Kashmir_11947 ई. के जम्मू-कश्मीर राज्य की सीमाओं का निर्माण उससे सही सौ वर्ष पूर्व हुआ था, जब अमृतसर की संधि के अंतर्गत अंग्रेजों ने जम्मू-लद्दाख के शासक महाराजा गुलाब सिंह को कश्मीर घाटी को अपने राज्य में मिला लेने की सहमति दे दी थी। आज के पाक अधिकृत कश्मीर और भारतीय कश्मीर को मिलाकर देखने से 1846 का जम्मू-कश्मीर राज्य अपने आप बन जाएगा। 1853 ई. में एक अमेरिकी यात्री (जान.वी. आयरलैंड) जब भारत आया तो उसने 1846 की अमृतसर संधि पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि-‘‘कश्मीर को महाराजा गुलाब सिंह के हाथों सौंपकर अंग्रेजों ने महान भूल की है।’’
1853 में ही महाराजा गुलाब सिंह का देहांत हो गया, तो अंग्रेजों को अपनी कश्मीर संबंधी नीति की गलती का अहसास हुआ। अत: उन्होंने नये महाराजा रणवीर सिंह के सामने उनके राज्य में अंग्रेज रेजीडेंट रखने की अनुमति चाही। जिसे महाराजा ने कड़ाई के साथ अस्वीकृत कर दिया। तब से अंग्रेज इस राज्य को हड़पने के लिए नये-नये षडयंत्र रचने लगे और अंत में महाराजा रणवीर सिंह की 1885 ई. में मृत्यु हो जाने के उपरांत उन्हें वहां अंग्रेज रेजीडेंट रखने में सफलता मिल ही गयी।
1924 ई. में इस रियासत की बागडोर महाराजा हरिसिंह के हाथों में आयी। जिन्हें अंग्रेजों ने और भी अधिक झुकाने के लिए दबाव डालना प्रारंभ किया। परंतु महाराजा हरिसिंह ने अंग्रेजों का अनुचित दबाव पसंद नही किया। यही कारण था कि महाराजा ने अंग्रेजों के दबाब के उपरांत भी गोलमेज सम्मेलन में भारतीय स्वाधीनता संग्राम को अपना खुला समर्थन देने की घोषणा की। जिससे वह अंग्रेजों के शत्रु बन गये। फलस्वरूप अंग्रेजों ने धीरे-धीरे शेख अब्दुल्ला की पीठ ठोंकनी आरंभ की और उसे अपना पिट्ठू बनाने में वे सफल रहे। महाराजा से नेहरू जी भी जलन रखते थे, उसका कारण ये था कि नेहरू जब कांग्रेस के अध्यक्ष थे तो एक कांग्रेसी बैठक में महाराजा हरिसिंह भी आमंत्रित थे, जब नेहरू उस बैठक में एकअध्यक्ष के रूप में प्रविष्ट हुए तो सभी कांग्रेसी अपने नेता के सम्मान में खड़े हो गये, परंतु महाराजा हरिसिंह खड़े नही हुए। जिसे नेहरू ने अपना अपमान समझा। इसलिए महाराजा को सबक सिखाने के लिए वह भी शेख अब्दुल्ला के साथ हो लिये।
यही कारण था कि जब देश आजाद हुआ तो सारी देशी रियासतों के विलयन का दायित्व सरदार पटेल के पास था, परंतु नेहरू जी ने केवल महाराजा को परेशान करने के उद्देश्य से कश्मीर के प्रश्न को अपने पास रखा। अब नेहरू शेख और अंग्रेज महाराजा हरिसिंह से अपना पुराना हिसाब चुकता कर लेना चाहते थे। इसलिए देशहित को परे धरकर सबने महाराजा को अपने-अपने चरणों में शीश रखने के लिए अपमानित करना आरंभ कर दिया। नेहरू और अंग्रेजों का शेख प्रेम देखकर महाराजा हरिसिंह ने कहा था-‘‘मैं भी कश्मीरी हूं और शेखा अब्दुल्ला को अच्छी तरह जानता हूं। उनके विगत जीवन और आधुनिक हचलचलों के सूक्ष्म अध्ययन से मेरी धारणा सार्थकता अवश्य ही प्रकट होगी।’’
महाराजा हरिसिंह की इस टिप्पणी को तब नेहरू और अंग्रेजों ने हंसकर टाल दिया था।
