आखिर महाराष्ट्र में इतना बड़ा खेल किसके दिमाग की उपज रहा ,?

images (24)

गंगाधर ढोबले

महाराष्ट्र में पिछले तीन वर्षों में तीसरी राजनीतिक बगावत में ‘ट्रिपल इंजन’ सरकार बनी है। सवाल है कि ये तीनों इंजन एक ही दिशा में कब तक चलेंगे? जब बीजेपी वाली ‘डबल इंजन’ सरकारें राज्यों में ठीक से न चल रही हों, तब ‘ट्रिपल इंजन’ सरकार का भविष्य क्या होगा? हो सकता है कि वह अपने बोझ तले ही ढह जाए या कर्नाटक की तरह चुनाव में जनता ऐसे प्रयोगों को ठुकरा दे। शिवसेना से एकनाथ शिंदे की बगावत जनता एकबारगी डिस्काउंट भी कर दे, लेकिन अजित पवार की तीन वर्षों में अपने चाचा शरद पवार से दूसरी बगावत को महाराष्ट्र क्योंकर सहेगा? अजित पवार भी एक बार ठीक, लेकिन एनसीपी के लगभग सारे दिग्गजों को आखिर क्या हो गया कि वे अमूमन पूरी पार्टी को ही बीजेपी के साथ ले गए? अब तो शरद पवार ही एनसीपी का एकमात्र चेहरा बचे दिखते हैं। आखिर किसका खेल है यह? खुद शरद पवार का या कि मोदी-शाह के आशीर्वाद से किया गया देवेंद्र फडणवीस का खेल।

कौन किस तरफ

एनसीपी के पास विधानसभा में 54 और विधान परिषद में 11 सदस्य हैं।
अजित पवार ने विधानसभा के लगभग 40 और विधान परिषद के 6 विधायकों के समर्थन का दावा किया है। छगन भुजबल और दिलीप वलसे-पाटील जैसे 8 दिग्गज कैबिनेट मंत्री बने हैं।
लोकसभा के 5 सांसदों में शरद पवार की बेटी सुप्रिया भी हैं। लक्षद्वीप के इकलौते सांसद मोहम्मद फैजल भी एनसीपी के हैं। इन दोनों को छोड़ दें तो शेष 3 में से सुनील तटकरे की बेटी अदिति, अजित के साथ चली गई हैं और मंत्री बन गई हैं। अब बचे दो में से सातारा के श्रीनिवास पाटील और शिरूर के अमोल कोल्हे किस ओर जाएंगे, यह अभी साफ नहीं है।
राज्यसभा के 4 सांसदों में से एक खुद शरद पवार हैं। उनके बेहद करीबी प्रफुल्ल पटेल अजित दादा के पाले में हैं। अब बची हैं केवल दो- फौजिया खान और वंदना चव्हाण। इस तरह लगभग पूरी पार्टी ही बीजेपी की गोद में चली गई है।

अजित पवार पर बीजेपी के डोरे डालने के दो कारण हो सकते हैं।

पहला, एकनाथ शिंदे समेत उनके गुट के 16 विधायकों की अयोग्यता का मामला अभी स्पीकर के समक्ष पेंडिंग है। यदि वे अयोग्य घोषित हो जाएं तो उनका गुट ही बिखर जाएगा और सरकार संकट में पड़ेगी।
दूसरा, चुनाव में शिंदे गुट की सफलता को लेकर बीजेपी आशंकित है। ऐसे में उसे अजित पवार जैसी बी टीम की आवश्यकता थी। यह जरूरत अब पूरी हो गई है। दोनों गुटों की नकेल अब बीजेपी के हाथ में है।
शिंदे गुट और अजित पवार गुट दोनों की मजबूरियां भी हैं, जो उन्हें बीजेपी के साथ ले गईं। दोनों गुटों में ऐसे कई नेता हैं, जिन पर ईडी के छापे पड़े हैं, जांच चल रही है, मामले पेंडिंग हैं। कुछ नमूने देखिए।

अजित पवार पर एक चीनी मिल औने-पौने दाम में खरीदने का आरोप है। ईडी की चार्जशीट में उनका नाम नहीं है, लेकिन उनसे जुड़ी एक पेपर कंपनी का नाम आया है। पैसों की हेराफेरी का यह मामला है।
छगन भुजबल के खिलाफ ईडी ने अदालत में चार्जशीट दायर की है। 2016 से यह मामला अदालत में है।
हसन मुश्रिफ पर हाल में ईडी ने छापे डाले थे। जांच अभी जारी है।
धनंजय मुंडे पर ईडी ने पैसे की हेराफेरी का मामला दर्ज किया है।
प्रफुल्ल पटेल पर शातिर अपराधी इकबाल मिर्ची की जमीन खरीदी में घोटाले का आरोप है। जांच अभी चल रही है।
लगभग सभी दिग्गजों पर तरह-तरह की जांच बैठाई गई है। इसलिए वहां डर का माहौल है कि बचे लोगों में से भी पता नहीं कौन कब जांच के दायरे में फंस जाए। ऐसे में कुछ विश्लेषकों का तर्क है कि हो सकता है, शरद पवार ने ही जांच से पिंड छुड़ाने के लिए लगभग पूरी पार्टी वहां भेज दी हो। उधर, उद्धव ठाकरे गुट में भी वही भय है। खुद उद्धव, संजय राऊत, अनिल परब जैसे कई लोगों की जांच जारी है। इसलिए उनके कई लोग टूटकर शिंदे के साथ आ रहे हैं। लेकिन सवाल तो यह है कि शिंदे गुट भी कब तक बचेगा?

महाराष्ट्र की राजनीति में बड़े विचित्र संयोग बन रहे हैं। फडणवीस और अजित पवार दोनों उपमुख्यमंत्री हैं। इसलिए फडणवीस का कहीं पुनर्वास करना बीजेपी के लिए जरूरी हो गया है। खबरें हैं कि उन्हें केंद्र में मंत्री बनाया जाएगा। फिर महाराष्ट्र में बीजेपी किसके जिम्मे होगी? केंद्र से नितिन गडकरी को राज्य में भेजा जाएगा या प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष चंद्रशेखर बावनकुले ही सबकुछ संभालेंगे या अन्य किसी को यह जिम्मेदारी सौंपी जाएगी, यह अभी साफ नहीं है। उधर, प्रफुल्ल पटेल को खुश करने के लिए उन्हें केंद्र में मंत्री बनाए जाने की चर्चा है। इस आपाधापी में शिंदे गुट के हाथ केंद्र में एकाध मंत्री पद मुश्किल से लग सकता है। राज्य में भी कतार लगाए बैठे शिंदे गुट के लोग मंत्री बनने से रह गए। उनकी नाराजगी बरकरार रहेगी। लेकिन उन्हें बहुत पुचकारने की बीजेपी को अब जरूरत नहीं रह गई है।

अस्थिरता का माहौल

कुल मिलाकर महाराष्ट्र की राजनीति स्वार्थों के दलदल में फंसी लगती है। इससे हर तरफ अस्थिरता का माहौल है। कौन किस तरफ कब चला जाएगा कोई नहीं जानता। कैसे नए समीकरण बनेंगे यह भी नहीं कहा जा सकता। हो सकता है कि आज टूटे लोगों के दिल फिर मिल जाएं। बेमेल और कल्पनातीत गठजोड़ से भी इनकार नहीं किया जा सकता। धुंधली राजनीतिक तस्वीर में कुछ कुछ संकेत तो उभर रहे हैं, लेकिन चित्र साफ होने के लिए चुनाव तक इंतजार करना होगा।

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं

Comment:

betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
casinolevant giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti mobil giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betsat giriş
betsat giriş
betgaranti giriş
betgaranti yeni giriş
betsat giriş
betsat giriş
superbetin giriş
betgaranti giriş
superbetin giriş
vdcasino giriş
superbetin giriş
superbetin giriş
vdcasino giriş
bettilt giriş
betsat giriş
betsat giriş
betpark giriş
betpark giriş
nesinecasino giriş
nesinecasino giriş
cratosroyalbet giriş
cratosroyalbet giriş
betgaranti giriş
jojobet giriş
betgaranti mobil giriş
klasbahis
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vdcasino giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş