गीता का चौथा अध्याय और विश्व समाज

गीता के इन श्लोकों में यह तथ्य स्पष्ट किया गया है कि संसार में जब अनिष्टकारी शक्तियों का प्राबल्य होता है तो उस अनिष्ट से लडऩे वाली शक्तियों का भी तभी प्राकट्य भी होता है।
जब बढ़ता संसार में घोर पाप अनाचार।
तभी जन्मते महापुरूष दूर करें दुराचार।।
उस समय सत्य को दबाव मुक्त करने के लिए और सज्जनशक्ति को तनावमुक्त करने के लिए प्रकृति उन शक्तियों का सृजन करती है जो संसार की बिगड़ी हुई व्यवस्था को पुन: ठीक करने की सामथ्र्य रखती हैं। इसी प्रकार की स्थिति को और संसार के एक शाश्वत सत्य को लोगों ने ‘अवतारवाद’ से जोडक़र देख लिया है। जबकि ऐसा मानना गलत है। संसार में ईश्वर का कभी भी अवतरण नहीं हो सकता। वह सर्वव्यापक है और सर्वत्र विद्यमान है, वह सब कुछ देख रहा है और सब कुछ सुन भी रहा है, यहां तक कि हमारी सन्ध्या में संसार के किसी भी व्यक्ति को यह पता नहीं होता कि हम क्या कह रहे हैं, और क्या मांग रहे हैं?- पर वह परमपिता परमेश्वर हमारी उस मौनावस्था में भी हमारे मन की बात को सुनता रहता है। हमारे संवाद को वह उस समय भी सुनता है और कभी-कभी तो हमसे उल्टे बातें भी करने लगता है। उस आनन्दपूर्ण वात्र्ता को अनुभव तो किया जा सकता है पर उसे वर्णन नहीं किया जा सकता। ऐसे परमपिता-परमेश्वर के बारे में यह भी सत्य है कि वह सन्ध्या में ऐसा नहीं है कि मेरे और आपके साथ ही रहता हो-वह उसी समय उन करोड़ों लोगों के साथ भी रहता है जो उस समय सन्ध्या कर भी रहे होते हैं या नहीं भी कर रहे होते हैं। इसीलिए वह सर्वव्यापक है, उस सर्वव्यापी को कभी भी किसी भी काल में संसार में आकर मानव रूप में जन्म लेने की आवश्यकता नहीं पड़ती।
श्रीकृष्ण जी यहां जो कुछ कह रहे हैं उसका अभिप्राय केवल इतना ही है कि ईश्वरीय शक्ति संसार के प्रत्येक प्रकार के उपद्रव को शान्त करने और प्रत्येक प्रकार की चुनौती का प्रत्युत्तर देने की व्यवस्था करती है और वह अन्धकार को मिटाकर प्रकाश करने के लिए संघर्ष करती रहती है। इसलिए श्रीकृष्ण अर्जुन से अपेक्षा कर रहे हैं कि तू भी उपस्थित चुनौती का सामना कर। यदि तू ऐसा करता है तो मानना कि तू भी ईश्वरीय शक्ति का अंश बनकर ईश्वरीय व्यवस्था को धर्मानुकूल बनाने के लिए ईश्वरीय कार्यों का ही निष्पादन कर रहा है। यदि आज संयोगावशात् तुझे ईश्वरीय व्यवस्था को धर्मानुकूल बनाये रखने के लिए ईश्वरीय कार्य को करने का सौभाग्य मिल रहा है तो इसे खोने की मूर्खता मत कर। इसे अपना सौभाग्य मानते हुए पूर्ण मनोयोग से निभाने का प्रयास कर। तेरा ऐसा प्रयास इस संसार के लिए उपयोगी होगा, और इसमें व्याप्त अव्यवस्था को मिटाने में सहायता मिलेगी।
श्रीकृष्णजी कहते हैं कि संसार में ऐसे बहुत से लोग हैं जो राग, भय, क्रोध से युक्त होकर मुझ में लीन होकर अर्थात मेरी शरण में आकर ज्ञान रूपी तप से पवित्र होकर मेरी ही भावना में आ मिले हैं। अर्जुन तुम्हें ध्यान रखना चाहिए कि संसार के लोग जिस भावना से मेरे पास आते हैं मैं उन्हें उसी भावना से अपनाता हूं।
