेव को प्रसन्न करने का सरल तरीका:-

पुराणों में बताया गया है कि कांवड़ यात्रा देवाधिदेव महादेव को प्रसन्न करने का सबसे सरल और सहज तरीका है। भगवान शिव के भक्त बांस की लकड़ी पर दोनों ओर टिकी हुई टोकरियों के साथ गंगा के तट पर पहुंचते हैं और टोकरियों में गंगाजल भरकर लौट जाते हैं। कांवड़ को अपने कंधों पर रखकर लगातार यात्रा करते हैं और अपने क्षेत्र के शिवालयों में जाकर जलाभिषेक करते हैं। मान्यता है कि ऐसा करने से व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति होती है और जीवन में कभी कोई कष्ट नहीं होता है। साथ ही घर में धन धान्य की कभी कोई कमी नहीं होती है और अश्वमेघ यज्ञ के समान फल मिलता है। कांवड़ यात्रा में जहां-जहां से जल भरा जाता है, वह गंगाजी की धारा में से ही लिया जाता है। कांवड़ के माध्यम से जल चढ़ाने से मन्नत के साथ-साथ चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति होती है। हरिद्वार से जल लेकर दिल्ली, पंजाब आदि प्रांतों में करोड़ों यात्री जलाभिषेक करते हैं। यह यात्रा लगभग पूरे श्रावण मास से लेकर शिवरात्रि तक चलती है।
सावन माह में शिव भक्त गंगा या अन्य किसी पवित्र नदी के तट पर कलश में गंगाजल भरते हैं और उसको कांवड़ पर बांध कर कंधों पर लटका कर अपने अपने इलाके के शिवालय में लाते हैं और श्रावण की चतुर्दशी के दिन शिवलिंग पर गंगाजल अर्पित करते हैं। पुराणों में बताया गया है कि कांवड़ यात्रा भगवान शिव को प्रसन्न करने का सबसे सहज रास्ता है।
कांवड के माध्यम से जल की यात्रा का यह पर्व सृष्टि रूपी शिव की आराधना के लिए हैं। पानी आम आदमी के साथ साथ पेड पौधों, पशु – पक्षियों, धरती में निवास करने वाले हजारो लाखों तरह के कीडे-मकोडों और समूचे पर्यावरण के लिए बेहद आवश्यक वस्तु है।
धार्मिक मान्यता :-
प्रतीकात्मक तौर पर कांवड यात्रा का संदेश इतना भर है कि आप जीवनदायिनी नदियों के लोटे भर जल से जिस भगवान शिव का अभिषेक कर रहे हें । वे शिव वास्तव में सृष्टि का ही दूसरा रूप हैं। धार्मिक आस्थाओं के साथ सामाजिक सरोकारों से रची कांवड यात्रा वास्तव में जल संचय की अहमियत को उजागर करती है। हमें अपने खेत खलिहानों की सिंचाई कर अपने निवास स्थान पर पशु पक्षियों और पर्यावरण को पानी उपलब्ध कराएं तो प्रकृति की तरह उदार शिव सहज ही प्रसन्न होंगे।

कांवर यात्रा के प्रकार:-

कांवड़ मुख्यत: चार प्रकार की होती है और हर कांवड़ के अपने नियम और महत्व होते हैं। इनमें हैं – सामान्य कांवड़, डाक कांवड़, खड़ी कांवड़, दांडी कांवड़। जो शिव भक्त जिस प्रकार की कांवड़ लेकर जाता है, उसी हिसाब से वह तैयारी की जाती है। इन चार प्रकार की कांवड़ के लिए शिव मंदिरो में उसी हिसाब से तैयारी भी की जाती है। आइए जानते हैं इन कांवड़ के बारे में।
1.सामान्य कांवड़ :-
सामान्य कांवड़ में शिव भक्त आराम कर सकते हैं। कांवड़ियों के लिए ज्यादातर जगहों पर पंडाल लगे होते हैं, वहां अपनी कांवड़ रखकर आराम कर सकते हैं।
2.डाक कांवड़ :-
डाक कांवड़ यात्रा के दौरान डाक कांवड़िए बिना रुके लगातार चलते रहते हैं। जहां से गंगाजल भरा हो और जहां जलाभिषेक करना हो, वहां तक उनको लगातार चलते रहना होता है। मंदिरों में डाक कांवड़ियों को लेकर अलग से व्यवस्था भी किए जाते हैं, ताकि जब कोई डाक कांवड़िया आए तब वह बिना रुके शिवलिंग तक पहुंच सकें।
3.खड़ी कांवड़ :-
खड़ी कांवड़ के दौरान कांवड़िए की मदद के लिए कोई ना कोई होता है। जब वह आराम करते हैं, तब उनका सहयोगी अपने कंधों पर कांवड़ को लेकर चलते हैं और कांवड़ को चलाने की अंदाज में हिलाते रहते हैं।
4.दांडी कांवड़ :-
दांडी कांवड़ सबसे मुश्किल होती है और इस यात्रा को करने में कम से कम एक महीने का समय लगता है। दांडी कांवड़ के कांवड़िए गंगा तट से लेकर शिवधाम तक दंडौती देते हुए परिक्रमा करते हैं। यह लेट लेटकर यात्रा को पूरा करते हैं। यह सबसे कठिन आराधना है।

कांवड़ यात्रा की परंपरा कैसे शुरू हुई :-
1.पहली मान्यता : शिव जी हलाहल की गर्मी को शान्त करने हेतु :-
मान्यताओं में बताया गया है कि समुद्र मंथन के दौरान जब महादेव ने हलाहल विष का पान कर लिया था, तब विष के प्रभावों को दूर करने के लिए भगवान शिव पर पवित्र नदियों का जल चढ़ाया गया था। ताकि विष के प्रभाव को जल्दी से जल्दी कम किया जा सके। सभी देवता मिलकर गंगाजल से जल लेकर आए और भगवान शिव पर अर्पित कर दिया। उस समय सावन मास चल रहा था। मान्यता है कि तभी से कांवड़ यात्रा की शुरुआत हो गई थी।
2.दूसरी मान्यता :गढ़मुक्तेश्वर से पुरा महादेव तक:-
अलग अलग जगहों की अलग मान्यताएं रही हैं, ऐसा मानना है कि सर्वप्रथम भगवान परशुराम ने कांवड़ लाकर “पुरा महादेव”, में जो उत्तर प्रदेश प्रांत के बागपत के पास मौजूद है, गढ़मुक्तेश्वर से गंगा जी का जल लाकर उस पुरातन शिवलिंग पर जलाभिषेक किया था। आज भी उसी परंपरा का अनुपालन करते हुए श्रावण मास में गढ़मुक्तेश्वर, जिसका वर्तमान नाम ब्रजघाट है, से जल लाकर लाखों लोग श्रावण मास में भगवान शिव पर चढ़ाकर अपनी कामनाओं की पूर्ति करते हैं।
एक अन्य प्रसंग में रावण को पहला कांवड़िया बताया है। समुद्र मंथन के दौरान जब भगवान शिव ने हलाहल विष का पान किया था, तब भगवान शिव का कंठ नीला हो गया था और वे तभी से नीलकंठ कहलाए थे। लेकिन हलाहल विष के पान करने के बाद नकारात्मक शक्तियों ने भगवान नीलकंठ को घेर लिया था। तब रावण ने महादेव को नकारात्मक शक्तियों से मुक्त के लिए रावन ने ध्यान किया और गंगाजल भरकर ‘पुरा महादेव’ का अभिषेक किया, जिससे महादेव नकारात्मक ऊर्जाओं से मुक्त हो गए थे। तभी से कांवड़ यात्रा की परंपरा भी प्रारंभ हो गई।

  1. तीसरी मान्यता :गोमुख से रामेश्वरम तक पूरे देश को एक सूत्र में पिरोना:-
    उत्तर भारत में भी गंगाजी के किनारे के क्षेत्र के प्रदेशों में कांवड़ का बहुत महत्व है। राजस्थान के मारवाड़ी समाज के लोगों के यहां गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ, बदरीनाथ के तीर्थ पुरोहित जो जल लाते थे और प्रसाद के साथ जल देते थे, उन्हें कांवड़िये कहते थे। ये लोग गोमुख से जल भरकर रामेश्वरम में ले जाकर भगवान शिव का अभिषेक करते थे। यह एक प्रचलित परंपरा थी। लगभग 6 महीने की पैदल यात्रा करके वहां पहुंचा जाता था। इसका पौराणिक तथा सामाजिक दोनों महत्व है।इससे एक तो हिमालय से लेकर दक्षिण तक संपूर्ण देश की संस्कृति में भगवान का संदेश जाता था। इसके अलावा भिन्न-भिन्न क्षेत्रों की लौकिक और शास्त्रीय परंपराओं के आदान-प्रदान का बोध होता था। परंतु अब इस परंपरा में परिवर्तन आ गया है। अब लोग गंगाजी अथवा मुख्य तीर्थों के पास से बहने वाली जल धाराओं से जल भरकर श्रावण मास में भगवान का जलाभिषेक करते हैं।

    1. चौथी मान्यता: बैजनाथधाम में शिव जी का अभिषेक :-
      आनंद रामायण में इस बात का उल्लेख मिलता है कि भगवान राम पहले कांवड़िया थे। भगवान राम ने बिहार के सुल्तानगंज से गंगाजल भरकर देवघर स्थित बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग का अभिषेक किया था। उस समय सावन मास चल रहा था। बैजनाथधाम (झारखंड) रावणेश्वर लिंग के रूप में स्थापित है। श्रावण मास तथा भाद्रपद मास में लाखों श्रद्धालु कांवड़ यात्रा करके इनका जलाभिषेक करते हैं। इस धार्मिक उत्सव की विशेषता यह है कि सभी कांवड़ यात्री केसरिया रंग के वस्त्र धारण करते हैं और बच्चे, बूढ़े, जवान, स्त्री, पुरुष सबको एक ही भाषा में बोल-बम के नारे से संबोधित करते हैं। दरभंगा आदि क्षेत्रों के यात्री कांवड़ के माध्यम से भगवान का अभिषेक बसंत पंचमी पर करते हैं। सर्वप्रथम उत्तर भारत से गए हुए मारवाड़ी परंपरा के लोगों ने इस क्षेत्र में यह परंपरा प्रारंभ की थी।
    2. पांचवी मान्यता : कासगंज से बटेश्वर तक:-
      आगरा जिले के पास बटेश्वर में, जिन्हें ब्रह्मलालजी महाराज के नाम से भी जाना जाता है, भगवान शिवजी का शिवलिंग रूप के साथ-साथ पार्वती, गणेश का मूर्ति रूप भी है। श्रावण मास में कासगंज से गंगाजी का जल भरकर लाखों की संख्या में श्रद्धालु भगवान शिव का कांवड़ यात्रा के माध्यम से अभिषेक करते हैं। यहां पर 101 मंदिर स्थापित हैं। इसके बारे में एक प्राचीन कथा है कि दो मित्र राजाओं ने संकल्प किया कि हमारे पुत्र अथवा कन्या होने पर दोनों का विवाह करेंगे। परंतु दोनों के यहां पुत्री संतानें हुईं। एक राजा ने ये बात सबसे छिपा ली और विदाई का समय आने पर उस कन्या ने, जिसके पिता ने उसकी बात छुपाई थी, अपने मन में संकल्प किया कि वह यह विवाह नहीं करेगी और अपने प्राण त्याग देगी। उसने यमुना नदी में छलांग लगा दी। जल के बीच में उसे भगवान शिव के दर्शन हुए और उसकी समर्पण की भावना को देखकर भगवान ने उसे वरदान मांगने को कहा। तब उसने कहा कि मुझे कन्या से लड़का बना दीजिए तो मेरे पिता की इज्जत बच जाएगी। इसके लिए भगवान ने उसे निर्देश दिया कि तुम इस नदी के किनारे मंदिर का निर्माण करना। यह मंदिर उसी समय से मौजूद है। यहां पर कांवड़ यात्रा के बाद जल चढ़ाने पर अथवा मान्यता करके जल चढ़ाने पर पुत्र संतान की प्राप्ति होती है।
    3. छठी मान्यता : उज्जयनी में महाकाल को अभिषेक :-
      उज्जयनी में महाकाल को जल चढ़ाने से रोग निवृत्ति और दीर्घायु प्राप्त होती है। लाखों यात्री इस समय में भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं। यहां की विशेषता यह है कि हजारों की संख्या में संन्यासियों के माध्यम से टोली बनाकर कावड़ यात्री चलते हैं। ये यात्रा लगभग 15 दिन चलती है।
    4. सातवीं मान्यता :श्रवण कुमार की हरिद्वार यात्रा :-
      कुछ विद्वान का मानना है कि सबसे पहले त्रेतायुग में श्रवण कुमार ने पहली बार कांवड़ यात्रा शुरू की थी। श्रवण कुमार ने अंधे माता पिता को तीर्थ यात्रा पर ले जाने के लिए कांवड़ बैठया था। श्रवण कुमार के माता पिता ने हरिद्वार में गंगा स्नान करने की इच्छा प्रकट की थी। माता पिता की इच्छा को पूरा करने के लिए श्रवण कुमार कांवड़ में ही हरिद्वार ले गए और उनको गंगा स्नान करवाया। वापसी में वे गंगाजल भी साथ लेकर आए थे। बताया जाता है कि तभी से कांवड़ यात्रा की शुरुआत हुई थी।

यात्रा में सात्विकता और पवित्रता के कड़े नियम :-
1. एक बार कावड़ को उठाने के बाद फिर से जमीन पर नहीं रखा जाता है और न ही किसी के द्वारा खींचे जाने से अपवित्र ही किया जाता है । यदि किसी प्रकार की लघुशंका या दीर्घ शंका की स्थिति उत्पन्न होती है तो सिद्धांत को वृक्ष या लौकिक रूप से पृथ्वी से ऊपर दिए गए लकड़ी के उपकरणों में ही रुक कर ही विश्राम या लघुशंका, दीर्घ शंका करने का विधान है। हर, लघुशंका, दीर्घशंका के बाद स्नान करने के बाद कैथेड्रल की पूजा करने के बाद फिर से शुरू की जाती है। अब हर साल करीब एक करोड़ लोग हरिद्वार, नीलकंठ और गंगोत्री तक भी गंगाजल लेने के लिए कैथेड्रल जल संरक्षण के लिए पहुंचते हैं।
2. कांवड़ यात्रा के दौरान किसी भी तरह का नशा, मांस मदिरा या तामसिक भोजन नहीं करना चाहिए। कांवड़ यात्रा पूरी तरह पैदल की जाती है। यात्रा प्रारंभ होने से लेकर पूर्ण होने तक सफर पैदल ही किया जाता है। यात्रा में वाहन का प्रयोग नहीं किया जाता।
3. गंगा या किसी पवित्र नदी का ही जल ही प्रयुक्त:-
कांवड़ में गंगा या किसी पवित्र नदी का ही जल ही रखा जाता है, किसी कुंवे या तालाब का नहीं। कावड़ को हमेशा स्नान करने के बाद ही स्पर्श करना चाहिए और ध्यान रखना चाहिए कि यात्रा के समय कांवड़ या आपसे चमड़ा स्पर्श ना हो। कावड़ियों को हमेशा जत्थे के साथ ही रहना चाहिए।
4.कावड़ हमेशा उच्च स्थान पर रखें:-
कांवड़ यात्रा के दौरान ध्यान रखना चाहिए कि अगर आप कहीं रुक रहे हैं तो कांवड़ को भूमि या किसी चबूतरे पर ना रखें। कांवड़ को हमेशा स्टैंड या डाली पर ही लटकाकर रखें। अगर गलती से जमीन पर कांवड़ को रख दिया है तो फिर से कांवड़ में पवित्र जल भरना होता है। कांवड़ यात्रा करते समय पूरे रास्ते बम बम भोले या जय जय शिव शंकर का उच्चारण करते रहना चाहिए। साथ ही यह भी ध्यान रखना चाहिए कि कांवड़ को किसी के ऊपर से लेकर ना जाएं।

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में लक्ष्य से भटकती पौराणिक कांवर यात्रा :-

उत्तर प्रदेश में 1990 के राम मंदिर आंदोलन के बाद कांवड़ यात्रा लोकप्रिय हुई वह साल-दर-साल बढ़ती चली गई। प्रारंभ में यह जल अभिषेक गढ़ गंगा के जल से ही किया जाता था।समय के साथ कांवड यात्रा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के साथ ही हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान बिहार झारखंड तथा महाराष्ट्र आदि क्षेत्रों में भी अधिक लोकप्रिय हो गई। पुरा महादेव के साथ ही देश के अन्यान्य शिव मंदिरों में भी जलाभिषेक किया जा रहा है।1990 के बाद ही साजी-धजी आर्किस्ट्रा का प्रचलन बढ़ा है।छोटे जरीकेन, एक से रंग की पेंटिंग्स के कपड़े बाजार ने ही विकसित हुए है। धीरे-धीरे-धीरे-धीरे आर्किटेक्चर यात्रा अपने आधुनिक स्वरूप में विकसित हुई। कावंड स्वरूप के वाहनों का प्रयोग बहुतायत से प्रचलित हुई जिसमें एक वाहन गांव में और गांवों के कावड़िये को इकट्ठे करके हरिद्वार तक आते हैं और वापसी में कुछ लोग गंगाजल को कंधे पर लेकर पैदल-पैदल में वापस आते हैं। वाहन से आ रहे आर्किटेक्चर डी. जे. बजा कर खूब नाच गाना करते जाते हैं। पिछले कुछ वर्षों से डाक कावड़ अधिक प्रचलित हुई है। डाक कावड़िये में शास्त्रियों का समूह छोटे चार पहिए वाले वाहन या दो पहिए वाले वाहन हरिद्वार, नीलकंठ तीर्थ से दर्शन करते हैं और फिर यहां से अपने गंतव्य की दूरी को दिन और घंटे के वादे से तय कर, एक या दो कावड़िये जल लेकर दौड़ते हैं। उनकी गाड़ियां दौड़ती हैं. जब एक कावड़िया थक जाती है तो दूसरी कावड़िया दौड़ती हुई कावड़िया से जल लेकर खुद आगे-आगे दौड़ना शुरू कर देती है। इस प्रकार हरिद्वार अयोध्या सोरों आदि नदी तटों से अपने लक्ष्य तक लगातार दौड़ते-दौड़ते ही गंगाजल भरे जाने लगे है ।
लंगड़ और शिविरो का बहुतायत से आयोजन :-
कांवर भक्तों की भीड़ बढ़ने का एक कारण यह भी है की सरकारी और निजी संस्थाओं द्वारा भक्तों को सुख सुबिधा बढ़ाने के लिए बड़ी संख्या में लंगड़ चिकित्सा खान पान और अन्य सुविधाओ का बढ़ाना भी है। बेकार और खाली घर पर बैठे युवा इन आकर्षणों को पाने के लिए ज्यादा सक्रिय हो जाते हैं। इस तरह आगरा तफरी और आप धापी में आम जन मानस और रहन सहन बुरी तरह प्रभावित हो उठता है।

काँवड़ यात्रा से व्यापार में बढ़ोतरी :-
हर साल लाखों की संख्या में नए गाने, राग रागनी जो भोले की बंदना पर आधारित होते हैं, बाजार में उतारे जा रहे हैं। साथ ही हर साल भोले के वे के लिए नए-नए टाइप के डिज़ाइनर ड्रेस भी मार्केट में उतारे जा रहे है। इस प्रकार की अलग-अलग प्रकार से अरबों रुपयों का कारोबार का बढ़ावा मिलता गया है।
गन्दगी की बढ़ोत्तरी:-
कलाकार ज्यादातर युवा ही आते हैं वे जोश से भरे रहते हैं और कावड़ की पवित्रता को लेकर आते हैं जो सिद्धांत लेकर कई बार अलौकिक, स्थानीय नागरिकों और प्रशासन से भी कट्टरपंथियों की हिंसक शिकार भी हुए हैं। भीड़ की यह हिंसक गंदगी और लाखों की संख्या में जब कावड़िए खुले में मलमूत्र का त्याग करते हैं तो कावड़ के बाद भीषण गंदगी चारों ओर फैली होती है जिसमें महामारी का खतरा बना रहता है ।
भांग-‌गांजे और मादक पदार्थों का सेवन में इजाफा :-
कांवड़ यात्रा में भक्तों का एक बड़ा हुजूम भांग-‌गांजे का सेवन करता हैं। कुछ तो इसे भोले का प्रसाद और पता नहीं क्या क्या बुलाते हैं। केवल वे लोग जो नशा करते हैं, ऐसी प्रवृत्ति में शामिल होते हैं और इन लोगों के अपने समूह होते हैं, समूह हर का अपना होता है। कांवरिया शराब का सेवन नहीं करता है। भांग गांजा को भगवान शिव का प्रसाद कहता है । मद्य निषेध विभाग द्वारा और अधिक जागरुकता अभियान चलाया जाना चाहिए।

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