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बात उन दिनों की है जब क्रांतिवीर सावरकर जी की योजना अनुसार महान क्रांतिकारी मदनलाल ढींगरा ने कर्जन वायली को गोली से उड़ा दिया था और कहा था कि कर्जन वायली स्वर्गधाम का नहीं , अपितु नरक धाम का अधिकारी है । इस हत्याकांड का केस लंदन की एक अदालत में विचाराधीन था । तभी वहां पर श्री विपिन चंद्र पाल की अध्यक्ष में कांग्रेसियों की एक बैठक हुई। अंग्रेज इस काण्ड की निंदा करने लगे । जो जितनी अधिक निंदा करता था उसके लिए उतनी ही अधिक तालियां बजती थीं। वहीं एक कोने में सावरकर जी अपने मन को मसोसकर चुपचाप बैठे हुए इस सभा की सारी बातों को सुन रहे थे। अंत में जब अध्यक्ष श्री विपिन चंद्र पाल ने कहा कि ‘तो क्या मान लिया जाए कि मदन लाल के कार्य का निंदा का प्रस्ताव सर्वसम्मति से पास होता है ?
अध्यक्ष विपिन चंद्र पाल की इस बात को सुनकर वीर सावरकर पर रहा नहीं गया । वे खड़े हुए और बोले ,- ‘ नहीं , मेरा इस पर विरोध है। मैं कुछ कहना चाहता हूं। मदनलाल ढींगड़ा का केस अभी विचाराधीन है। बिना कोई न्यायालय का निर्णय आए हुए निंदा प्रस्ताव के पास होने से उसके केस पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा। जब तक केस विचाराधीन है तब तक किसी को भी अपराधी घोषित नहीं किया जा सकता। ऐसे में आप कैसे कह सकते हैं कि मदनलाल ढींगरा अपराधी है?”
तभी एक अंग्रेज सावरकर जी की इस बात को सुनकर अत्यधिक क्रोधित हो उठा। और उसने सावरकर जी के मुख पर एक घूसा मारते हुए कहा कि ‘जरा अंग्रेजी घूूसे का मजा ले लो, कैसा बैठता है?’
उसी अंदाज में ठीक उसी समय श्यामजी कृष्ण वर्मा के एक शिष्य ने उस अंग्रेज के गंजे सिर पर जोर से डंडा मारते हुए कहा ‘जरा इसका भी मजा ले लो, यह हिंदुस्तान का डंडा है।’ बस, फिर क्या था ? भगदड़ मच गई । किसी ने वहीं पर एक पटाखा भी फोड़ दिया। अचानक इस तरह ढींगड़ा जी का निंदा प्रस्ताव पास हुए बिना ही सभा भंग हो गई।
आज पश्चिम बंगाल सांप्रदायिक हिंसा की आग में झुलस रहा है। उसी का अनुकरण करते हुए बिहार में भी सांप्रदायिक दंगे हो रहे हैं। दोनों ही प्रांतों में इस समय धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक दलों की सरकारें हैं। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपने राजनीतिक सफर में कभी भगवा की शरण में तो कभी धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक दलों की शरण में जाकर अपने सत्ता स्वार्थ पूरे करते रहे हैं। इसी प्रकार पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी अपने राजनीतिक स्वार्थों के लिए कभी भगवा के साथ तो कभी धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक दलों के साथ दिखाई देती रही हैं। इससे इन दोनों मुख्यमंत्रियों की सोच का पता चलता है कि इनके लिए अपने राजनीतिक लाभ अथवा सत्ता स्वार्थ कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं, अपेक्षाकृत इस बात के कि जनता का कुछ भला हो सके? जो लोग अपने सत्ता स्वार्थों के लिए जनसाधारण को मरने के लिए अकेला छोड़ दें उनसे देश हित की अपेक्षा नहीं की जा सकती।
राजनीतिक लोग धर्मनिरपेक्षता की नपुंसकता भरी भांग को पीकर हर सांप्रदायिक दंगे के पश्चात केवल हिंदू को दोषी बताते हैं। ये नशेड़ी भंगेड़ी लोग हैं जो विचारशून्य होकर देश की सत्ता का संचालन करते रहते हैं। इनकी सभाएं उसी प्रकार आयोजित होती हैं जिस प्रकार कर्जन वायली की हत्या के बाद अंग्रेजों की सभा हुई थी और उसमें जिस प्रकार उस समय अंग्रेज कर्जन वाइली को मारने वाले वीर क्रांतिकारी मदनलाल ढींगरा को गाली दे रहे थे, उसी प्रकार ये लोग बैठकर इस देश के बहुसंख्यक वर्ग को गाली देते हैं। बिना अपील, वकील और दलील के यह बयानवीर हिंदू को फांसी चढ़ा देते हैं। अपने मूल स्वभाव में शांति प्रिय हिंदू के बारे में इनकी ऐसी गतिविधियां या बयानबाजियों के चलते यह संदेश जाता है कि वह सांप्रदायिक दंगे करने वाला है और उसके भीतर असहिष्णुता का भाव कूट-कूट कर भरा है। दुर्भाग्य हमारा यह है कि आजादी के पश्चात देश का अर्थात हिंदुस्तान का डंडा उन लोगों के हाथों में चला गया जो डंडे का सही उपयोग करना नहीं जानते? यह वही लोग हैं जो डंडा चलाते समय भी वोट गिनते हैं और डंडे को रखते समय भी वोटों की गिनती पर इनकी दृष्टि गड़ी होती है। इन लोगों की कार्यशैली को देखकर यही कहा जा सकता है कि :-

  तुझ से उम्मीदें वफ़ा जिसे होगी उसे होगी,

हमें तो देखना ये है कि तू जालिम कहां तक है?

