‘वैदिक धर्म बनाम् आधुनिक जीवन’

मनमोहन आर्य

 

वैदिक धर्म एक जीवन पद्धति है जो कि आघुनिक जीवन पद्धति से कुछ समानता रखने के साथ कुछ व कई बातों में इसके विपरीत भी है। अतः इन दोनों जीवन पद्धतियों में कौन सी पद्धति मनुष्यों के लिए श्रेयस्कर और श्रेष्ठ है और कौन सी नहीं है, इस पर विचार करना इस लिए आवश्यक है कि कहीं ऐसा न हो कि हम इस पर विचार व निर्णय करने में विलम्ब कर दें और देरी के कारण हमें इसकी बड़ी भारी कीमत चुकानी पड़ें। हम जब अध्ययन करते हैं तो हमें यह ज्ञात होता है कि जीवन में किये जाने वाले सभी कर्मों का प्रभाव हमारे वर्तमान और भविष्य पर पड़ता हैं। वैदिक धर्म ही ऐसा संसार का एक मात्र ऐसा धर्म है जिसमें कहा गया है कि मनुष्य को अपने किए हुए कर्मों का फल अवश्यमेव ही भोगना पड़ता है। बिना भोगे इससे कोई बच नहीं सकता और न कोई धर्म गुरू व मत प्रवर्तक आदि भी कर्म-फल भोग से किसी को बचा सकता है। वैदिक विचारधारा के आधार पर हमारा तो यह भी मानना है कि सभी धर्म गुरू व मत प्रवर्तक भी कर्म फल बन्धों से आबद्ध हैं। जब वह स्वयं ही इससे मुक्त नहीं हो सकते तो वह दूसरों को क्या मुक्ति दिलायेंगे? कर्म व इसके फलों के भोग पर यदि विचार करें तो यह तब ही सम्भव होता है कि जब मनुष्यों व प्राणियों से भिन्न कोई एक ऐसी सत्ता हो जो चेतन तत्व हो और जिसमें सोचने, समझने, जानने, विचार करने, सभी जीवों का साक्षी होने की क्षमता सहित उसका स्वरूप सर्वव्यापक, अत्यन्त सूक्ष्म, निराकार, सर्वज्ञ व सर्वशक्तिमान हो। इस सत्ता की आवश्यकता केवल कर्मों का फल देने मात्र के लिए ही नहीं है अपितु इस संसार को बनाने, इसे चलाने, इसकी प्रलय करने व सभी प्राणियों की सृष्टि अर्थात् उनको जन्म देने, पालन करने, मृत्यु होने पर उनकी आत्मा को शरीर से पृथक करने व उनके कर्मानुसार उन्हें नये जीवन प्रदान करने के लिए भी है। यदि ऐसी सत्ता संसार या ब्रह्माण्ड में न हो तो न तो यह संसार न बन सकता है, न चल सकता है, न प्राणियों के जन्म व मृत्यु ही हो सकती हैं। इसका यह भी अर्थ है कि ईश्वर व जीव नाम की सत्तायें हैं तो यह संसार है और यदि नहीं होती तो फिर इस संसार को कौन बनाता और किसके लिए बनाता? अतः बनानेवाला, जिसके लिए बनाया है और जिससे बनाया है, उन तीनों सत्ताओं (ईश्वर, जीव व प्रकृति) का होना आवश्यक है। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि संसार में ईश्वर व जीव दो अलग-अलग चेतन सत्तायें हैं। और इनके होने पर जीवात्मा के कर्मों का वह सर्वव्यापक ईश्वर साक्षी होता है। साक्षी व सर्वशक्तिमान होने के कारण वह सबको उनके कर्मानुसार अपनी न्याय व्यवस्था से सुख व दुख रूपी दण्ड व पुरूस्कार रूपी फल भी नरन्तर देता है व देता आ रहा है यह हम प्रत्यक्ष देखते हैं।

