गुजरात वाया उत्तर प्रदेश

राहुल गांधी किसी भी तरह वंश का सहारा लेकर सत्ता के शिखर पर पहुंचने की जल्दी में है। वह किसलिए सत्ता प्राप्त करना चाहते हैं, इसका उनको पता नहीं है। उनका सारा दावा केवल एक तर्क पर आधारित है कि वह हिंदोस्तान के राजवंश के वारिस हैं। अब वह अपने इस दावे की तसदीक गुजरात के लोगों से करवाने की फिक्र में हैं और इसके लिए कई दिनों से वहां घूम फिर रहे हैं। वही मीडिया जो यूपी में योगी को असफल सिद्ध करने में लगा हुआ था, अब राहुल को गुजरात की नई आशा के रूप में स्थापित करने के लिए ओवर टाइम कर रहा है। 
उत्तर प्रदेश के स्थानीय निकायों के चुनावों के परिणाम सामने आ गए हैं। इन चुनावों को प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अग्निपरीक्षा कहा जा रहा था। मार्च, 2017 में योगी आदित्यनाथ ने प्रदेश की सत्ता संभाली थी। मीडिया पिछले कुछ महीनों से माहौल बना रहा था कि मार्च, 2017 के बाद राज्य में कानून व्यवस्था बिगड़ गई थी। कहा जा रहा था कि जीएसटी के कारण प्रदेश का आम आदमी मोदी से नाराज हो गया है। जीएसटी से सरमाएदारों को लाभ हुआ है और सामान्य आदमी इसकी पकड़ में आ गया है और वह अब यातना भोग रहा है। मीडिया का मानना है कि मोदी और योगी की जोड़ी से उत्तर प्रदेश में मुसलमानों का जीना लगभग मुश्किल हो गया है। बेरोजगारी तो मोदी और योगी के आने से ही बेतहाशा बढ़ी है, उससे पहले तो स्वर्णिम राज चल रहा था। नोटबंदी को लेकर तो समस्त विपक्ष ने आपस में मिलकर सामूहिक रूप से काला दिवस ही मना डाला। राहुल गांधी पता नहीं कितनी बार उत्तर प्रदेश के आम लोगों को समझाने की बारीक कोशिश करते रहे कि नोटबंदी से गरीबों को बहुत नुकसान हुआ और धन्ना सेठों को लाभ हुआ।
यह डा. मनमोहन सिंह का अर्थशास्त्र है। उनके ये सिद्धांत उत्तर प्रदेश के लोगों को भला क्या समझ आते, क्योंकि यूपीए में जैसे-जैसे वह सोनिया-राहुल मां-बेटे को अपना अर्थशास्त्र पढ़ाते थे, वैसे-वैसे करोड़ों के घोटाले जन्म लेते थे। लेकिन इसे क्या कहा जाए कि राहुल गांधी इसके बावजूद मनमोहन सिंह से सीखा हुआ यह अर्थशास्त्र उत्तर प्रदेश के लोगों को इन चुनावों में भी पढ़ाते-समझाते रहे। शायद प्रदेश के गरीब लोगों को दूर से अर्थशास्त्र पढ़ा रहे राहुल गांधी की बातें पल्ले नहीं पड़ीं। उत्तर प्रदेश के आम लोग राहुल गांधी से अर्थशास्त्र नहीं पढ़ते, उनका अर्थशास्त्र तो जमीन से जुड़ा हुआ है। वही अर्थशास्त्र उन्हें बताता है कि नोटबंदी से किसकी चोरी पकड़ी गई है और इससे अंतत: किसे लाभ होने वाला है। यही स्थिति जीएसटी को लेकर है। वह जानते हैं कि जीएसटी से कौन घबरा रहा है और किसको उससे फायदा होने वाला है।
मीडिया उत्तर प्रदेश के मुसलमानों को बता रहा था कि तुम्हें भाजपा सरकार तंग कर रही है और मुसलमानों को इसकी खबर तक नहीं है। मीडिया का कहना था कि तीन तलाक के मामले में भाजपा सरकार का स्टैंड इस्लाम में दखलअंदाजी है। प्रदेश में अवैध बूचडख़ाने बंद कर दिए गए। गोरक्षक प्रदेश में जगह-जगह मुसलमानों को मार रहे हैं, जिसके कारण मुसलमान गुस्से में हैं। गुस्से में हैं, तो उनको इन स्थानीय चुनावों में भाजपा को सबक सिखाना ही चाहिए। लेकिन मुसलमानों को यह पता ही नहीं था कि वे आजकल गुस्से में आए हुए हैं। उधर दलितों को लेकर सारा नकली सेक्युलर कुनबा रोनी सूरत बनाए चैनलों पर बता रहा था कि दलितों ने सवर्ण जातियों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है, इसलिए अब भाजपा मुंह के बल गिरेगी। कुछ गंभीर टाइप के बुद्धिजीवी इससे भी आगे निकल गए और घोषणा करने लगे कि भाजपा की सरकार से घबरा कर दलित और मुसलमान इक_े हो गए हैं। अपनी इस कल्पना को वे सोशल इंजीनियरिंग का नाम दे रहे थे। उनका कहना था कि इस सोशल इंजीनियरिंग की सम्मिलित शक्ति के आगे भाजपा धराशायी हो जाएगी।
