गीता का छठा अध्याय और विश्व समाज

आत्म कल्याण कैसे सम्भव है 
संसार के लोग अपने आप पर अपनी ही नजरें नहीं रखते। मैं क्या कर रहा हूं? मुझे क्या करना चाहिए? ऐसी दृष्टि उनकी नहीं होती। वह ये सोचते हैं कि मैं जो कुछ कर रहा हूं-उसे कोई नहीं देख रहा और मैं उसे किसी को नहीं देखने दे रहा हूं, इसलिए मैं बहुत ही चतुर चालाक हूं? जिन लोगों की अपने विषय में ऐसी सोच होती है-वे आत्मछल करते हैं। जिसके कारण वे कब नीचे गिर जाएं, और कब उनका दिखावटी बड़प्पन मिट्टी में मिल जाए?-इसके विषय में कुछ भी नहीं कहा जा सकता। संसार के लोग बड़प्पन का झूठा महल चिनते हैं और वह अक्सर थोड़ी सी विपरीत स्थिति-परिस्थिति के आते ही भर भराकर गिर जाता है।
श्रीकृष्णजी आत्मकल्याण का रास्ता बताते हुए अर्जुन को समझा रहे हैं कि सुनो अर्जुन! मनुष्य अपना उद्घार या आत्मकल्याण स्वयं ही कर सकता है। वह अपने आप पर स्वयं नजर रखे और कभी भी स्वयं को नीचे ना गिरने दे। सदा यह वचन याद रखे कि हर व्यक्ति स्वयं ही अपना मित्र है और स्वयं ही अपना शत्रु है। एकान्त में मनुष्य अपना अन्तरावलोकन स्वयं करे, स्वयं अपनी गलतियां देखे, अपने चरित्र की स्वयं समीक्षा करे। अपने आपसे स्वयं प्रश्न पूछे और बड़ी ईमानदारी से उनका उत्तर दे तो वह उन्नतिगामी होने लगता है। उसका आत्मकल्याण होने लगता है। जब करने वाला ‘मैं’ हूं तो यह भी ध्यान रहे कि टोकने वाला भी ‘मैं’ ही होना चाहिए। ‘मैं’ से ‘मैं’ का वात्र्तालाप होता रहेगा तो ‘मैं’ (अहंकार) नष्ट हो जाएगा। यह भीतरी जगत का खेल है, जिससे ‘मैं’ और ‘मैं’ मिलकर ‘मैं’ को ही मार डालती हैं। बाहरी जगत में एक और एक मिलकर दो होते हैं पर भीतरी जगत में एक और एक मिलकर शून्य हो जाते हैं। जी, हां वही शून्य जिससे यह जगत उपजता है। इस खेल को जरा खेलकर तो देखो बड़ा आनंद आएगा।
‘मैं’ और ‘मैं’ मिलकर करें ‘मैं’ का सत्यानाश।
‘मैं’ के सत्यानाश में छुप रहा आत्मविकास।।
आत्मकल्याण का इससे उत्तम और इससे सस्ता कोई मार्ग नहीं है। ‘मैं’ के अर्थात अहंकार के विनाश होते ही व्यक्ति के आत्मविकास के मार्ग खुल जाते हैं। जो व्यक्ति ईमानदारी से अपने आपसे अपने आपको नहीं छुपाता वह अपने दोषों को पहचान लेता है और उन्हें दूर करने के लिए भी सचेष्ट हो उठता है।
इसी बात को श्रीकृष्ण जी हमारे लिए उत्तम बता रहे हैं। वह कहते हैं कि हे अर्जुन! जो व्यक्ति योग की सीढिय़ों को तय कर लेता है और योगी कहा जाने लगता है, वह एकान्त में अकेला बैठकर अपने चित्त और आत्मा को वश में रखकर उच्चता की साधना करता है, ऐसा व्यक्ति वासना से मुक्त हो जाता है। वासना के सारे साधन उपलब्ध होते हुए भी वह उससे मुंह फेर लेता है, अर्थात एक योगी को वासना सताना बंद कर देती है। वह अपरिग्रहवादी बनकर संसार के भौतिक ऐश्वर्यों को भी लात मार देता है और अपने मन को सदा परमात्मा के साथ जोड़े रखता है। उसके लिए संसार के सारे स्वाद और सारे रस फीके हो जाते हैं। ऐसे योगी को आत्मरस का लपका पड़ जाता है और वह समय मिलते ही उसी में लगा रहता है। उसके इस आनन्द को कोई दूसरा व्यक्ति न तो जान सकता है और न ही बखान कर सकता है।
योगी के लिए सदा एकान्त स्थान ही उपयोगी होता है, और योगी के लिए ही क्यों?- संसार की समस्याओं का समाधान खोजने वाले सामाजिक चिन्तकों, लेखकों, कवियों, दार्शनिकों, राजनीतिशास्त्रियों और राष्ट्रसाधकों के लिए भी एकान्त ही उपयोगी होता है। एकान्त में अर्थात ध्यान की अवस्था में ही समस्याओं के समाधान निकला करते हैं। एकान्त में रहकर ही लोग बड़े आविष्कार करते हैं, बड़े-बड़े चमत्कार करते हैं और एकान्त में रहकर ही आत्मसाक्षात्कार करते हैं।