इस कर्म फल भोग के सिद्धान्त को सामने रखकर ही विद्वानों, बुद्धिजीवियों व चिन्तकों द्वारा मनुष्य जीवन पद्धति का निर्धारण किया जाना चाहिये। वस्तुतः वैदिक जीवन पद्धति में इस सिद्धान्त का पूरा पूरा ध्यान रखा गया है जबकि आधुनिक जीवन पद्धति में हम इस सिद्धान्त को प्रायः पूरी तरह अनुपस्थित पाते हैं। इस सिद्धान्त के आधार पर मनुष्य की जीवन पद्धति क्या होनी चाहिये, उस पर विचार करते हैं। 24 घण्टे का एक दिन होता है जिसमें प्रातःकाल में उठना स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद रहता है। अतः समय पर सोना और समय पर जागना आवश्यक है। बहुत सोच विचार कर हमारे पूवजों ने रात्रि 10 बजे शयन व प्रातः 4 बजे जागरण का विधान किया है। सोकर उठने के बाद कुछ समय तक प्रातःकाल की वेला में ईश्वर से प्रार्थना के 5 मन्त्रों का अर्थ सहित पाठ करने का विधान है। इसके पश्चात शौच आदि से निवृत होकर वायु सेवन के लिए लगभग 1 घंटा व कुछ कम या अधिक समय तक भ्रमण करना चाहिये। इसके बाद स्नान से निवृत होकर आसन व प्राणायाम करने चाहियें और इसके बाद परिवार के सभी लेागों को मिलकर सन्ध्या व यज्ञ करना चाहिये। अग्निहोत्र के बाद सभी लोग पितृयज्ञ के रूप में घर के वृद्धजनों के सेवा-सत्कार के लिए उनसे बातचीत करनी उचित है और उनकी आवश्यकताओं को जानकर यथासम्भव उसकी पूर्ति करनी चाहिये। इन कार्यों से निवृत होकर अपने व्यवसायिक कार्यों को करना चाहिये जिसमें यह ध्यान रखना चाहिये कि उसमें पूरी सच्चाई व धर्म का पालन हो। किसी प्राणी को हमारे कार्यों व व्यवसाय से दुःख व हानि नहीं पहुंचनी चाहिये। इसके बाद सायं शौच व उसके पश्चात परिवार के साथ बैठकर यज्ञ व सन्ध्या करनी चाहिये। यज्ञ के नाम से बहुत से लोग घबरा सकते हैं। इस दैनिक यज्ञ में मात्र 15 से 20 मिनट का समय ही लगता है जबकि भौतिक व आध्यात्मिक लाभ की दृष्टि से यह कार्य अनुपमेय व अतुलनीय हैं। वैदिक जीवन पद्धति में भोजन पर विशेष ध्यान दिया गया है। भोजन समय पर करने के साथ यह पूरी तरह से शाकाहारी होना चाहिये जिसमें गोदुग्ध, गोधृत तथा मौसमी फलों व बादाम आदि शुष्क मेवों आदि की भी प्रचुरता होनी चाहिये। इससे रोग कम होते हैं और जीवन स्वस्थ होने के साथ बल की भी वृद्धि होती है। इस पर विशेष ध्यान दिया जाता है। इसके बाद समय निकाल कर स्वाध्याय करना चाहिये। स्वाध्याय का प्रमुख ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश व महर्षि दयानन्द के अन्य ग्रन्थ हैं। इनका अध्ययन पूरा कर लेने के बाद उपनिषद, दर्शन व वेद आदि का अध्ययन करना चाहिये। कुछ समय संस्कृत अध्ययन के लिए भी निकालना चाहिये। इसके लिए आर्य समाज या आर्य संस्थाओं व इनके प्रमुख, राग-द्वेष-पक्षपात रहित विद्वान पुरूषों से सम्पर्क किया जा सकता है। यह दुःख का विषय है कि आज संस्कृत अध्ययन से विहीन लोग आर्य समाज के पदाधिकारी यथा प्रधान, मंत्री व कोषाध्यक्ष आदि बना दिये जाते हैं। संस्कृत व शास्त्र ज्ञान से वंचित यह लोग व्यापारिक बुद्धि के अधिक कार्य करते हैं जिसमें धर्म की भावना अनुपस्थित देखी जाती है। धन का अपव्यय व दुरूपयोग भी देखा जाता है। कई दुराचारी लोग भी पदों पर आसीन देखें गये हैं। यह समाज में गिरावट की निशानी है। यह बात हम अपने निजी अनुभवों से कह रहे हैं। यह अधिकारी एक प्रकार से ऐसे ही हैं जैसे कि जिस देश में कोई वृक्ष न हो वहां अरण्ड के वृक्ष को ही सबसे बड़ा, अर्थात् बरगद, पीपल आदि से भी बड़ा माना जाता है। दिन भर इन करणीय कार्यों को करने के पश्चात रात्रि 10 बजे विश्राम व शयन करना चाहिये। रविवार के दिन अवकाश होने पर आर्यसमाज जाना चाहिये और सम्भव हो तो शेष अवकाश के समय में अन्य लोगों में कुछ वेदप्रचार के लिए भी समय निकालना चाहिये। यह वैदिक जीवन पद्धति है। इसके साथ हम यह भी निवेदन करना चाहते हैं कि स्वाध्याय के अन्तर्गत महर्षि दयानन्द, स्वामी श्रद्धानन्द, पं. गुरूदत्त विद्यार्थी, पं. लेखराम जी आदि के जीवन चरित भी एक के बाद एक पढ़ने चाहिये, इससे भी हमें अपनी दिनचर्या निर्धारित करने में सहायता मिलती है। इस जीवन पद्धति में हम देखते हैं कि हमें धर्मपूर्वक सभी कार्य करने होते हैं अर्थात् यह ध्यान रखना होता है कि हमारे किसी कार्य से किसी अन्य प्राणी का अनुचित अहित न हो। इसके साथ, सन्ध्या, अग्निहोत्र, स्वाध्याय, दान, सेवा, परोपकार से हम धर्म वा पुण्यों का संचय भी करते हैं जिससे कर्म-फल सिद्धान्त के अनुसार हमारा प्रारब्ध बनता है और हमारे वर्तमान व भावी जीवन भी उन्नत होने के साथ हम मुक्ति के मार्ग पर अग्रसर रहते हैं। सोलह संस्कार भी वैदिक जीवन पद्धति का अनिवार्य कृत्य है जिन्हें यथासमय करना होता है। इसमें व्यय अधिक नहीं होता। 250 ग्राम घृत व समधिाओं का ही व्यय होता है और पुरोहित की दक्षिणा जो कि अपनी सामर्थ्य के अनुरूप दी जा सकती है।

