मातृभाषा को मात्र भाषा ना समझें.

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नहीं तो मातृभाषा को मृत भाषा बनने से कोई नहीं रोक सकता.

1- अफ्रिका महाद्वीप – 46 पिछडे देश
21 देश फ्रांसीसी में सीखते हैं।
18 देश अंग्रेज़ी में सीखते हैं।,
5 देश पुर्तगाली में सीखते हैं।,
2 देश स्पेनिश में सीखते हैं।,
उन देशों के लिए ये सारी परदेशी भाषाएँ हैं। उनपर शासन करने वालों की भाषाएँ.
इनमें से कितने देश आगे बढे हैं?

शून्य

2- जापान
दुनिया की 6 भाषाओं से शोधपत्र (रिसर्च पेपर)का अनुवाद
जर्मन, फ्रांसीसी, रूसी, अंग्रेज़ी, स्पेनिश और डच भाषाओं से शोधपत्रों का जापानी में अनुवाद करवाते है। , जापानी भाषा में मात्र 3 सप्ताह में प्रकाशित किया जाता है। अनुवाद छापकर जापानी विशेषज्ञों को मूल कीमत से भी सस्ते मूल्य पर बेचे जाते हैं.

जापान की उन्नति का कोई प्रमाण देने की जरूरत नहीं.

3- पाकिस्तान –
आपको जानकार आश्चर्य होगा कि पाकिस्तान की अपनी भाषा क्या है यह आज भी विवाद का विषय है.
सरकारी कामकाज + उच्च शिक्षा – अंग्रेजी
संसद की भाषा + मिडिया की भाषा — उर्दू
घर की भाषा- पंजाबी, सिन्धी, बलोच आदि.
1947 से पहले पाकिस्तान के किसी भी हिस्से की मुख्य भाषा उर्दू नहीं थी. बंग्लादेश बनने का मुख्य कारण बंगाली को हटा कर उर्दू लादना था।
पाकिस्तान के हालत —
60 % पाकिस्तान में पीने लायक पानी नहीं.

25% पाकिस्तान इतना अधिक अशान्त है कि वहां पाकिस्तान का प्रधानमन्त्री भी नहीं जा सकता. आज भी पाकिस्तान जनमानस अपनी मातृभाषा पंजाबी, सिन्धी, पश्तो और बलोच से नफरत करता है। बंग्लादेश भी उससे बहुत आगे निकल चुका है।

4–इजरायल देश से आप परिचित ही हैं जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद 1948 में विश्व भर में फैले यहूदियों को एक स्थान पर बसाने के लिए बनाया गया। आज वहाँ की मुख्य राजभाषा हिब्रू है और सहयोगी भाषाएँ अँग्रेजी एवं अरबी हैं। अँग्रेजी और अरबी तो आज विश्व के अनेक देशों में बोली जाती हैं, पर हिब्रू ऐसी भाषा है जो दुनिया के नक़्शे से लगभग गायब ही हो गई थी। इसके बावजूद यदि आज वह जीवित है और एक देश की राजभाषा के प्रतिष्ठित पद पर आसीन है
• दुनिया में प्रति व्यक्ति पेटेंट कराने वालों में इजरायलियों का स्थान पहला है.
इजरायल की जनसंख्या न्यूयॉर्क की आधी जनसंख्या के बराबर है. इजराइल का कुल क्षेत्रफल इतना है कि तीन इजराइल मिल कर भी राजस्थान जितना नहीं हो सकते.
इजरायल दुनिया का इकलौता ऐसा देश है, जो समूचा एंटी बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस सिस्टम से लैस है. इजरायल के किसी भी हिस्से में रॉकेट दागने का मतलब है मौत. इजरायल की ओर जाने वाला हर मिसाइल रास्ते में ही दम तोड़ देता है.
इजरायल अपने जन्म से अब तक 7 बड़ी व अनेकों छोटी लड़ाइयां लड़ चुका है. जिसमें अधिकतम में उसने जीत हासिल की है. इजरायल दुनिया में जीडीपी के प्रतिशत के मामले में सर्वाधिक खर्च रक्षा क्षेत्र पर करता है
इजरायल के कृषि उत्पादों में 25 साल में सात गुणा बढ़ोतरी हुई है, जबकि पानी का इस्तेमाल जितना किया जाता था, उतना ही अब भी किया जा रहा है.
इजरायल अपनी जरुरत का 93 प्रतिशत खाद्य पदार्थ खुद पैदा करता है. खाद्यान्न के मामले में इजरायल लगभग आत्मनिर्भर है.

एक भाषा से एकता का उदाहरण है इजरायल .