हालांकि ऐसा कुछ नहीं हुआ। इन स्थानीय निकायों के चुनावों में भाजपा को आशातीत सफलता ही नहीं मिली, बल्कि सोनिया कांग्रेस और समाजवादी पार्टी का तो सूपड़ा ही साफ हो गया। प्रदेश के लगभग साढ़े तीन लाख मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया था। अत: कहा जा सकता है कि यह मार्च, 2017 के बाद एक प्रकार से दूसरा मतदान था, जिसमें लोगों ने योगी सरकार पर अपनी राय व्यक्त करनी थी। स्पष्ट ही प्रदेश के लोगों ने सभी प्रकार के भ्रामक प्रचार को नकारते हुए योगी सरकार के पक्ष में राय दी है। प्रदेश में सोलह नगर निगमों के लिए चुनाव हुए थे। इनमें से भाजपा ने महापौर के चौदह पद जीते और दो पद बहुजन समाज पार्टी के खाते में गए। सोनिया कांग्रेस और समाजवादी पार्टी किसी एक महानगर में भी महापौर का पद जीत नहीं सकी। यहां तक की अपने गढ़ रहे अमेठी में भी कांग्रेस कोई सीट नहीं जीत सकी।
विपक्ष यह तर्क दे सकता है और उसने कहना भी शुरू कर दिया है कि 2012 में हुए स्थानीय निकाय के चुनावों में भी भाजपा को इसी प्रकार की सफलता मिली थी। इसलिए भाजपा ने नया कुछ प्राप्त नहीं किया है, लेकिन उत्तर प्रदेश की राजनीति पर गिद्ध दृष्टि रखने वाले जानते हैं कि 2012 से लेकर अब तक गोदावरी में बहुत पानी वह चुका है। उसके बाद प्रदेश की राजनीति का रंग और ढंग दोनों बदल चुके हैं। देसी लडक़ों की पट्टी गले में डाल कर घूमने वाले राहुल-अखिलेश की जोड़ी औंधे मुंह गिर चुकी है। अब यह जोड़ी एक बार फिर उत्तर प्रदेश की धरती पर खड़ी होने की कोशिश कर रही थी। इन स्थानीय निकाय चुनावों को वे दोबारा खड़ा होने की दिशा में पहला अवसर मान रहे थे।
अंतर केवल इतना ही था कि राहुल-अखिलेश ने मार्च, 2017 में जो साझा पट्टा पहन रखा था, वह उन्होंने निकाल कर फेंक दिया था और अकेले-अकेले ताल ठोंक रहे थे। लेकिन न वे मिल कर कुछ कर सके और न ही वे अलग होकर कुछ कर पाए। राहुल गांधी किसी भी तरह वंश का सहारा लेकर सत्ता के शिखर पर पहुंचने की जल्दी में है। वह किसलिए सत्ता प्राप्त करना चाहते हैं, इसका उनको पता नहीं है। उनका सारा दावा केवल एक तर्क पर आधारित है कि वह हिंदोस्तान के राजवंश के वारिस हैं।
अब वह अपने इस दावे की तसदीक गुजरात के लोगों से करवाने की फिक्र में हैं और इसके लिए कई दिनों से वहां घूम फिर रहे हैं। वही मीडिया जो उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ को असफल सिद्ध करने में लगा हुआ था, अब गुजरात में राहुल गांधी को गुजरात की नई आशा के रूप में स्थापित करने के लिए ओवर टाइम कर रहा है। लेकिन उत्तर प्रदेश के स्थानीय निकाय चुनावों ने दोनों की आशाओं पर तुषाराघात कर दिया। चुनावों के बारे में हर तरह की जमा तकसीम में माहिर विशेषज्ञ, उत्तर प्रदेश के चुनाव परिणाम गुजरात में सोनिया कांग्रेस को कितना नुकसान पहुंचाएंगे, इसका आकलन करने में जुट गए हैं।

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