श्रीकृष्णजी का मानना है कि संसार के लोग यदि मेरे पास सकाम भाव से आ रहे हैं तो मैं उन्हें सकाम भाव से ग्रहण करता हूं और यदि निष्काम भाव से आ रहे हैं तो मैं उन्हें निष्काम भाव से अपनाता हूं। जिन लोगों की भावनाएं अपने लिए कुछ मांगने की हैं उन्हें ईश्वर उसी प्रकार गले लगाते हैं और जो संसार के लिए कुछ मांग रहे हैं, प्रार्थना कर रहे हैं-उनकी प्रार्थना को वह उसी रूप में सुनते हैं। इस पर सत्यव्रत सिद्घान्तालंकार जी कहते हैं-”श्रीकृष्ण का कहना है कि सकाम तथा निष्काम दोनों प्रकार के कर्म करने वालों का लक्ष्य तो भगवान है ही उसी की ओर मुंह उठाये सब चले जा रहे हैं, परन्तु सकाम कर्मियों की अपेक्षा निष्काम कर्मी ऊंचे सत्य की चट्टान पर खड़ा है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि मानव सृष्टि में मनुष्य को गुण कर्म के अनुसार कर्म करने में मैंने ही प्रवृत्त किया है, परन्तु मैं इस कर्म का कत्र्ता होते हुए भी क्योंकि मैंने यह कर्म निष्कामता से किया है इसलिए मैं कत्र्ता होते हुए भी अकत्र्ता हूं।”
हम पूर्व में ही बता चुके हैं कि योगेश्वर श्रीकृष्णजी जहां ‘मैं’ का प्रयोग कर रहे हैं वहां वहां हमें ईश्वर का अर्थ समझना चाहिए। मानो गीता में आत्मा और परमात्मा का संवाद चल रहा है। एक परमयोगी की आत्मा परमात्मा के साथ मिलकर उसकी ओर से संसार के साधारण लोगों को उपदेश कर रहा है। संसार के साधारण लोगों का प्रतिनिधि यहां पर अर्जुन है। आत्मा और परमात्मा का या भक्त और भगवान का संवाद होने यह गीता-ज्ञान शाश्वत और सनातन हो गया है। यह आज भी उतना ही उपयोगी है जितना महाभारतकाल में था और सृष्टि के रहने तक उतना ही उपयोगी रहेगा जितना आज है।
श्रीकृष्णजी कह रहे हैं कि ईश्वर ने गुण- कर्म के विभाग के आधार पर संसार में चार वर्ण बनाए। अर्जुन तुझे समझना चाहिए कि यद्यपि इस कर्म विभाग का कत्र्ता ईश्वर है, परन्तु वह फिर भी अव्यय अकत्र्ता है। इसका अभिप्राय है कि ईश्वर अविनाशी है। उसे कर्मों का लेप नही होता, वह कर्मों के फलों में कोई आसक्ति या स्पृहा या इच्छा नहीं रखता। वह अपनी सारी की सारी व्यवस्था को निष्काम भाव से चलाता है और अनासक्त रहता है। वह कर्म के बन्धन से मुक्त है। कर्म के बन्धन से मुक्त हो जाना ही निष्कामभाव की सिद्घि हो जाना है। तू इसी भाव से युद्घ कर, समझ कि तू कुछ नहीं कर रहा। कोई ईश्वरीय शक्ति अपने कार्यों को तुझसे पूर्ण कराके तुझे पुण्य का भागी बना रही है।
श्रीकृष्णजी कहते हैं कि वैदिक संस्कृति को वैश्विक संस्कृति बनाने का महान उद्यम पूर्ण पुरूषार्थ करने वाले हमारे ऋषि पूर्वज और पुराने लोग इसी निष्काम भाव से ही अपने सारे कार्यों को पूर्ण करते थे। वह मुमुक्षु होते थे अर्थात मोक्ष के अभिलाषी होते थे और अपनी साधना को बड़ी कुशलता से पूर्ण करते थे। इसलिए तुझे भी अपने पूर्वजों के दिखाये हुए मार्ग का अनुकरण करते हुए अपना कर्म करना चाहिए।
कोई भी देश वैश्विक नेतृत्व तभी कर सकता है जब उसके निवासियों का बौद्घिक चिन्तन ऊंचा और पवित्र हो। चिन्तन का ऊंचा होना अलग बात है और पवित्र होना अलग बात है। चिन्तन ऊंचा तो अमेरिका का भी हो सकता है जिसके द्वारा विज्ञान के अनेकों आविष्कार किये गये हैं, निश्चय ही भौतिक विज्ञान की इतनी बड़ी खोजें मनुष्य की बुद्घि को विस्मित कर डालती हैं जिन पर अमेरिका ही नहीं समस्त मानव जाति ही गर्व कर सकती है। चिन्तन की इस ऊंचाई के होते हुए भी अमेरिका का चिन्तन पवित्र इसलिए नहीं है कि उसका बढ़ाया हुआ विज्ञान आज के विश्व के लिए घातक बन चुका है। कारण है कि उस चिन्तन में लोक कल्याण के सपने नहीं बुने गये। कैसे दूसरे देश को अपने चरणों में झुकाया जाए और कैसे दूसरों को विकास में पीछे धकेलकर उन्हें अपने आश्रित रखा जाए-ऐसे स्वार्थपूर्ण चिन्तन के कारण अमेरिका जैसा देश भी अपने आप को सुरक्षित नहीं मान रहा है। क्रमश:

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