5-राष्ट्र भाषा और महर्षि दयानन्द —
भारतवर्ष के इतिहास में महर्षि दयानन्द पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने अहिन्दी भाषी गुजराती होते हुए पराधीन भारत में सबसे पहले राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता के लिए हिन्दी को सर्वाधिक महत्वपूर्ण जानकर मन, वचन व कर्म से इसका प्रचार-प्रसार किया।
दिसम्बर, 1872 को स्वामीजी वैदिक मान्यताओं के प्रचारार्थ भारत की तत्कालीन राजधानी कलकत्ता पहुंचे थे और वहां उन्होंनें अनेक सभाओं में व्याख्यान दिये। ऐसी ही एक सभा में स्वामी दयानन्द के संस्कृत भाषण का बंगला में अनुवाद गवर्नमेन्ट संस्कृत कालेज, कलकत्ता के उपाचार्य पं. महेशचन्द्र न्यायरत्न कर रहे थे। दुभाषिये वा अनुवादक का धर्म वक्ता के आशय को स्पष्ट करना होता है परन्तु श्री न्यायरत्न महाशय ने स्वामी जी के वक्तव्य को अनेक स्थानों पर व्याख्यान को अनुदित न कर अपनी उनसे विपरीत मान्यताओं को सम्मिलित कर वक्ता के आशय के विपरीत प्रकट किया जिससे व्याख्यान में उपस्थित संस्कृत कालेज के छात्रों ने उनका विरोघ किया। विरोध के कारण श्री न्यायरत्न बीच में ही सभा छोड़कर चले गये थे। प्रसिद्ध ब्रह्मसमाजी नेता श्री केशवचन्द्र सेन भी इस सभा में उपस्थित थे। बाद में इस घटना का विवेचन कर उन्होंने स्वामी जी को सुझाव दिया कि वह संस्कृत के स्थान पर लोकभाषा हिन्दी को अपनायें। गुण ग्राहक स्वाभाव वाले स्वामी दयानन्द जी ने तत्काल यह सुझाव स्वीकार कर लिया। यह दिन हिन्दी के इतिहास की एक प्रमुख घटना थी कि जब एक 48 वर्षीय गुजराती मातृभाषा के संस्कृत के अद्वितीय विद्वान ने हिन्दी को अपना लिया। ऐसा दूसरा उदाहरण इतिहास में अनुपलब्ध है। इसके बाद स्वामी दयानन्द जी ने जो प्रवचन किए उनमें वह हिन्दी का ही प्रयोग करने लगे।
थियोसोफिकल सोसासयटी की नेत्री मैडम बैलेवेटेस्की ने स्वामी दयानन्द से उनके ग्रन्थों के अंग्रेजी अनुवाद की अनुमति मांगी तो स्वामी दयानन्द जी ने 31 जुलाई 1879 को विस्तृत पत्र लिख कर उन्हें अनुवाद से हिन्दी के प्रचार-प्रसार एवं प्रगति में आने वाली बाधाओं से परिचित कराया। स्वामी जी ने लिखा कि अंग्रेजी अनुवाद सुलभ होने पर देश-विदेश में जो लोग उनके ग्रन्थों को समझने के लिए संस्कृत व हिन्दी का अध्ययन कर रहे हैं, वह समाप्त हो जायेगा। हिन्दी के इतिहास में शायद कोई विरला ही व्यक्ति होगा जिसने अपनी हिन्दी पुस्तकों का अनुवाद इसलिए नहीं होने दिया जिससे अनुदित पुस्तक के पाठक हिन्दी सीखने से विरत होकर हिन्दी प्रसार में बाधक हो सकते थे।

हरिद्वार में एक बार व्याख्यान देते समय पंजाब के एक श्रद्धालु भक्त द्वारा स्वामीजी से उनकी पुस्तकों का उर्दू में अनुवाद कराने की प्रार्थना करने पर उन्होंने आवेश पूर्ण शब्दों में कहा था कि अनुवाद तो विदेशियों के लिए हुआ करता है। देवनागरी के अक्षर सरल होने से थोड़े ही दिनों में सीखे जा सकते हैं। हिन्दी भाषा भी सरल होने से आसानी से कुछ ही समय में सीखी जा सकती है। हिन्दी न जानने वाले एवं इसे सीखने का प्रयत्न न करने वालों से उन्होंने पूछा कि जो व्यक्ति इस देश में उत्पन्न होकर यहां की भाषा हिन्दी को सीखने में परिश्रम नहीं करता उससे और क्या आशा की जा सकती है?

आज जरूरत है भाषा गौरव जगाने की

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