समुज्ज्वल भविष्य के लिए अतीत के गौरव को वर्तमान से जोड़ना आवश्यक : डॉक्टर सत्यव्रत शास्त्री

दिल्ली की पॉश कालोनियों में कोई यह कल्पना भी नहीं कर सकता कि यहां किसी आलीशान बंगले के भीतर कोई तपा तपाया ऋषि रह रहा होगा । जी हां , एक ऐसा ऋषि जिसे संसार की सभी ऐषणाओं ने मुक्त कर संसार में भूसुर की उच्चतम श्रेणी तक पहुंचा दिया हो । यदि आपसे हमारा यह प्रश्न हो तो निश्चित रूप से आपका उत्तर यही होगा कि दिल्ली की पॉश कालोनियों के भीतर तो ऐसा कोई ऋषि – तपस्वी खोजा जाना सर्वथा असंभव है । पर जब पिछली 8 जुलाई को हम ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित संस्कृत के प्रकांड पंडित डॉ सत्यव्रत शास्त्री से मिले तो हमारा उपरोक्त कथन सत्य सिद्ध होता हुआ दिखाई दिया । यहां प्रस्तुत हैं डॉक्टर सत्यव्रत सिद्धांत शास्त्री जी से हुई हमारी मुलाकात के कुछ खास अंश :– श्रीनिवास आर्य ( वरिष्ठ सह – संपादक )सन 1930 ई. में जन्मे और वर्ष 2007 ई0 के ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित संस्कृत लेखक और विद्वान डॉ. सत्यव्रत शास्त्री पंजाब विश्वविद्यालय से संस्कृत में एम.ए. और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से भर्तृहरि कृत वाक्यपदीय में दिक्काल मीमांसा विषय पर पीएच.डी. हैं।शालीनता , सौम्यता और विद्वता की प्रतिमूर्ति डॉ. सत्यव्रत शास्त्री ने १९५५ में दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य आरम्भ किया। अपने चालीस वर्ष के कार्यकाल में उन्होंने विभागाध्यक्ष तथा कलासंकायाध्यक्ष का पदभार सम्भाला। श्री शास्त्री बताते हैं कि 1995 में वह सेवानिवृत्त हुए । उसके पश्चात 2013 में यूपीए कि तत्कालीन सरकार ने जब संस्कृत आयोग का गठन किया तो उसके अध्यक्ष बनाए गए । इस संस्कृत आयोग में 12 सदस्य और भी रखे गए थे । आयोग ने संस्कृत भाषा की उन्नति और विकास के लिए अपनी एक रिपोर्ट सरकार को दी थी । जिसके बारे में डॉक्टर शास्त्री बताते हैं कि हमने संस्कृत के प्रचार-प्रसार के लिए सरकार को अपने विचारों से अवगत कराया । हमने सरकार से कहा था कि जनता की संस्कृत के प्रति उदासीनता को समाप्त करने के लिए जनता तक संस्कृत की अधिक से अधिक जानकारी पहुंचाना सुनिश्चित किया जाए । साथ ही संस्कृत को बोधगम्य बनाने हेतु भी कुछ ठोस सुझाव हमारी ओर से दिए गए थे ।डॉ सत्यव्रत शास्त्री जगन्नाथ विश्वविद्यालय पुरी के भी कुलपति रहे। इन्हीं के प्रयासों से सिल्पाकोर्न विश्वविद्यालय, थाईलैंड में संस्कृत अध्ययन केंद्र की स्थापना हुई। डॉक्टर शास्त्री बताते हैं कि विदेशों में और विशेषकर थाई भाषा में संस्कृत की विपुल शब्दावली मिलती है । उन्होंने अनेक शब्दों का थाई भाषा में और संस्कृत में उच्चारण करके बताया तो सचमुच बड़ा आश्चर्य हुआ कि थाई भाषा का अधिकांश शब्द भंडार संस्कृत शब्दावली से ही पूर्ण हुआ है ।‘डिस्कवरी ऑफ़ संस्कृत ट्रेज़र्स ‘के सात खंडों में उन्होंने संस्कृत वाङ्मय के विविध पक्षों पर प्रकाश डालकर अपनी विद्वता और प्रतिभा का पूर्ण प्रदर्शन किया है । जिसे पढ़कर निश्चित रूप से यह कहा जा सकता है कि लेखक का प्रयास सचमुच स्तुत्य बन गया है। उन्होंने अपने संस्मरणों में थाई लोगों और थाईलैंड के राजपरिवार के विषय में भी विशेष जानकारी हमें दी । उन्होंने बताया कि जब वह थाईलैंड गए तो वहां की राजकुमारी को उन्होंने संस्कृत पढ़ाई।‘थाइदेशविलासम्‌’ के बाद ‘श्रीरामकीर्तिमहाकाव्यम्‌’ की रचना की। साहित्य अकादमी ने ‘गुरुगोविंदचरितम्‌’ पर पुरस्कृत किया।डॉक्टर सत्यव्रत शास्त्री कहते हैं कि अतीत से वर्तमान और वर्तमान से भविष्य निकलता है । इसलिए अपने गौरवमयी अतीत के प्रति हमें सदैव सजग , सावधान , और सक्रिय रहना चाहिए । उसी से हमारा वर्तमान बनता है और जब वर्तमान अतीत के गौरवमयी पृष्ठों को स्मरण करने में अपनी ऊर्जा लगाएगा तो भविष्य निश्चय ही उज्ज्वल होगा ।