subhash cariहिंदी विश्व की समृद्घतम संस्कृत भाषा की उत्तराधिकारिणी है। इसके एक-एक अक्षर का वैज्ञानिक अर्थ है। एक-एक शब्द कुछ ऐसा अर्थ रखता है जिसमें झलकती है-आत्मीयता और टपकता है-स्नेह रस। आज हम कुछ ऐसे शब्दों पर चर्चा करते हैं जो दिखाते हैं हमारे संबंधों को और जिनके कारण हम बंध जाते हैं प्रेम की डोर में।

तात:-तात पिता के अर्थ में प्रयोग होता है। परन्तु यह शब्द आजकल ताऊ के रूप में समाज में प्रचलित है। ताऊ के रूप में इसलिए कि इस शब्द का अपने से बड़े या श्रद्घेय व्यक्ति के प्रति सम्मान भाव प्रकट करने के लिए इसका प्रयोग किया जाता था। इसलिए पिता अपनी संतान से, अपने से ज्येष्ठ भ्राता को तात कहलवाता था। वैसे इस तात शब्द को बच्चों और विद्यार्थियों के प्रति प्रेम प्रकट करने के लिए भी प्रयुक्त किया जाता था। परंतु अब समाज में यह केवल पिता के ज्येष्ठ भ्राता और उनके समकक्ष अन्य लोगों के लिए ही प्रयुक्त किया जाता है। वैसे इसका अर्थ ‘ज्येष्ठ पिता’ भी होता है। उसी को सम्मान के साथ तात कहा जाता है। क्योंकि तात पिता से भी पूर्व अपने दायित्वों को, अपने भाईयों की संतानों को अपनी संतान मानकर निर्वाह करता था और संतानें अपने ‘ज्येष्ठ पिता’ को अपने पिता से भी पूर्व आदरणीय और सम्माननीय मानती थीं, इसलिए यह शब्द ‘तात’ परिवार की एक प्रमुख कड़ी होता था।

पिता :- पिता को संस्कृत में जनक भी कहा जाता है। जिसका अर्थ जन्म देने वाला होता है। इसी का एक समानार्थक शब्द है-वाप:। इसका अर्थ है बीज बोना। इसी ‘वाप:’ से बाप शब्द बन गया। जबकि बोना भी वाप: से ही बिगडक़र एक शब्द हमारे सामने आ गया। इसी से ‘बापू’ शब्द बन गया। इसी से ‘वापुल’ और वापुल से ‘बाबुल’ शब्द आ गया। सारे शब्दों में आत्मीयता है। ससुराल के लिए विदा होती बेटी के सिर पर जब पिता हाथ रखता है-तो उसकी भावनाएं शांत हो जाती हैं, शुभकामनाएं इतनी तीव्रता से बहती हैं कि कुछ कहते नही बनता। इसलिए उन मार्मिक क्षणों में केवल हाथ ही उठता है और उसी को बेटी ‘बाबुल की दुआओं’ की सौगात मान लेती है। जो समझता है बस वही इन क्षणों  की गंभीरता को जान सकता है। बाबुल का मूल शब्द ‘वाप:’ तब साकार हो उठता है-बीज एक आकार के रूप में सामने खड़ा होता है, और उसे फूलने फ लने की शुभकामनाएं उसका जनक-बाप दे रहा है। तब ज्ञात होता है कि बाप किसे कहते हैं?

पिता घर रूपी सृष्टि का विष्णु है। पालक है उसका भरण पोषण करने वाला है। जो लोग एक पिता के इस अर्थ के मर्म को जानते और समझते हैं वे पिता का विष्णु के समान ही सम्मान करते हैं।

