शांति के संग शक्ति हो, शक्ति के संग होश

बिखरे मोती-भाग 9५

गतांक से आगे….
धर्महीन जीवन सदा,
बिन पतवार की नाव।
लक्ष्य तक पहुंचे नही,
बीच में देय डुबाय।। 919।।

व्याख्या :
धर्महीन जीवन बिना पतवार की नाव के समान है। जिस प्रकार बिना पतवार के नाव, अपने गंतव्य स्थान तक नही पहुंच पाती है, उसे लहरें एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाती हैं, कभी-कभी तो नाव भंवर में फंसकर मझधार में ही डूब जाती है। ठीक इसी प्रकार मनुष्य बिना धर्म के इस संसार रूपी समुद्र में हिचकोले खाता फिरता है, जीवन के वास्तविक लक्ष्य से भटक जाता है, पापों के भंवर में फंसकर न जाने कितने जन्म जन्मांतरों को बिगाड़ लेता है। मनुष्य जीवन व्यर्थ चला जाता है, स्वर्ग अथवा मोक्ष से वंचित रह जाता है। अत: मनुष्य को चाहिए कि वह सर्वदा अपने जीवन में धर्म का आचरण करे, ताकि वह अपने लक्ष्य स्वर्ग अथवा मोक्ष का अधिकारी हो सके।
केवल मनुष्य योनि ही ऐसी योनि है जिसमें स्वर्ग अथवा मोक्ष को प्राप्त किया जा सकता है। बाकी तो अन्य सब योनियों के दरवाजे बंद हैं।

शांति के संग शक्ति हो,
शक्ति के संग होश।
चिंतन कर कभी बैठकै,
दो घड़ी हो खामोश ।। 920।।

व्याख्या :-
शांति और शालीनता की बातें सामथ्र्यवान व्यक्ति को ही शोभा देती हैं, अन्यथा कायरता परिलक्षित होती है। इसलिए शांति के साथ शक्ति का होना नितांत आवश्यक है और यदि मनुष्य के पास शक्ति हो अर्थात सामथ्र्य हो किंतु शांति न हो अर्थात विवेक न हो, धैर्य न हो, सहनशीलता अथवा क्षमाशीलता न हो तो वह शक्ति अज्ञान और अहंकार के कारण कभी भी आत्मघाती हो सकती है, महाविनाशकारी हो सकती है। जैसा कि जरासंध, कंस, दुर्योधन, रावण, हिरण्यकशिपु इत्यादि इसके ज्वलंत उदाहरण हैं। दूसरा दृष्टांत महाराज जनक को देखिए :-वे महान सामथ्र्यवान और प्रतापी राजा था किंतु मन में होश था अर्थात विवेक और विनम्रता से उनका व्यक्तित्व जाज्वल्यमान था, अनेक सद्गुणों से अलंकृत था। वे राजा होते हुए भी योगी थे, धर्मात्मा थे। इसलिए उन्हें ‘विदेह’ भी कहते थे। उन्हें अपनी शक्तियों का भान था किंंतु वे आत्मसंचयी और विवेकशील थे। इसलिए उनकी प्रभु प्रदत्त शक्ति मां लोककल्याणकारी सिद्घ हुई और वे एक आदर्श राजा कहलाए। अत: मनुष्य को चाहिए कि यदि परमपिता परमात्मा उसे किसी प्रकार की सामथ्र्य देता है तो उसके द्वारा उसका सर्वदा सदुपयोग होता रहे । इस संदर्भ में शांत मन से दो घड़ी बैठकर उसे चिंतन अवश्य करना चाहिए और त्रुटियों को दूर करना चाहिए अन्यथा वह प्रभु प्रदत्त शक्ति विलक्षणता वापिस चली जाती है।
रिश्ते से भी श्रेष्ठ है,
आपस का विश्वास।
गर टूटे विश्वास तो,
रहे न रिश्ता खास ।। 921।।

व्याख्या :-
यदि रिश्ते संबंध और विश्वास में तुलना की जाए तो रिश्ते से बड़ा विश्वास होता है, क्योंकि पारस्परिक विश्वास ही प्रत्येक रिश्ते की आधारशिला है, नींव है। जैसे नींव के हिलने पर बड़ी से बड़ी इमारत धड़ाम से गिर जाती है, ठीक इसी प्रकार जब हृदय में विश्वास के स्थान पर संदेह आ जाए तो संसार का बड़े से बड़ा रिश्ता चाहे पिता पुत्र का हो, पति-पत्नी का हो, मित्र-मित्र का हो, भाई-भाई का हो, क्षण भर में ऐसे टूट जाता है जैसे कच्चा धागा टूट जाता है। संसार में भक्त और भगवान का रिश्ता भी विश्वास पर टिका है। इसलिए रिश्ते की अपेक्षा विश्वास श्रेष्ठ है। मनुष्य को चाहिए कि वह सर्वदा संबंधों को अक्षुण्ण् रखने के लिए हर हाल में पारस्परिक विश्वास की रक्षा करे। क्रमश:

Comment:

kolaybet giriş
bettilt giriş
betgaranti giriş
betgaranti 2026
Kolaybet Giriş
bettilt giriş
Kolaybet
Kolaybet Giriş
Kolaybet
Kolaybet Giriş
Hititbet Giriş
Hititbet
betgaranti giriş
Hititbet Giriş
Hititbet Güncel Giriş
hititbet giriş
hititbet
Betorder
betorder giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betorder giriş
betnano
betnano
Tuzla Cilt Bakım Merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Tuzla Lenf Drenaj
holiganbet
holiganbet
holiganet
bettilt giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
holiganbet
holiganbet giriş
holiganbet güncel
holiganbet
betgaranti giriş
Teknik Seo
hititbet
grandpashabet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
artemisbet giriş
artemisbet giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
holiganbet giriş
holiganbet güncel
holiganbet giriş
betgaranti giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betnano güncel giriş
betnano giriş
betgaranti giriş
madridbet
madridbet
betnano