गीता का कर्मयोग और आज का विश्व, भाग-29

गीता का चौथा अध्याय और विश्व समाज

गीता में आगे गीताकार श्रीकृष्णजी के मुखारविन्द से कहलवाता है कि हे पार्थ! इस संसार में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो आहार को सन्तुलित और नियमित करके अपने प्राणों से प्राणों में ही आहुति देेते हैं। (भारतवर्ष में ऐसे ऐसे योगी भी हो गये हैं जो प्राण साधना करते करते वायु के परमाणुओं से ही जीवन ऊर्जा ले लेते थे और उन्हें भोजन की आवश्यकता ही नहीं पड़ती थी। यह तथ्य कृष्णदत्त ब्रह्मचारी जी अपने प्रवचनोंं कहते रहे थे) ऐसे लोग भी यज्ञविद् हैं। इनकी साधना भौतिक यज्ञ से उच्चतम स्तर की थी। इसलिए इन्हें श्रीकृष्णजी ने ‘यज्ञविद्’ कहा है। यज्ञ के रहस्य को जानने वाले और भौतिकता से अथवा स्थूल से सूक्ष्म की ओर यात्रा करने वाले होने से इन्हें ‘यज्ञविद्’ कहा जाना सर्वथा उचित ही है। इनका जीवन यज्ञमय होने से ‘पापमुक्त’ हो जाता है।
हमारे यहां आज भी सद्गृहिणियां सबको भोजन कराने के उपरान्त भोजन कराती हैं। मानो वह भोजन तैयार करके पहले भौतिक यज्ञ करते हुए सबको प्रेम और श्रद्घा से भोजन कराती हैं और तदुपरान्त यज्ञशेष (बचे हुए भोजन को) प्राप्त करती हैं और उसी में सन्तुष्ट रहती है। भारत की संस्कृति में गृहिणियों का यह बहुत पवित्र और उच्च संस्कार है। हमारे यहां कुछ समय पूर्व तक यह संस्कार विवाह समारोहों के समय भी देखने में आता था। जब लोग सर्वप्रथम बारातियों को भोजन कराते थे, उसके पश्चात सम्बन्धियों को फिर मित्रों को और सबसे बाद में घर वाले स्वयं भोजन करते थे। यहां पर यह देखने वाली बात है कि वधु पक्ष के सभी मित्र सम्बन्धी, परिजन और प्रियजन सबसे पहले बारातियों को भोजन कराना इसलिए उचित मान रहे हैं कि उनके लिए कोई चीज कम न पड़ जाए और उनके स्वागत सत्कार कोई कमी न रह जाए। सबसे पीछे घर वाले इसलिए भोजन करते थे यदि कोई चीज कम रह गयी अथवा समाप्त हो गयी तो उसकी जानकारी केवल उन्हें ही हो। हमारी ऐसी भावना यज्ञीय भावना थी।
घर गृहस्थ में इस पवित्र यज्ञीय भावना का निर्वाह गृहिणियां करती हैं। यह भी एक साधना है और इसमें भी जीवन का वह रस छिपा है, जिसे लोग प्रेम कहते हैं और जो संसार के सारे सम्बन्धों का आकर्षण है। आजकल लोग जिसे प्रेम मानते हैं वह तो स्वार्थ (इंग्लिश का रुश1द्ग हिन्दी में लव बोला जाए तो लोभ का समानार्थक बन जाता है) और वासना का प्रतीक है।
परिवारों में माता-बहनें अपने लिए, अपने पति के लिए और अपने बच्चों के लिए भोजन बनाती हैं और चूल्हा बंद कर देती है। इसके पश्चात सास चाहे तो स्वयं अपना भोजन बना ले और देवरानी-जेठानी चाहें तो वे भी अपना भोजन स्वयं बना लें -उसे कोई फर्क नहीं पड़ता। इस विषैली व्यवस्था से संसार को अमृतमयी व्यवस्था देने की ओर संकेत करते हुए गीता कहती है कि जो लोग यज्ञ से अवशिष्ट अमृतमयी भोजन का सेवन करते हैं-वे सनातन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।
अवशिष्ट भोजन होत है अमृतमयी अनंत।
सनातन ब्रह्म को प्राप्त कर खुशी मनाते संत।।
जो व्यक्ति इस संसार में आकर यज्ञ नहीं करता-उसके लिए यह संसार ‘नहीं’ के बराबर है। ऐसे व्यक्ति को दूसरे लोक के विषय में तो सोचना ही नहीं चाहिए, अर्थात उसकी मुक्ति सर्वथा असंभव है।
इस प्रकार गीताकार ने अनेकों यज्ञों का वर्णन किया है जो वेदवाणी में फैले पड़े हैं। इन्हें यदि संसार के लोग समझ लें तो वे सबके सब कर्म के बन्धन से छूट जाएंगे और मुक्ति को प्राप्त कर लेंगे।
