माँ और भारतीय परिवार विज्ञान : विश्व की एक अद्भुत व्यवस्था , जिस की संचालिका होती है मां

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आज मातृ दिवस है । सचमुच हम सब में वे लोग सौभाग्यशाली हैं जिनकी मां है । जिनकी नहीं है , उन्हें निश्चय ही आज अपनी मां की याद आ रही होगी । मुझे भी अपनी मां का प्यार और उसकी ममता की स्वाभाविक रूप से याद आ रही है ।अपनी उसी ममतामयी मां की स्मृति में मेरा यह लेख सादर समर्पित है ।
माँ को परिवार की साम्राज्ञी कहा जाता है। अथर्ववेद 14/1/144 गृह पत्नी और गृहपति का सम्बन्ध श्रेष्ठ है। “गृहपति ज्ञानी है, गृह पत्नी ( माँ ) भी वैसी ही ज्ञानी है, गृहपति साम मन्त्र है, गृहपत्नी ऋग्वेद मन्त्र है। गृहपति द्युलोक है, गृहपत्नी पृथिवी समभाव है”- अथर्ववेद 14/2/69 उपासनामय श्रेष्ठ, का समभाव आकाश-धरा वत ज्ञानमय सम्बन्ध वैदिक परिवार का आधार है। वेद के इन प्रमाणों से यह सिद्ध होता है कि भारत की सांस्कृतिक परंपरा में माँ को बहुत अधिक सम्मान पूर्ण स्थान दिया गया है। किसी भी दृष्टिकोण से उसे हीन करके नहीं देखा गया है। परिवार की साम्राज्ञी होने से परिवार का प्रत्येक सदस्य माँ के शासन – अनुशासन में रहना अपना सौभाग्य समझता है , परंतु जैसे जंगल की रक्षा शेर से और शेर से जंगल की रक्षा होती है , वैसे ही उस साम्राज्ञी और परिवार की अन्य महिलाओं को या मातृशक्ति को सुरक्षा प्रदान करने के लिए घर के पुरुष वर्ग की विशेष जिम्मेदारी रही है। जिसे आज के तथाकथित प्रगतिशील लोगों ने कुछ इस प्रकार परिभाषित , व्याख्यायित और स्थापित करने का प्रयास किया है कि जैसे नारी को भारतीय संस्कृति में बंधनों में जकड़ करके रखा गया है।

वास्तव में ऐसी व्यवस्था नारी के अधिकारों पर किसी प्रकार का प्रतिबंध या पहरा नहीं है। यह तो पुरुष वर्ग का उसके प्रति कर्तव्यबोध ही है जो उसे इस प्रकार की व्यवस्था में रहने के लिए प्रेरित करता है । यह किसी प्रकार की बाध्यता नहीं है । ना ही किसी प्रकार से किसी के अधिकारों का अतिक्रमण है । इसके विपरीत यदि नारी शक्ति अपनी कर्तव्य परायणता से परिवार का पोषण करती है या परिवार के बीच समन्वय स्थापित करके रखती है इस उसे अपने स्नेह से सींचने का काम करती है तो परिवार के अन्य लोग अपनी कर्तव्यपरायणता का प्रदर्शन करते हुए उसके सम्मान का प्रत्येक स्थान पर ध्यान रखने का प्रयास करते हैं।
वैदिक संस्कृति में परिवार के सभी सदस्यों अर्थात वधू, पुत्र , पिता , पुत्र , बहन आदि की वैज्ञानिक परिभाषा मिलती है। जैसे वधू उसे कहते हैं जो गृहस्थ धर्म में प्रवेश कर प्रत्येक जन को सुख देती है एवं तत्तत: कार्यों को वहन करती है। वेद वधू को सुमंगली कहता है।
गृहपत्नी के तीन अर्थ हैं । (निरुक्त 12/9)
पहले अर्थ के अनुसार गृहपत्नी वह है जो कुल में भलीभांति स्थित है । दूसरे अर्थ के अनुसार गृह पत्नी का अर्थ है – कुल पोषण पदार्थ वितरक , ( घर में कोई भी चीज आ जाए उसको भी माँ ही बांटती है , शाम को दूध भी बच्चों को माँ ही बांटती है । तनिक समझिए कि ऐसा क्यों होता है ? इसके पीछे यही वेद की व्यवस्था है । दूसरी बात यह भी है कि मां न्याय संगत पक्षपात शून्य होकर इस कार्य को कर सकती है , इसलिए भी उसे ही यह कार्य सौंपा गया है । ) और तीसरे अर्थ के अनुसार गृहपत्नी का अर्थ है – उत्तम सन्तान दात्री। ,इसी प्रकार परिवार को स्नेह से सरोबार कर देने वाली भी है।
इसी प्रकार माता की भी बहुत सुंदर परिभाषा हमारे यहां शास्त्रों में मिलती है ।माता कुल को संतुलित प्यार देती है , अतः माता है। माता संस्कार दायिनी होने से भी माता है। “माता निर्मात्री भवति” माता निर्माणकर्ती है। उपरोक्त दायित्वों के कारण ही मान पूजा व सत्कार के योग्य है माता।अन्य परिजनों की भूमिकापिता सर्वत्र हमारे लिए एक रक्षक बनकर खड़ा होता है । वह हमारा सबसे विश्वसनीय रक्षा कवच है। इसीलिए उसके बारे में वैदिक विद्वानों की मान्यता है कि पालन एवं रक्षणकर्ता पिता है। संसार समर में हम पिता के संरक्षण और साए में रहकर ही लड़ना सीखते हैं । संसार में कौन हमारा शत्रु है ? कौन हमारा मित्र है ? कौन हमारा भला चाहने वाला है और कौन हमसे ही ईर्ष्या या द्वेषभाव रखता है ? इन सबकी जानकारी भी हमें पिता के साए में रहते हुए ही होती है । जिनके सिर पर पिता का साया नहीं होता , तनिक उनसे पूछिए कि उन्हें शत्रु और मित्र में पहचान करने में कितना समय लगा ? या जीवन की दूसरी समस्याओं को समझने और उनका उत्तर खोजने में कितना समय लगा ?
