महानतम में एक नरसिंहराव

नरसिंहरावजी का पूरा नाम था− पामलपूर्ति वेंकट नरसिंहराव! उनके सम्मान में नरेंद्र मोदी सरकार शांति−स्थल पर स्मारक बना रही है तो वह बधाई की पात्र है। उसके इस कदम से कांग्रेस शर्मिंदा हो रही है तो जरुर हो। यदि आप अपने पिता का श्राद्ध न करें और वह पवित्र कार्य आपका पड़ौसी करे तो लोग आप पर थूकेंगे, इसमें नया क्या है? इसीलिए टीवी चैनलों पर कांग्रेस के प्रवक्ताओं की या तो घिग्घी बंधी हुई है या वे विलाप कर रहे हैं कि मोदी हमारे नायकों को छीनकर अपनी छवि चमका रहा है। पहले गांधी, फिर पटेल और अब नरसिंहराव!

सच्चाई तो यह है कि यह कांग्रेस−मुक्त भारत के सपने को साकार करना है। कांग्रेस महात्मा गांधी की जगह राहुल गांधी की आरती उतार रही है। कांग्रेस खुद को खत्म करने पर जुटी हुई है। मोदी इसी प्रक्रिया को आगे बढ़ा रहे हैं। राव साहब के स्मारक पर कांग्रेस प्रसन्नता जाहिर करती तो उसका कद ऊंचा होता लेकिन कोई क्या करे, वह अपना ही स्मारक बनवाने पर तुली हुई है।

राव साहब का जीते−जी और मरने के बाद भी सोनिया−कांग्रेस ने कितना अपमान किया, इसके मैं दर्जनों उदाहरण पेश कर सकता हूं। इसकी तुलना में नरसिंहरावजी अनंत धैर्य के स्वामी सिद्ध हुए। उनके दो मंत्रियों की आपत्ति के बावजूद उन्होंने राजीव गांधी फाउंडेशन के लिए 100 करोड़ रु. दिए। एक मंत्री चाहते थे कि सोनिया गांधी और उनके एक सहयोगी के विरुद्ध कठोर कानूनी कार्रवाई की जाए लेकिन राव साहब ने साफ मना कर दिया। कांग्रेस की अनुशासन समिति ने अर्जुनसिंह, तिवारीजी, शीला दीक्षित और नटवरसिंह को तत्काल निकालने का फैसला कर लिया। राव साहब ने उसे ताक पर रखवाया। इन बागियों से सुलह करने की कोशिश की। उन्होंने घोर विरोधियों को मंत्रिमंडल में शामिल कर लिया। कुछ को राज्यपाल बना दिया। इसके बावजूद कांग्रेसियों ने उनके प्रति कृतघ्नता दिखाई।

यह सफेद झूठ है कि उन्होंने रा. स्वं. संघ से मिलकर बाबरी मस्जिद गिरवाई। इसके बारे में मेरे अनुभव कभी विस्तार से लिखूंगा। उन पर लगाया गया यह आरोप मूर्खतापूर्ण और दुर्भावनापूर्ण है। वे देश के चार महानतम प्रधानमंत्रियों में से एक थे। नेहरु, इंदिराजी,नरसिंहरावजी और अटलजी! कौनसा ऐसा प्रधानमंत्री है, जिसके कार्यकाल में भयंकर भूलें नहीं हुई हैं लेकिन नरसिंहरावजी को याद किया जाएगा, उनके आर्थिक सुधारों के लिए, विदेश नीति में नई पहलो के लिए, परमाणु−बम की तैयारी के लिए, विरोधियों के प्रति सहिष्णुता के लिए, अपनी सज्जनता के लिए और सबसे बड़ी इस बात के लिए कि उन्होंने प्रधानमंत्री पद को अपने पर कभी बोझ नहीं बनने दिया। उसे उन्होंने कमीज़ की तरह पहना और कमीज़ की तरह उतार कर रख दिया।

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