हम कहां थे, कहां पहुंचे?

Untitledडा. चंद्रकांत गर्जे
किसी समय भारत की कृषि लहलहाती थी, यहां की भूमि हीरे मोती उगलती थी, दूध की नदियां बहती थीं, सोने का धुआं निकलता था। समाज में नैतिकता थी न्याय था, सत्य धर्म था, धर्मराज्य था, राष्ट्रधर्म था, आदर्श परिवार थे, समाज आदर्श था कोई आडंबर नही था। विद्या ज्ञान, विज्ञान था। भारत विश्व का गुरू था। प्राचीन वैदिक साहित्य, आर्ष ग्रंथों में भारत देश का उद्घांत चित्र प्रतिबिम्बित है
मनुर्भव की वैदिक शिक्षा पाकर मनुष्य मनुष्य बना हुआ था। उद्याते पुरूष नावयानम-मनुष्य ऊपर उठा हुआ था। मानवता के श्रेष्ठ गुणों को धारण करने वाला मनुष्य था। वेदों की शिक्षा से मनुष्य जीवन था। वेदों की शिक्षा मनुष्य जीवन परिपूर्ण था। महर्षि वेदव्यास ने अपने ग्रंथ में एक भावना व्यक्त की है-न हि मानुषात श्रेष्ठतरं हि किंचित। इस भावना के अनुसार उस समय श्रेष्ठ मनुष्य था। श्रेष्ठता में धर्म और सत्य भी जुड़ा हुआ था।
नैतिकता मनुष्य की आध्यात्मिक साधना मानी जाती थी। नैतिकता का संबंध मनुष्य के आचरण और उसके व्यवहार से था। नैतिक उत्थान के बिना मनुष्य मनुष्य हो ही नही सकता था। मनुष्य के आचरण और व्यवहार में धर्म की भूमिका भी प्रमुख मानी जाती थी। ऐसा दृढ़ विश्वास था कि सदाचार ही धर्म है, दुराचार ही अधर्म है। सदाचार से आयु की वृद्घि होती है, दुराचार से आयु घटती है। इन्हीं सिद्घांतों के कारण उस समय का समाज सदगुण ग्रहण करता था और दुर्गुणों से बचता था। वेदों के उद्घोष सहस्राब्दियों तक चलते रहे। जीवन में मूल्यों को बनाए रखने में कभी शिथिलता नही आयी। इसीलिए देवता भी मानवदेह ही प्राप्ति के लिए ललचाते थे।
यह दृढ़ विश्वास था कि दुर्गुण दुराचारों के कारण ही मनुष्य चोर बनता है, डकैती डालता है, छल कपट करता है, हिंसा करता है, जुआ खेलता है और धन कमाता है। ऐसा अर्जित धन वर्जित माना जाता था। ऐसी पापी लक्ष्मी से बचने का पूरा पूरा प्रयास किया जाता था। दुराचार का दूसरा नाम था अश्लीलता। अश्लीलता का अर्थ था भद्दापन। भद्दे चित्र, भद्दा साहित्य, भद्दे गीत, स्त्रियों के भद्दे नृत्य, पर स्त्री गमन भद्देपन की यह व्याख्या थी। दुराचारी व्यक्ति के साथ संघर्ष करना व मनुष्यता के विपरीत था और न यह कायरता थी। समाज में न कोई बड़ा था न कोई छोटा, न कोई निकृष्ट था न कोई ऊंचा। सभी समान थे। भाई भाई की तरह रहकर जीवन की उन्नति में मनुष्य लगा रहता था। तब तो उस समय का मनुष्य आर्यश्रेष्ठ ईश्वर का पुत्र कहलाता था। शिक्षालयों की सीख थी-सदा सत्य बोलो धर्म का आचरण करो, धर्म से जुड़े रहो, कर्म और शील की उपासना करो, यह कुल धन्य माना जाता था, जहां माता पिता विद्वान तथा धार्मिक हों। ऐसे माता पिता की संतान बड़ी भाग्यवान समझी जाती थी। माता पिता, आचार्य पूज्यनीय थे। गुरूकुल शिक्षा प्रणाली में बालक बालिकाएं शिक्षित हों आदर्श नागरिक बनते थे। ऐसे नागरिक जिनके लिए राष्ट्र सर्वोपरि था।
भारतीय संस्कृति ने ऐसे अनेक महापुरूषों को जन्म दिया जिन्होंने काम वासना को अपने पास फटकने नही दिया। मर्यादा पुरूषोत्तम रामचंद्र जी एक पत्नीव्रती थे। वे अपने चौदह वर्ष के वनवास में पत्नी के साथ रहते हुए भी काम वासना से दूर रहे। योगीराज श्रीकृष्ण ने रूक्मिणी से विवाह करने के बाद भी बारह वर्ष तक ब्रह्मïचर्य का पालन करने के बाद ही प्रद्युम्न को जन्म दिया था। उस समय का पुरूष केवल अपनी पत्नी से ही प्रीति रखनेवाला था-स्वदार निरत: सदा। पतिव्रता स्त्री भी पति की सेवा देवता की भांति करती थी। उपचर्य स्त्रियां साधव्या सततं देववत्पत्ति। प्रभु रामचंद्र के बनवास काल में उनके भ्राता लक्ष्मण अपने बड़े भाई और भाभी की सेवा में थे। वे अपनी पत्नी उर्मिला से दूर थे। बाल्मीकि ने अपने रामायण में लक्ष्मण के आदभाव को इन शब्दों में व्यक्त किया है।
नाहं जानामि केयूरे, नाहं जानामि कुण्डले।
नूपुरे त्वभि जानामि नित्यं पदाभिवन्दनात।
न तो मैं सीता माता के बाजुओं के आभूषणों को जानता हूं न ही कानों के आभूषणों को पहचानता हूं। मैं तो उनके पैरों के आभूषणों को पहचानता हूं, क्योंकि मैं सदा उनके चरणों को प्रणाम करता हूं। यह इस देश का शील था। स्त्री उपभोग्या नही थी वह लक्ष्मी थी। पुरूषों के बराबर उसे भी अधिकार था, वह अर्द्घांगिनी थी। कोई धार्मिक कर्म उसके बिना पूरा नही हो सकता था। आर्य समाज के संस्थापक ऋषिवर दयानंद भी आजन्म ब्रह्मïचारी थे, कभी वासना को अपने पास आने नही दिया। वे एक निष्कलंक ऋषि थे। आदर्श जीवन के लिए तीन तत्वों का होना आवश्यक माना जाता था। ये तत्व थे-धन (श्रम और ईमानदारी से कमाया) स्वास्थ्य और चरित्र। ये तत्व जीवन के आधार स्तंभ माने गये थे। हर स्तंभ का अपना अपना एक अलग महत्व था। मान लीजिए किसी के पास धन नही है, उसका कुछ बिगड़ता नही था, किसी के पास स्वास्थ्य नही है, फिर भी मनुष्य अपनी जीवन नैया को खेता रहता था, किंतु जिसके पास चरित्र ही नही है-ऐसा मनुष्य जीकर भी मरने के समान था। इसी सत्य को समझाने के लिए अंग्रेजी में एक उक्ति प्रचलित है-If wealth is lost,nothing is lost,If health is lost,something is lost.If character is lost every thing is lost.
इन तत्वों के साथ एक और तत्व संयुक्त कर दूसरी कथा प्रचलित है-वह तत्व है-सत्य। विक्रमादित्य एक आदर्श राजा थे, प्रजावत्सल थे, न्यायी थे, न्यासी थे। उनमें इन चार तत्वों का सुंदर मिश्रण हुआ था। राजा विक्रमादित्य जिस राजसिंहासन पर विराजित हो राज्य चलाते थे, वह सिंहासन इन्हीं चार तत्वों पर टिका था। राजा विक्रमादित्य जब तक राज्य करते रहे, सिंहासन से ये तत्व भी जुड़े हुए थे। विक्रमादित्य के पश्चात दुराचार फैलता गया। राजसिंहासन के चार पैर (तत्व) एक एक कर हटते गये। धन गया, सिंहासन का कुछ बिगड़ा नही, सिंहासन का स्वास्थ्य चला गया, फिर भी सिंहासन टिका रहा। तीसरा तत्व सत्य चला गया, सिंहासन का बहुत कुछ अंश हिल गया। सिंहासन का चौथा तत्व चरित्र चला गया। सिंहासन ही लुढ़क गया, राज्य समाप्त हुआ। विक्रमादित्य की तरह ही राजा अश्वपति का भी राज्य था। कहा जाता है उनके राज्य में–
न मे स्तेयो जनपदे न कदर्यो न मद्यप:।
नाना हितार्ग्निाविद्वान न स्वैरी स्वैरिणी कुत:।
राज्य में कोई चोर नही, कृपण नही न मद्यपी। ऐसे अनेक उदाहरण प्रस्तुत किये जा सकते हैं।
महाभारत काल के आते आते समाज के आदर्श तत्व ढलते गये। महाभारत के युद्घ ने भारतीय संस्कृति को ही नष्टï कर डाला, वैदिक संस्कृति का प्रकाश ही लुप्त हुआ, अज्ञान अंधेरा फैल गया। यहां शक, कुषाण आए, अरब देशों के लुटेरे आए, चाहे जितना धन लूटा और लूट की संपत्ति अपने साथ लिए लौट गये। यहां मुगल आए, उनकी सल्तनत के पैर यहां जम गये। देश के गद्दारों ने उनका साथ दिया। सारी भारतीय अस्मिता ही दांव पर लगी रही। व्यापार के बहाने यहां अंग्रेज आए, उन्होंने भी अपने पैर जमाये और राजसिंहासन के अधिकारी बने। इन अंग्रेज शासकों ने भारत का बचा खुचा समाप्त कर दिया। भारतीय संस्कृति मरणासन्न हो सांस लेने लगी। भौतिकवादी संस्कृति ने इस देश की नैतिकता और सांस्कृतिक मर्यादा, सामाजिक आदर्श व्यवस्था लगभग ध्वस्त कर दी। सदियों की त्रस्त भारतीय जनता ने गुलामी को चुनौती देते हुए स्वतंत्रता संग्राम प्रारंभ किया। वंदे मातरम का उद्घोष आकाश में गूंज उठा। असंख्य देशभक्तों ने अपने प्राणों की आहूति दी। अखंडित भारत देश दो टुकड़ों में बंटकर 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्र हुआ। स्वतंत्रता का प्रारंभ हुआ-गांधी जी का गांधीवाद समाप्त हुआ, गांधीगीरी प्रारंभ हुई।
इस देश को स्वतंत्र हुए 65 वर्ष बीत गये। 65 वर्ष की यात्रा में इस देश को कहां पहुंच जाना था, पर वह कहां पहुंच गया है? क्या इस देश ने अपनी यात्रा की कोई दिशा निश्चित की है? उत्तर-नकारात्मक ही होगा। वर्तमान में अपना देश अनेक व्याधियों से ग्रस्त हैं। सार्वजनिक भ्रष्टाचार, महाकाय आर्थिक घोटाले, संकुचित प्रदेशवाद, जाति पांति में असमानताएं धर्मांधता, क्षुद्र राजनीति बढ़ती हुई गुनहगारी बढ़ती हुई स्वार्थ प्रवृत्ति भू्रण हत्या बलात्कार कहीं चोरी है तो कहीं डकैती, लूटमार कही है तो कही महंगाई की मार है। लग रहा है-इन व्याधियों का सामना करते हुए स्वयं डॉक्टर भी व्याधिग्रस्त हो रहा है। उपर्युक्त दर्शायी घटनाओं पर चिंतन होने की आवश्यकता है।
सार्वजनिक भ्रष्टाचार दिल्ली से गली तक फैल चुका है। भ्रष्टाचार से लिप्त है राजनीतिज्ञ, अधिकारी, कर्मचारी, उद्योगपति। भ्रष्टाचार से कमाया धन विदेशी बैंकों में है। यह कालाधन भारत में लाए तो इस देश की अनेक समस्याएं सुलझ सकती है। दिल्ली की दामिनी पर हुई बलात्कार जैसी घटनाएं नित्य घटित हो रही है। बलात्कारियों में नाबालिग है बालिग है, बुजुर्ग है। बिटिया, बहन, भाभी रिश्ते ही स्त्रियां इस घृणित घटनाएं अधम चरित्र को दर्शानेवाली हैं।
एक ओर आर्थिक उदारीकरण के फल चखते हैं तो दूसरी ओर जाति, धर्म के नाम पर एक दूसरे का गला काटा जा रहा है। मनुष्य सुसंस्कृत हुआ है-यह कहने में बड़ा संकोच लगता है। देश की भावना पर जग चढ़ा हुआ है। देश की सीमाएं सुरक्षित नही हैं। आए दिन घुसपैठ बढ़ने लगी है। सीमा पर आतंकवादी है-देश में भी आतंकवादी माओवादी है। किसे चिंता है देश की सुरक्षा की, चिंता-केवल वोट की अपनी राज्य सत्ता की।
सारा विश्व एक परिवार बनने की घोषणा करता है, पर हम उतने ही स्वार्थी और संकुचित बन रहे हैं। केवल सुख सुविधा भोगने के लिए हम वैश्विक है। इधर एक और वाद बढ़ने लगा है-वह है व्यक्तिवाद। मैं अपने लिए हूं जीता हूं-केवल अपने लिए-यह है आतंकी व्यक्तिवाद। समाज देश के हम सजग नागरिक है। इस हैसियत से नागरिक के कुछ कर्त्तव्य होते हैं-इसी का हमें विस्मरण होने लगा है। व्यक्तिगत स्वार्थ में लिप्त, देश के लिए अपना कुछ लेना देना है ही नही-यह प्रवृत्ति बढ़ने लगी है। हम प्रथम है-जो कुछ बचा है, तो देश के लिए देश अंतिम है-पहला है व्यक्ति। अनुशासन समय पालन, उत्कृष्टता के प्रति आस्था, श्रम और संगठित कर्म की खोज करनी पड़ती है। आज यह देश पश्चिम की भौतिकवादी संस्कृति की ओर आकृष्ट है। टीवी सिनेमा ने अपनी सांस्कृतिक मर्यादा और नैतिकता लगभग समाप्त ही कर दी है। बालक बालिकाओं की शिक्षा जीवनमूलक न होकर, पाश्चात्य सभ्यता में ढालने का माध्यम बनी हुई है। ऐसी भयानक परिस्थिति है। प्राचीन संस्कृति की गौरवमयी परंपरा को देखना जितना आवश्यक है, उससे कहीं अधिक आवश्यक है भविष्य की ओर देखना। क्या थे-यह भूलिए मत, कहां पहुंचे-इसे निहारते और अपने आपको, समाज और देश को सही मार्ग पर लाने का प्रयास कीजिए, अन्यथा फिर से दासता सम्मुख खड़ी है।

Comment:

betgaranti giriş
vdcasino giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
alobet
vegabet giriş
vegabet giriş
restbet giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
roketbet giriş
imajbet giriş
ikimisli giriş
roketbet giriş
ikimisli giriş
ikimisli giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
vdcasino giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
begaranti giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
roketbet giriş
vegabet giriş
vegabet giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
betnano giriş
betpark giriş
betpark giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
Safirbet giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betnano giriş
norabahis giriş
betnano giriş
norabahis giriş
roketbet giriş
betbox giriş
betbox giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
betnano giriş
rinabet giriş
rinabet giriş
rinabet giriş
ikimisli giriş
ikimisli giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
ikimisli giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
sekabet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
romabet giriş
romabet giriş
İmajbet güncel
Safirbet resmi adres
Safirbet giriş
betnano giriş
noktabet giriş
ikimisli giriş
ikimisli giriş
nitrobahis giriş
sekabet giriş
sekabet giriş