उसी समय पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत में डेरा इस्माइल खां के भू.पू. डिप्टी कमिश्नर श्री आर. एम. शिवचरण लाल ने भारत सरकार का ध्यान इस ओर आकृष्ट कराया कि पाकिस्तान ने कबायलियों की बड़ी भारी फौज कश्मीर पर आक्रमण के लिए एकत्रित कर रखी है। अत: कश्मीर के प्रधानमंत्री मेहरचंद महाजन ने महाराजा से विचार विमर्श कर भारत सरकार से सैनिक सहायता की प्रार्थना करते हुए कश्मीर के भारत में यथाशीघ्र विलय का प्रस्ताव रखा। भारत के बेताज के बादशाह नेहरू ने भारत के ‘ताज’ कश्मीर की कीमत नही समझी, इसलिए महाराजा का ‘ताज’ कभी नेहरू के पांवों में तो कभी अंग्रेजों के पांवों में यूं ही लुढक़ता रहा और वे दोनों ही उसे फुटबाल बनाकर शेख की ओर फेंकते रहे। महाराजा खून के आंसू पोंछ-पोंछकर समय काटता रहा और उचित घड़ी की प्रतीक्षा करता रहा। तब 23 अक्टूबर 1947 को चौथी जम्मू कश्मीर सेना लेफ्टिनेंट कय्यूम के साथ पाकिस्तानी आक्रमणकारियों से जाकर मिल गयी और उसने भारत की ओर बढऩे का दुस्साहस करना आरंभ कर दिया। 24 अक्टूबर को इन आक्रमणकारियों ने उड़ी सेक्टर की ओर बढऩा आरंभ कर दिया। हमारे स्टाफ ब्रिगेडियर राजेन्द्र सिंह ने अपना बलिदान दिया और 26 अक्टूबर तक शत्रु को आगे बढऩे से रोका।
इसके अतिरिक्त भिम्बर, राजौरी कोटली आदि शहरों में भारत की नारी शक्ति ने भी शत्रु का सामना किया और जब देखा कि अब अपनी ‘इज्जत’ बचानी कठिन है तो हजारों ने विषपान कर अपना जीवन ही समाप्त कर लिया। आज के कश्मीर के इतिहास के लिए नेहरू-अंग्रेजों का शेख का आचरण, ब्रिगेडियर राजेन्द्र सिंह का बलिदान, हमारी नारी शक्ति का अनुकरणीय जौहर और सही समय आने पर जम्मू-कश्मीर की एक टुकड़ी की देश के प्रति गद्दारी पठनीय, मननीय और चिंतनीय है।
हम पूर्व में लिख चुके हैं कि कैसी विषम परिस्थितियों में अंत में 26 अक्टूबर 1947 को कश्मीर का भारत में विलय हुआ। महाराजा की बात नही मानी गयी और महाराजा को अपमानित करते करते भारत का एक बहुत बड़ा भू भाग पाकिस्तान के अधिकार क्षेत्र में चला गया। नये कश्मीर का सुल्तान शेख अब्दुल्ला को बना दिया गया। जिसकी निष्ठा भारत के प्रति तनिक भी नही थी।
31 दिसंबर 1947 को भारत सरकार ने भारतीय अनेकों वीरों के अनुपम बलिदान, माताओं के अनुपम जौहर, और करोड़ों रूपयों का व्यय करने के पश्चात युद्घ विराम की घोषणा की। ये इतनी बड़ी बड़ी क्षति केवल महाराजा की ‘अकड़ ढीली’ करने के लिए देश को उठानी पड़ी। यह तत्कालीन नेतृत्व की भूल थी और उस भूल की कीमत देश को चुकानी पड़ी। ‘अकड़ ढीली’ करने के चक्कर में देश के एक बड़े भूभाग पर तत्कालीन नेतृत्व की ‘पकड़ ही ढीली’ पड़ गयी। अगले दिन अर्थात 1 जनवरी 1948 को नेहरू जी जिस भूभाग को पाकिस्तान ने अवैध रूप से कब्जाया था, उसे वापस पाने की उम्मीद के साथ कश्मीर के प्रश्न को संयुक्त राष्ट्र संघ में ले गये। यह तथ्य बहुत कम लोगों को ज्ञात है कि नेहरू जी कश्मीर में जनमत संग्रह कराके विलय का निपटारा कराने के लिए यू.एन.ओ. नही गये थे, बल्कि वह पाक अधिकृत कश्मीर को वापस लेने के लिए यू.एन.ओ. गये थे। परंतु बाद में वह अपने ही बुने हुए जाल में उलझ गये और पूरे कश्मीर को और कश्मीर के विलय प्रस्ताव को ही जब यू.एन.ओ. के तत्कालीन नेताओं द्वारा तरह-तरह से उलझाने के लिए तरकशी तीरों को नेहरू जी ने देखा तो उन्हें अपनी गलती का अहसास हो गया था कि समस्या के समाधान के लिए गलत मंच का प्रयोग कर लिया गया है।
15 जनवरी 1948 को ही नेहरू जी ने जम्मू में भाषण देते हुए जो कुछ कहा था उससे उनकी यू.एन.ओ. के प्रति बनी निराशाजनक मानसिकता का अच्छा परिचय मिलता है। उन्होंने कहा था-‘‘सीधी और न्याय संगत दृष्टि से इस समस्या का मनन करने तथा उस पर एक निर्भीक निर्णय देने के बजाए आज विश्व के मदांध सबल राष्ट्र संयुक्त राष्ट्र संघ की ओट में बैठकर सत्ता राजनीति की चालें चल रहे हैं।’’ कालांतर में जब शेख अब्दुल्ला को गिरफ्तार कर नेहरू ने उसे जेल में डाला तो वह घटना भी यही सिद्घ करती है कि महाराजा ने शेख के विषय में जो कुछ कहा था कि मैं भी एक कश्मीरी हूं और शेख को अच्छी तरह जानता हूं….