हिंदू राष्ट्र के स्वप्न द्रष्टा : बंदा वीर बैरागी —- 2

पंजाब की गुरु परंपरा और बंदा वीर बैरागी

जिस समय पंजाब में हमारे गुरुओं का आविर्भाव हुआ उस समय ईसाइयत और इस्लाम दोनों अपने-अपने अनुयायियों के बढ़ाने पर अधिक बल दे रहे थे । चारों ओर वह अपने मत के प्रचार – प्रसार में लगे हुए थे । इस्लाम ने अपने आप को बादशाही मजहब के रूप में स्थापित करने में भी सफलता प्राप्त की थी । राजकीय संरक्षण मिलने से इस्लाम बहुत शीघ्रता से बढ़ता जा रहा था। जिस कारण उसका आतंक सर्वत्र व्याप्त था । बादशाहों ने या उनके पूर्व के सुल्तानों ने अनेकों नरसंहारों के माध्यम से लोगों के भीतर अत्यधिक भय बैठा दिया था ।

हमारे गुरुओं ने इस बात पर विशेष ध्यान दिया कि कोई भी मत , पंथ या संप्रदाय एक सुनियोजित योजना के अंतर्गत ही प्रचार प्रसार पा सकता है ,और जितने अधिक अनुयायी उस मत , पंथ या संप्रदाय के होंगे , उतना ही वह अपनी विचारधारा को जीवित रखने में सक्षम और सफल हो पायेगा । उन्होंने पंजाब की पवित्र भूमि में धर्म प्रचार का कार्य इस्लाम के विस्तार को रोकने के लिए प्रारंभ किया । यह एक चमत्कार ही था कि जिस कार्य को ईसाइयत और इस्लाम कर रहे थे , उसी धर्म प्रचार के माध्यम से अपने अनुयायियों की संख्या बढ़ाने का कार्य पंजाब की गुरु परंपरा ने किया और लोगों को अपने सामाजिक मतभेद छुआछूत आदि भुलाकर या मिटाकर एक अकालपुरख या एक देवता की शरण में आने की बात कही । यह एक सर्वमान्य सत्य है कि अनेकेश्वरवाद अनेकता को जन्म देता है और एकेश्वरवाद सामाजिक एकता को बलवती करता है । गुरुओं ने इस विचार के रहस्य को समझ कर इसी पर कार्य करना आरंभ किया । वास्तव में यह पंजाब के सिख गुरुओं की भारतवर्ष के प्रति की गई बहुत बड़ी सेवा थी । यही गुरु परंपरा का रहस्य था । उनका यह महान कार्य ईसाइयत और इस्लाम के लिए एक करारा उत्तर भी था कि भारत के लोग भी एकेश्वरवादी ही हैं।

जब पंजाब की धरती की बात की जाती है तो यहां की गुरु परंपरा के समक्ष प्रत्येक राष्ट्रभक्त का स्वयं ही सिर झुक जाता है । गुरु नानक जी ने जिस समय सिख परंपरा का शुभारंभ किया था , उस समय से लेकर गुरु गोविंद सिंह जी के दो सुपुत्रों के बलिदान तक एक से एक बढ़कर ऐसे गौरवपूर्ण कार्य पंजाब की गुरु परंपरा के माध्यम से हुए जिन्हें लिखते समय लेखनी भी गौरवान्वित हो उठती है।

गौरवान्वित हो रहा पंजाब निज अतीत पर ,

गुरु शिष्य की परंपरा ने शत्रु भगाया जीतकर ।

शास्त्र और शस्त्र की सर्वत्र हो रही थी आरती

हमारा शौर्य सवार था शत्रु भयभीत पर ।।

गुरु नानक देव

पंजाब की सिख परंपरा का शुभारंभ करने वाले गुरु नानक देव जी थे । जिन्हें सिक्ख लोग आज भी सम्मान के साथ नानक , नानक देव या नानकशाह के नाम से पुकारते हैं । गुरु नानक जी का जन्म कार्तिक पूर्णिमा के दिन 1469 ईस्वी में ननकाना साहब में हुआ । उस समय इस स्थान को तलवंडी के नाम से जाना जाता था । गुरु नानक जी का यह जन्म स्थान आजकल पाकिस्तान में है ।