शास्त्रीजी की अपनी पहली संस्कृत कविता के बारे में बताते हैं कि उनकी पहली कविता उस समय प्रकाशित हुई थी , जब वह केवल 11 वर्ष के थे । जयपुर से निकलनेवाली संस्कृत पत्रिका ‘संस्कृतरत्नाकर’ के यशस्वी संपादक महामहोपाध्याय भट्ट मथुरानाथ शास्त्री ने यह कविता प्रकाशित करते हुए उसके शीर्षक ‘षडऋतुवर्णनम्‌’ के नीचे कवि की आयु पर भी टिप्पणी दी थी। डॉ. सत्यव्रत शास्त्री कहते हैं कि कविता उनके मन में स्वयं फूट पड़ती थी , जिसे वह केवल संकलित मात्र करते थे।[ ] डॉक्टर सत्यव्रत शास्त्री ने 40 ग्रंथों की रचना की है । वह कहते हैं कि मैंने कभी किसी विषय विशेष पर नहीं लिखा , अपितु विविध विषयों पर लिखता रहा हूँ । दर्शन , पुरातत्व आदि पर कुछ अधिक गंभीरता से लिखा है । मेरे जीवन का बड़ा भाग विदेशों में बीता है। थाईलैंड में मैं अधिक रहा हूं । 1977 ई0 में मैं वहां अभ्यागत प्राचार्य के रूप में गया ।वह कहते हैं कि थाईलैंड में एम.ए. करने के लिए लघु शोध प्रबंध लिखना अनिवार्य होता है। जब मैंने वहां की राजकुमारी को संस्कृत पढ़ाई तो उन्होंने भी एम.ए. संस्कृत से किया और लघु शोध प्रबंध मेरे निर्देशन में तैयार किया।डॉक्टर सत्यव्रत शास्त्री बताते हैं कि थाई भाषा में इंजीनियरिंग के लिए पढ़ाई जाने वाली पुस्तक को विश्वकर्मशास्त्र कहा जाता है , जो कि शुद्ध संस्कृत का शब्द है । इसका अभिप्राय वही होता है जो इंजीनियर जैसे शब्द का इंग्लिश में अर्थ होता है । वह बताते हैं कि वहां के एक बांध का नाम भूमिबल बांध रखा गया है । जिसे वहां के राम नवम राजा की स्मृति में नाम दिया गया है । वहां पर वर्तमान में रामदशम का शासन है । यह बहुत ही महत्वपूर्ण तथ्य है कि वहां के वर्तमान शासक अपने आप को राम कहते हैं । इससे वहां के राजवंश की भारत के प्रति आत्मिक लगाव की झलक स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है। साथ ही भारत के मर्यादा पुरुषोत्तम राम के प्रति उनकी निष्ठा का भी पता चलता है।1977 में वह थाईलैंड पहुंचे तो उनकी नियुक्ति चुल्लंकोर्ण विश्वविद्यालय में संस्कृत पढ़ाने के लिए हुई। कारण यह था कि वहाँ की राजकुमारी संस्कृत पढ़ने की इच्छुक थी। उन्हें आश्चर्य तब हुआ जब यह पता चला कि यहाँ थाई भाषा को समझने के लिए संस्कृत पढ़ी-पढ़ाई जाती है , क्योंकि इस भाषा में संस्कृत के बहुत से शब्द हैं। वहाँ एक विश्वविध्यालय है- शिल्पाकोर्न[शिल्पकार] विश्वविद्यालय जिसमें शिल्प शास्त्र का उच्च अध्ययन होता है; धम्मसात विश्वविद्यालय में धर्म शास्त्र और कसेरसात विश्वविद्यालय में कृषिशास्त्र का अध्ययन एवं अनुसंधान होता है। इन शब्दों से थाई और संस्कृत की निकटता का आभास होता ही है। इसलिए शास्त्रीजी का मानना है कि दक्षिणपूर्व एशिया की भाषाओं का हमें पठन-पाठन करना होगा क्योंकि ये अधिकांश भाषाएँ संस्कृत के बहुत निकट है।डॉ. सत्यव्रत शास्त्री को कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है जिनमें भारत सरकार द्वारा पद्मश्री, इटली सरकार का सम्मान, सहित्य अकादमी पुरस्कार, पंजाब और महाराष्ट्र सरकारों द्वारा पुरस्कार तथा विभिन्न संस्कृत अकादमियों के अनेक पुरस्कार शामिल हैं। उन्हें 2007 ई. में ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला है।सचमुच मां भारती को अपने ऐसे तप:पूत तेजस्वी व्यक्तित्वों पर बहुत गर्व है , और हो भी क्यों नहीं ? क्योंकि मां भारती की वास्तविक साधना में लगे इन तप:पूतों के कारण ही हमारी सांस्कृतिक विरासत की अतुल्य सेवा हो पा रही है।

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