वह सत्य सिद्घ हुआ और नेहरू को वहां भी अपनी गलती का अहसास हुआ कि महाराजा सही थे, और मैं गलत था। पर ‘चिडिय़ों ने जब चुग खेत लिया तो पछपाये क्या होत है’-वाली कहावत भी शायद जिंदा ना रहती यदि नेहरू जी जैसे महापुरूष महागलतियां कर करके उन्हें पछताने को ना मिलते। नेहरू गलतियां कर रहे थे और उनका फल भी भोग रहे थे परंतु गलतियों से कोई सीख लेने को तैयार नही थे और उनकी यही मनोवृत्ति देश के लिए उस समय सबसे बड़ा खतरा बन चुकी थी। जनसंघ के नेता श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने उनसे जम्मू-कश्मीर के लिए देश में आए दो विधान, दो निशान और दो प्रधान की अतार्किक व्यवस्था का समाधान खोजने के लिए पत्राचार करना आरंभ कर दिया, जिनका जवाब नेहरू जी ने भी दिया। कश्मीर के जटिल प्रश्न और उसकी जटिल बना दी गयी स्थिति को सुलझाने के लिए श्यामाप्रसाद मुखर्जी बार-बार नेहरू से मिलने का अनुरोध करते रहे और नेहरू उसे टालते रहे। नेहरू की हठधर्मिता निर्दयता बनती जा रही थी और मुखर्जी का देशप्रेम एक चट्टान बनता जा रहा था। निर्दयता चट्टान को झुकाना चाहती थी और चट्टान सीना तानकर खड़ी हो गयी। मुखर्जी ने नेहरू जी को फरवरी 1953 में लिखा था कि वर्तमान परिस्थितियों में जम्मू-कश्मीर की विधानसभा को रियासत के भारत में विलीनीकरण पर अपनी मुहर लगा देनी चाहिए।
तब तेहरू ने इसका जवाब देते हुए लिखा कि-‘‘मुझे इस प्रस्ताव पर कोई आपत्ति नही है। इस बात से कठिनाई पैदा नही होगी-बल्कि कठिनाई इस बात से पैदा होती है कि इस प्रकार के प्रस्ताव से संयुक्त राष्ट्र संघ में एक मामले की चर्चा ही अंतिम रूप से सत्य हो जाती है।’’ जबकि डा. मुखर्जी उन्हें अपने पूर्व केपत्र में ही लिख चुके थे कि संयुक्त राष्ट्र संघ में कश्मीर का मामला पाकिस्तानी आक्रमण के प्रश्न पर ले जाया गया है, ना कि कश्मीर के भारत में विलयन के प्रश्न पर। नेहरू नही माने और उन्होंने लिखा-‘‘लेकिन हमने संयुक्त राष्ट्र के संघ को जो आश्वासन दिये हैं वे हमारी जिम्मेदारी है और उनका फेेसला इस तथ्य को सामने रखते हुए किया जाएगा।’’ यदि नेहरू यू.एन.ओ.में जाने के निर्णय पर विचार करते हुए यह भी समझ लेते कि हम यू.एन.ओ. में कश्मीर के विलय को लेकर नही बल्कि पाकिस्तान द्वारा किये गये आक्रमण को लेकर गये थे, क्योंकि पाक को हमारी संप्रभुता पर हमला करने का कोई अधिकार नही था, और इसी बात को अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर उठाते तो कश्मीर का प्रश्न जटिल से जटिलतम की ओर नही बढ़ता। हम बोले नही, और हमारी गलती हमारे लिए ही बोझ बनती चली गयी। क्या ही अच्छा हो कि मोदी आज मुखर्जी के बलिदान की सार्थकता और नेहरू की जिद की निरर्थकता को समझें और कश्मीर-समस्या का तर्कसंगत समाधान खोजें। मोदी दुनिया को समझाएं कि अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भारत में कश्मीर के विलय को लेकर कोई संशय नही होना चाहिए, हमारा विषय तो केवल पाकिस्तानी कबायलियों के आक्रमण से हमारी संप्रभुता को उत्पन्न हुआ खतरा था।

Comment:

Kuponbet Giriş
betgaranti giriş
Teknik Seo
ikimisli giriş
grandpashabet giriş
bonus veren siteler
grandpashabet giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet
grandpashabet giriş
betlike giriş
betlike giriş
ikimisli giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet
grandpashabet giriş
grandpashabet
grandpashabet giriş
betparibu giriş
restbet giriş
vdcasino giriş
grandpashabet giriş
betebet giriş
betlike giriş