वैदिक जीवन पद्धति से भिन्न व कुछ विपरीत भी आजकल की सभी जीवन पद्धतियां हैं जिन्हें आधुनिक जीवन पद्धतियां कह सकते हैं। सभी मतों व धर्मों के लोगों की जीवन पद्धतियों में कुछ कुछ भिन्नता है जिसका कारण उनकी अपनी मान्यतायें व सिद्धान्त हैं। इन जीवन पद्धतियों में सच्ची ईश्वर की उपासना व अग्निहोत्र यज्ञ का विधान ही नहीं है। सच्ची ईश्वरोपासना यह इस लिए नहीं कर पाते चूंकि इनको ईश्वर के सत्य स्वरूप और उसके गुण, कर्म व स्वभाव का ज्ञान ही नहीं है। अतः इससे होने वाले लाभों से सभी मत व पन्थों के लोग वंचित रहते हैं। प्रायः आजकल हम देखते हैं कि इन पद्धतियों में न सोने का समय निर्धारित है न जागने का। रात्रि में देर तक जागते रहते हैं और सुबह देर से उठते हैं। इसमें कुछ लोग तो आजकल आसन प्राणायाम करने लगे हैं परन्तु बहुत से लोग किंचित भी नहीं करते जिससे भविष्य में हानि होती है। वायुसेवन या प्रातःकाल भ्रमण भी कम ही लोग करते हैं। अतः इससे होने वाले लाभों से भी लोग वंचित रहते हैं। सन्तुलित व पोषक भोजन का भी आजकल की जीवन पद्धतियों में ध्यान नहीं रखा जाता। सड़ा-गला, बासी, पुराना बना हुआ गरिष्ठ भोजन अनेक लोग करते हैं। भोजन के बनाने में शुद्धता, भोज्य पदार्थों व बनाने वाले की स्वच्छता आदि, की भी अनदेखी की जाती है। भोजन में अण्डे व मांस मछली आदि का भी सेवन देश व विश्व की जनसंख्या के बहुत बड़े भाग द्वारा किया जाता है। यह एक प्रकार से अमानवीय कार्य है जिसका कारण बड़ी संख्या में जीव-प्राणी-हत्या होना है जबकि यह भोजन शाकाहारी भोजन से अधिक लाभप्रद नहीं होता। इससे मनुष्य के दया व करूणा आदि के गुणों में कमी आती है और उनमें हिंसा व क्रोध का प्रभाव बढ़ता है साथ हि नाना प्रकार के रोगों की उत्पत्ति की सम्भावना होती है। आधुनिक जीवन पद्धति में ऋषि व विद्वानों के धार्मिक ग्रन्थों के स्वाध्याय का भी कोई ध्यान नहीं रखा जाता अपितु उपेक्षा ही की जाती है। कई मनुष्य मुख्यतः पुरूष धूम्रपान के व्यस्नी हो जाते हैं और अनेक तो अनेक अवसरों व नियमित रूप से मदिरापान व नशा आदि करते हैं। यह सब स्वास्थ्य, मन व बुद्धि को विकृत करने के कारण बनते हैं। ऐसे लोगों द्वारा जो परम्परागत रूप से पूजा, उपासना आदि कार्य किये जाते हैं वह भी तर्क व युक्ति अर्थात् बुद्धिसंगत नहीं होते। इसी क्रम में यह भी वर्णन कर दें कि आजकल बहुत से लोग अपना बहुमूल्य समय टीवी कार्यक्रम, क्रिकेट एवं चलचित्र देखने आदि में नष्ट करने के साथ स्वयं को सुन्दर व आकर्षक दिखाने के साथ नाना प्रकार के उपक्रम करते हैं जिनमें आकर्षक व महंगी वेशभूषा तथा महंगे सौन्दर्य प्रसाधन आदि का प्रयोग होता है। कई वेशभूषायें तो मानवीय जीवन की मर्यादा व गरिमा की दृष्टि से भी हेय प्रतीत होती हैं। इन कार्यों में ईश्वर से हमें मिला दुलर्भ समय व्यय होता है और हम जीवन के उद्देश्य व लक्ष्य को विस्मृत कर उससे दूर चले जाते हैं। इन सबसे मनुष्य जीवन का पतन होता है। हमारा जो शरीर हमें लगभग 100 वर्षों तक स्वात्मनिर्भर रूप से स्वस्थ रहकर जीवन व्यतीत करने व धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की प्राप्ति करने के लिए ईश्वर से मिला होता है, उसे बीच में ही हम रूग्ण आदि करके कालकवलित कर देते हैं। आध्यात्मिक दृष्टि से यह जीवन बहुत ही दोष पूर्ण पद्धति है। हमारा अध्ययन यह कहता है कि ऐसे लोगों का भावी जीवन कर्म-फल सिद्धान्त के आधार पर उन्नत होने के स्थान पर अवनत होता है। इसका कारण यह है कि हमने पिछले जन्म-जन्मान्तरों के प्रारब्ध वा कर्मों के कारण वर्तमान जीवन में सुख तो भोग लिया है परन्तु हमने धर्म रूपी पूंजी एकत्रित नहीं की जिससे मृत्यु के पश्चात नये जन्म में हमें सुखों से युक्त इच्छित व प्रशंसनीय जीवन मिल सके। हमें तो इस बात की भी शंका है कि आधुनिक जीवन प़द्धति से जीवन जीने वालों को शायद ही मनुष्य जीवन मिले और यदि मिलता है तो उसमें उन्हें वह उत्कृष्टता प्राप्त नहीं होगी जिसकी हम सब आशा, अपेक्षा व उम्मीद करते हैं।

