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कविता

खुदा से बंदा पूछे, तेरी रजा क्या है**

ए खुदा एक बात तो तू आज जरूर बता। इंसान की क्या खता, नहीं तेरा सही पता।। सुना है तू हर दिलो-दिमाग में धड़कता है। सुना है तू हर फन में फनकार फड़कता है।। जब तेरा ही जलजला है यहां वहां हर कहीं। तेरी रहमत सब पर आकर समझा तो सही।। फिर क्यों सताता है […]

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कविता

अपनी कलम सम्हालो

हे सत्ता के गलियारों में, दुम हिलाने वालों। हे दरबारी सुविधाओं की, जूठन खाने वालों।। तेरे ही पूर्वज दुश्मन को, कलम बेचकर खाए। तेरे ही पूर्वज सदियों से, वतन बेचते आए।। कलम बिकी तब गोरी के साथी, जयचंद कहाए। कलम बिकी तब राणा साँगा, बाबर को बुलवाए।। बिकती कलमों ने पद्मिनियों को, कामातुर देखा। बिकती […]

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नए साल के पँख पर

नए साल के पँख पर बीत गया ये साल तो, देकर सुख-दुःख मीत ! क्या पता? क्या है बुना ? नई भोर ने गीत !! माफ़ करे सब गलतियां, होकर मन के मीत ! मिटे सभी की वेदना, जुड़े प्यार की रीत !! जो खोया वो सोचकर, होना नहीं उदास ! जब तक साँसे हैं […]

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अवधपति! आना होगा

112- प्राची का पट खोल, बाल सूरज मुस्काया। भ्रमर कली खग ओस बिंदु को अतिशय भाया।। जागी प्रकृति तुरन्त, हुए गायब सब तारे। पुनः हुए तैयार, विगत में जो थे हारे।। उठे बालगण खाट छोड़ माँ – माँ – माँ रटने। माँ दौड़ी सब काम छोड़ लख आँचल फटने।। काँधे पर ले स्वप्न, सूर्य सँग […]

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योग की संक्षिप्त में कविता के रूप में प्रस्तुति

सुप्रभातम। शुभ दिवस। योग की संक्षिप्त में कविता के रूप में प्रस्तुति । कविता। आप सदैव संपन्न ,प्रसन्न ,स्वस्थ रहें। ईश्वर से हम एक दूजे के लिए ऐसा कहें। हम सदैव ईश्वर की शरण में रहें कर्मफल मानकर सुख -दुख को सहैं। हताशा निराशा का ना हो बोझ। अवसाद का भी ना हो कहीं खोज। […]

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बाजारवाद के चंगुल में

ऑक्टोपस की कँटीली भुजाओं सरिस जकड़ रहा है सबको व्यापक बाजारवाद जन साधारण की औकात एक वस्तु जैसी है कुछ विशेष जन वस्तु समुच्चय ज्यों हैं हम स्वेच्छा से बिक भी नहीं सकते हम स्वेच्छा से खरीद भी नहीं सकते पूँजीपति रूपी नियंता चला रहा है पूरा बाजार जाने- अनजाने हम सौ-सौ बार बिक रहे […]

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हम भेड़ हैं

हाँ, हम भेड़ हैं हमारी संख्या भी बहुत अधिक है सोचना-विचारना भी हमारे वश में नहीं न अतीत का दुःख न भविष्य की चिंता बस वर्तमान में संतुष्ट क्रियाशील, लगनशील, अनुगामी अगुआ के अंध फॉलोवर अंध भक्त, अंध विश्वासी अनासक्त सन्यासी क्योंकि हम भेड़ हैं। हाँ, हम भेड़ हैं किंतु खोज रहे हैं उस भेड़िये […]

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गीता विजय उद्घोष

कृष्ण की गीता पुरानी हो गई है, या कि लोगों की समझ कमजोर है। शस्त्र एवं शास्त्र दोनों हैं जरूरी, धर्म सम्मत कर्म से शुभ भोर है।। था करोड़ों सैन्य बल, पर पार्थ में परिजनों के हेतु भय या मोह था। कृष्ण को आना पड़ा गीता सुनाने, सोचिए कि क्या सबल व्यामोह था! वह महाभारत […]

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कैसे हम सच्चाई को जान पाएँगे

जब गजनवी के दरबार से सोमनाथ का आकलन और खिलजी के दरबार से पद्मावती का आकलन, बख्तियार के दरबार से नालंदा का आकलन तथा गोरी के दरबार से पृथ्वीराज का आकलन पढ़ेंगे तो – कैसे हम सच्चाई को जान पाएँगे! जब बाबर के दरबार से राणा साँगा का मूल्यांकन और हुमायूँ के दरबार से सती […]

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कान खोलकर सुन लो ….

कान खोलकर सुन लो कान खोलकर सुन लो- हे अंध-संविधान समीक्षकों! हे तथाकथित कानून रक्षकों! हे समाज के ठेकेदारों! है मज़हबी जालसाज़ों! हे वासना को प्यार कहने वाले कामलोलुपों! हे पाप को प्यार कहने वाले पापियों! हे फिल्मी जोकरों! हे लिव इन रिलेशनशिप के पैरोकारों! हे सनातनी जीवन पद्धति के विरोधियों, गद्दारों! आज हम डंके […]

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