पुत्र माता-पिता की बहुत रक्षाकर्ता होने से पुत्र है । माता-पिता का वृद्धावस्था में पालनकर्ता होने से भी उसे पुत्र कहा जाता है। वृद्धावस्था में या बीमारी की अवस्था में या किसी दुख तकलीफ की अवस्था में माता-पिता से जो मुंह फेरकर निकल जाए या सर्वसामर्थ्ययुक्त होते हुए भी उनकी उचित देखभाल न कर सके , वह पुत्र होकर भी पुत्र नहीं होता । बात साफ है कि पुत्र वही है जो इन विषम परिस्थितियों में माता-पिता का रक्षक बन जाए , उनका सेवक बन जाए , उनके प्रति श्रद्धा रखते हुए उनका दुख दर्द दूर करने वाला बन जाए।
भ्राता वह है जो ज्योतित स्नेह का धारक होता है। जिसका स्नेह हमारे लिए ज्योतिष्मान होता है , ज्योति के समान होता है । वह हमारे जीवन का प्रकाश स्तंभ होता है। उसके ज्योतित स्नेह से भीगे हुए हृदय से निकलने वाली लताड़ भी हमें ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ का पाठ पढ़ाती है और हम अपने जीवन में प्रकाश के पुजारी बन जाते हैं । निश्चय ही इसमें ज्येष्ठ भ्राता का बहुत अधिक योगदान होता है। स्नेह , कर्तव्य, सामंजस्यमय भ्राता विशिष्ट गुणों से युक्त होकर नेह द्वारा हमारा संरक्षक होता है । वह भय का हरण करने वाला होता है ,इसलिए भैय्या होता है। संसार में जब हम किसी आपदा में फंस जाते हैं तो भाई ही काम आता है । कल्पना करो कि हम कहीं बदमाशों ने घेर रखे हैं । दूर जंगल में घटने वाली इस घटना में जब हम अपने बचाव के लिए शोर मचाते हैं तो कहीं दूर गांव से लोग पुकार उठते हैं कि -‘हम आ रहे हैं ।’ यदि उनमें हमारे भाई की आवाज हमारे कानों में पड़ जाए कि ‘ मैं आया’ – तो चाहे हम मरणासन्न अवस्था में ही क्यों न हों फिर भी हमें बहुत बड़ा सम्बल मिल जाता है । बस यही है भाई की विशेषता। भैया के बिना जीवन कैसा होता है ? यह उस व्यक्ति से समझा जा सकता है जिसके कोई भाई ना हो और उसे कदम कदम पर भाई की आवश्यकता महसूस होती है।
बहिन वह है जो भाई के समस्त दुःखों का भलीभांति निवारण करने वाली होती है। आज भी ऐसी अनेकों बहनें हैं जो भाई के दुःख को देखकर दु:खित हो उठती हैं और उसके लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करने तक के लिए तैयार रहती हैं । प्राचीन काल में तो भारत में ऐसी बहनें घर-घर में मिला करती थीं ।
भगिनी भी बहन का ही पर्यायवाची है । बहन को भगिनी इसलिए कहा जाता है कि वह भाई के प्रति भग अर्थात ऐश्वर्य एवं कल्याण की इच्छा रखने वाली होती है। सचमुच बहन और भाई का जैसा प्यार भारतवर्ष में वैदिक संस्कृति में रचे – बसे परिवारों में देखने को मिलता है , वैसा कहीं और नहीं मिलता। बहन भाई के लिए माँ के अभाव को पूर्ण करती है। यदि किसी परिवार में माता का जल्दी देहान्त हो जाए तो वहाँ पर अक्सर बड़ी बहन छोटे भाई और बहनों को मातृवत ममता देते हुए पाल देती है। इसे वह अपना कर्तव्य समझकर पूर्ण कर जाती है । बहुत छोटी सी अवस्था में भी इतनी बड़ी जिम्मेदारी का निर्वाह करना सचमुच कर्तव्य परायणता की पराकाष्ठा है।
भारतीय संस्कृति में भाई और बहन के इस असीम प्रेम को दर्शाती गोपाल सिंह नेपाली जी की यह कविता बहुत कुछ कह जाती है :–तू चिंगारी बनकर उड़ री, जाग-जाग मैं ज्वाल बनूं,
तू बन जा हहराती गंगा, मैं झेलम बेहाल बनूं|