गुरु नानक जी 20 अगस्त 1507 को सिखों के पहले गुरु बने थे और अपने मृत्यु काल तक अर्थात 22 सितंबर 1539 ई0 तक वह इस पद पर विराजमान रहे। गुरु नानक जी के पिता कल्याणचंद उपनाम मेहता कालू थे । जबकि माता का नाम तृप्ता देवी था । लद्दाख और तिब्बत में गुरु नानक जी को लोग नानकलामा के नाम से पुकारते हैं । 1485 ई0 में गुरु नानक देव जी ने दौलतखान लोदी के यहां एक अधिकारी के रूप में नियुक्ति ली थी ।

गुरु नानक जी ने अपने समय में मुसलमानों के अत्याचारों के विरुद्ध सिखों को तैयार किया । जिस समय उनका जन्म हुआ , उस समय सल्तनत काल था। परंतु 1526 ई0 में बाबर के दिल्ली पर अधिकार कर लेने के उपरांत यहां मुगल वंश की स्थापना हो गई थी । उस काल में मुस्लिमों या विदेशी आक्रमणकारियों के अत्याचार निरंतर भारत के हिंदू लोगों पर हो रहे थे , जिनके विरुद्ध आवाज उठाने का कार्य गुरु नानक देव जी ने किया । उनका दिया हुआ संस्कार कालांतर में जब वटवृक्ष के रूप में फैला तो उसने बड़े – बड़े महान कार्य कर दिखाएं । वास्तव में गुरुजी जैसे महापुरुषों ने न केवल उस समय भारतवर्ष की रक्षा की अपितु उन्हीं के पुण्य प्रताप के कारण अनेकों योद्धा भारत की स्वतंत्रता के लिए कालांतर में कूद पड़े थे । उनकी प्रेरणा का संस्कार हमारे चरितनायक बंदा वीर बैरागी तक गुरु गोविंद सिंह जी के माध्यम से पहुंचा था , जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार किया था।

आजकल पर पाकिस्तान के करतारपुर नामक स्थान पर 22 सितंबर 1539 को गुरु जी का देहांत हो गया था । उनकी वाणी ‘ गुरु ग्रंथ साहिब ‘ में वर्णित है । जिसे उनके अनुयायी आज भी बहुत ही श्रद्धा के साथ पढ़ते और सुनते हैं । उन्होंने अपने जीवन काल में अफगानिस्तान , फारस और अरब की यात्रा की थी और वहां पर वैदिक संस्कृति का डिंडिम घोष किया था । उन्होंने जातिभेद , मूर्ति पूजा और पाखंड के विरुद्ध भी कार्य किया , जिसे वह वेद विरुद्ध मानते थे। गुरु नानक देव जी ने निर्भीकता के साथ कार्य किया और तत्कालीन क्रूर बादशाही के विरुद्ध भी लोगों को तैयार करने का महान पुरुषार्थ किया। उनके इन दिव्य संस्कारों ने भावी शौर्य संपन्न पंजाब की नींव रखी ।

गुरु अंगद और अमरदास

गुरु नानक देव जी की मृत्यु के उपरांत उन्होंने अपने प्रिय शिष्य भाई लहणा जी को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया । भाई जी ने गुरु अंगद देव के नाम से गुरु पद स्वीकार किया । गुरु अंगद देव जी का जन्म 31 मार्च 1504 ईस्वी को हरीक़े नामक गाँव श्री मुक्तसर साहिब फिरोजपुर पंजाब में हुआ । जबकि उनकी मृत्यु 29 मार्च 1552 ईस्वी को हुई थी । भाई लहणा जी सनातन मत के मानने वाले थे । सनातन मत से अभिप्राय है कि पौराणिक मूर्ति पूजा में उनका विश्वास था ।

