काँग्रेस और कम्युनिस्टों का छलिया लोकतंत्र

जब लार्ड मैकाले भारत आया था तो यहां की न्याय व्यवस्था, सामाजिक व्यवस्था और आर्थिक व्यवस्था को दखकर दंग रह गया था। उसके आने से पूर्व सदियों से भारत विदशी शासकों की दासता से लड़ रहा था, परंतु अपनी न्याय व्यवस्था, सामाजिक व्यवस्था और आर्थिक व्यवस्था को बचान में वह सफल रहा था। सैकड़ों वर्ष के मुस्लिम शासन में भारत की प्राचीन न्याय-व्यवस्था ज्यों की त्यों कार्य कर रही थी। इसलिए समाज में सामाजिक अन्याय न के बराबर था, लोगों को न्याय मिलता था और वह न्याय भी ग्राम्य स्तर पर होने वाली पंचायतों से ही मिल जाया करता था। बहुत कम लोग गांव से निकलकर न्याय के लिए बाहरी न्यायालयों का दरवाजा खटखटाया करते थे। वास्तविक ग्राम्य स्तरीय स्वशासन और आत्मनिर्भरता वही थी, क्योंकि न केवल न्याय लोगों को गांव में ही मिल जाता था, अपितु सामाजिक वर्ण व्यवस्था के अंतर्गत गांव का किसान गांव के भूमिहीन कृषिक मजदूरों का भी पूरा ध्यान रखता था और किसी को भी अनाज के लिए बाहर नहीं जाना पड़ता था। गुरूकुलीय शिक्षा से कोई भी गांव वंचित नहीं था।

यह एक तथ्य है कि भारत में सामाजिक, आर्थिक और न्यायिक सुधारों के लिए अंग्रजों के आने से पहल के शासकों से कोई लड़ाई नहीं लड़ी गयी। इसका कारण यही है कि अंग्रजों से पूर्व इन क्षत्रों में भारत में कोई असमानता थी ही नहीं। हां, अंग्रेजों की शिक्षा प्रणाली के लागू होन के उपरांत देश में सामाजिक, आर्थिक और न्यायिक क्षेत्रों में असमानता बढ़ी। गुरूकुलों को अंग्रेजों ने बलात् बंद करा दिया, जिससे एक ही झटके में पूर देश में अशिक्षा का अंधकार व्याप्त हो गया। नई शिक्षा ने देश में एक ऐसे वर्ग को उत्पन्न करना आरंभ किया जो शरीर से भारतीय परंतु आत्मा और मन से अंग्रज बनने लगा। इस वर्ग ने शैक्षणिक आधार पर असमानता उत्पन्न की और स्वयं को पढ़े लिखे होने के नाते अन्य भारतीयों से भिन्न स्थापित किया। अन्य भारतीयों से भिन्न होने के इस कुसंस्कार ने स्वदेशी वस्तुओं, स्वदेशी वस्त्रों, स्वदेशी लोगों और स्वदेशी मान्यताओं के प्रति घृणा का भाव उत्पन्न किया। फलस्वरूप ग्राम्य स्तर की आत्मनिर्भरता का युगों-युगों से चला आ रहा स्वरूप भरभरा कर गिरने लगा।

