sitajiयह सामान्य धारणा है कि सीताजी का स्वयंवर हुआ था, और उन्होंने रामचंद्र जी को अपने लिए पति रूप में चुना। ऐसी ही धारणा द्रोपदी के लिए है कि उसने भी अपने स्वयंवर में अपने पति रूप में अर्जुन को अपने लिए चुना। इस आलेख में हम केवल सीताजी के कथित स्वयंवर तक ही सीमित रहेंगे। वस्तुत: सीताजी का स्वयंवर नही हुआ, क्योंकि वह ‘वीर्यशुल्का’ थीं, जिन्हें कोई भी राजकुमार या राजा अपना पराक्रम दिखाकर अपनी बना सकता था। यह शर्त भी पिता की थी, न कि स्वयं सीताजी की। यह निश्चित था कि  पिता की इच्छा और शर्त को पूर्ण करने वाले व्यक्ति को ही वह अपना पति स्वीकार करेंगी। इस प्रकार सीताजी पिता की शर्त से बंधी थीं, जबकि स्वयंवर में उन्हें अपने लिए अपने ढंग से पति चुनने की छूट होनी चाहिए थी।

अब हम उन परिस्थितियों पर विचार करें जो साक्ष्य रूप में ‘वाल्मीकीय रामायण’ के बाल काण्ड के 25वें सर्ग में स्पष्ट की गयीं हैं।  जब विश्वामित्र जी राजा जनक की सभा में पहुंच जाते हैं तो राजा उनका उचित आदर सत्कार करता है। अगले दिन प्रात:काल में राजा जनक और विश्वामित्र जी का संवाद होता है। तब विश्वामित्र जी राजा जनक से आग्रह करते हैं-

‘‘लोक में प्रसिद्घ, क्षत्रिय वंश में उत्पन्न दशरथ के ये दोनों पुत्र उस श्रेष्ठ धनुष को देखना चाहते हैं, जो आपके यहां रखा है।’’

तब राजा जनक ने कहा-‘योगिनी के गर्भ से उत्पन्न सीता नाम से प्रसिद्घ मेरी ‘वीर्यशुल्का’ (पराक्रम दिखाकर प्राप्त करने योग्य) कन्या को युवा होते देख उसके साथ विवाह करने के लिए अनेक राजा लोग आये। मैंने उन राजाओं से कहा कि यह कन्या ‘वीर्यशुल्का’  है, अत: बिना पराक्रम की परीक्षा लिये मैं अपनी कन्या किसी को नही दूंगा।’

‘तब सब राजा इकट्ठे होकर अपना पराक्रम प्रदर्शित करने के लिए मिथिला में आये, पराक्रम की डींग हांकने वाले उन राजाओं को अल्पवीर्य समझकर मैंने लौटा दिया। तब उन राजाओं ने मिलकर मिथिला को घेर लिया, परंतु अंत में वे भीरू, वीरता की झूठी डींग हांकने वाले राजा मेरे द्वारा परास्त होकर अपने मंत्रियों सहित चारों दिशाओं में भाग गये।’

इस प्रकार स्पष्ट है कि जिस दिन विश्वामित्र जी मिथिला में पहुंचे उस दिन वहां कोई स्वयंवर या विवाह समारोह नही हो रहा था, ना ही वहां पर रावण या कोई अन्य राजा था। अब से पूर्व ही कुछ राजा मिथिला आए थे और वह परास्त होकर वहां से चले गये, अब राजा जनक इस बात को लेकर चिंतित थे कि ऐसा कौन राजकुमार होगा जिससे वह अपनी पुत्री का विवाह संस्कार कर पुत्री के प्रति अपने दायित्व से मुक्त हो सकेंगे? अब अपने बीच विश्वामित्र जी और उनके साथ राम व लक्ष्मण को पाकर वह प्रसन्न तो हैं, परंतु निश्चिंत नही हैं, क्योंकि अभी उन्हें नही पता कि उनकी ‘वीर्यशुल्का’ पुत्री का भावी पति आज उनके भवन राम के रूप में प्रवेश कर चुका है।

26वें सर्ग में वाल्मीकीय रामायण में स्पष्ट किया गया है कि राजा जनक की बात सुनकर विश्वामित्र जी ने कहा-‘राजन! वह धनुष श्रीराम को दिखाइए। तब राजा जनक ने मंत्रियों को आदेश दिया कि गंध और पुष्पमालाओं से भूषित धनुष को ले आओ।’