मैं 2018 में 9 फरवरी को पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में था। उस समय हिंदू महासभा की एक विशेष बैठक का आयोजन वहां पर किया गया था। तब वहां के कुछ हिंदू युवा मुझसे आकर मिले थे। उनकी व्यथा कथा सुनकर दिल उस समय भी दुखी हुआ था और आज भी उनके शब्द और उनके चेहरे की भाव भंगिमा को स्मरण कर मन दुखी होता है। उन्होंने मुझसे कहा था कि ‘.साहब ! आप हम को बचाने के लिए कुछ सोचिए? हमारे सामने ही जब हमारी बहन बेटियों का शीलभंग किया जाता है तो उस समय हमारे दिल पर क्या गुजरती है, यह केवल हम ही जानते हैं? हमारी पीड़ा को सुनने वाला कोई नहीं? उनका कहना था कि बांग्लादेश से अमुक अमुक मुस्लिम नेता यहां पर आते हैं और सीधे एक – एक लाख की भीड़ वाली मुस्लिमों की सभाओं को संबोधित कर सुरक्षित लौट जाते हैं। उनकी इस प्रकार की गैर कानूनी घुसपैठ की प्रक्रिया पर सरकार कोई ध्यान नहीं देती । इतना ही नहीं, वे अपने भाषणों में सीधे हिंदुओं का नरसंहार करने के लिए मुस्लिमों को भड़का कर जाते हैं। पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार ऐसे लोगों पर डंडा चलाने के स्थान पर उन्हें प्यार ,दुलार और सम्मान देती है।’
उन लोगों की बातों का उत्तर मेरे पास नहीं था। यद्यपि मै उनकी पीड़ा को सुनकर अत्यधिक दु:खी था। अभी कुछ समय पहले जब पश्चिम बंगाल विधानसभा के चुनाव हुए थे तो उसके पश्चात भी हिंदुओं को उनके घरों में जा जाकर मारा-पीटा गया था। इन हिंदुओं का अपराध केवल यह था कि उन्होंने चुनावों में भाजपा को सपोर्ट किया था। ममता बनर्जी केवल मुस्लिम मतों को संतुष्ट करने के लिए और उन्हें अपने साथ जोड़े रखने के लिए देश की अस्मिता का सौदा कर रही हैं। इसके लिए उन्हें नारी होकर भी हिंदू बेटी के शील सम्मान का कोई ध्यान नहीं है। उनके लिए हर हिंदू बेटी एक शिकार है। जिसके लिए वह शिकारी पाल रही हैं। सत्ता की ओट में वह जिस प्रकार शिकार कर रही हैं उसका पाप उनके सिर चढ़कर बोल रहा है। एक दिन आएगा जब वह स्वयं इसी पाप के बोझ तले दबकर समाप्त हो जाएंगी। समय के चक्र की परिक्रमा अभी पूर्ण नहीं हुई है। जब पूर्ण होगी तो नियति उतनी ही दर्दनाक होगी जितना दर्दनाक उठाव था। उठाव को या पड़ाव को कभी भी मंजिल नहीं मानना चाहिए।
जिस शासक के शासनकाल में जनसाधारण चीखता चिल्लाता हो और उसे शासक संवेदनाशून्य होकर या भावशून्य होकर उपेक्षित करता हो, उस शासक का विनाश निश्चित होता है। इतिहास उनका नहीं होता है जो अत्याचारों के बल पर अधिक से अधिक देर सत्ता के शीर्ष पर बने रहने में सफल हो जाते हैं। इतिहास उनका होता है जो जीवन में सार्थकता के संगीत की लहरों को पैदा करते हैं और उन लहरों से देश व समाज के परिवेश को अमृतमय बनाते हैं। उनके पुरुषार्थ से सर्वत्र अमृत की वर्षा होती है और सर्व समाज उनके यशोगान के लिए सिर झुका कर खड़ा हो जाता है। जिस जिस शासक ने अपने आप को सत्ता में बनाए रखने के लिए जनता का अत्याचार पूर्ण शैली में सिर झुकाने का प्रयास किया है, समय ने एक दिन उसके शीश को ही झुकने के लिए विवश किया है। कहने का अभिप्राय है कि ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल में आज आग से खेल रही हैं और एक दिन समय आएगा कि यह आग स्वयं उनको ही जलाकर नष्ट कर देगी। हिंदू बहन बेटियों के साथ आज जो कुछ हो रहा है, उसके लिए यह कलम उनके साथ है और उनके दर्द को दर्द समझ कर भावशून्य शासकों के समक्ष उठाने के अपने राष्ट्र धर्म का निर्वाह करती रहेगी, फिर चाहे अंजाम जो हो, उसकी परवाह नहीं।