 

वैदिक जीवन पद्धति में हर कार्य व कर्म सोच विचार अर्थात् सत्य-असत्य को विचार कर, युक्ति व तर्क से करणीय सिद्ध होने पर किया जाता है और ईश्वरीय ज्ञान वेद की भी सहायता ली जाती है जिस कारण कि ऐसा जीवन जीने वालों को धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की प्राप्ति होती है या वह इस मार्ग पर अग्रसर होते हैं। हम यह समझते हैं कि जिस प्रकार जल को जिस बर्तन में डालें, वह उसमें ढल जाता है व इसी प्रकार ऐसे उदाहरणों से यदि हम अपने जीवन को आरम्भ से वैदिक धर्म जीवन पद्धति के सांचे में ढालेंगे तो इस जीवन को जीने में लाभ ही लाभ, सुख ही सुख, आनन्द ही आनन्द मिलेगा तथा कोई कठिनता नहीं होगी। महर्षि दयानन्द, स्वामी श्रद्धानन्द, पं. गुरूदत्त विद्याथी, पं. लेखराम, महात्मा हंसराज आदि ज्ञानी व वेदों से सुपरिचित थे और वह इस वैदिक जीवन पद्धति के अनुसार जीवन व्यतीत करने में सुख व सन्तोष का अनुभव करते थे। इससे पूर्व सृष्टि के आरम्भ से महाभारत काल तक के लगभग 2 अरब वर्षों में भी सारी दुनिया के पूर्वजों ने वेदानुसार सुखपूर्वक जीवन व्यतीत किया है। हम आधुनिक जीवन जीने वाले व्यक्तियों से निवेदन करते हैं कि वह अपना हित व अहित समझ कर वैदिक जीवन के सभी पहलुओं पर आर्य विद्वानों से चर्चा करें और सत्य को ग्रहण और असत्य का त्याग करें। यह न भूले कि आप जैसा बोयेंगे वैसा हि काटेंगे क्योंकि ईश्वर किसी के प्रति पक्षपात नहीं करेगा और आप कुछ भी कर लें, पाप, असदकर्म तथा जीवन की भूलें क्षमा नहीं होंगी, उनका दण्ड भी हमें अवश्यमेव भोगना होगा।

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