गुरु नानक देव जी के संपर्क में जब वह आए तो गुरु जी की प्रेरणा से उन्होंने अकालपुरख अर्थात उस परमपिता परमेश्वर की उपासना करनी आरंभ की जिसका निज नाम ओ३म है । उसे अकाल इसलिए कहा जाता है कि वह काल से परे है ,और पुरख उसे इसलिए कहा जाता है कि वह वेद की भाषा में पुरुष भी है । इस प्रकार अकाल और पुरख दोनों शब्द ही वैदिक संस्कृति के संवाहक शब्द हैं। उन्होंने गुरुद्वारों में अटूट लंगर चलाया जिसकी परंपरा आज भी यथावत चल रही है । इसके साथ-साथ उन्होंने गुरुमुखी लिपि को भी प्रचलित करने का महान कार्य किया । सिक्खी का प्रचार करने के लिए उन्होंने दूर-दूर तक अपने शिष्यों को भेजा । इससे सिक्खी के संबंध में पंजाब की भूमि पर एक क्रांति का श्रीगणेश हुआ।

गुरु अंगद देव जी के पश्चात गुरु अमरदास जी को सिखों का तीसरा गुरु बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ । कहा जाता है कि गुरु अंगद जी के स्नान के लिए अमरदास जी प्रतिदिन प्रातः काल में उठकर कुँए से पानी का घड़ा लाया करते थे । एक दिन घड़ा उठाए हुए वह एक जुलाहे की खड्डी में गिर पड़े । जिससे जुलाहा शोर करने लगा । जुलाहे की पत्नी बोली – कुछ नहीं है , वही अमरू होगा । कहते हैं कि जब इस बात की जानकारी गुरुजी को हुई तो उन्होंने अपनी गद्दी अमरदास को सौंप दी ।

गुरु अमर दास जी का जन्म बसरका नामक गांव में 5 अप्रैल 1479 ईस्वी को हुआ । उनके पिता तेजभान भल्ला जी और माता बख्त कौर जी थीं । इन्होंने अपने काल में छुआछूत को मिटाने पर विशेष बल दिया। साथ ही पंजाब को 22 प्रांतों में विभाजित करने की महत्वपूर्ण योजना पर भी कार्य किया ।

गुरु रामदास

सिक्खों के चौथे गुरु के रूप में गुरु रामदास जी का नाम आता है । इनका जन्म 24 सितंबर 1534 ईस्वी को बाजार चूना मंडी लाहौर में हुआ था । उनका जन्मस्थान भी आजकल पाकिस्तान में है । इनके बचपन का नाम जेठा जी था । जब यह शिशु ही तब इनकी माता का देहांत हो गया था । इनके पिता का नाम हरिदास मल जी सोढ़ी और माता का नाम दयाकौर था । जब बालक जेठा जी 7 वर्ष के हुए तो पिता हरिदास मलजी सोढ़ी भी संसार से चले गए ।ऐसी परिस्थितियों में उनका लालन-पालन इनके ननिहाल में नानी के द्वारा किया गया ।

गुरु पद पर गुरु रामदास जी 1 सितंबर 1581 को विराजमान हुए । वह तीसरे गुरु अमरदास जी के दामाद थे । 1577 ई0 में उन्होंने ‘अमृत – सरोवर ‘ नामक नगर की स्थापना की । कालांतर में यही नगर अमृतसर के नाम से विख्यात हुआ । इन्होंने अपने काल में गुरु के लिए चंदा या दान देने की परंपरा आरंभ की । इसके माध्यम से इन्होंने सामाजिक कार्यों को करने और सिखों के भीतर देशभक्ति का संचार करते हुए उन्हें समझो आने वाले समय के लिए विदेशी सत्ताधीशों से लड़ने के लिए तैयार करने की नींव रखी । रामदास जी के बारे में यह भी कहा जाता है कि उनके कहने पर अकबर बादशाह ने पंजाब का एक वर्ष की मालगुजारी माफ कर दी थी । उससे भी इनके पास पर्याप्त धन एकत्र हो गया । इनके काल की एक महत्वपूर्ण घटना यह भी है कि उन्होंने गुरु के पद को परंपरागत कर दिया था । यही कारण रहा कि इन्होंने गुरु गद्दी अपने पश्चात अपने पुत्र अर्जुन देव के लिए दे दी थी ।

गुरु अर्जुन देव

गुरु अर्जुन देव सिक्खों के पांचवे गुरु थे उनका जन्म 15 अप्रैल 1567 को गोइंदवाल साहिब में हुआ । इनके जीवन की कई ऐसी प्रमुख घटनाएं हैं जिनके कारण उन्हें इतिहास में विशेष स्थान मिला । गुरु परंपरा में वे सिखों के पहले गुरु थे , जिन्हें अपनी संस्कृति और धर्म की रक्षा के लिए अपना प्राणोत्सर्ग करना पड़ा था । गुरु जी के साथ हुई इस घटना को लेकर सिक्खों में बहुत आक्रोश व्याप्त हो गया था । उन्हें लगा था कि मुगल शासक उनके धर्म में अनुचित हस्तक्षेप कर उन्हें प्रताड़ित कर रहे हैं । इससे गुरुओं की धरती पंजाब पर मुगलों के विरुद्ध विद्रोह की चिंगारी भड़कनी आरंभ हुई।

गुरु ग्रंथ साहिब में 30 रागों में गुरु जी की वाणी को सिखों के द्वारा संकलित किया गया है । गणना की दृष्टि से श्री गुरु ग्रंथ साहिब में सर्वाधिक वाणी पंचम गुरु अर्जन देव जी की ही है । उनके बारे में अकबर बादशाह को एक बार किसी ने जाकर कह दिया कि गुरु ग्रंथ साहिब में अर्जुन देव जी के द्वारा इस्लाम के विरुद्ध लिखा गया है । इस पर मुगल बादशाह अकबर ने जांच कराई तो पता चला कि इस्लाम के विरुद्ध ऐसी कोई आपत्तिजनक सामग्री गुरु ग्रंथ साहिब में गुरुजी के माध्यम से नहीं डाली गई थी । इस पर अकबर बादशाह ने गुरुजी को 51 मोहरे देकर खेद व्यक्त किया था ।

अकबर के पश्चात जहांगीर के समय में फिर गुरुजी के विरुद्ध पुनः उन्हीं आरोपों की पुनरावृति की गई । जहांगीर ने बिना सोचे – समझे और बिना अपने विवेक का प्रयोग किए ही चंदू दीवान को यह आदेश दे दिया कि वह गुरुजी का मार डाले । इस पर चंदू दीवान ने गुरु जी को पहले तो खौलते देग पर बैठाया। फिर तपती हुई तवी पर बैठाकर उन्हें समाप्त करने का प्रयास किया । तत्पश्चात गरम रेत उनके ऊपर डाली गई । परंतु गुरुजी बहुत सहज भाव से गुरुवाणी पाठ करते रहे और शांतमना रहकर मुगलों के सारे अत्याचारों को सहन करते रहे । उन्हें पता था कि मुगल उनके विरुद्ध कुछ कर रहे हैं उसकी प्रतिक्रियास्वरूप उन्हें भारी हानि उठानी पड़ेगी और बाद में ऐसा हुआ भी । इसी घटनाक्रम में 16 जून 16 0 6 ई0 को गुरु अर्जुन देव जी का बलिदान देश , जाति और धर्म के लिए हो गया । उन्होंने गुरु परंपरा में पहले सिख गुरु के रूप में अपना बलिदान देकर ऐतिहासिक कार्य किया । इसके पश्चात सिखों ने तत्कालीन मुगल बादशाह के विरुद्ध मोर्चा खोल लिया । गुरु अर्जुन देव जी की शहादत के पश्चात जो परिस्थितियां बननी आरंभ हुईं उन्होंने बंदा वीर बैरागी के आगमन की पृष्ठभूमि तैयार की । गुरु जी के बलिदान ने न केवल पंजाब की भूमि को क्षोभ से भर दिया , अपितु संपूर्ण भारतवर्ष में हिंदूवादी शक्तियां तत्कालीन मुगल सत्ता के विरुद्ध हथियार भांजने लगीं।

गुरु हरगोबिंद जी

गुरु हरगोविंद जी सिखों के छठे गुरु के रूप में इतिहास में जाने जाते हैं । वह गुरु अर्जुन देव जी के सुपुत्र थे। इन्हें सिख इतिहास में ‘दल भंजन योद्धा ‘ कह कर सम्मानित स्थान दिया गया है । वास्तव में गुरु अर्जुन देव के साथ मुगल बादशाह जहांगीर के द्वारा जो कुछ भी किया गया था , उसने अब न केवल पंजाब की धरती का खून खौला दिया था ,अपितु पूरे भारतवर्ष में ही एक ऐसे नए क्रांतिकारी परिवेश को जन्म दे दिया था ,जिसमें सर्वत्र मुगल बादशाही को लोग कोस रहे थे । ऐसी परिस्थितियों में गुरु अर्जुन देव के पश्चात जब गुरु हरगोविंद जी गुरु के पद पर विराजमान हुए तो यह स्वभाविक था कि वह अब सिक्खी को कुछ नई पहचान देने के लिए प्रयास करते।

गुरु हरगोबिंद जी का जन्म 19 जून 1595 को गुरु की वडाली अमृतसर पंजाब में हुआ था । उन्होंने अपने गुरु पद के काल में अकाल तख्त का निर्माण करवाया। साथ ही सिखों को युद्ध में सम्मिलित होने के लिए प्रेरित करने हेतु विशेष प्रयास किए । किसी भी युद्ध में सम्मिलित होने वाले सिखों के वे पहले गुरु थे । उन्होंने सिखों को सैन्य प्रशिक्षण के लिए प्रेरित करना आरंभ किया । वह समझ गए थे कि मुगल सत्ता से अब सीधा टकराव कभी भी हो सकता है । इसलिए पूरे सिख समुदाय को उन्होंने सैनिक के रूप में प्रशिक्षित करने की भावना पर बल दिया। वे पहले गुरु थे जिन्होंने भारत वर्ष की प्राचीन राजनीतिक प्रणाली को अपनाते हुए क्षत्रबल और ब्रह्मबल का समन्वय स्थापित करते हुए ‘ मीरी – पीरी ‘ की स्थापना की ।

‘ मीरी पीरी ‘ का अभिप्राय ब्रह्मबल और क्षत्रबल से अर्थात दोनों के समन्वय से है । उन्होंने स्पष्ट किया कि अब यह दोनों साथ – साथ चलेंगे । बाबा बुड्ढा जी ने इन दोनों बलों की प्रतीक के रूप में उन्हें दो तलवारें प्रदान कीं । जिससे सिक्ख दर्शन की चेतना को नए दर्शन से जोड़ने में गुरु हरगोबिंद जी को सफलता मिली।

पंजाब की गुरु परंपरा के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ कि अकाल तख्त से अब तक के गुरुओं और हिंदू धर्म की रक्षार्थ काम करने वाले अनेकों वीर योद्धाओं का गुणगान होने लगा । जिससे लोगों को अपने इतिहास को समझने में सहायता मिली और देश ,धर्म व संस्कृति की रक्षा के लिए मुगलों के विरुद्ध उठ खड़े होने की प्रेरणा मिली। गुरु जी के इन वीरता पूर्ण कृत्यों की जानकारी जहांगीर को भी मिल रही थी । इसलिए उसने अवसर देखते हुए गुरुजी को ग्वालियर के किले में बंद करा दिया । गुरुजी के इन वीरतापूर्ण कृत्यों की जानकारी जहांगीर को निरंतर मिल रही थी । इसलिए उसने अवसर देखते हुए गुरुजी को ग्वालियर के किले में बंद कर दिया । इसके किले में गुरु जी को 3 वर्ष तक निरंतर बंद किए रखा गया । गुरुजी के साथ किए गए इस अपघात का भी मुगल सत्ता के लिए विपरीत प्रभाव ही सामने आया । लोगों को लगा कि जैसा मुगल बादशाह ने गुरु अर्जुन देव के साथ किया था , वैसा ही वह गुरु हरगोबिंद जी के साथ कर सकता है। बाबा बुड्डा व भाई गुरदास ने गुरु जी को इस प्रकार बंदी बनाए रखने का विरोध करना आरंभ किया । जिससे अंत में जहांगीर को गुरु हरगोबिंद जी को जेल से मुक्त करना पड़ा।

गुरु हरगोबिंद जी पहले सिख गुरु थे जिन्होंने रोहिल्ला की लड़ाई , करतारपुर की लड़ाई ,अमृतसर की लड़ाई , हरगोविंदपुर की लड़ाई , गुरुसर की लड़ाई , कीरतपुर की लड़ाई में उन्होंने सीधे-सीधे भाग लिया । कीरतपुर की स्थापना गुरु हरगोबिंद जी के द्वारा ही की गई थी।

गुरु जी का देहांत 19 मार्च 1644 ईस्वी को कीरतपुर साहिब में ही हुआ था ।

गुरु हरिराय

गुरु हर राय सिखों के सातवें गुरु थे । आध्यात्मिक और राष्ट्रवादी महापुरुष के साथ-साथ वह एक योद्धा भी थे। अब देश की परिस्थितियां भी ऐसी ही बन गई थीं , जब हमारे किसी भी गुरु का आध्यात्मिक राष्ट्रवादी होने के साथ-साथ योद्धा होना भी आवश्यक था । 1630 ईस्वी में कीरतपुर में उनका जन्म रोपड़ में हुआ था ।

गुरु हरगोविंद साहब ने अपनी मृत्यु से पूर्व उन्हें अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था । वे गुरु हरगोविंद साहब के पौत्र थे । जब उनको गुरुजी ने अपना उत्तराधिकारी घोषित किया तो उस समय उनकी मात्र 14 वर्ष की अवस्था थी । यह घटना 3 मार्च 1644 की है । हर राय साहब का विवाह माता किशनकौर जी के साथ हुआ , जो कि उत्तर प्रदेश के अनूपशहर के श्री दयाराम जी की सुपुत्री थीं।

मुगल शासकों की दृष्टि उस समय सिक्खों और गुरुओं के प्रति दिन प्रतिदिन कठोर होती जा रही थी। उन्हें यह भली प्रकार आभास हो चुका था कि तुम्हारे लिए यदि भारतवर्ष में इस समय सबसे बड़ा खतरा कोई है तो वह गुरु और उनके सिक्ख ही हैं । औरंगजेब गुरु हरराय से प्रारंभ से ही घृणा करता था। उसने गुरु हरराय पर यह आरोप लगाया कि उन्होंने दाराशिकोह की उस समय सहायता की थी , जब वह उससे सत्ता संघर्ष कर रहा था । एक बार गुरु हरराय जी मालवा और दोआबा से अपने प्रवास के उपरांत लौट रहे थे तो मोहम्मद यार ने उनके काफिले पर हमला बोल दिया । सिक्खों ने मोहम्मद यार बेग की इस करतूत का बड़ी वीरता के साथ सामना किया और उसके अनेकों सैनिकों को दोजख की आग में फेंक दिया । शाहजहां की मृत्यु के पश्चात औरंगजेब ने गैर मुस्लिमों पर जिस प्रकार की कठोरता का प्रदर्शन करना आरंभ किया था , उसका सबसे अधिक शिकार गुरु और उनके सिक्ख लोग ही बन रहे थे। मुगल शासक जितना ही अधिक पंजाब की धरती पर पैदा हुए गुरु और सिक्खों के राष्ट्रवाद को कुचलने का प्रयास कर रहे थे , उनका राष्ट्रवाद उतना ही और अधिक उग्र होता जा रहा था।

