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15 अगस्त 1947 ईं को जो स्वतंत्रता हमें मिली थी, वह लंगड़ी-लूली स्वतंत्रता थी, क्योंकि विभाजित भारत में मिला-अखण्ड भारत तो अंग्रेजी साम्राज्यवाद की कुचालों के भूचाल में और सियासत की शतरंजी चालों के सागर में कहीं विलीन हो गया था।
कोई दुष्ट दुष्टता करके कहीं छिप नही गया था। फिर भी शतरंज बिछी रह गयी। चौपड़ सजी रही। फलस्वरूप चालें चली जाती रहीं। राजनीतिज्ञों ने राष्ट्र को ठगा, बार बार झूठ बोला और उनके द्वारा यह कहा जाता रहा कि-
कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है।

कश्यप ऋषि का मर्ग (घर) आज का कश्मीर है। इसका अपना एक गौरवपूर्ण इतिहास है, गौरवपूर्ण अतीत है। इसके दर्द की बात चली है तो इसके विषय में थोड़ा बहुत जान लेना भी आवश्यक है। कश्मीर का हजारों वर्ष पुराना इतिहास है जिसमें पिछली लगभग सात शताब्दियों का इसका इतिहास उत्पीड़न, बलात-धर्मांतरण और अत्याचारों का इतिहास है। इससे इस धरती के स्वर्ग का वास्तविक स्वरूप ही परिवर्तित हो गया है। सरदार पटेल हंसी मजाक में इस पवित्र भूमि को नेहरू जी की ससुराल कहा करते थे। क्योंकि नेहरू जी को कुछ विशेष कारणों से कश्मीर से विशेष लगाव था। प्रथमदृष्टया उसका एक ही कारण बताया जाता है कि नेहरू जी कश्मीर की देन थे इसलिए उन्हें कश्मीर से विशेष अनुराग था जबकि विशेष अनुराग का यह कारण जंचता नहीं।
यदि ऐसा था तो फिर तो कश्मीर के भारत में अंतिम विलय की सारी संभावनाओं को अंतिम और वास्तविक मानकर नेहरू जी इसे अंतर्राष्ट्रीय मंच यू.एन.ओ. में नही ले जाते। वस्तुत: पटेल साहब के शब्दों में ‘नेहरू जी भारत के एकमात्र राष्ट्रवादी मुसलमान थे।’ अपनी इसी छवि को बनाये व बचाये रखने के लिए राजनीति को बीच में डालकर कश्मीर के प्रति नेहरू जी ने अपना विशेष अनुराग प्रदर्शित किया था।
देखिए, श्यामाप्रसाद मुखर्जी के यह शब्द बड़े ही सार्थक हैं कि-
‘भारत की एक एक इंच भूमि पर भारत की 35 करोड़ जनता का अधिकार है, जो लोग इस भारत भूमि पर भारत के होकर सम्मिलित रहना नही चाहते उनका दिल जहां चाहे वे वहां जा सकते हैं, किंतु अपने साथ भारत की एक इंच भूमि को भी नही ले जा सकते। नेहरू जी विशेष मजहब की ओर आकर्षित थे, जिसने राष्ट्र धर्म के निर्वहन में नेहरू जी से चूक करा दी। जबकि श्यामाप्रसाद मुखर्जी के सामने केवल और केवल राष्ट्र धर्म ही प्रथम और सर्वोपरि था। इसलिए उनके शब्दों में राष्ट्रधर्म की गंध मिलती है, जबकि नेहरू जी के विचारों में दोगलापन और दिन में सपने देखने की पुनरावृत्ति स्पष्ट झलकती है। इस दोगलेपन के कारण शेख अब्दुल्ला के राज में कश्मीर की वादियां की शांत वायु में आतंकवाद की आग लग गयी। कश्मीर धू-धू करके जलने लगा, मजहबी जुनून ने अपना रंग दिखाया और कश्मीर धर्मांतरण से मर्मांतरण की ओर चल दिया, बिना इस बात का ध्यान किये कि-
चमेरा इतिहास भारत का इतिहास है।
चमेरी संस्कृति शमशीर की नही अपितु देववाणी, वेदवाणी को नि:सृत करने की है।
चमानव धर्म मेरा सबसे बड़ा धर्म है। मजहब को तो मैं जानती तक नही हूं।
चभारतीय राष्ट्र पर मेरा भी अधिकार है और मैं स्वयं उसी का एक अंग हूं। उसके बिना मैं और मेरे बिना वह आधे-अधूरे हैं।
