आखिर बार-बार के भारत बंद से कौन सा मकसद हल करना चाहती हैं ऐसी ताकतें

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ललित गर्ग 

आंदोलन से उपजी समस्याओं से सुप्रीम कोर्ट भी अवगत है, लेकिन समझना कठिन है कि वह कोई फैसला सुनाने से क्यों बच रहा है? वह न तो किसान संगठनों की ओर से सड़कों को बाधित किए जाने का संज्ञान ले रहा है और न ही कृषि कानूनों की समीक्षा करने वाली समिति की रपट का।

केन्द्र सरकार के तीन कृषि कानूनों के खिलाफ किसान यूनियनों का भारत बंद एक बाद फिर आम जनता के लिये परेशानियों का सबब बना। हाइवे रोके गये, रेल की पटरियों पर प्रदर्शनकारियों ने रेल यातायात को अवरुद्ध किया। जनजीवन अस्त-व्यस्त हुआ, परेशानियों के बीच आम आदमी का जीवन थमा ही नहीं, कड़वे अनुभवों का अहसास बना। जो जनता को दर्द दें, उनकी परेशानियां बढ़ायें, उन्हें किस तरह लोकतांत्रिक कहां जा सकता है? विभिन्न किसान संगठनों ने भारत बंद के नाम पर एक बार फिर लोगों को बंधक बनाने वाली राजनीति का परिचय दिया है।

यह कैसी राजनीतिक मानसिकता है जो आम लोगों को ज्यादा से ज्यादा परेशान करने पर आमादा है। यह और कुछ नहीं, एक तरह की हठधर्मिता ही है। इस हठधर्मिता ने एक विकृत राजनीति का रूप धारण कर लिया है। किसान संगठन यह अच्छी तरह जान रहे हैं कि उनके धरना-प्रदर्शन और खासकर सड़कों को घेर कर बैठने से आवागमन के साथ लोगों की रोजी-रोटी पर बुरा असर पड़ रहा है, लेकिन वे अपनी जिद छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं। आंदोलनरत किसान संगठनों को समर्थन देने वाले राजनीतिक दल भी यह भली तरह समझ रहे हैं कि यह आंदोलन आम लोगों के साथ उद्योग-व्यापार जगत के लिए परेशानियों का कारण बन गया है, लेकिन वे अपने तथाकथित राजनीतिक लाभ के लिये अराजकता पैदा करने वाले इस तथाकथित आंदोलन को तूल दे रहे हैं।
किसान आंदोलन को चलते हुए अब तीन सौ दिन हो गये हैं, इस अवधि में राजधानी के प्रवेश की तीनों सीमाओं के राजमार्गों पर तम्बू गाड़ कर बैठे इन किसानों ने सड़क यातायात इतनी लम्बी अवधि से बाधित किया हुआ है। इन बड़ी एवं परेशान करने वाली बाधाओं के बावजूद सरकार व किसान संगठनों की बातचीत किसी नतीजे पर नहीं पहुंचना शासन एवं प्रशासन में लोकतांत्रिक मूल्यों का उपहास है। किसानों ने शहीद-ए-आजम भगत सिंह के जन्म दिवस 27 सितम्बर को भारत बन्द का आयोजन किया। किसान संसद द्वारा पारित उन तीन कृषि कानूनों को समाप्त किये जाने की मांग कर रहे हैं लेकिन वे इन कानूनों को समाप्त करने के कोई ठोस कारण प्रभावी ढंग से बताने में नाकाम रहे हैं। आज के तीव्रता से बदलते समय में, लगता है हम महापुरुषों को न केवल तीव्रता से भुला रहे हैं, बल्कि अतिश्योक्तिपूर्ण तरीके से भुना रहे हैं जबकि और तीव्रता से उन्हें सामने रखकर हमें अपनी व राष्ट्रीय जीवन प्रणाली की रचना करनी चाहिए। भगत सिंह, गांधी, नेहरू के बाद के राष्ट्रीय नेताओं के कद छोटे होते गये और परछाइयां बड़ी होती गईं। हमारी प्रणाली में तंत्र ज्यादा और लोक कम रह गया है। यह प्रणाली उतनी ही अच्छी हो सकती है, जितने कुशल चलाने वाले एवं उसमें सहयोगी बनने वाले राजनीतिक दल और आम जन होते हैं। हम आज तक भगत सिंह जैसे बलिदानी नेताओं की मौत को भुनाते रहे हैं, नये-नये नारे देकर भरमाते रहे। कभी-कभी ऊंचा उठने, स्वार्थ की राजनीति और भौतिक उपलब्धियों की महत्वाकांक्षा राष्ट्र को यह सोचने-समझने का मौका ही नहीं देती कि कुछ पाने के लिए उसने कितना खो दिया? और जब यह सोचने का मौका मिलता है तब पता चलता है कि वक्त बहुत आगे निकल गया और तब राष्ट्र अनिर्णय की ऊहापोह में दिग्भ्रमित हो जाता है।
राष्ट्र केवल नारों एवं आन्दालनों से ही नहीं बनता, यह बनता है उसमें रहने वाले लोगों एवं संगठनों के उच्च चरित्र से। हम केवल राष्ट्रीयता के खाने (कॉलम) में भारतीय लिखने तक ही न जीयें, बल्कि एक महान राष्ट्रीयता (सुपर नेशनेलिटी) यानि चरित्र, जिम्मेदारीयुक्त राष्ट्रीयता के प्रतीक बन कर जीयें। अब राष्ट्रीयता पर केवल आन्दोलनों-नारों तक ही न हों, शब्दों के पार की साधना हो। जब लोकजीवन की परेशानियों, समस्याओं एवं तकलीफों में दर्द का अहसास हो जाएगा तभी राष्ट्रीय चरित्र की खुशबू उठेगी। हमारी वाणी में, हमारे किरदार में तेजस्विता आयेगी। वाणी एवं व्यवहार में नागरिक धर्म नहीं उतरेगा तो विश्व और राष्ट्र तो क्या स्वयं का परिवार भी परेशानी मुक्त नहीं होगा। उसमें भी शांति, सह-अस्तित्व एवं सह-जीवन के मूल्य नहीं रहेंगे। कम-से-कम वे राजनीति के प्रेरक तो नहीं ही होंगे।
राजनीतिक दल और उनके समर्थन से चलने वाले किसान आन्दोलन अराजकता, अस्त-व्यस्तता एवं अस्थिरता पैदा करने के बड़े कारण हैं, जिनसे एक बेहद खराब, अराष्ट्रीय एवं अलोकतांत्रिक परंपरा की नींव रखी जा रही है। ऐसे आंदोलनों को बल मिलने का अर्थ है एक नियोजित एवं व्यवस्थित शासन व्यवस्था को ध्वस्त करने की कुचेष्टा। बेहतर हो कि अपने संकीर्ण स्वार्थों के लिए किसान संगठनों को उकसा रहे विपक्षी राजनीतिक दल यह समझें कि इसी तरह के अराजक आंदोलनों से वे भी दो-चार हो सकते हैं। उन्हें यह स्मरण रहे तो अच्छा है कि पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह को किसान संगठनों से तंग आकर ही यह कहना पड़ा था कि वे राज्य से बाहर जाएं। उनका साफ कहना था कि इस आंदोलन से पंजाब को नुकसान हो रहा है। नुकसान केवल पंजाब को ही नहीं समूचे राष्ट्र का हो रहा है।