स्वतंत्रता की भावना को दिल में लिए पंजाब की धरती अब मुगलों के विरुद्ध आग उगलने लगी थी । मुगलों की ओर से जो भी कार्य किया जा रहा था , वह इस आग को वैसे ही और अधिक तेज कर रहा था जैसे जलती हुई आग में घी डालने पर आग और भी अधिक तेज होती जाती है। गुरु हरराय अपने पूर्वजों की भांति ही वीर और योद्धा के रूप में स्थापित हुए और उन्होंने अपने पूर्वजों की परंपरा को झुकने नहीं दिया । यहां तक कि जब मुगल दरबार में पहुंचे रामराय ने गुरुवाणी कि वहां पर त्रुटिपूर्ण व्याख्या की तो उन्होंने उसे सिख पंथ से निष्कासित करने में भी देरी नहीं की । गुरुजी ने यह स्पष्ट संदेश देने का प्रयास किया कि यदि कोई भी सिख पंथ के विरुद्ध जाएगा या गुरु – ग्रंथ साहब की त्रुटिपूर्ण व्याख्या करेगा तो वह चाहे किसी भी घराने से क्यों न हो , उसे कठोर दंड का पात्र बनना ही पड़ेगा । वास्तव में उनका यह संदेश यह भी स्पष्ट करता था कि अब धर्म और राजनीति का समन्वय करके चलने का समय आ गया है , अर्थात इन दोनों को एक ही सिक्के के दो पहलू समझ कर काम करने की आवश्यकता है । संस्कृति और धर्म के बिना राजनीति करना व्यर्थ है। उन्होंने अपने सबसे छोटे सुपुत्र गुरु हरकिशन को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया । इसके पश्चात एक ज्योतिपुंज के समान जीवन जीने वाले तेजस्वी गुरु साहिब 6 अक्टूबर 1661 ई0 को ज्योतिजोत में समा गए।

गुरु हरकिशन

गुरु हरकृष्ण जी सिक्खों के 8 वें गुरु थे । गुरु हरकिशन जी सिखों के सारे गुरुओं में से एकमात्र ऐसे गुरु रहे जिन्हें बाल्यकाल में ही गुरुपद प्राप्त हुआ और बाल्यकाल में ही उनकी मृत्यु भी हो गई । 7 जुलाई 1656 को कीरतपुर में उनका जन्म हुआ था । वह गुरु हरराय जी के छोटे सुपुत्र थे । जिन्हें गुरुपद इसलिए प्राप्त हुआ कि उनके बड़े भाई रामराय ने मुगल दरबार में जाकर गुरुग्रंथ साहब की त्रुटि पूर्ण व्याख्या की थी । जिससे गुरु हरराय जी उससे अप्रसन्न हो गए थे। राम राय को तब उन्होंने सिख पंथ से निष्कासित कर दिया था । जब गुरु जी का देहांत हुआ तो उस समय उनके छोटे सुपुत्र हरिकृष्ण की अवस्था मात्र 5 वर्ष की थी । उन्हें 5 वर्ष की अवस्था में ही गुरु बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ । यह घटना 6 अक्टूबर 1661 की है ।