अंग्रेजों ने भारत की आत्मा को झकझोर दिया और इस देश को विभिन्न प्रकार की असमानताओं के गहन गहवर में धकेल दिया। अब से पूर्व भारत मुस्लिम काल में केवल राजनीतिक अन्याय के विरूद्ध लड़ता आ रहा था। परंतु अंग्रेजों के समय में सामाजिक, आर्थिक, न्यायिक और राजनीतिक सभी क्षेत्रों में असमानता फली और भारत की आत्मा भीतर से कराह उठी। इसलिए भारत की सदियों से चली आ रही (राजनीतिक अन्याय के विरूद्ध) लड़ाई अब क्रांति की बात करने लगी। राजनीतिक अन्याय के विरूद्ध लड़ाई को हमने लड़ाई माना, परंतु जब देखा कि पतन और अंधकार होते-होते उसमें सार्वत्रिकता और समग्रता का समावेश हो गया है तो समग्र क्रांति की आवाज आने लगी। क्रांतिवीर सावरकर ने इसी मंथन के दृष्टिगत 1857 की क्रांति को सैनिक विद्रोह ना कहकर उसे ‘क्रांति’ का नाम दिया। आवाज और आगाज क्रांति के थे, परंतु कांग्रस ने धोखा दिया देश की आत्मा को और उसने राजनीतिक सत्ता परिवर्तन के खेल को ही क्रांति का नाम दे दिया। जबकि राजनीतिक परिवर्तन भारत की मांग नहीं थी, भारत की आत्मा की पुकार थी समग्र क्रांति से सारी व्यवस्था में ही आमूल चूल परिवर्तन लाने की। भारत की स्वाधीनता का शीघ्रता से शवोच्छदन किया गया और पराधीनता को ही स्वाधीनता की दुल्हन बनाकर सत्ता सिंहासन पर विराजमान कर दिया गया। तब से आज तक हम एक गणित को ही नहीं समझ पाये हैं कि ग्राम्य स्तर पर स्वायत्तता या स्वशासन या आत्मनिर्भरता कैसे स्थापित की जाए? लार्ड मैकाले की शिक्षा नीति गांव की प्रतिभाओं को नौकरियों के झांसे में डालकर महानगरों की ‘फ्लैट संस्कृति’ की ओर खींचकर गांवों को प्रतिभाविहीन कर रही है और हम आत्मनिर्भर गांव के सब्जबागों की दलदल में फंसते जा रहे हैं। हम नहीं समझ पाये हैं कि आत्मनिर्भर गांव का सपना तभी साकार होगा जब गांव की प्रतिभा गांव के लिए तथा गांव की प्रतिभा को भी महानगरों की सी सुविधा और सम्मान प्रदान किया जाएगा। हमें विस्तार सुविधा और सम्मानों का करना था हम करने लगे आर्थिक सहायता का विस्तार जिसने भ्रष्टाचार को तो बढ़ाया परंतु गांव को आत्मनिर्भर नहीं बनाया।

यह हमारी मूर्खता है कि हम गांवों में भी बड़े अस्पताल बनाने की बात करते हैं या अंग्रजी माध्यम के स्कूल स्थापित करन की बात करते हैं। गांव को आप अस्पताल नहीं, योग्य वैद्य दीजिए और उन वैद्यों को वो सुविधा दीजिए जिसस वो आयुर्वद के माध्यम से लोगों का उपचार कर सकें, गांव को वो न्यायालय शिक्षक दीजिए जो गांव में स्वास्थ्य के प्रति सचेत करते हुए स्वस्थ गांव स्वच्छ गांव का सपना साकार कर सकें। इसी प्रकार गांवों को सुसंस्कारित और सुशिक्षित बनाने के लिए गुरूकुलों की स्थापना की जाए। इन सब कार्यों को करने वाले लोगों को उचित सम्मान दिया जाए। यह दुर्भाग्य रहा इस देश का कि इस दिशा में कोई भी प्रगति स्वतंत्रता के बीत वर्षों में नहीं की गयी। यहां तो लोकतंत्र के नाम पर गांवों को आतंक परोसा गया है। गांव वालों के मत लेने के लिए धनबल, गनबल और जनबल का लोकतंत्र के कथित प्रहरी ही अधिक दुरूपयोग करत रहे हैं। अंग्रजों के पश्चात् कांग्रेस ने दश की राजनीतिक व्यवस्था को अंग्रजों के अनुसार चलाने का संकल्प लिया तो कम्युनिस्टों ने अंग्रजों की अन्याय और शोषण की नीति के माध्यम स भारत को भारत के अतीत से काटने का संकल्प लिया। इस प्रकार कांग्रेस और कम्युनिस्टों ने मिलकर देश का तेल निकालना आरंभ किया, वह भी लोकतंत्र के नाम पर।