माता:-माता हमारी जननी होती है। पर ‘मा’ संस्कृत शब्द का अर्थ माप तोल से भी है, चिन्ह लगाने का सीमांकन करने से भी है। मां हमारे व्यक्तित्व का सीमांकन करती है, उसका चिह्नीकरण करती है, अपनी कल्पनाओं से हमारे ज्ञान को विस्तार देती है और चंदा को ‘मामा’ बताकर उस से भी हमारा आत्मीय संबंध स्थापित कर देती है। माता हमारी निर्माता होती है। हमारे निर्माण के लिए हमारे स्वरूप का सीमांकन करती है। गौमाता और भारतमाता यद्यपि हमारी जननी नही हंै, परंतु हमारे व्यक्तित्व को एक स्वरूप अवश्य देती हैं। इसलिए जननी माता के समान ही  इन्हें भी हमारे द्वारा प्राचीन काल से ही सम्माननीया और आदरणीया माना गया है। इसी ‘मां’ से मातृ, मात्र, मात्रा जैसे शब्द बने हैं। इसी से मातुल: (मातुभ्र्राता) मां का भाई-और मातुली (मामी) शब्द बने हैं। इसी को आजकल हम मामा, मामी कहते हैं। ये सभी मां के तुल्य समादरणीय हैं।

पितामह:-पिता का पिता पितामह कहा जाता है। यह ब्रह्मा का विशेषण भी है। ब्रह्मा सृष्टि का सृजक है, सृष्टा है। परिवार रूपी सृष्टि का सृष्टा पितामह है। इसलिए उसके प्रति इससे उत्तम कोई विशेषण हो ही नही सकता। ब्रह्मा के समक्ष इसीलिए विष्णु (पिता) जी शांत रहते हैं। कुछ बोलते नही कि ब्रह्माजी (पितामह) उसके भी सृष्टा हैं। यह हमारे संबंधों की गंभीरता और मार्मिकता है। जिसे एक संस्कार भी कहा जा सकता है कि पिता के समक्ष पुत्र शांत रहना ही श्रेयस्कर मानता है। माता लक्ष्मी है, पिता विष्णु है तो पितामह ब्रह्मा है। सारे देवताओं का वास एक ही परिवार में है। इन्हें मंदिरों में खोजने वाले भूल जाते हैं कि इनका अस्तित्व तो साकार रूप में घर में ही है।

पितामह को भारत के देहात में लोग ‘दादा या बाबा’ भी कहते हैं। ‘बाबा’ किसी संत या विद्वान को भी कहा जाता है। ‘बाबा’ का अर्थ कुछ इस प्रकार लिया जाता है जैसे कोई व्यक्ति लंबी दाढ़ी वाला, वैरागी संसार से विरक्त, सांसारिक विषय वासनाओं के प्रति पूर्णत: विरक्त हो गया हो, सबके साथ न्यायपूर्ण व्यवहार करने वाला और समदर्शी हो।

पुराने समय में गांवों में घर-घेर दूर रखे जाते थे। घर में बहू के आते ही ससुर घेर से घर कम ही आता था, घर के दरवाजे पर आकर खांसता था, जिससे कि बहू बेटियां यदि किसी असहज अवस्था में हैं तो सहज हो जायें। फिर जिस काम के लिए आता था, उसे शीघ्र पूरा कर चला जाता था। एक प्रकार से वह घर के प्रति विरक्ति भाव का प्रदर्शन करता था। अपनी निर्लिप्तता दिखाता था। परंतु ब्रह्मा की भांति यज्ञ का संचालन अवश्य करता था। अपनी पैनी दृष्टि से देखता रहता था कि यज्ञ (घर के सारे कार्यों में) के निष्पादन में कमी कहां झलक रही है? परिवार के हर बच्चे का ध्यान रखता था, कौन कहां जा रहा है, कहां से आया है, क्या कर रहा है, किसे किस चीज की आवश्यकता है? ब्रह्मा का दायित्व बड़ा महत्वपूर्ण था। एक परिवार में दो-चार भाई होते थे, उनकी संतानें होती थीं। उन सबमें सहज समायोजन यह ‘बाबा’ रूपी ब्रह्मा ही करता था। इसीलिए वह अपनी भूमिका को न्यायपूर्ण बनाकर रखता था। किसी के दबाव में या प्रभाव में उसका न्याय या न्यायिक दृष्टिकोण न आ जाए, इसलिए वह एक दूरी बनाकर रखता था। यहां तक कि अपनी पत्नी से भी दूर रहता था। पत्नी यदि किसी की शिकायत भी करती थी तो उसे भी न्यायपूर्ण ढंग से सुनता था, ऐसा बाबा घेर में मिलता था या गांव से दूर खेतों में बनी कुटिया में मिलता था।