चौथे अध्याय के अन्त में श्रीकृष्णजी अर्जुन को पुन: स्पष्ट करते हैं कि जिस ‘द्रव्य यज्ञ’ का सबसे पहले वर्णन किया गया है उसकी अपेक्षा सबसे अन्त में वर्णित ‘ज्ञानयज्ञ’ सर्वश्रेष्ठ है। क्योंकि सब कर्म ज्ञान में जाकर ही समाप्त होते हैं। ‘ज्ञान यज्ञ’ का अभिप्राय है-अविद्या अन्धकार को पूर्णत: विनष्ट कर देना, उसका होम कर देना। जो लोग अविद्या अन्धकार में पड़े हुए हैं-उनका जीवन नहीं के बराबर है। संसार में ऐसे अनेकों मनुष्य हैं जो मनुष्य जीवन की उपयोगिता पर विचार तक नहीं करते। इनमें से भी अधिकांश ऐसे हैं जिन्हें मनुष्य जीवन की उपयोगिता पर विचार करना आता ही नहीं। उन्हें नहीं पता कि यह नर तन हमें किसलिए मिला है, और हमें इसे पाकर संसार में कौन से कर्म करने चाहिएं? ऐसे लोग संसार में धरती पर केवल बोझ होते हैं। उनका जीवन व्यवहार संसार के अन्य जीवधारियों को कष्ट देने वाला होता है।
जो लोग अविद्या-अन्धकार को मिटाकर ज्ञानयज्ञ के माध्यम से उसका होम करते हैं, उनका जीवन धन्य हो जाता है। यह तभी सम्भव है-जब गुरूओं के प्रति पूर्ण श्रद्घा भाव हमारे हृदय में उत्पन्न हो और हम उनसे अपनी छोटी से छोटी शंका का भी समाधान पूछते रहें। यदि हमने अपनी शंकाओं के समाधान में किसी प्रकार का आलस्य या प्रमाद बरता तो वह स्वयं हमारे लिए ही घातक होगा। क्योंकि ऐसी परिस्थिति में हमारा ज्ञान अधकचरा रह जाएगा। तब हम जिस पूर्णता को प्राप्त करने के लिए गुरू के पास समित्पाणि होकर गये थे-उसका कोई अर्थ नहीं रह जाएगा।
गुरूओं से शंका समाधान कराते समय हमारे हृदय में पूर्ण श्रद्घा और निष्कपटता होनी चाहिए। ऐसा करने से व्यक्ति तत्वदर्शी बनता है। श्रीकृष्णजी कहते हैं कि इस प्रकार के ज्ञान को पाकर अर्जुन तू फिर कभी इस प्रकार के मोह को प्राप्त नहीं हो सकेगा। संसार का पापी से पापी व्यक्ति भी अविद्या-अंधकार को मिटाकर अर्थात ज्ञान की नौका को पाकर ही इस भवसागर से पार हो सकता है। क्योंकि अर्जुन तू याद रख कि जैसे अग्नि प्रदीप्त होने पर ईंधन को भस्मसात कर देती है वैसे ही जब ज्ञानग्नि प्रदीप्त हो जाती है तब वह सब कर्मों के बन्धन को भस्मसात कर देती है। अत: ज्ञान प्राप्ति जीवन का उद्देश्य होना चाहिए। इसके समान इस संसार में अन्य कोई वस्तु पवित्र नहीं है। जिसने ज्ञान प्राप्ति को अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया-समझो वह महानता की साधना के लिए उठ खड़ा हुआ और जिसने महानता की साधना के लिए खड़ा होना सीख लिया वह एक दिन अमरता के द्वार पर पहुंच ही जाता है। ज्ञान से परमशान्ति की प्राप्ति होती है। व्यक्ति संसार में आकर जिस परम शान्ति को पाना चाहता है वह बिना ज्ञान के प्राप्त नहीं हो सकती। शंकालु और संशयालु व्यक्ति संसार में आकर नष्ट हो जाता है। संशयालु के लिए न तो यह लोक है और न ही वह लोक है। ऐसे व्यक्तियों को संसार में सुख की प्राप्ति होना असम्भव है। जिसने ज्ञान के माध्यम से योग करते हुए आत्मा पर अधिकार कर लिया है, वह कर्मबन्धन से मुक्त हो जाता है। अत: हे भारत! अज्ञान से उत्पन्न होने वाले हृदय में बैठ गये संशय को तुझे अपने आत्मा केे ज्ञान रूपी तलवार से काटकर योग मार्ग पर आरूढ़ हो जाना चाहिए। जीवन का कल्याण इसी में है, इसलिए तू उठ खड़ा हो। यदि अब भी विलम्ब करेगा तो तू जीवन के परम लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकेगा।
इस प्रकार के जीवन प्रद ज्ञानप्रद और शिक्षाप्रद वादसंवाद से गीताकार गीता के चौथे अध्याय को पूर्ण करता है। उसने विषय को विस्तार दिया और संसार के साधारण लोग के लिए भी गीता को उपयोगी बना दिया।
क्रमश:

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