पश्चिम बंगाल में 1999 में (पुलिस अपराध शाखा के सूत्रों के अनुसार) एक ही वर्ष में 636 राजनीतिक हत्याएं कम्युनिस्टों ने कीं। इसके अतिरिक्त जिन हत्याओं में प्राथमिकी ही दर्ज नहीं हुई, वो अलग हैं। एक ही प्रांत में इतन बड़े स्तर पर अपन राजनीतिक विरोधियों को समाप्त करने का यह कीर्तिमान अंग्रेजों के दमन काल को स्मरण कराता है और हमें यह बताता है कि कम्युनिस्ट अंग्रेजों के उत्तराधिकारी हैं। झारखंड के 14 जिलों में 2000 ई. में नक्सलियों द्वारा की गयी हत्याओं की जानकारी हमें ‘हिंदुस्तान’ पटना के संस्करण 11-11-2001 से मिलती है। जिसमें बताया गया ‘पीपुल पावर’ (द नक्सलाइट मूवमेंट इन संट्रल बिहार) के लेखक प्रकाश लुइस न पृष्ठ 262 पर दिया है। जिसमें विद्वान लेखक ने कम्युनिस्टों से संबंधित आतंकी या हत्याओं की घटनाओं की (1994 स 1993) कुल संख्या ब्यौर वार 5263 है। ये घटनाएं हमारी आंखें खोलन के लिए पर्याप्त हैं। इन्हें समझना होगा और देखना होगा कि अंतत: इन घटनाओं के करने का वास्तविक उद्देश्य क्या है? अंग्रेजों ने इस देश की एक राष्ट्रीय भाषा-संस्कृत के गुरूकुलों को पूरे दश से विलुप्त किया और इस दश के लोगों के लिए अनिवार्य कर दिया कि व अपनी शैक्षणिक संस्थाएं चलाकर अपनी प्राचीन संस्कृति को धर्म को और इतिहास को सुरक्षित रखन का अधिकार नहीं रखते हैं, क्योंकि अंग्रजों का उद्देश्य भारत को अपने अतीत से ही तो काटना था। स्वतंत्रता मिलन के उपरांत कम्युनिस्टों ने भारत में इसी अंग्रजी नीति को यथावत लागू किया। देश में भाषाओं की बहुलता और भाषाई दंगों का इतिहास यदि निष्पक्षता से समीक्षित किया जाए तो अंग्रेजों से कांग्रेस और कांग्रेस से कम्युनिस्टों तक का जो एक त्रिकोण बनता दिखाई देगा उसी में सार दश की आत्मा और स्वाभिमान पिसते दृष्टिगोचर होंगे। 30-6-2002 की घटना है जब पांडिचरी में संस्कृत भारती ने संस्कृत शिक्षण हतु दस दिवसीय नि:शुल्क संस्कृत संभाषण शिविर का आयोजन किया था। इस शिविर में केरल तमिलनाडु, आंध्रप्रदश और पांडिचरी के सौ से भी अधिक लोगों ने नाम दर्ज करवाये थे। शिविर को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की एक योजना के अंतर्गत आर्थिक सहायता मिल रही थी। परंतु भाकपा को इस शिविर से संभवत: खतरा अनुभाव हुआ। उसकी राष्ट्रीय परिषद के सदस्य तथा पांडिचरी के पूर्व मंत्री आर. विश्वनाथन भाकपा की युवा शाखा ‘ऑल इंडिया यूथ फडरशन’ के कुछ कार्यकर्ताओं को लेकर शिविर में जा धमके। उन्होंने शिविर में शिक्षार्थियों पर आक्रमण किया। आक्रमण से पहल महाविद्यालय के प्राचार्य को फोन पर धमकियां भी दी गयीं थी। जहां अपनी जड़ों को खोदने वाले आत्मघाती और संस्कृति नाशक लोग हर शाख पर उल्लू की भांति उल्ट लटक रहे हों, वहां देश के सांस्कृतिक मूल्यों का और सांस्कृतिक एकता को स्थापित करने के सपने को कैसे साकार किया जा सकेगा? सचमुच विश्व में केवल भारत ही एक ऐसा दश है जो अपनी जड़ों को काटने वालों को भी सम्मान देता है। इस वैचारिक स्वतंत्रता के नाम पर भारत की महानता के रूप में स्थापित किया जाता है, परंतु यह वैचारिक स्वतंत्रता या लोकतंत्र में व्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रश्न नहीं है, अपितु वैचारिक स्वतंत्रता और व्यक्ति की निजता पर हो रहे आक्रमण का प्रश्न है। आप हिंसा फैलाने वाली भाषा अंग्रेजी और हिंसा का निषेध करने वाली संस्कृत या तद्जनित अन्य भारतीय भाषाओं को एक ही पलड़ में नहीं तोल सकते। विवेक की आवश्यकता हर कदम पर पड़ती है। इसलिए विवक को गिरवी रखकर आत्महीनता की खाई को अपने चारों ओर गहरा करना मूर्खता के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं कहा जा सकता। जस गांव को हाथ पकड़कर महानगरों की ओर बढ़ाने के लिए प्ररित करना अनियोजित विकास को आमंत्रण देने के समान है, उचित बात ये है कि हम स्वयं ही गांव की ओर चलें और महानगरों में महंगी होती जा रही भूमि को रोककर गांव की भूमि को ही वंदन करें, वैसे ही संस्कृति वैचारिक प्रदूषण की धूल डालन के स्थान पर पड़ी हुई धूल को स्वस्थ मानसिकता और स्वच्छ हाथों से साफ करने की आवश्यकता है। कांग्रेस और कम्युनिस्ट जितनी शीघ्रता से इस नीति को अपना लेंगे उतनी ही शीघ्रता से देश में वास्तविक लोकतंत्र आ सकता है। अभी तो हम छलिया लोकतंत्र में जी रहे हैं।

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