महिलाओं पर क्रूरता दिखा रहे तालिबानियों पर खामोश क्यों हैं लोग

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दिव्या गौरव त्रिपाठी

तालिबान की ओर से अफगानिस्तान के उच्च शिक्षा मंत्रालय के कार्यवाहक मंत्री के रूप में नियुक्त किए गए अब्दुल बकी हक्कानी ने कहा कि महिला छात्रों के लिए कक्षाएं पुरुषों से अलग होंगी। कुछ दिनों पहले सरकारी और निजी विश्वविद्यालयों के अधिकारियों और कर्मचारियों से हक्कानी ने बात की। उन्होंने कहा कि अफगान लड़कियों को पढ़ने का अधिकार है, लेकिन वे लड़कों के साथ एक ही क्लसरूम में नहीं पढ़ सकती हैं। अब सवाल ये है कि एक महिला के तौर पर मेरे अधिकार, मेरी जिम्मेदारियां, मेरे विचार, मेरा भविष्य तय करने वाला कोई संगठन कौन होता है? कैसे कोई आतंकी संगठन ये तय कर सकता है कि किसे क्या करना है, क्या पहनना है, क्या खाना है, क्या नहीं करना है। और ये बात सिर्फ तालिबान की नहीं है। ये बात भारत में भी हो रही है।

भारत में जमीयत उलेमा-ए-हिंद के चीफ मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि गैर-मुस्लिम लोगों को बेटियों को को-एजुकेशन देने से परहेज करना चाहिए ताकि वो अनैतिकता की चपेट में न आएं। मौलाना मदनी ने कहा, ‘अनैतिकता और अश्लीलता किसी भी धर्म की शिक्षा नहीं है। इनकी हर धर्म में निंदा की गई है क्योंकि इनसे समाज में कदाचार फैलता है। ऐसे में, मैं अपने गैर-मुस्लिम भाइयों से कहना चाहूंगा कि वे बेटियों को सह-शिक्षा देने से परहेज करें ताकि वो अनैतिकता से दूर रहें। उनके लिए अलग स्कूल कॉलेज बनाए जाएं।’

भारत में इस ‘तालिबानी’ सोच का क्या काम?
हैरान करने वाली बात है कि जिस सोच के साथ तालिबान ने अफगानिस्तान में अपनी हुकूमत का आगाज किया है, वही सोच भारत में भी दिखाई दे रही है। सवाल यही है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में तालिबान से प्रभावित सोच का क्या काम है? सवाल ये भी है कि जिस तरह की बयानबाजी खुलेआम भारत में हो रही है, उसे रोकने की कोशिशें क्यों नहीं की जा रही। भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था का प्राथमिक आधार यहां के नागरिकों को मिले मूलभूत अधिकार हैं। उनमें से एक अधिकार समानता का अधिकार है। इस व्यवस्था पर जब प्रश्नचिह्न खड़ा करने की कोशिश की जाती है तो देश एकजुट होकर ऐसी विभाजनकारी ताकतों का विरोध क्यों नहीं करता?
क्या महिलाओं को ‘चीज’ समझता है तालिबान
महिलाओं की आजादी के लिए दुनिया के करीब हर देश में लंबी लड़ाई लड़ी है। आजादी के विकासवाद की रेखा हर देश में लगातार बढ़ती चली गई लेकिन दुर्भाग्य देखिए, जहां दुनिया आगे बढ़ रही है, वहीं अफगानिस्तान को तालिबान सैकड़ों साल पीछे लेकर जाने की तैयारी में लगा है। कल्पना करिए, एक महिला विधवा है, अपनी कमाई से अपने बच्चों को पाल रही है लेकिन तालिबान ने कह दिया कि तुम्हें नौकरी नहीं करनी है, वह भी सिर्फ इसलिए क्योंकि तुम एक महिला हो। क्या महिला होना अपराध है या फिर महिलाओं को ये तालिबानी सोच सिर्फ एक ‘चीज’ समझती है?
क्यों खामोश हैं आप?
हमेशा महिलाओं को गुलाम बनाकर रखने वाली सोच दुनिया के कई हिस्सों में रही है, लेकिन दुनिया ने उस सोच में बदलाव होते भी देखा है। अब सवाल ये है कि इस सोच के साथ काम करने वाले लोगों के खिलाफ दुनिया क्यों कुछ नहीं बोलती? क्यों नारीवाद का झंडा लेकर चलने वाले लोग खामोशी से इस नाइंसाफी को देख रहे हैं। क्यों एक महिला के द्वितीयक नेतृत्व में पहने वाला अमेरिका इसपर खामोश क्यों है? सैकड़ों-हजारों महिलाओं के बलिदान के बाद खुली हवा में आजाद सांसे लेकर महिलाओं के नेतृत्व में दुनिया का भूगोल बदलने की क्षमता रखने वाला भारत इसपर खामोश क्यों है? देश के अलग-अलग विश्वविद्यालयों में हरदिन किसी न किसी विषय पर विवाद करके महिलाओं की तथाकथित आजादी के झंडाबरदार बनने वाले लोग आज मुंह में दही जमाकर क्यों बैठे हैं? मैं नाराज हूं आप सबसे भी, आखिर आप क्यों चुप हैं?

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