विभाजित भारत के साथ कश्मीर का दर्द हमने लुभाव में लिया। इस लुभाव को भारत के सैक्यूलर शासकों ने लुभाव ही समझा।
इस लुभाव के साथ कितना घाटे का सौदा हमने किया, इस ओर भारतीय राष्ट्र का ध्यान दिलाने का प्रयास नही किया गया बल्कि ये ढोल पीटा गया कि अंग्रेजों को यहां से भगाकर हमने बहुत बड़ा काम कर दिया है। हमें वीर कहो, बहादुर कहो, क्योंकि हमने देश को स्वतंत्र करा लिया है।
इन नगाड़ों के शोर में राष्ट्र को नही समझने दिया गया कि ‘अश्वत्थामा’ मर गया है? अर्थात राष्ट्र खंडित हो गया है। कितना बड़ा छल था? कितना बड़ा धोखा था राष्ट्र के साथ? जो ऐसा करके दिखा रहे थे वही बाद में ‘राष्ट्रनिर्माता’ और ‘युगनिर्माता’ बन गये। यह उनका सौभाग्य रहा। शायर के शब्दों में राष्ट्र की आत्मा का इनसे प्रश्न है-
तेरे बुलंद मनसिफ की, खैर हो या रब्ब।
जिसके लिए किया तूने खुद ही को हलाल।।
ऊंचे पद के लिए आपने अपनी अंतरात्मा की स्वयं हत्या कर ली, इसके लिए आपको बधाई।
कश्मीर के इतिहास की संक्षिप्त जानकारी
नीलमत पुराण के अनुसार प्रजापति कश्यप ने अपनी घोर तपस्या से कश्मीर का निर्माण किया था, यथा–
क: प्रजापतिरदिष्टि : कश्यपश्च प्रजापति:।
तेनेद निर्मित देशं कश्मीराख्यं भविष्यति।।
जब कभी संपूर्ण उत्तर भारत जलप्रलय से विनष्ट हो गया था, कश्मीर निर्माण का यह प्रकरण उसी समय की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट करता है। अत: इसे उस समय आबाद करने में ऋषि को निश्चित रूप से घोर तपस्या ही करनी पड़ी होगी। इस प्रकार वर्तमान ज्ञात इतिहास में कश्मीर का महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। यदि ऐसा भी कहा जाए कि भारत के वर्तमान ज्ञात इतिहास में पहला पृष्ठ कश्मीर के नाम से ही आरंभ होता है तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नही होगी।
कश्यप ऋषि के भागीरथ प्रयास से वितस्ता (झेलम) के आसपास नगर ग्राम बसाए गये। उनकी नाग जाति का इन नगर ग्रामों के बसाने में विशेष स्थान रहा। इसके पश्चात उन्हीं के पुत्र नील को इस प्रदेश का प्रथम राजा होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। इन्होंने बड़ी कुशलता से कश्मीर का शासन संभाला, इनकी शासन व्यवस्था और कश्मीर की संपन्नता की ख्याति ने दूर दूर के देशों का ध्यान आकृष्ट किया। उन्हीं के नाम से ‘नीलमत पुराण’ की रचना अब से हजारों वर्ष पूर्व की गयी थी, जिसमें कश्मीर के विस्तृत इतिहास की जानकारी दी गयी है। नागपूजामत, बौद्घमत, शैवमत जैसे मतों ने इस प्रदेश को सांस्कृतिक रूप से समृद्घ किया। वेदों की ऋचाओं का गान इस रमणीक और शांतिपूर्ण प्रदेश के कण कण में रचा-बसा है। आज भी वैदिक ऋषियों के तप और त्याग का व्यापक प्रभाव इस प्रांत के वायुमंडल को सर्वोपयोगी, सर्वहितकारी और सबको शांति प्रदायक बनाये हुए है। यह इस भारतीय भूभाग के सांस्कृतिक इतिहास का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पहलू है जो विश्व इतिहास में अन्यत्र दुर्लभ है। हर एक ऋर्षि को यहीं अपनी तत्श्चर्या करने और विद्या दान करने हेतु विद्यालय, विद्यापीठ, शिक्षाकेन्द्र स्थापित करने का एक चस्का सा लग गया था। इसीलिए यहां विद्वानों पंडितों की भरमार रही।