महलों का संचालन और न्यायपूर्ण पालन ब्रह्मा दूर कुटिया से करता था। घर के सभी लोग किसी भी जटिल प्रश्न पर उत्तर पाने के लिए या किसी परिस्थिति में उसका मार्गदर्शन लेने के लिए घेर में या जंगल की कुटिया की ओर जाते थे। बहुएं ब्रह्मा ‘बाबा’ की न्यायपूर्ण शैली से प्रभावित होकर हर दिन पहले उसी को भोग लगाना शकुन मानती थीं। ऐसे मार्गदर्शक ब्रह्मा को लोग ‘बाबा’ कहते थे। बाबा शब्द ब्रह्मा से ही रूढ़ हुआ है।

आज ‘बाबा’ का सम्मान नही हो रहा है। इसका कारण है परिवार के और समाज के संस्कारों में आया परिवर्तन। ‘बाबा’ ब्रह्मा नही रहा। वह ‘ग्राण्डपा’ या ग्राण्डफादर हो गया है और महल को कुटिया से संचालित न करके घर रहकर ही चलाना चाहता है। त्याग के कष्टपूर्ण जीवन से बचना चाहता है। पत्नी की ओर झुककर रहता है, या किसी एक बहू बेटे की ओर झुकता है। जिससे उसकी भूमिका न्यायपूर्ण नही रह पाती है। संतानें भी उसे एक बोझ मान रही हैं।

जिन लोगों को ‘हिन्दुत्व’ में एक साम्प्रदायिकता दिखायी देती हैं वे हिन्दुत्व जैसी जीवन प्रणाली को तनिक समझेंगे तो उन्हें हर स्थान पर एक रस प्रवाहित होता दिखेगा। आज हिन्दुत्व को संकट केवल इसलिए है कि इसकी आर्य मान्यताओं और आर्य प्रणाली को न अपनाकर पश्चिम की विनाशकारी संस्कृति को अपनाने पर बल दिया जा रहा है। पश्चिमी (अप) संस्कृति के आक्रमण ने हमारे शब्दों की पावनता और संबंधों की सरसता को बड़ी गहराई से प्रभावित किया है। आज हमारे लिए ‘बाबा’ केवल एक रूढ़ शब्द बनकर रह गया है। जबकि ‘बाबा’ हमारी पूरी व्यवस्था-परिवार से लेकर सृष्टि पर्यन्त का मूल स्रोत होता था। आज ब्रह्मा को भी किसी रहस्यमयी संसार का एक काल्पनिक सा पात्र माना जाता है। हम भूल गये हैं कि वह ब्रह्मा हमारा ‘बाबा’ ही तो है। शब्दों की पवित्रता पर समय की आंधियों ने इतनी रेत चढ़ा दी है कि उन्हें साफ करना बड़ा कठिन हो रहा है। ‘बाबा’ को वृद्घाश्रम में भेजकर युवा किधर जा रहा है? यह विचारणीय बात है। कहीं बाबा को वृद्घावस्था में इसलिए तो नही डाला जा रहा है कि युवा अपने ऊपर और अपनी उच्छ्रंखलता पर किसी प्रकार का प्रतिबंध नही चाहता। उसे किसी का मार्गदर्शन नही चाहिए। उसे किसी की नेक सलाह नही चाहिए। ऐसे उच्छ्रंखल युवा समाज से तो भारत महान बन नही सकता। भारत महान की संरचना के लिए जड़ को सींचना पड़ेगा। इसलिए जड़ को उखाडक़र आश्रमों में मत डालो। यदि ये सूख गयी तो हमारा समाज ही सूख जाएगा। युवा वर्ग को आज इस तथ्य को और सत्य को समझना होगा। ‘बाबा’ हमारी जड़ है, सृष्टि का ब्रह्मा है, घर का मुखिया है, मार्गदर्शक है। उसे उसकी पहचान लौटा दो। भारत विश्वगुरू बन जाएगा।

Comment:

Kuponbet Giriş
betgaranti giriş
Teknik Seo
ikimisli giriş
grandpashabet giriş
bonus veren siteler
grandpashabet giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betlike giriş
ikimisli giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet
betparibu giriş
vdcasino giriş
grandpashabet giriş
betlike giriş
betmarino giriş
betmarino giriş
betmarino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betnano giriş
ikimisli giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş