वैदिक सम्पत्ति : वेदमंत्रों के उपदेश

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(यह लेख माला हम पंडित रघुनंदन शर्मा जी की “वैदिक सम्पत्ति” नामक पुस्तक के आधार पर सुधि पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं।)
प्रस्तुति:- देवेंद्र सिंह आर्य
(चेयरमैन ‘उगता भारत’)

गतांक से आगे…..

इस प्रकार दिनचर्या का वर्णन करके अब नदावार से सम्बन्ध रखनेवाली उदारता अर्थात् दान का वर्णन करते हैं-

तवोतिभिः सचनाना अरिष्टा बृहस्पते मघवानः मुवोराः ।
ये अश्वदा उत वा सन्ति गोदा ये वस्वदाः सुभगास्ते रायः । (ऋ०5/42/8)

अनुपूर्ववत्स धेनुमनड्वाहमुपबर्हणम् ।
वासोहिरण्यं दत्तवा ते यन्ति दिवमुत्तमाम् । (अथर्व 6/5/29)

अर्थात् है बृहस्पते ! जो आपकी रक्षा से सम्बन्ध रखनेवाले हैं, वे दुःखों से रहित, धनवान् और पुत्रपौत्र वाले होते हैं और जो गायों, घोड़ों और वस्त्रों का दान करनेवाले होते हैं, वे सौभाग्यवाले होते हैं और उनके घरों में अनेक प्रकार के धन सदा प्रस्तुत रहते हैं। जो जननेवाली गौ, बोझा ढोनेवाला बैल, शिर के नीचे रखनेवाली तकिया, वस्त्र और सुवर्ण का दान करते हैं, वे उत्तम गति को प्राप्त होते हैं। इस उदारता और दानसम्बन्धी उपदेश के आगे सब सदाचार के मूल सत्सङ्ग का वर्णन करते हैं। ऋग्वेद में पाया है कि-

नाकस्य पृष्ठे अधि तिष्ठति श्रितो यः पृणाति स ह देवेषु गच्छति ।
तस्मा आपो घृतमर्षन्ति सिन्धवस्तस्मा इयं दक्षिणा पिन्वते सदा।। (ऋ० 1/125/5 ) अर्थात् जो सदा विद्वानों के साथ रहता है, वह सुखकारी स्वर्ग में निवास करता है, जहाँ अपतत्त्व (ईश्वर) स्थान देता है और सूर्यकिरणें दक्षिणा देती हैं। इस मन्त्र में विद्वानों के सत्संग का फल बतलाया गया है। इसके मागे विद्वानों को दक्षिणा देकर उनकी सेवा करने का फल भी बतलाते हैं। ऋग्वेद में है कि-

दक्षिणावतामिदिमानि चित्रा दक्षिणावतां दिवि सूर्यासः ।

दक्षिणावन्तो अमृतं भजन्ते दक्षिणावन्तः प्र तिरन्त आयुः ।। (ऋ०1/125/6)
दक्षिणावान्प्रथमो हूत एति दक्षिणावान्प्रामणीरप्रमेति ।
तमेव मन्ये नृपति जनानां यः प्रथमो दक्षिणामाविवाय ।। (ऋ०10/107/5)
‘दक्षिणाश्र्व’ दक्षिणा गां ददाति दक्षिणा चन्द्रमुत परिश्यम् ।
दक्षिणान्नं वनुते यो न आत्मा दक्षिणां वर्म कृणुते विजानन् । (ऋ० 10/107/7)

अर्थात् दक्षिणावान् पुरुषों को नाना प्रकार के सुख, सूर्य के समान ऐश्वर्य और अमृत के समान फल तथा दीर्घायु प्राप्त होती है। जो सबसे प्रथम श्रेणी का दक्षिणावान् होता है, वह सबसे पहिले बुलाया जाता है, वहीं ग्राम का भागवान होता है और वही राजा के यहाँ सम्मान पाता है । जो विद्वानों को दक्षिणा में, गौ, सोना, चांदी और अन्न देता है, उसके लिए यह दक्षिणा कवच का काम देती है-उसकी रक्षा करती है। परन्तु यह सदाचार सम्बन्धी समस्त व्यवहार तभी सम्पन्न हो सकता है, जब मनुष्य व्रतवाला हो, जिसका सङ्कल्प द्दढ़ हो और जो सदैव अपने सिद्धांत पर कायम रहे। इस व्रत का माहात्म्य बतलाते हुए वेद उपदेश करते हैं कि-

व्रतेन दीक्षामाप्नोति दीक्षपाप्नोति दक्षिणाम् ।
दक्षिणा श्रद्धामाप्नोति श्रद्धया सत्यमाप्यते ।। (यजु०19/30)

अर्थात् मनुष्य व्रत से दीक्षावान् होता है, दीक्षा से दक्षिणावान होता है, दक्षिणा से श्रद्धावान् होता है और श्रद्धा से सत्य को अर्थात् मोक्ष को प्राप्त होता है। इस प्रकार से यह व्रत ही सदाचार का मूल है। जो व्रतधारी हैं, दृढ़ प्रतिज्ञावाले हैं, वही सदाचार में सफलता प्राप्त करते हैं। परन्तु स्मरण रखना चाहिये कि यह द्दढ़ता और इस प्रकार का व्रत बिना अभ्यास के नहीं हो सकता और न अभ्यास बिना संस्कारों के हो सकता है। इसलिए भागे देखते हैं कि संस्कारों के सम्बन्ध में वेद क्या उपदेश देते हैं।
क्रमशः

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