इस देश ने कर्जन वायली और अंग्रेजों के अत्याचारों को ही नहीं देखा है इसने तो प्राचीन काल से रावण और कंस जैसे महान अपराधियों अत्याचारी शासकों का विनाश करने को अपना राष्ट्रधर्म समझा है। ऐसे में हम यह नहीं मान सकते कि आज राष्ट्र धर्म और राष्ट्रनीति को निभाने वाले लोग नहीं हैं। यदि कर्जन वायली किसी रूप में आज जीवित है तो श्यामजी कृष्ण वर्मा और वीर सावरकर भी अपना स्वरूप दिखाने के लिए तत्पर हैं। ना तो परिभाषाएं बदली हैं ना ही परिक्रमा का मार्ग बदला है, और ना ही भूमिकाएं बदली हैं। लोग अपने अपने स्थान पर खड़े होकर अपनी – अपनी भूमिकाओं का निर्वाह कर रहे हैं । रावण यदि अपनी भूमिका में खड़ा है तो श्रीराम भी शरसंधान के लिए तैयार हैं।
निश्चय ही इस समय डंडा पड़ने मात्र की देर है। आज लोकतंत्र है तो इसका अभिप्राय यह नहीं है कि इसमें डंडा नहीं चलता है। ध्यान रखना चाहिए कि तानाशाह के डंडे एक बार को टूट जाते हैं पर लोकतंत्र का डंडा कभी टूटता नहीं है। यह अत्याचारी, क्रूर और सत्ता स्वार्थी लोगों को चुन – चुनकर मारता है। वास्तविक चोर उचक्के बदमाश को ये ढूंढ-ढूंढकर मारता है। इसीलिए लोग शासन के संदर्भ में सदैव लोकतांत्रिक शासन प्रणाली को अपनाने पर बल देते हैं।
भारत आत्म संयमी देश है। यह अपराध करने वाले को एक बार खुली छूट देता है , पर जब दंड देने की मुद्रा में आता है तो जैसा जिसका अपराध होता है वैसा ही दंड उसे देने में संकोच नहीं करता है। यह भारत की सनातन परंपरा है । इसमें हर शिशुपाल को एक सीमा तक अपराध करने दिया जाता है और जब उसके अपराधों की गिनती पूरी हो जाती है तो सुदर्शन चक्र स्वयं ही चल पड़ता है। इसे किसी भी गांधीवादी सोच के माध्यम से यह कहकर समाप्त नहीं किया जा सकता कि हिंदुत्व तो उदारता का पाठ पढ़ाता है और इसे अपराध सहना आता है। भारत की गंगा जमुनी तहजीब के समग्र विकास के दृष्टिगत हिंदुत्व को सब्र के घूंट पीने का अपना परंपरागत स्वरूप बदलना नहीं चाहिए।….
भारत भारत है और भारत ही रहेगा।
भारत का अभिप्राय आत्म सम्मान के लिए अपना सर्वस्व समर्पण कर देना है।
भारत का अर्थ है अपने ज्ञान विज्ञान की वैदिक परंपरा का सतत सनातन निर्वाह करते रहना ।
भारत का अभिप्राय है प्रत्येक बहन की अस्मिता की रक्षा के लिए अपने प्राणों का उत्सर्ग करना।
भारत का अभिप्राय है सत्ता स्वार्थी लोगों को चुन चुन कर घसीट घसीट कर मारना ।
……और भारत का अर्थ है मानवतावादी दृष्टिकोण अपनाने वाले प्रत्येक व्यक्ति का अभिनंदन करना और उसका वंदन करते करते उसे भगवान के विशेषण से सुशोभित करना। कहने का अभिप्राय है कि भारत के पास प्रत्येक व्यक्ति को उसके कर्मों के अनुसार यदि स्वर्गधाम का टिकट देने की क्षमता है तो नरक धाम भेजने का जज्बा भी है।
यह ममता बनर्जी को सिद्ध करना है कि वह कौन सी परंपरा का निर्वाह करना चाहती हैं और भारत से कौन सा पुरस्कार प्राप्त करना चाहती हैं?

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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