कालांतर में सभी कश्मीरियों को पंडित कहे जाने की यही स्थिति एक कारण बन गयी कि यहां का रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति ही पंडित है।
राजतरंगिणी:राजतरंगिणी के लेखक ‘कल्हण’ ने कश्मीर का इतिहास लिखा। इस ग्रंथ में आगे आने वाले कई विद्वानों ने अपने अपने समय में कश्मीर के विभिन्न राजाओं के कार्यों का उल्लेख किया। महाभारत के युद्घ से पूर्व कश्मीर में गोनंद नामक राजा था। इसने श्रीकृष्ण के विरूद्घ जरासंध का भी साथ दिया था। इसके पश्चात इसके दामोदर नामक लड़के ने कश्मीर पर शासन किया। गोनंद को भी श्रीकृष्ण द्वारा ही मारा गया था तो इस दामोदर का विनाश भी उन्हीं के द्वारा हुआ। क्योंकि इसने उन पर उस समय हमला कर दिया था जब वह गंधार में एक विवाह संस्कार में सम्मिलित होने के लिए गए हुए थे। इसके पश्चात श्रीकृष्ण के द्वारा दामोदर की पत्नी रानी यशोमति को कश्मीर की गद्दी पर बिठाया गया। यह रानी उस समय गर्भवती थी, जिसने एक पुत्र को जन्म दिया, जिसे इतिहास में गोनंद द्वितीय के नाम से जाना गया। कल्हण के अनुसार गोनंद द्वितीय के बाद 35 राजा हुए। इनमें से 23 राजा पांडव वंश के थे। मार्तण्ड तथा भव्य मंदिरों के भग्नावशेष पांडवलरी या ‘पांडव भवन’ कहलाते हैं। अर्जुन का प्रपौत्र ‘हरनदेव’ जो कि हस्तिनापुर के राज्य के लिए अपने भाई जनमेजय से लड़ा था, हस्तिनापुर से भागकर यहां पहाड़ियों में आ छिपा था। यही एक दिन गोनंद की सेना में भर्ती होकर प्रधानमंत्री के पद पर पहुंच गया था। गोनंद द्वितीय के पश्चात यही प्रथम पाण्डव शासक के रूप में कश्मीर के अंदर स्थापित हुआ। यहां का शंकराचार्य मंदिर पांडव नरेश संदीपन की देखरेख में बनाया गया था। भीमसैन इसी वंश का एक ऐसा शासक था, जिसके समय में कश्मीर का राज्य विस्तार होकर वह दूसरे देशों तक फैला। इसके पश्चात इस भव्य प्रांत पर सम्राट अशोक का भी आधिपत्य रहा। उसके पश्चात कनिष्क, मिहिरकुल, मेधवाहन, दुर्भभवर्धन जैसे शासकों ने भी कश्मीर पर अपनी अच्छी बुरी छाप छोड़ी। इसके पश्चात अरब हमलावरों का मुख मोड़ने वाला महान शासक चंद्रापीड कश्मीर को मिला। इसने सन 713 में चीनी दरबार में अपना एक दूत इस आशय से भेजा था कि चीन की सहायता से वह अरब से युद्घ करे। गोपीनाथ श्रीवास्तव जी के अनुसार चीन भी इस महान शासक की महत्ता को स्वीकार करता था। यह एक न्यायप्रिय शासक था। अरब आक्रमणों को रोकने के लिए चीन की सैनिक टुकड़ियां कश्मीर के राजा चंद्रपीड़ की सहायतार्थ पहुंची। इससे पूर्व हर्षवर्धन की केन्द्रीय सत्ता के अधीन कश्मीर को रहना पड़ा था। सम्राट ललितादित्य के समय कश्मीर के पराक्रम की दुुंदुभि देश में ही नही अपितु विदेशों में भी बजी। इस प्रतापी और पराक्रमी शासक के शासनकाल में कश्मीर का राज्य पूर्व में तिब्बत से लेकर पश्चिम में ईरान और तुर्किस्तान तक तथा उत्तर में मध्य एशिया से लेकर दक्षिण में उड़ीसा और द्वारिका के समुद्रतटों तक पहुंच गया था। अपने पराक्रम से विश्व में अपनी साख का परचम लहराने वाली कश्मीर की पावन भूमि पर आज पाकिस्तान और चीन का शिकंजा धीरे-धीरे मजबूत होता जा रहा है, और हम वहां से भाग रहे हैं, परिणाम क्या होगा? तनिक चिंतन करें।

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