भारत की इस प्रवाहमानता के कारण भारत के चिंतन में कहीं कोई संकीर्णता नहीं है, कही कोई कुण्ठा नहीं है, कहीं किसी के अधिकार को छीनने की तुच्छ भावना नहीं है, और कहीं किसी प्रकार का कोई अंतर्विरोध नहीं है। सब कुछ सरल है, सहज है और निर्मल है। उसमें वाद है, संवाद है-विवाद नहीं है। तर्क है, वितर्क है, कुतर्क नहीं है। ज्ञान है, विज्ञान है, प्रज्ञान है, अज्ञान नहीं है। बस, अपने इन्हीं विशेष गुणों के कारण भारत सबको अपना मानता है। सारे संसार को एक परिवार मानता है और सारे संसार के लोग एक ही परिवार के सदस्य के रूप में परस्पर वत्र्तने लगें, इसलिए सबको ‘आर्य’ बनाने का संकल्प धारण करके आगे बढ़ता है। ऐसे दिव्य गुणों से भूषित मेरा भारत महान है।
सबको अपना मानने से क्या मिला भारत को?
बहुत भारी पुरूषार्थ और उद्यम के पश्चात ऋषियों की घोर तपश्चर्या से भारतीय संस्कृति का भवन तैयार हुआ। उस भवन की भव्यता दिग-दिगंत में छा गयी। संसार के कोने-कोने के लोगों ने उस भव्य भवन को बड़ी उत्सुकता से देखा। फलस्वरूप लोगों के काफिले के काफिले भारत की ओर चल दिये-ज्ञान का खजाना पाने के लिए। यहां लोग आते रहे और अपनी ज्ञान-पिपासा बुझाकर स्वदेश लौटते रहे। आज से हजारों वर्ष पूर्व के भारत का यह काल वास्तव में ही स्वर्णकाल था। उस समय सारा भारत एक गुरूकुल बन गया था, लोगों के लिए एक तीर्थ बन गया था, एक मंदिर बन गया था और इन सबसे बढक़र संसार के लोगों के लिए ‘मोक्षधाम’ बन गया था। इसके हर कंकर में शंकर होने की लोगों को अनुभूति हो रही थी। जिसके साक्षात दर्शन करने के लिए वे यहां को उठे चले आ रहे थे। मनु महाराज ने मनुस्मृति (2/20) में इस गौरवप्रद स्थिति का बड़ा सुंदर चित्र प्रस्तुत किया है। वह लिखते हैं-
एतद्देशे प्रसूतस्यसकाशादग्रजन्मन:।
स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवा:।।
भारत में उत्पन्न हुए विद्वानों ने भूतल के मानव समाज को आचार और व्यवहार सिखाया। लोग इस देश में आते रहे और अपने-अपने चरित्र को महान बनाकर अपने-अपने देश लौटते रहे। ऐसी उत्कृष्टाव्यवस्था ही किसी देश को ‘विश्वगुरू’ बनने की पात्रता प्रदान करती है। भारत ने इस पात्रता को प्राप्त किया और फिर उसके लिए अपेक्षित धीरता प्रदर्शित करते हुए अपनी भूमिका का भी निर्वाह किया। भारत की स्थिति उस समय एक ऐसे वृद्घ की सी हो गयी थी जिसके पास सभी लोग मार्गदर्शन लेने आते हैं, और वह वृद्घजन सभी को बिना किसी भेदभाव और बिना किसी पक्षपात के अपना ज्ञान बांटता है, अनुभव बांटता है, प्यार बांटता है और आशीर्वाद बांटता है। ऐसी सम्मान जनक स्थिति हर किसी को प्राप्त नहीं होती। बहुत संभव है कि व्यक्तियों में से अधिकतर को यह स्थिति प्राप्त हो जाए, पर देशों में तो भारत ही है जिसे यह सम्मानजनक स्थिति प्राप्त हुई। संसार का कोई अन्य देश भारत की इस क्षेत्र में बराबरी नहीं कर सकता। भारत को ‘सोने की चिडिय़ा’ कहा जाता था। यह सोने की चिडिय़ा उस समय सभी को चरित्र की ऊंची शिक्षा देती थी और सभी को मूल्यवान हीरा बनाकर भेजती थी। ऐसा धन (विद्याधन) देकर भेजती थी-जिसे कोई लाख प्रयत्न करने पर भी चुरा नहीं सकता था। इससे लोगों की अस्खलित भक्ति भारत के प्रति बढ़ती जाती थी। जिन लोगों ने भारत पर विदेशी आक्रमणों का इतिहास लिखकर यह सिद्घ करने का अतार्किक प्रयास किया है कि भारत में तो लोग बाहर से आते रहे और भारत बसता गया। ऐसे लोगों ने भारत के संदर्भ में बहुत बड़ा ‘पाप’ किया है। यदि भारत ने केवल आक्रांताओं को ही अपनी ओर आकृष्ट किया होता तो भारत आज जीवित ना होता। आक्रांताओं से पहले भारत सांस्कृतिक चेतना का इतना समृद्घतम और सुदृढ़तम गढ़ बन गया था कि जब ये लोग यहां आये तो सदियों तक निरंतर प्रबल प्रहार करने के उपरांत भी वे उस गढ़ को तोड़ नहीं पाये। उन्होंने इसे क्षतिग्रस्त तो किया पर इसे भूमिसात नहीं कर पाये। तभी तो शायर को यह कहना पड़ गया था-
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी।
सदियों रहा है दुश्मन दौरे जहां हमारा।।
रक्त पिपासु बनाम ज्ञानपिपासु
जो लोग भारत में रक्तपिपासु बनकर आये उनके इतिहास को तो हमने इतिहास मान लिया, पर जो लोग उनसे पूर्व सदियों तक यहां ज्ञानपिपासु बनकर आते रहे उनका इतिहास हमने इतिहास ही नहीं माना। यह भारतीय इतिहास की एक विडंबना है। इसी विडंबना का फल है कि भारत के इतिहास में सिकंदर जैसे रक्त पिपासु से लेकर मौहम्मद बिन कासिम, गजनी, गौरी, अलाउद्दीन, तैमूर लंग, बाबर और अंग्रेजों तक के अनेकों रक्त पिपासुओं के अवगुणों के गुणगान से इतिहास भरा पड़ा है। जिसे पढ़ते समय किसी के मन में यह प्रश्न नहीं आता कि रक्तपिपासुओं के अवगुणों का गुणगान कैसे संभव है? गुणगान तो गुणियों का होता है, मानवता के रक्षकों का होता है और ईश्वरभक्त लोगों का होता है। राक्षसों का गुणगान नहीं हो सकता। क्रमश:

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