एक योगी तो जीवन और जगत दोनों की अबूझ पहेलियों का समाधान खोजता है-अत: उसके लिए तो एकान्त और भी आवश्यक है। पर हमें ध्यान रखना चाहिए कि संसार के अन्य लोगों के एकान्तसेवन और योगी के एकान्तसेवन में भारी अंतर होता है। योगी की साधना सात्विकता में प्रवाहित होती है और वह सात्विकता के सकारात्मक परिवेश का ही निर्माण कर संसार को लाभान्वित करती है। जबकि संसार के लोगों से एकान्त में कई बार चूक भी हो सकती है वह कोई ऐसा निर्णय ले सकते हैं जो विश्व के लिए हानिकारक हो। परमाणु बम की खोज किसी वैज्ञानिक की बड़ी साधना का फल है, परन्तु यह संसार के लिए भय का कारण बनी है और इसने अतीत में भारी विनाश भी मचाया है। ऐसे और भी उदाहरण हो सकते हैं, जिन्होंने संसार को लाभ के स्थान पर हानि ही दी है। इसका कारण ये है कि संसार के लोगों का चित्त और आत्मा वश में नहीं होती, ना ही वासना पर उनका नियंत्रण होता है, यह भी आवश्यक नहीं कि वह अपरिग्रहवादी हो गये हों और ऐषणाओं से उन्होंने स्वयं को मुक्त कर लिया हो, और यह भी नहीं कि उनका मन ईश्वर के साथ निरन्तर जुड़ा रहता हो। बस, यही वह अन्तर है जो योगी को संसार के सब लोगों से श्रेष्ठ बनाता है। भारत की संस्कृति श्रेष्ठ की ही उपासना करती है, वह घटिया माल को हाथ भी नहीं लगाती, यद्यपि सम्मान सभी का करती है, पर चाहिए उसे एकदम अव्वल माल ही।
श्रीकृष्ण जी इसी अव्वल माल की ओर ही संकेत करते हुए अर्जुन को बता रहे हैं कि हे पार्थ! ऐसे योगीजन स्वच्छ स्थान पर अपना स्थिर आसन बिछाकर और ऐसे स्थान का चयन कर जो न तो अधिक ऊंचा हो और न ही अधिक नीचा हो, उस पर कुशा, फिर मृगछाला और उस पर स्वच्छ वस्त्र बिछाकर अपने मन को एकाग्र कर चित्त तथा इन्द्रियों की क्रियाओं को रोककर अपनी साधना करते हैं और आत्मशुद्घि के लिए योग में जुट जाते हैं। उनका योग उन्हें संसार के भोग और रोग से दूर कर देता है।
श्रीकृष्ण जी यहां एक प्रकार से योगी की दिन चर्या पर प्रकाश डाल रहे हैं। उसकी दिनचर्या में योग का क्या स्थान है और उसके प्रति उसकी निष्ठा किस स्तर की होती है?- इस पर प्रकाश डाल रहे हैं। योगेश्वर श्रीकृष्ण जी जिस प्रकार के योगी का चित्रण कर रहे हैं-उसका संसार अलग है, उसकी प्राथमिकताएं अलग हैं और उसकी मान्यताएं व जीवन के प्रति दृष्टिकोण अलग है। वह संसार में अपने शत्रु नहीं खोजता अपितु अपने भीतर काम, क्रोध, मद, मोह लोभादि के शत्रुओं को खोजता रहता है और उन्हें पटक-पटक कर मारता रहता है। उसका अभियान आत्म विजयी होने का है। वह जानता है कि बाहरी शत्रु मेरे भीतर के शत्रुओं की प्रतिच्छाया हैं। भीतर के शत्रु जब तक समाप्त नहीं होंगे, तब तक बाहरी जगत के शत्रुओं का सफाया होना असम्भव है। अत: एक योगी की सारी दिनचर्या भीतरी जगत के शत्रुओं के सफाये के लिए बनती है। वह आंखें इसलिए बन्द कर लेता है कि उसे भीतर के जगत में अपने शत्रु खोजने होते हैं, जो आंख बन्द करके ही खोजे जाने संभव हैं। दूसरे, उसे बाहरी शत्रुओं का कोई भय नहीं रहता और ना ही बाहर उसका कोई शत्रु होता है, इसलिए बाहरी शत्रुओं का उसे भय न होने के कारण वह आंखें बन्द करके बैठ जाता है। जिसने बाहरी संसार में शत्रुओं की लम्बी पंक्ति तैयार कर ली है-वह आंख बन्द करके भी नहीं बैठ सकता।
क्रमश:

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