कृषि कानूनों को लेकर किसान संगठन भले ही केन्द्र सरकार से सहमत न हों, लेकिन असहमति बताने एवं किसानों के पक्ष को सुनने के लिये केन्द्र ने अनेक कोशिशें की हैं, अवसर दिये हैं। कृषि हालांकि राज्यों का विषय है मगर केन्द्र सरकार ने ये कानून व्यापार व वाणिज्य की कानून प्रणाली के तहत बनाये हैं जोकि केन्द्र के अधिकार में आता है। किसानों का कहना है कि कृषि उत्पादों के व्यापार केन्द्रों में जाने से पूरे कृषि व्यापार पर चन्द बड़े-बड़े पूंजीपतियों व उद्योगपतियों का कब्जा हो जायेगा और भंडारण की कोई सीमा न होने की वजह से ये पूंजीपति भारी मुनाफा लेकर इनका विक्रय करेंगे। ये और ऐसी जो भी खामियां या स्थितियां किसान संगठन महसूस करते हैं, उन्हें व्यक्त करने के लिये राजमार्गों को अवरुद्ध करना कौन-सी लोकतांत्रिक प्रक्रिया है? कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर ने कहा भी है कि किसान आंदोलन का रास्ता छोड़कर बातचीत के रास्ते पर आएं। सरकार कृषि कानूनों पर किसानों की आपत्तियों पर विचार के लिए तैयार है। पहले भी कई बार बात हुई है। यदि कुछ बच गया है तो सरकार फिर वार्ता के लिए तैयार है। किसान आंदोलन के नाम पर राजनीति नहीं होनी चाहिए। किसान हम सभी के हैं।
किसान संगठनों के आंदोलन से उपजी समस्याओं से सुप्रीम कोर्ट भी अवगत है, लेकिन समझना कठिन है कि वह कोई फैसला सुनाने से क्यों बच रहा है? वह न तो किसान संगठनों की ओर से सड़कों को बाधित किए जाने का संज्ञान ले रहा है और न ही कृषि कानूनों की समीक्षा करने वाली समिति की रपट का। विडंबना यह है कि यह स्थिति तब है, जब खुद उसने ही इस समिति का गठन किया था। लोकतंत्र के दो मजबूत पैर न्यायपालिका और कार्यपालिका हैं। दोनों ही किसान आन्दोलन के सन्दर्भ में अपनी सार्थक भूमिका के निर्वाह से बच रहे हैं। संविधान के अन्तर्गत बनी समीक्षा समिति मुखर हो, प्रभावी हो। अजीब विडम्बना है कि रास्ता बताने वाले रास्ता पूछ रहे हैं। और रास्ता न जानने वाले नेतृत्व कर रहे हैं। दोनों ही भटकाव की स्थितियां हैं। जन भावना लोकतंत्र की आत्मा होती है। लोक सुरक्षित रहेगा तभी तंत्र सुरक्षित रहेगा। लोक के लिए, लोक जीवन के लिए, लोकतंत्र के लिए कामना है कि उसे शुद्ध सांसें मिलें। लोक जीवन और लोकतंत्र की अस्मिता को गौरव मिले। लोकतंत्र की अस्मिता पर किसान आन्दोलन जैसी नासमझी, हठधर्मिता एवं गैर-जिम्मेदाराना का दंश न लगे।

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