आज बसंती चोला तेरा, मैं भी सज लूं लाल बनूं,
तू भगिनी बन क्रांति कराली, मैं भाई विकराल बनूं|
यहां न कोई राधा रानी, वृंदावन, बंशीवाला,
तू आंगन की ज्योति बहन री, मैं घर का पहरे वाला|बहन प्रेम का पुतला हूं मैं, तू ममता की गोद बनी,
मेरा जीवन क्रीड़ा-कौतुक, तू प्रत्यक्ष प्रमोद भरी|
मैं भाई फूलों में भूला, मेरी बहन विनोद बनी,
भाई की गति, मति भगिनी की, दोनों मंगल-मोद बनी|
यह अपराध कलंक सुशीले, सारे फूल जला देना,
जननी की ज़ंजीर बज रही, चल तबियत बहला देना|भाई एक लहर बन आया, बहन नदी की धारा है,
संगम है, गंगा उमड़ी है, डूबा कूल-किनारा है|
यह उन्माद, बहन को अपना भाई एक सहारा है,
यह अलमस्ती, एक बहन ही भाई का ध्रुवतारा है|
पागल घड़ी, बहन-भाई है, वह आज़ाद तराना है,
मुसीबतों से, बलिदानों से, पत्थर को समझाना है|जामाता शब्द को परिभाषित करते हुए स्पष्ट किया गया है कि जो पत्नी को पवित्र रखता है, उत्तम मार्ग में लगाता है, परिमार्जित परिष्कृत आचरण कर्ता है – वह जामाता है।
स्याल अर्थात साला वह है जो निकट सम्बन्ध वाला है । मातुल या मामा वह है जो जिसके अथाह प्यार की तुलना ही नहीं है । मामा के सानिध्य में जाकर आज भी बच्चे अपने आप को वैसे ही संरक्षित और सुरक्षित अनुभव करते हैं जैसे पिता के साए में पहुंच गए हों । बहन जब घर पर आ जाती है तो भाई उसके बच्चों का वैसे ही ध्यान रखता है जैसे अपने बच्चों का ध्यान रखता है । यहाँ तक कि पढ़ाई – लिखाई आदि के प्रति भी उतना ही पवित्र भाव रखता है जितना वह अपने बच्चों के बारे में रखता है। उसकी उपस्थिति में बहन के बच्चे अपने आप को वैसे ही अनुभव करते हैं जैसे पिता के साए में रह रहे हों ।
नन्दिनी अर्थात ननद वह है जो सरसता से आल्हादित कर देने वाली होती है। इस प्रकार इन सारे शब्दों की शाब्दिक व्याख्या से ही स्पष्ट हो जाता है कि यह सब एक दूसरे को आनन्दित , आह्लादित , उल्लसित और हर्षित करने के लिए होते हैं । कोई भी अपने लिए काम नहीं करता अपितु दूसरे के लिए जीवन जीता है। इससे परिवार का सारा परिवेश सुन्दर और गरिमा पूर्ण बनता है। स्वैर्गिक आनन्द की अनुभूति होती है । अन्त में यही आनन्द वैश्विक आनन्द में परिवर्तित हो जाता है।
यह बहुत ही दुखद स्थिति है कि भारत में परिवारों के भीतर पाए जाने वाले इन संबंधों में परस्पर या तो ठहराव आ गया है या फिर कहीं ना कहीं ईर्ष्याभाव घर कर गया है । जिससे परिवारों के मूल्य उजड़ रहे हैं। परिवारों की होती जा रही जर्जर अवस्था से संसार की व्यवस्था की चूलें हिल रही है । निश्चित रूप से भारत को अपने आप को समझना होगा और भारतीय नेतृत्व को भी इस ओर ध्यान देकर परिवार नाम की संस्था की जर्जर होती हुई व्यवस्था को सुधारने की दिशा में कुछ ठोस कार्य करने होंगे ।
हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि सारे संसार को ही उत्सव के आनन्द में सराबोर कर देना भारतीय संस्कृति का अन्तिम लक्ष्य है । यह तभी संभव है जब भारतीय वैदिक संस्कृति में विश्वास रखने वाले परिवारों के कर्तव्यपरायण से ओतप्रोत भाव को विश्व परिवार के भीतर यथावत लागू कर दिया जाए।डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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