*ईश्वर की स्तुति कैसे करें* ?

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डॉ डी के गर्ग

यह एक ऐसा विषय है जिसपर विभिन्न विद्वानों मत मतान्तरों के अलग अलग विचार ही मिलेंगे। जबकि ये सभी मानते है की ईश्वर एक है और निराकार ,जन्म मरण से रहित है लकिन उसमे अज्ञानतावश या कहो स्वार्थवश किंतु परन्तु डालकर एक स्पष्ट विषय को पेचीदा और बहस का विषय बना देते है इसका कारण एक और है -स्वाध्याय की कमी होना,विद्वानों के विचार सुनने के बजाय मुर्ख साधुओ /गुरुओ पर निर्भर रहना की गुरु ही भगवांन है।
मैं रोजाना सेकड़ो तस्वीरें अपने मोबाइल से हटाता हु जिनको किसी न किसी भगवन का रूप बताकर लोग सुबह भेजते है , कुछ शनि नमः पशुपति नमः, जा महाकाल , जय श्री राम आदि व्हाट्सप आदि पर मशीन की तरह पोस्ट करते है और मुझे तो लगता है की वो भी इन तस्वीरों को समय समय पर मोबाइल से साफ़ करते रहते होंगे। यदि ये ईश्वर के स्वरूप का आदान प्रदान है तो फिर इसमें सफाई कैसी ? सम्हाल कर रखो और जब इतने सारे भगवन आपके मोबाइल में आ गए तो फिर काम काज की जरुरत क्यों ? बल्ले बल्ले होनी चाहिए।
मैंने ये प्रश्न सभी मित्रो से किया -*क्या व्हाट्सअप पर तस्वीर डालना या जय शनि जय बजरंगी लिखने से इश्वर स्तुति हो जाती हैं*?
*परन्तु किसी का उत्तर नहीं मिला* , अन्तः मैंने कुछ वैदिक विद्वानों से संपर्क किया और अध्ययन के बाद जो निष्कर्ष मिला वह आपके सम्मुख प्रस्तुत है।
*उत्तर* : (विश्वप्रिय जी) – ईश्वर स्तुति तो कभी भी नहीं होगी। इसे उदाहरण से समझें। टाटा होटल्स का प्रचार करना हो तो क्या हम गोदरेज या विप्रो के विज्ञापन व्हाट्स एप पर भेजें तो टाटा होटल्स का प्रचार होगा ? नहीं न ,ठीक वैसे ही हनुमान जी ईश्वर नहीं, उनके चित्र भेजने से ईश्वर स्तुति कभी भी नहीं होगी
*अन्य उत्तर* : सच्ची स्तुति का रहस्य यह है कि ‘क्रतुमिच्छत’ कर्म की इच्छा करो। केवल सन्ध्या, भजन, पूजापाठ से कुछ नहीं होता। तुम्हारी जो इच्छा या कामना है, उसे पूरा करने के लिए कुछ कर्म करो। मतलब यह कि परमेश्वर की सच्ची स्तुति शब्द से नहीं कर्म से होती है, कथनी से नहीं, करनी से होती है।
*विश्लेषण* : (स्वामी विवेकानंद जी परिव्राचक ) यह व्यक्ति जो पूजा भक्ति उपासना का खंडन कर रहा है इसका कथन वेदों के विरुद्ध होने से झूठ है। वेदोवेदों में कहा है, तीन काम करने चाहिएं।
एक — पूजा स्तुति उपासना भी करनी चाहिए।
दूसरा — कर्म भी करना चाहिए।
तीसरी बात — वेदों का अध्ययन भी करना चाहिए। ईश्वर अल्पज्ञ जीवात्माओं से महान व महानतम सत्ता है। वह सर्वज्ञ अर्थात् पूर्ण ज्ञान रखने वाली सत्ता है। संसार में जो ज्ञान व विज्ञान उपलब्ध है उसका अधिष्ठाता व प्रकाशक परमात्मा ही है। इसे ऋषि दयानन्द ने आर्यसमाज के प्रथम नियम में प्रस्तुत करते हुए कहा है कि ‘सब सत्य विद्या और जो पदार्थ विद्या से जाने जाते हैं उनका आदि मूल परमेश्वर है।’
तीनों को मिलाकर भक्ति पूरी होती है।
इसने एक तिहाई भक्ति = कर्म का विधान किया है।
एक तिहाई भक्ति = स्तुति प्रार्थना का खंडन किया है।
एक तिहाई भक्ति = वेदाध्ययन के विषय में कुछ बताया ही नहीं।
इसलिए इसके कथन में दोष है।
विश्वप्रिय जी का कहना है की यदि हवन ,संध्या केवल दिखाने के लिए ,किसी प्रसिद्धी के लिए किये जाये तो बाह्य आडंबर से अच्छा है आन्तरिक श्रृंगार यानि कर्म दुसरे शब्दों में संध्या हवन यदि प्रदर्शन के लिए है तो उससे अच्छा है सात्त्विक कर्म।
“”यस्य छाया अमृतम् “” उस ईश्वर की छाया में रहना, उसकी शिक्षाओं का पालन करना,आदेशों के पालन में तत्पर रह कर कर्म करते रहना ही उत्तम है, न की प्रदर्शन।
लेकिन जैसे बालक संध्या हवन करते हैं तो उनका प्रदर्शन आगे बढ़ने में सहायक हो सकता है यदि आत्मिक उन्नति हो ही नहीं रही तब भी प्रदर्शन के लिए भी करते रहना आगे चल कर परिणाम दे सकता है अतः उसकी निन्दा नहीं करनी चाहिए जबकि उसे आगे बढ़ने की प्रेरणा देते रहना चाहिए।
*विस्तार से* : प्रत्येक व्यक्ति सरलतम रूप में ईश्वर को जानना व उसे प्राप्त करना चाहता है। हिन्दू समाज में अनेकों को मूर्ति पूजा ,गुरु पूजा सरलतम लगती है क्योंकि यहां स्वाध्याय, ज्ञान व जटिल अनुष्ठानों आदि की आवश्यकता नहीं पड़ती। अन्य मतों की भी कुछ कुछ यही स्थिति है। अनेक मत वालों ने तो यहां तक कह दिया कि बस आप हमारे मत पर विश्वास ले आओ, तो आपको ईश्वर व अन्य सब कुछ प्राप्त हो जायेगा। बहुत से भोले-भाले लोग ऐसे मायाजाल में फंस जाते हैं परन्तु विवेकी पुरूष जानते हैं कि यह सब मृगमरीचिका के समान है। जब रेगिस्तान की भूमि में जल है ही नहीं तो वह वहां प्राप्त नहीं हो सकता। अतः धार्मिक लोगों द्वारा अपने भोले-भाले अनुयायियों को बहकाना एक धार्मिक अपराध ही कहा जा सकता है। दोष केवल बहकाने वाले का ही नहीं, अपितु बहकने वाले का भी है क्योंकि वह संसार की सर्वोत्तम वस्तु ‘ईश्वर’ की प्राप्ति के लिए कुछ भी प्रयास करना नहीं चाहते और सोचते हैं कि कोई उसके स्थान पर तप व परिश्रम करे और उसे उसका पूरा व अधिकतम लाभ मिल जाये।
ईश्वर व जीवात्मा को जानने व ईश्वर को प्राप्त करने की सरलतम विधि कौन सी है और उसकी उपलब्घि किस प्रकार होगी? मोक्ष की पहली शर्त है कि उपासना व सत्कर्मों को करके ईश्वर का साक्षात्कार करना व जीवनमुक्त जीवन व्यतीत करना। बिना ईश्वर का साक्षात्कार किये मोक्ष वा जन्म मरण से मुक्ति प्राप्त नहीं होती।
*ईश्वर के ब्रह्म परमात्मा आदि नाम हैं, जो सच्चिदानन्दादि लक्षणयुक्त है, जिस के गुण, कर्म, स्वभाव पवित्र हैं। जो सर्वज्ञ, निराकार, सर्वव्यापक, अजन्मा, अनन्त, सर्वशक्तिमान, दयालु, न्यायकारी, सब सृष्टि का कर्त्ता, धर्त्ता, हर्त्ता, सब जीवों को कर्मानुसार सत्य न्याय से फलदाता आदि लक्षणयुक्त है, उसी को परमेश्वर मानता हूं।*’
सखाय: क्रतुमिच्छ्त कथा राघाम शरस्य।
उपस्तुतिं भोज: सूरिर्यो अह्रय:।। -ऋक् ८/७०/१३
इस मन्त्र में परमेश्वर के तीन नाम बताए गए हैं। वह परमेश्वर अर्थ प्रश्न- (शरस्य) ‘श् हिंसायाम्’ भक्तों को सुख देने वाले की (उपस्तुतिं) स्तुति (कथा राघाम) किस प्रकार सिद्ध करें? जो (भोज:) सबको भोजन देने वाला तथा (सूरि:) प्रेरणा देने वाला है और (अह्रय:) अपराजित रहने वाला है। उत्तर- (सखाय: क्रतुमिच्छ्त) मित्रो, काम करने की इच्छा करो।
१.(भोज:) सबको भोजन देने वाला है, अगर तुम भी वैसा बनना चाहते हो तो (क्रतुमिच्छत) काम करो।८/७८/७ में भी कहा है कि (क्रत्वइत्पूर्णमुदरम्) पेट कर्म के द्वारा ही भरता है।
२. वह (सूरि:) सबको प्रेरणा देने वाला है, अगर तुम भी वैसा बनना चाहते हो तो (क्रतुमिच्छत) प्रज्ञा=बुद्धि की कामना करो। जब तक स्वयं बुद्धिमान नहीं बनोगे दूसरों को भी प्रेरणा नहीं दे सकोगे।
३. वह (अह्रय:) कभी किसी से पराजित नहीं होता, दुष्टों के सामने झुकता नहीं, कोई ऐसा काम नहीं करता कि पीछे लज्जित होना पड़े; अगर तुम भी ऐसा बनना चाहते हो तो (क्रतुमिच्छत) संकल्प की इच्छा करो, सच्चे संकल्प वाले बनो। जो आदमी दृढ़ और सच्चे संकल्प करने वाला है, वह कभी बुरा काम नहीं करेगा, किसी प्रलोभन के आगे नहीं झुकेगा और किसी से पराजित नहीं होगा।
*शब्दार्थ-* क्रतु: – कर्म – प्रज्ञा – संकल्प।
स्तुति – शब्दात्मक स्तुति। उपस्तुति – कर्ममय स्तुति।
पुरुहन्मा – (हन हिंसागत्यो:) बहुत गति करने वाला।
ईश्वर के इस स्वरूप का उपासक को बार बार विचार करना चाहिये और एक एक गुण, कर्म, स्वभाव व लक्षण को तर्क वितर्क कर अपने मन व मस्तिष्क में अच्छी तरह से स्थिर कर देना चाहिये। जब इन गुणों का बार बार विचार, चिन्तन व ध्यान करते हैं तो इसी को उपासना कहा जाता है। उपासना की योग निर्दिष्ट विधि के लिए महर्षि पंतजलि का योग दर्शन भी पूर्ण सावधानी, तल्लीनता व ध्यान से पढ़ना चाहिये जिससे उसमें वर्णित सभी विषय व बातें बुद्धि में स्थित हो जायें। ऐसा होने पर उपासना व उपासना की विधि दोनों का ज्ञान हो जाता है। ईश्वर के स्वरूप व उपासना विधि के ज्ञान सहित जीवात्मा को अपने स्वरूप के बारे में भी भली प्रकार से ज्ञान होना चाहिये।
अब ईश्वर को प्राप्त करने की विधि पर विचार करते हैं। ईश्वर को प्राप्त करने के लिए जीवात्मा को स्तुति, प्रार्थना सहित *सन्ध्या*-उपासना कर्मों व साधनों को करना है। आइये सत्यार्थ प्रकाश के सप्तम समुल्लास से इनकी परिभाषा देखते हैं|
*स्तुति* – जिससे ईश्वर में प्रीति, उसके गुण कर्म स्वभाव से अपने गुण कर्म स्वभाव का सुधारना होता है उसे स्तुति कहते हैं|
*प्रार्थना* – जिससे निरभिमानता, उत्साह और सहाय का मिलना होता है उसे प्रार्थना कहते हैं|
*उपासना* – उपासना शब्द का अर्थ समीस्थ होना है। अष्टांग योग से परमात्मा के समीपस्थ होने और उस को सर्वव्यापी, सर्वान्तर्यामीरूप से प्रत्यक्ष करने के लिये जो जो काम करना होता है, वह वह करना चाहिये। उपासक वा योगियों को ईश्वर को प्राप्त करने के लिए उपासना करते समय कण्ठ के नीचे, दोनों स्तनों के बीच में और उदर से ऊपर जो हृदय देश है, जिसको ब्रह्मपुर अर्थात् परमेश्वर का नगर कहते हैं, उसके बीच में जो गर्त है, उसमें कमल के आकार का वेश्म अर्थात् अवकाशरूप एक स्थान है और इसके बीच में जो सर्वशक्तिमान् परमात्मा बाहर भीतर एकरस होकर भर रहा है, यह आनन्दस्वरूप परमेश्वर उसी प्रकाशित स्थान के बीच में खोज करने से मिल जाता है। दूसरा उसके मिलने का कोई उत्तम स्थान वा मार्ग नहीं है। अतः उपासक को इस प्रकार से उपासना करनी चाहिये जिसका परिणाम शुभ होगा और सफलता भी अवश्य मिलेगी।
*प्रश्न – उपासना कैसे की जाती है*?
उत्तर – उपासना शब्द का अर्थ समीपस्थ होना है| साधारण शब्दों में कहें तो हमारा मन जो हमेशा इधर उधर भागता रहता है उसे विषयों से हटा कर अंदर की और लगा दें – जैसे कछुआ अपने अंगों को अपने कवच के अंदर समेट लेता है उसी प्रकार मनुष्य अपने मन को अपनी अन्तरात्मा की और मोड़ दे |
*प्रश्न – इसको सपष्ट करके समझाओ*|
उत्तर – महर्षि पातंजलि अपने योग सूत्र में समझाते हैं – जो उपासना का आरंभ करना चाहै उसके लिये यही आरंभ है कि वह किसी से वैर न रक्खे, सर्वदा सब से प्रीति करे | सत्य बोले | मिथ्या कभी न बोले | चोरी न करे | सत्य व्यवहार करे | जितेन्द्रिय हो | लम्पट न हो और निरभिमानी हो | अभिमान कभी न करे | यह पांच प्रकार के यम मिल के उपासनायोग का प्रथम अंग है |
फिर महर्षि आगे कहते हैं कि राग द्वेष छोड़ भीतर और जलादि से बाहर पवित्र रहे | धर्म से पुरुषार्थ करने से लाभ में न प्रसन्नता और हानि में न अप्रसन्नता करे | प्रसन्न होकर आलस्य छोड़ सदा पुरुषार्थ किया करे | सदा दुःख सुखों का सहन और धर्म ही का अनुष्ठान करे, अधर्म का नहीं | सर्वदा सत्य शास्त्रों को पढ़े पढ़ावे | सत्पुरुषों का संग करे और ‘ओ‌३म्’ इस एक परमात्मा के नाम का अर्थ विचार करे नित्यप्रति जप किया करे | अपने आत्मा को परमेश्वर की आज्ञानुकूल समर्पित कर देवे | इन पांच प्रकार के नियमों को मिला के उपासनायोग का दूसरा अंग कहता है |
यह भी विचारणीय है कि सभी मत मतान्तरों के अनुयायी भिन्न भिन्न प्रकार से उपासना व पूजा आदि करते हैं। क्या उन्हें उन्हें ईश्वर की प्राप्ति होती है वा नहीं? विचार करने पर हमें लगता है कि उससे लाभ नहीं होता, जो लाभ होता है वह उनके पुरूषार्थ तथा प्रारब्घ से होता है।
*प्रश्न – स्तुति कितने प्रकार की होती है*?
उत्तर – स्तुति दो प्रकार की होती है:
o सगुण – वह परमात्मा सब मैं व्यापक, शीघ्रकारी और अनंत बलवान जो शुद्ध, सर्वज्ञ, सबका अन्तर्यामी, सर्वोपरि विराजमान, सनातन, स्वयंसिद्ध, परमेश्वर अपनी जीवरूप सनातन अनादि प्रजा को अपनी सनातन विद्या से यथावत् अर्थों का बोध वेद द्वारा करता है| यह सगुण स्तुति कहलाती है अर्थात् जिस-जिस गुण से सहित परमेश्वर की स्तुति करना वह सगुण|
o निर्गुण –(अकाय) अर्थात् वह कभी शरीर धारण व जन्म नहीं लेता, जिसमें छिद्र नहीं होता, नाड़ी आदि के बन्धन में नहीं आता और कभी पापाचरण नहीं करता, जिसमें क्लेश, दुःख, अज्ञान कभी नहीं होता, इत्यादि जिस-जिस राग द्वेषादी गुणों से पृथक् मानकर परमेश्वर की स्तुति करना है वह निर्गुण स्तुति है|
*प्रश्न – सगुण माने साकार और निर्गुण माने निराकार, ऐसा हम सुनते और मानते आये हैं*|
उत्तर – यह आपका सुनना और मानना गलत है क्यों कि ईश्वर सर्वदा स्वतंत्र है और कभी भी शरीर और नस-नाड़ी या जन्म–मरण के बन्धन में नहीं आता है; इन गुणों से रहित होने के कारण वह निर्गुण कहलाता है| उसी प्रकार सर्वज्ञ, न्यायकारी आदि गुणों से सहित होने के कारण वह सगुण कहलाता है|
*प्रश्न – स्तुति का क्या फल होता है*?
उत्तर– स्तुति से फल यह है कि जैसे परमेश्वर के गुण हैं वैसे गुण कर्म स्वभाव अपने भी करना| जैसे वह न्यायकारी है तो आप भी न्यायकारी होवें| और जो केवल भांड के समान परमेश्वर के गुणकीर्तन करता जाता और अपने चरित्र नहीं सुधारता उसका स्तुति करना व्यर्थ है|
*प्रश्न – प्रार्थना का क्या फल होता है*?
उत्तर – प्रार्थना में यह जानते हुए कि हम से भी कहीं बड़ी शक्ति है, हमारे अभिमान का नाश करती है| उसी प्रकार जब हमारा मन दुर्बलता से भर जाता है तो यही प्रार्थना हमारे अन्दर ईश्वर की सहायता से उत्साह और शक्ति का संचार करती है आदि| प्रार्थना द्वारा हम ईश्वर से मेधा नामक बुद्धि, तेज, धैर्य, पराक्रम, सामर्थ्य, बल आदि मांगते हुए अपने कर्तव्य पथ पर पूर्ण पुरुषार्थ करते हुए चलते जायें|
*ईश्वर की स्तुति प्रार्थना और उपासना*
यह तीन शब्द, स्तुति, *प्रार्थना और उपासना आप हर सत्संग* में सुनते हैं | हर किसी के मन में यह प्रश्न उठता है कि यह होते क्या है? क्या यह तीनो एक ही हैं? और अगर एक हैं तो ईश्वरस्तुतिप्रार्थानोपासना हम क्यों बोलते हैं?
*ईश्वर की स्तुति क्यों करनी चाहिये*?
इस प्रश्न का उत्तर है कि ईश्वर की स्तुति करने से उससे प्रीति वा प्रेम, उसके गुण, कर्म व स्वभाव का जानना व उन्हें जानकर अपने गुण, कर्म व स्वभावों को सुधारना होता है। जब हम ईश्वर की स्तुति करते हैं तो हमारे गुण, कर्म व स्वभाव में सुधार होता है। ऐसा होने से हमारे स्तुति से पूर्व जो दुर्गुण, दुव्र्यस्न और दुःख होते हैं, उनमें स्तुति के प्रभाव से स्वतः सुधार होता जाता है। हम जब राम, कृष्ण व दयानन्द जी के जीवन सहित अन्य महापुरुषों व ऋषियों के जीवन पर विचार करते हैं तो यह स्पष्ट होता है कि इन महापुरुषों का निर्माण वेदों व वैदिक साहित्य का स्वाध्याय तथा ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना और उपासना का ही परिणाम था। हमारे कुछ पौराणिक बन्धुओं को यह बात आश्चर्यजनक लग सकती है कि राम व कृष्ण ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना व उपासना करते थे? वह तो इन्हें परमात्मा का अवतार मानते हैं। परमात्मा का अवतार स्वयं की स्तुति व उपासना करे, यह तर्कसंगत एवं उचित नहीं है। इसका उत्तर यही है कि राम व कृष्ण ईश्वर का अवतार न होकर उच्च कोटि की श्रेष्ठ आत्मायें थीं और वह भी अपने जीवन के सुधार व निर्माण के लिये तथा मोक्ष प्राप्ति के लिये सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी तथा सृष्टिकर्ता ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना और उपासना किया करते थे।

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