जिस पेटी में वह धनुष रखा था उस लोहे की पेटी को लाकर मंत्रियों ने देवतुल्य राजा से कहा-हे मिथिलाधीश्वर! राजेन्द्र ! यह धनुष जिसकी सब जनक राजाओं ने पूजा की है, उपस्थित है अब आप चाहें जिसको दिखाइए।’ (इस साक्षी से यह स्पष्ट है कि धनुष को एक दो मंत्री उठे और ले आये, ऐसा नही था कि उस धनुष को आठ पहियों वाली लोहे की पेटी में रखा था और पांच हजार वीर पुरूष किसी प्रकार उसे खींचकर लाये थे। यह भी संभव नही है कि एक राजकुमारी होते हुए सीताजी घर में झाडू पोंछा करती हों और चौका लगाते समय एक हाथ में धनुष को उठा लेती हों, तो दूसरे से चौका लगा देती हों)

‘मंत्रियों की बात सुनकर राजा जनक ने हाथ जोडक़र विश्वामित्र तथा राम, लक्ष्मण से कहा-‘हे मुनिश्रेष्ठ ! यह धनुषों में श्रेष्ठ धनुष आ गया है। हे महाभाग! आप इसे राजकुमारों को दिखाइए।’ तब धर्मात्मा विश्वामित्र राजा जनक के इन बचनों को सुन राम से बोले-वत्स इस धनुष को देखो।

विश्वामित्र जी का आदेश पाकर राम उस पेटी को जिसमें धनुष था खोलकर और धनुष को देखकर बोले-‘हे ब्रह्मन ! अब मैं इस श्रेष्ठ धनुष को हाथ लगाता हूं। मैं इसे उठाकर इस पर चिल्ला चढ़ाने का भी प्रयत्न करूंगा। ’

महायशस्वी एवं बलवान श्रीराम ने चिल्ला चढ़ाने के पश्चात ज्यों ही उसे खींचा उस धनुष के बीच से टूटकर दो टुकड़े हो गये। धनुष के टूटने से घोर शब्द हुआ। उस शब्द से विश्वामित्र, राजा जनक, राम और लक्ष्मण को छोडक़र शेष सभी लोग स्तब्ध हो गये। कुछ देर में लोगों की स्तब्धता भंग होने पर घबराहट से मुक्त (राजा जनक को घबराहट इस बात की थी कि यदि श्रीराम भी धनुष का चिल्ला ना चढ़ा सके तो सीता का विवाह कैसे होगा?) वाकपटु राजा जनक हाथ जोडक़र विश्वामित्र जी बोले-‘भगवन! मैंने दशरथ पुत्र राम का पराक्रम देख लिया है। इनका पराक्रम अति अद्भुत, कल्पना और तर्क से परे है। मेरी पुत्री सीता दशरत नंदन श्रीराम को पति रूप में प्राप्त करके मेरे वंश की कीर्ति फैलाएगी।

‘हे कौशिक! मैंने सीता के विवाह के लिए ‘वीर्यशुल्क’ की जो प्रतिज्ञा की थी वह पूर्ण हो गयी। अब मैं प्राणों से भी बढक़र प्रिय सीता को राम के लिए दूंगा।’

‘हे ब्रह्मन! हे कौशिक ! यदि आपकी अनुमति हो तो मेरे मंत्री रथ पर सवार हों और शीघ्र अयोध्या को जाएं और महाराज दशरथ को विनय युक्त वाक्यों से ‘वीर्यशुल्का’ सीता के विवाह की सूचना देकर और यहां का संपूर्ण वृतांत बताकर यहां ले आयें।’

इस प्रसंग से स्पष्ट है कि कल्पना करते-करते और और व्यर्थ की विद्वत्ता का प्रदर्शन करते हुए लोगों ने अर्थ का किस प्रकार अनर्थ किया है? इससे स्वयंवर और ‘वीर्यशुल्का’ जैसे दोनों शब्दों का अंतर भी समाप्त हो गया, और लोगों ने ‘वीर्यशुल्का’  को स्वयंवर मान लिया। आज बहुत से लोग हैं जो आज के वासनापूर्ण प्रेम विवाहों को सीता के आदर्श विवाह से जोडक़र देखते हैं और उसे स्वयंवर कहकर महिमामण्डित करते हैं। जबकि सीताजी एक आदर्श नारी हैं, जो अपने विवाह काल तक अखण्ड ब्रह्मचारिणी रहीं, और उन्हें पिता की इच्छा के विपरीत जाकर विवाह करने की कोई ना तो शीघ्रता है और ना ही किसी प्रकार की हठ का प्रदर्शन उनके व्यवहार में कहीं दिखाई देता है। जबकि आज के कथित वासनापूर्ण प्रेम विवाहों में लडक़े लड़कियों में विवाह के लिए शीघ्रता भी दीखती है और एकप्रकार की हठ भी दीखती है। इसका अभिप्राय है कि हमने सीता के आदर्श चरित्र को नही समझा। सीताजी के विवाह में वासना की और शारीरिक सौंदर्य की कहीं दूर-दूर तक भी गंध नही आती। इसलिए सीताजी के विवाह को आज के प्रेम विवाहों के साथ जोडक़र नही देखा जा सकता।

टीवी चैनलों पर भी कुछ समय पहले ‘स्वयंवर’ को लेकर एक फिल्म नायिका ने अच्छा नाम और धन कमाया था पर वह केवल नाम और धन कमाने के लिए अपनी वासना की पूर्ति हेतु किया गया एक अभद्र नाटक ही था, इससे बढक़र और कुछ नही था। हमें अपनी प्राचीन संस्कृति के आदर्शों को अपनाकर उन्हें वर्तमान के संदर्भों में स्थापित कर देखने की आवश्यकता है। ऐसी चीजों को प्रोत्साहित नही किया जाना चाहिए, जिनसे हमारे संस्कृतिक मूल्यों को ठेस पहुंचे और हम उन्हें एक परंपरा मानकर अपने लिये बोझ बनाकर ढोने के लिए अभिशप्त हो जाएं। आधुनिकता और नवीनता निश्चित रूप से स्वीकार की जानी चाहिए। परंतु उन पर पुरातन के अधुनातन स्वरूप की चादर को भी डालकर रखना चाहिए। जिससे उनकी गरिमा में वृद्घि हो सके।

हमारे धर्म के कथित ठेकेदारों को शास्त्रों की उचित, सारगर्भित और सटीक व्याख्या करने हेतु आगे आना चाहिए, क्योंकि शास्त्र ही वह चीज है जिनमें देश का अतीत, वर्तमान और भविष्य तीनों एक साथ जुड़े होते हैं, अथवा शास्त्र ही वह घाट है जिस पर ये तीनों काल एक साथ पानी पीते हैं। इसलिए हमारे शास्त्रवेत्ताओं का यह पुनीत कत्र्तव्य है कि वह आने वाली संतति को उचित मार्गदर्शन दें। सीता जी के विषय में भ्रांत धारणाओं को और अवैज्ञानिक तथ्यों को स्थापित कर हमने नई पीढ़ी को  अपने वैज्ञानिक अतीत से काटकर उसे नितांत अवैज्ञानिक और अतार्किक सिद्घ कराने का एक हथियार दे दिया है। इस हथियार से हमारी युवा पीढ़ी तो हमें मार ही रही है, विपरीत मतावलंबी भी हमारी बातों पर उपहास उड़ाकर या उन्हें दोषपूर्ण ढंग से प्रस्तुत कर अपने मत का प्रचार और प्रसार कर रहे हैं। जिससे ‘घर वापिसी’ के लिए भी मार्ग कठिन होता जा रहा है। ‘घर वापिसी’ के लिए  घर की साफ सफाई भी आवश्यक है, क्योंकि जो आ रहा है उसके स्वागत के लिए घर में स्वच्छता का होना भी आवश्यक है। इसलिए अपनी देवी सीता को सचमुच की देवी सीता बना लो। अपने राम को सचमुच का यौद्घेय राम बना लो। आज आदर्श सीता की भी आवश्यकता है, जो केवल शास्त्र की प्रतीक बनकर खड़ी हो, और यौद्घेय राम की भी आवश्यकता है, जो शस्त्र का प्रतीक बनकर खड़े हों। ऐसे आदर्शों को समझकर ही हम अपने गौरवपूर्ण अतीत की रक्षा कर सकेंगे। इसलिए सीताजी के स्वयंवर और वीर्यशुल्का के सही अर्थों को सही समझना भी आवश्यक है।

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