जब राम राय को यह ज्ञात हुआ कि उसके स्थान पर गुरु हर राय ने अपने छोटे सुपुत्र हरि कृष्ण को गुरु पद प्रदान कर दिया है तो उसने इस बात की शिकायत मुगल बादशाह औरंगजेब से की । तब गुरु हरकृष्ण जी को बादशाह के सामने उपस्थित होने के लिए दिल्ली से एक विशेष दूत राजा जयसिंह ने भेजा । राजा जयसिंह के संदेशवाहक ने गुरु हरकृष्ण जी से दिल्ली चलने का आग्रह किया । जिसे गुरु हरकृष्ण जी ने प्रारंभ में तो अस्वीकार कर दिया ,परंतु उस संदेशवाहक के बार – बार कहने पर और कुछ लोगों के द्वारा भी ऐसा परामर्श दिए जाने के पश्चात वह दिल्ली जाने पर सहमत हो गए । पंजाब में उनके अनुयायी सिक्ख लोगों ने उन्हें बड़े सम्मान के साथ दिल्ली के लिए पंजोखरा गांव तक आकर विदा किया , पंजोखरा से गुरुजी ने उन्हें लौट जाने का आदेश दिया ।

दिल्ली में आकर वह जिस स्थान पर रुके उस स्थान को आजकल गुरुद्वारा बंगला साहिब के नाम से जाना जाता है । जब वह दिल्ली में अपना प्रवास कर रहे थे तो यहां के लोगों के मध्य वह बहुत अधिक लोकप्रिय हो गए थे । हिंदू और मुसलमान सभी उनके पास आते और उनका सम्मान करते थे । उस समय दिल्ली में हैजा और छोटी माता जैसी बीमारियों का प्रकोप फैला हुआ था । जिससे लोग बहुत दुखी थे । लोगों की पीड़ा गुरुजी से नहीं देखी गई ।जिससे उन्होंने उस अवस्था में पड़े लोगों की भरपूर सेवा करने का संकल्प लिया। उनकी ऐसी मानवीय सोच को देखकर मुस्लिम तो उन्हें बालापीर कहकर पुकारने लगे थे । लोगों के बीच इतने अधिक लोकप्रिय हो जाने से औरंगजेब भी गुरु हरकृष्ण जी से कुछ नहीं कह पाया था । उसने उन्हें यूं ही छोड़ दिया , परंतु गुरुजी बीमार लोगों के बीच रहने से स्वयं भी छोटी माता और तेज ज्वर से पीड़ित हो गए । कई दिनों तक वह बिस्तर में पड़े रहे । कई लोगों ने जब यह आभास कर लिया कि अब उनकी जीवन लीला समाप्त हो सकती है तो उनसे किसी ने बड़ा साहस करके यह पूछा कि आप अपना उत्तराधिकारी बताइए ? तब उन्होंने बाबा बकाला का नाम लिया । बाबा बकाला उस समय गुरु तेग बहादुर जी को कहा जाता था ,जो उन दिनों पंजाब में ब्यास नदी के किनारे स्थित बकाला गांव में रह रहे थे।

30 मार्च 1664 को बालापीर गुरु हरकृष्ण जी इस असार संसार से चले गए । उन्होंने अल्पायु में ही गीता का गहरा अध्ययन कर लिया था और गीता के ज्ञान को हृदयंगम कर लोगों को कई बातों में आश्चर्यचकित कर दिया करते थे । गीता के प्रति उनका अनुराग यह बताता है कि उनके समय तक सभी गुरु और उनके शिष्य वैदिक संस्कृति के प्रति निष्ठा रखते थे । अतः उनके लिए हिंदू और सिख सब एक जैसे थे । जब बात धर्म की रक्षा की आती थी तो उसका अभिप्राय यही होता था कि वह वैदिक धर्म की रक्षा की बात कह रहे हैं ।

गुरु हरकिशन जी के देहांत के मात्र 6 वर्ष पश्चात ही बंदा वीर बैरागी का जन्म 1670 में हुआ । उनके बारे में हम आगे चलकर विस्तार से चर्चा करेंगे ।

डॉ राकेश कुमार आर्य

संपादक: उगता भारत

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