गीता का कर्मयोग और आज का विश्व, भाग-44

गीता का छठा अध्याय और विश्व समाज

अच्छे बुद्घिमानों का और पवित्रात्माओं का परिवार ऐसे ही योगभ्रष्ट लोगों को एक पुरस्कार के रूप में मिलता है। जिनके संसर्ग, सम्पर्क और सान्निध्य में रहकर वह योगभ्रष्ट व्यक्ति या योगी शीघ्र ही आगे बढऩा आरम्भ कर देता है। वह पूर्व जन्म के बुद्घि संयोग को फिर से पा लेता है और जहां से उसने पूर्वजन्म में अपना उद्यम या पुरूषार्थ या मोक्ष प्राप्ति का प्रयत्न बीच में छोड़ा था-वहीं से पुन: मोक्ष (संसिद्घि) पाने का यत्न आरम्भ कर देता है।
वर्तमान संसार इस रहस्य को समझ नहीं पा रहा है। इसका कारण वेद विरूद्घ मत-मतान्तरों का बढ़ता जाल है, जिसने मनुष्य की बुद्घि को ही विकृत कर डाला है। साम्प्रदायिक व्यक्ति दूसरे मतों की वैज्ञानिक बातों को ही इसलिए नहीं मानता कि वह उसके अपने सम्प्रदाय में वैसी ही नहीं लिखी गयी है या मानी गयी है जैसी दूसरे सम्प्रदाय में लिखी या मानी गयी है। यद्यपि आधुनिक वैज्ञानिक शोध भारत के इस मत की पुष्टि कर रहे हैं कि मृत्यु के उपरान्त पुनर्जन्म है और यह भी कि साधना या ज्ञान-विज्ञान की जिस ऊंचाई से जीवात्मा इस मानवदेह को त्यागता है-पुनर्जन्म में उसे उसी ऊंचाई से आगे बढऩे का अवसर परमात्मा उपलब्ध कराता है। इस प्रकार की शोधों से न केवल भारत के पुनर्जन्म सम्बन्धी वैदिक मत की पुष्टि हो रही है अपितु आत्मा के अजर, अमर और अविनाशी होने के मत की भी पुष्टि हो रही है। साथ ही पुनर्जन्म की मान्यता को मान लेने से कर्मबन्धन का गीता का वैदिक सिद्घान्त भी विश्व की समझ में आ रहा है।
भारत के विज्ञान को समझ रहा संसार।
नतमस्तक जन हो रहे करते हैं आभार।।
इससे भारत के अध्यात्म विज्ञान के सामने संसार के लोग धीरे-धीरे नतमस्तक होते जा रहे हैं। यह अलग बात है कि अभी विश्व के तथाकथित बुद्घिजीवी अपनी धारणाओं के निर्मूल सिद्घ हो जाने के भय से भारतीय वैदिक मत को खुल्लम-खुल्ला स्वीकार करने से बच रहे हैं। परन्तु अब इतना तो स्पष्ट होने लगा है कि शेष संसार के सभी बुद्घिजीवियों को देर सवेर भारत के अध्यात्म विज्ञान को हृदयंगम करना ही होगा। श्रीकृष्णजी कहते हैं कि जो व्यक्ति योग भ्रष्ट होता है-वह इस जन्म में पिछले जन्म के अभ्यास से बने संस्कारों से इस जन्म में भी प्रेरित होता है और वह अपनी भीतरी प्रेरणा से विवश सा होकर योग की ओर खिंचता चला आता है। श्रीकृष्ण जी का कथन है कि योग का जिज्ञासु तक भी सकाम विधि-विधान (वेदों के मंत्रों में जिस ब्रह्म की चर्चा है वह शब्द ब्रह्म है और उससे परे पर ब्रह्म है, वह शब्दों से या किसी प्रकार के अनुष्ठानादि से परे है) करने वाले से ‘शब्द ब्रह्म’ तक सीमित रह जाने वाले से अर्थात ब्रह्म की केवल शाब्दिक चर्चा करने वाले से बहुत आगे निकल जाता है।
‘शब्द ब्रह्म’ एक सैद्घान्तिक ज्ञान है। वह कथनी तक सीमित रह सकता है। ‘परब्रह्म’ करनी का विषय है-अनुभूति का विषय है। उसमें क्रिया होने लगती है। पर यह भी ध्यान रखना चाहिए कि इस क्रिया का शुभारम्भ ‘शब्द ब्रह्म’ से ही होता है। वहां से अभ्यास के लिए प्रेरणा मिलती है और मन एकान्त की खोज करने के लिए चेष्टा करने लगता है। ऐसी अवस्था को पाकर मन संसार के विषयों से विरक्त होने लगता है और उसे परब्रह्म की चर्चा में या भक्ति में अलौकिक आनन्द आने लगता है। उस अलौकिक आनन्द की अवस्था में जाकर मन संसार के विषय वासनाओं को तुच्छ और हेय मानने लगता है। इसी अवस्था में रहकर मन मोक्ष की तैयारी करने लगता है। यहां से आगे मन का विषय छूट जाता है और आत्मा का जगत आरम्भ हो जाता है।
श्रीकृष्ण जी कह रहे हैं कि वहां से आगे योगी (पर ब्रह्म में रमा होने से) पाप से छूटकर अनेक जन्म जन्मान्तरों में अपने आपको पूर्ण बनाता हुआ परमगति को प्राप्त होता है।
यहां पर पाप से छूटने का अभिप्राय यह नहीं है कि जो पापकर्म कर लिये हैं-उनके फल से भी छूट जाएगा, अपितु इसका अभिप्राय केवल यही है कि ऐसे व्यक्ति की पापवासना शान्त हो जाती है, जिससे जीवन निर्मल और निर्विकार हो जाता है। ऐसा योगी को तपस्वियों से भी बड़ा मानते हुए श्रीकृष्णजी ने छठे अध्याय के अन्त में स्पष्ट किया है कि वह ज्ञानियों से भी बड़ा होता है। वह कार्यकाण्डियों से भी बड़ा है। अत: श्रीकृष्ण जी अर्जुन से कह रहे हैं तू भी योगी बन जा। परमात्मा से आत्मा का योग कर लेगा तो तेरे जीवन का उद्घार हो जाएगा।
श्रीकृष्णजी कह रहे हैं कि मैं सभी योगियों में भी उसे सर्वश्रेष्ठ मानता हूं जो मुझमें अपने अन्तरात्मा को डालकर अर्थात मुझमें ध्यान लगाकर एकाग्रचित होकर श्रद्घापूर्वक मेरा भजन करता है अर्थात ईश नाम का जप करता है और अपने आत्मा को साधना से बलशाली बनाता है।
इस प्रकार गीता का यह छठा अध्याय ध्यान योग की चर्चा करके समाप्त हो जाता है। आचार्य विनोबा भावे ने कहा है कि गीता कर्म को इस प्रकार करने की शिक्षा देती है कि वह कर्म होकर भी अकर्म हो जाए। इसके लिए आचार्य एक उदाहरण देते हैं कि जैसे जब कोई बच्चा घुटनों के बल चलता है तो तब वह खड़ा होने को और खड़े होकर चलने को भी अपना कर्म मानता है। परन्तु फिर कुछ समयोपरान्त वह बच्चा दौड़ लगाने लगता है और अब वह स्थिति आ जाती है कि वह चलने को कोई कर्म नहीं मानता। उसका कर्म अकर्म में (निष्काम भाव के साथ) परिवर्तित हो गया। ठीक इसी प्रकार मानव को भी अपने कर्म को अकर्म बनाने के लिए योग साधना करनी चाहिए। इसके लिए श्रीकृष्ण जी ने छठे अध्याय में ध्यान योग को स्पष्ट किया है। कर्मयोग का अर्थ कर्म के फल को छोडक़र कर्म को अकर्म बना देना है। कर्म में मन की शक्ति का संचार कर देना ही उसे ‘विकर्म’ बना देना है। विकर्म का अभिप्राय विशेष कर्म से है। यह विशेष कर्म ध्यान योग है, यह कर्म की सहायता के लिए निरन्तर चलता रहता है।
ध्यान शक्ति, आत्मा-अनात्मा का विवेक ये सभी विकर्म हैं। इनसे कर्म में शक्ति का संचार होता है, उसे ऊर्जा मिलती है। एकाग्रता बढऩे से कर्म का सौंदर्य बढ़ता है। साथ ही ईश्वर के प्रति निष्ठा बढऩे से कर्म-अकर्म से परिवर्तित होता जाता है। इस प्रकार कर्म को विकर्म की सहायता से अकर्म में परिवर्तित करने का एक चक्र आरम्भ हो जाता है। जिसका अन्तिम लाभ मनुष्य को ही मिलता है। इस ध्यान योग को सफल बनाने के लिए चित्त की एकाग्रता, जीवन में संयम, समदृष्टि, अभ्यास, वैराग्य और श्रद्घा की आवश्यकता होती है।
चित्त की एकाग्रता से इन्द्रियों के रस को हम ईश्वर के साथ जोडऩे के अभ्यासी बनने लगते हैं। जिससे हमारे भीतर संयम का भाव जागृत होता है। हम अपनी हर इन्द्रिय पर अपने आप ही पहरा देने लगते हैं। इससे जीवन को पवित्र बनाने में सहायता मिलती है।
वर्तमान विश्व के लिए यह व्यवस्था व्यवहार में लागू की जानी अपेक्षित है। उससे अमर्यादित मानव समाज मर्यादा में बंधने लगेगा और मर्यादा ही वह चीज है जो घर से लेकर विश्व तक शान्ति स्थापित करा सकती है।
क्रमश:

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

%d bloggers like this: