राम मंदिर के निर्माण में गुर्जर प्रतिहार वंश के राजाओं की विशेष भूमिका होने के सबूतों के चलते : राम मंदिर ट्रस्ट में गुर्जर प्रतिनिधि को शामिल करने की मांग ने पकड़ा जोर

अभी हाल ही में राम जन्म भूमि के संबंध में आए सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के अवलोकन से यह स्पष्ट होता है कि इसमें माननीय न्यायालय ने एएसआई की रिपोर्ट को उचित और तार्किक माना है ।ए एस आई के पूर्व रीजनल डायरेक्टर रहे के के मोहम्मद का कहना है कि राम मंदिर के निर्माण में 12 वीं शताब्दी में गुर्जर प्रतिहार वंश के शासकों का महत्वपूर्ण योगदान रहा । जिससे स्पष्ट होता है कि यह मंदिर उस समय गुर्जर प्रतिहार वंश के शासकों द्वारा ही बनवाया गया था । इस प्रकार के सबूतों के चलते अब राम मंदिर निर्माण संबंधी बनाए जाने वाले ट्रस्ट के लिए गुर्जर समाज की ओर से यह मांग जोर पकड़ती जा रही है कि इस ट्रस्ट में गुर्जर समाज समाज का भी एक प्रतिनिधि होना चाहिए।

इस विषय में अखिल भारतीय गुर्जर महासभा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं समाजसेवी श्री नेपालसिंह कसाना का कहना है कि गुर्जर बिरादरी ने दीर्घकाल तक देश की रक्षा के लिए अपने सर्वोत्कृष्ट बलिदान दिये हैं । जिनके दृष्टिगत इस बिरादरी के लोगों को सम्मानित करते हुए प्रधानमंत्री श्री मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ को राम मंदिर निर्माण न्यास में एक प्रतिनिधि गुर्जर समाज से लेना चाहिए।

इस संबंध में अखिल भारतीय वीर गुर्जर महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अनुराग गुर्जर का कहना है कि गुर्जर प्रतिहार वंश या प्रतिहार वंश मध्यकाल के दौरान मध्य-उत्तर भारत के एक बड़े हिस्से में राज्य करने वाला राजवंश था, जिसकी स्थापना नागभट्ट नामक एक सामन्त ने 725 ई॰ में की थी। इस राजवंश के लोग स्वयं को राम के अनुज लक्ष्मण के वंशज मानते थे, जिसने अपने भाई राम की एक विशेष अवसर पर प्रतिहार की भाँति सेवा की। इस राजवंश की उत्पत्ति, प्राचीन कालीन ग्वालियर प्रशस्तिअभिलेख से ज्ञात होती है। उन्होंने कहा कि पर्याप्त सबूतों के चलते अब यह स्पष्ट हो गया है कि राम मंदिर का निर्माण गुर्जर प्रतिहार वंश के शासकों द्वारा ही किया गया था , ऐसे में राम मंदिर ट्रस्ट में गुर्जर समाज का एक प्रतिनिधि रखा जाना समय की आवश्यकता है ।

गुर्जर सेवादल के राष्ट्रीय अध्यक्ष सूर्यवंशी इंद्रजीत गुर्जर का कहना है कि अपने स्वर्णकाल में प्रतिहार साम्राज्य पश्चिम में सतलुज नदी से उत्तर में हिमालय की तराई और पूर्व में बंगाल-असम से दक्षिण में सौराष्ट्र और नर्मदा नदी तक फैला हुआ था। सम्राट मिहिर भोज, इस राजवंश का सबसे प्रतापी और महान राजा थे। अरब लेखकों ने मिहिरभोज के काल को सम्पन्न काल बताते हैं। इतिहासकारों का मानना है कि प्रतिहार राजवंश ने भारत को अरब हमलों से लगभग 300 वर्षों तक बचाये रखा था, इसलिए प्रतिहार (रक्षक) नाम पड़ा। अपने संगठन की ओर से उनका कहना है कि गुर्जर इतिहास अपने आप में एक शानदार दस्तावेज है । जिसने इस देश की संस्कृति के लिए अपने सर्वोत्कृष्ट बलिदान दीर्घकाल तक किए हैं । राम मंदिर में भी इस समाज ने अपने अनेकों बलिदान दिए हैं । इसलिए गुर्जर समाज को सम्मानित करने के दृष्टिकोण से प्रधानमंत्री श्री मोदी को गुर्जर समाज का एक प्रतिनिधि उक्त ट्रस्ट में रखना ही चाहिए।

धन सिंह कोतवाल शोध संस्थान के चेयरमैन डॉक्टर तस्वीरसिंह चपराना का इस संबंध में कहना है कि प्रतिहारों ने उत्तर भारत में जो साम्राज्य बनाया, वह विस्तार में हर्षवर्धनके साम्राज्य से भी बड़ा और अधिक संगठित था। देश के राजनैतिक एकीकरण करके, शांति, समृद्धि और संस्कृति, साहित्य और कला आदि में वृद्धि तथा प्रगति का वातावरण तैयार करने का श्रेय प्रतिहारों को ही जाता हैं। प्रतिहारकालीन मंदिरो की विशेषता और मूर्तियों की कारीगरी से उस समय की प्रतिहार शैली की सम्पन्नता का बोध होता है। उनका कहना है कि प्रतिहार वंश के शासकों ने न केवल देश की सीमाओं की रक्षा की बल्कि देश की समृद्ध संस्कृति की भी रक्षा की और तत्कालीन समय में देश के सभी वर्गों को साथ लेकर चलने की अनुकरणीय पहल की । इसी के चलते प्रतिहार वंश के शासकों ने राम मंदिर का निर्माण करवाया । अब जबकि देश इस मंदिर का फिर से निर्माण होते देख रहा है तो ऐसे में माननीय सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा दिए गए दिशा निर्देश के अनुपालन में इस समाज के प्रतिनिधि का इस न्यास में होना आवश्यक है । जिसके लिए केंद्र सरकार और प्रदेश सरकार को पहल कर गुर्जर समाज की भावनाओं का सम्मान करना चाहिए।

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