घटता हिंदू “मरता भारत”

भारत के 7 राज्यों में हिंदुओं को अल्पसंख्यक घोषित किए जाने की तैयारी है। जबकि केरल में इस समय हिंदू लगभग 53 प्रतिशत है, जो कि आने वाले समय में बहुत शीघ्र ही अल्पसंख्यक होने जा रहा है। इस्लाम और ईसाइयत दोनों ने अपने देश में ‘न्यूनतम सांझा कार्यक्रम’ पर कार्य करना आरंभ किया हुआ है। जिस काम को मुगल और अंग्रेज अपने 700 वर्ष के शासनकाल में नहीं कर पाएं, वह ‘भारत के इन अंग्रेजों’ ने पिछले 70 वर्ष में कर दिखाया है। छद्मधर्मनिरपेक्षता की यहसबसे बड़ी सेवा है कि उन्होंने देश की बहुलतावादी संस्कृति के नाम पर इस्लाम और ईसाइयत की ‘हिंदू मिटाओ नीति’ को प्रोत्साहित किया है।

केरल सौभाग्यशाली प्रदेश है, जहां विदेशी शासन लगभग न के बराबर रहा है। कहने का अभिप्राय है कि विदेशी शासन सत्ता की स्याह रात में भी यहां हिंदू वैभव और हिंदू गौरव लहलहाता रहा। आर्य संस्कृति में किसी भी विदेशी संस्कृति ने ग्रहण करने से ही इंकार कर दिया, और यदि कहीं किसी ने उसे इस प्रांत के लोगों पर जबरन थोपने का प्रयास भी किया तो उसका यहां पर जमकर प्रतिकार किया गया। पर स्वतंत्र भारत में 70 वर्ष में ही वह हो गया जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी।

पूर्वोत्तर ने केरल से भी अधिक शौर्य का परिचय देकर अपनी अस्मिता को 700 वर्षीय कालखंड में बचा कर रखा है। पर 70 वर्ष में वहां भी हिंदू अल्पसंख्यक हो गया है। यह ‘वोटों के राज’ का चमत्कार है जिन ‘एगलों इंडियंस’ (अंग्रेजों की भारतीय पत्नियों से पैदा अनैतिक संतानें) के लिए भारत से जाते-जाते अंग्रेज 2 सीट लोकसभा में सुनिश्चित करके गए थे, उनकी संतानों ने 70 वर्ष में इतनी प्रगति की है कि अब वह दर्जनों सीटों पर अपना दावा करने लगे हैं। भारत में ‘जयचंद’ की संतानें आज भी जीवित हैं, जो कि आसन्न संकट से आंखें बंद किए बैठी हैं। वह इसी को धर्मनिरपेक्षता कहती और मानती हैं कि कुछ लोग अपने संप्रदाय की वृद्धि के लिए और मानवता की सेवा के नाम पर अपना विस्तार करते जाएं और धीरे-धीरे विस्तार पाकर देश के क्षेत्र विशेष पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लें। यह घोर सांप्रदायिकता है, जिसको धर्मांतरण के नाम पर देश में बढ़ाया जा रहा है। इस सोच के कारण ही देश बंटा था और यही कारण था कि इस प्रकार की सांप्रदायिकता भविष्य में जोर न पकड़ सके, इसलिए संविधान सभा में कई मुस्लिम सदस्यों ने भी इस प्रकार की घटनाओं और देश को विघटन की परिस्थितियों से बचाने के लिए इसका विरोध किया था। उन्होनें यह स्पष्ट मांग रखी थी कि देश में धर्मांतरण की प्रक्रिया पर पूर्ण प्रतिबंध लगना चाहिए।

जो लोग धर्मांतरण के माध्यम से देश की जनसंख्या के आंकड़े को बिगाडऩे में लगे हैं उनके प्रयासों का यदि आप विरोध करेंगे या उन्हें उजागर करेंगे तो ऐसे कितने ही ‘जयचंद’ है जो एकदम बाहर निकल आते हैं। उन्हें इस प्रकार की घटनाओं में कोई संप्रदायिकता नहीं दीखती। उन्हें किसी आतंकी मुस्लिम संगठन की आतंकी घटनाओं का विरोध करना तो धर्मसापेक्षता दीखती है और आर.आर.एस. की आलोचना करना धर्मनिरपेक्षता दीखती है। पिछले दिनों ग्रेटर नोएडा में एक सपा नेता ने धर्मनिरपेक्षता पर एक परिचर्चा का आयोजन किया था। मैं वहां यह देखकर दंग रह गया था कि धर्मनिरपेक्षता के नाम पर वक्ताओं ने संविधान निर्माताओं की भावनाओं पर प्रकाश न डालकर इसके नाम पर केवल आर.आर.एस.को कोसना ही उचित समझा। उन्हें नहीं पता था कि यह सब धर्मनिरपेक्षता न होकर पंथनिरपेक्षता है। क्योंकि धर्म सभी का एक ही होता है- मानवता। मानवता से निरपेक्ष कोई भी यदि होता है तो वह दुष्ट, आतातायी ही धर्मनिरपेक्ष होगा। हम यदि ऐसे ही धर्मनिरपेक्ष मानव समाज की रचना करने जा रहे हैं तो यह पुन: चंगेजी और नादिरशाही परंपरा की ओर बढऩा होगा।

इतिहास की क्रूर पुनरावृत्ति की ओर न बढक़र हमें स्वर्णिम भविष्य की ओर बढऩा था, इसलिए हमारे संविधान निर्माताओं ने हमें आगे बढऩे वाली प्रगतिशील सोच अर्थात पंथनिरपेक्षता प्रदान की। इसका अभिप्राय था कि राज्य का कोई पंथ नहीं होगा, अर्थात राज्य अपने नागरिकों में पन्थीय आधार पर कोई भेदभाव नहीं करेगा, और उनकी निजता का सम्मान करते हुए उनके विकास के सारे साधन और अवसर उन्हें उपलब्ध कराएगा। सांप्रदायिक खेमेबंदी को धर्मांतरण के माध्यम से अपना कर जो लोग अपने-अपने खेमों को मजबूत करने में लगे हैं, और इस देश के जनसांख्किीय संतुलन को बिगाड़ रहे हैं वे देश के संविधान और उसकी भावना के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। यह मानसिकता देश के लिए घातक है।

भारत के बारे में यह यह तथ्य है कि यहां विश्व के 94 प्रतिशत हिंदू रहते हैं। कुछ समय पूर्व ‘प्यू रिसर्च सेंटर’ ने एक अध्ययन कर दावा किया था कि उसके अगले दो दशक के भीतर विश्व भर में मुस्लिम महिलाओं से जन्म लेने वाले बच्चों की संख्या ईसाई नवशिशुओं की अपेक्षा बढऩे की संभावना है। इस प्रकार 2075 तक इस्लाम विश्व का सबसे बड़ा संप्रदाय हो जाएगा। कुछ लोग इस प्रकार की स्थिति को एक स्वाभाविक प्रक्रिया कहकर हल्के में लेने का प्रयास करते हैं। जब कि सच यह है कि 2075 को यथाशीघ्र लाने का एक बड़ा षड्यंत्र कार्य कर रहा है। बस, वह षडय़ंत्र ही देश के लिए चिंता का विषय है। क्योंकि यह षडयंत्र ही देश के संविधान के पंथनिरपेक्ष स्वरूप के लिए खतरा बन कर आ रहा है। जिस दिन वह सफल हो जाएगा, उस दिन सबसे पहले इस संविधान को ही जलाया जाएगा। इसलिए नहीं कि इसी संविधान के रहते उन्हें अपने मिशन के सफल होने का अवसर मिला, अपितु इसलिए कि इस संविधान ने उन्हें एक शताब्दी से अधिक समय तक तथाकथित हिंदू शासन में रहने के लिए विवश किया। उक्त अध्ययन में कहा गया है कि 2035 तक मुस्लिम शिशुओं की दर ईसाई शिशुओं से आगे निकल जाएगी। इन दोनों पन्थों के बीच शिशुओं के बीच का यह अंतर 60 लाख तक पहुंच सकता है। कहने का अभिप्राय है कि मुस्लिमों के बीच 23.2 करोड़ शिशु यदि जन्म ले रहे होंगे तो ईसाइयों के बीच उनकी संख्या 22.6 करोड़ होगी। अध्ययन में यह भी स्पष्ट किया गया है कि इसके विपरीत 2015-60 के दौरान सभी अन्य बड़े पन्थो में जन्म लेने वाले शिशुओं की कुल संख्या तेजी से गिरने की संभावना है। स्पष्ट है कि यह संकेत हिन्दुओं की ओर ही है।

‘बदलते वैश्विक धार्मिक परिदृश्य’ नामक एक अध्ययन में तो यह स्पष्टत: स्वीकार कर लिया गया है कि जन्म लेने वाले शिशुओं की संख्या में गिरावट विशेषत: हिंदुओं में होगी। अध्ययन का मत है कि भारत में घटती प्रजनन दर के चलते वर्ष 2055-60 के दौरान इस पन्थ में जन्म लेने वाले शिशुयों की संख्या 2010-2015 के बीच जन्म लेने वाले शिशुओं की संख्या से 3.3 करोड़ कम होगी। 2010 से 2015 के बीच इस्लाम की संख्या में 15 करोड़ लोगों की वृद्धि हुई। ‘न्यूयॉर्क’ टाइम्स के अनुसार यह वाकई भौगोलिक अध्ययन है। वास्तव में भारत में वैदिक मत के अनुयायियों की संख्या का घटना हमें इस बात के लिए चिंतित करता है कि यदि ऐसा निरंतर होता रहा तो यह भारत ही एक दिन मिट जाएगा। ‘जय भीम’ और ‘जय मीम’ का नारा देकर जो लोग सांप्रदायिक आधार पर गठबंधन कर देश के राजनीतिक परिदृश्य को हथियाने की नीतियों में व्यस्त हैं- उनके प्रयास तो देश के लिए और भी घातक हैं। यदि धीरे से सत्ता का हस्तांतरण वोटों के माध्यम से उन हाथों में हो गया जो देश में ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे- इंशाअल्लाह इंशाअल्लाह’ इस प्रकार के नारों को भी भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मानते हैं- तो यह देश मिट जाएगा। अच्छा यही होगा कि इस प्रकार के नारों की जीत से पहले भारत जीत जाए। भारत के जीतने के लिए आवश्यक है कि धर्मनिरपेक्षता और पंथनिरपेक्षता को देश के शासन की ओर से स्पष्टत: परिभाषित किया जाए, और यह स्थापित किया जाए कि धर्मांतरण की गतिविधियां देश के पंथनिरपेक्ष स्वरूप के साथ खिलवाड़ मानी जाएगी। साथ ही एक समान नागरिक संहिता देश में लागू कर परिवार नियोजन की नीति को सभी पर समान रूप से लागू किया जाएगा। संप्रदायिक शिक्षा को देश में लागू नहीं होने दिया जाएगा और किसी को भी देश के जनसांख्यिकीय परिवेश को बिगाडऩे की अनुमति नहीं दी जाएगी।

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