देश में अभूतपूर्व बिजली संकट

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गाजियाबाद। सारा देश इस समय बिजली संकट से गुजर रहा है। उत्तर भारत में लू का प्रकोप ज्यों ज्यों बढ़ा त्यों त्यों बिजली की किल्लत लोगों को झेलनी पड़ी। दक्षिण भारत की स्थिति भी बिजली के विषय में ऐसी ही रही है। उत्तर भारत में गुजरे हुए माह में 3000 मेगावाट बिजली की कमी रही। दक्षिण भारत के कर्नाटक और तमिलनाडु राज्यों में भी 4300 मेगावाट बिजली की कमी रही है।
अब ऐसी परिस्थितियों के बीच ही खबर आ रही है कि देश के 29 बिजली प्लॉटों में भी कोयला लगभग समाप्ति के कगार पर है। केन्द्रीय बिजली प्राधिकरण की रिपोर्ट के अनुसार देश के बिजली संयंत्रों में 178 हजार मेगावाट की क्षमता है, जिसमें से 37 हजार मेगावाट की कटौती हो चुकी है। यदि इस स्थिति में सुधार नहीं हुआ तो बिजली उत्पादन पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ सकता है। देश में 9 हजार मेगावाट की गैस आधारित कई परियोजनाएं ईंधन की कमी के कारण चालू नहीं हो पा रही हैं। ऐसी परिस्थितियों के लिए जनता को सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए। सरकारी उपाय यद्यपि प्रधानमंत्री कार्यालय के हस्तक्षेप के माध्यम से कुछ होते दीख रहे हैं। लेकिन यहां संकट का सामना संकट के आ उपस्थित होने पर ही किये जाने की पुरानी परंपरा रही है। यहां बरसाती नालों की सफाई भी बरसाती पानी के रूक जाने पर हुआ करती है। इसलिए जो अब कुछ किया जाएगा वह इसी तर्ज पर किया जाएगा।
अधिक बिजली उत्पादन के लिए कोयला आयात करना होगा। बांध बनाने होंगे, अन्य संसाधन जुटाने होंगे। इसके लिए पूरे देश में विनोबा भावे जैसे भूदान आंदोलन को चलाने की आवश्यकता है। कोई विनोबा मैदान में आये और देश के ऐसे लोगों से आगामी 10 वर्ष का बिजली का बिल जमा करायें जो उसे एकमुश्त जमा करा सकते हैं। सरकार को ऐसे लोगों को अपनी ओर से यकीन दिलाना चाहिए कि वह उनसे एकमुश्त पैसा लेकर दस साल तक कुछ नहीं कहेगी। जनरेटर में डीजल फूंक फूंककर जो लोग अपना बिजली का काम चला रहे हैं और डीजल पर मोटी रकम खर्च कर रहे हैं, उनकी संख्या देश में करोड़ों में है। यदि ये लोग ही दस साल का बिजली बिल एक साथ जमा करा दें तो स्थिति में आमूल चूल परिवर्तन आ सकता है और हम बिजली की किल्लत से निजात पा सकते हैं।

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