गीता का कर्मयोग और आज का विश्व, भाग-45

गीता का सातवां अध्याय और विश्व समाज

ज्ञान-विज्ञान और ईश्वर का ध्यान
गीता के सातवें अध्याय का शुभारम्भ करते हुए योगेश्वर श्रीकृष्ण जी कहते हैं कि हे पार्थ! मुझ में मन को आसक्त करके अर्थात कर्मफल की आसक्ति के भाव को छोडक़र और संसार के भोगों या विषय वासनाओं को त्यागकर जिस प्रकार तू मुझे जान सकता है-अब उस विषय में सुन।
इस स्थान पर श्रीकृष्ण जी कह रहे हैं कि अब अर्जुन मैं तुझे वह रहस्य की बात बताता हूं- जिसके माध्यम से तू मुझे असन्दिग्ध रूप से और पूर्णत: जान सकता है। यदि तू मेरे बताये अनुसार चलेगा और ईश्वर को जानने का प्रयास करेगा, तो उसे जानकर फिर कुछ और जानने के लिए तेरे पास शेष नहीं रहेगा। उसे जानकर सब कुछ जान जाएगा। संसार के सारे शास्त्र और उनमेें निहित ज्ञान ठीक है कि उसे बताने वाले हो सकते हैं, और उनके पठन-पाठन में आनन्द की प्राप्ति होती है, परन्तु जो आनन्द उसके सीधे दर्शन करने से मिलता है, उससे साक्षात्कार करने से मिलता है, वह आनन्द इस प्रकार के आनन्द से बहुत अधिक है। इसलिए मैं तुझे ‘विज्ञान सहित ज्ञान’ बतलाऊंगा। तू उसे ध्यान से सुन।
आत्मा का परिष्कार कर सुन मानव मतिमन्द।
मोक्ष मिलै ऊंचा चढ़ै मिल जाए दिव्यानन्द।।
शंकराचार्य जी ने शास्त्रगत ज्ञान को ज्ञान तथा आत्मसाक्षात्कार से प्राप्त ज्ञान को विज्ञान कहा है। इसी ज्ञान-विज्ञान को श्रीकृष्णजी यहां स्पष्ट करने लगे हैं। वह कहते हैं कि इस संसार में हजारों मनुष्यों में से कोई एक व्यक्ति ऐसा होता है-जो योग की सिद्घि करता है। श्रीकृष्ण जी के समय यह संख्या हजारों में से एक थी और आज इसे आप लाखों में से एक कह सकते हैं। इससे पता चलता है कि ज्ञान-विज्ञान की श्रेणी को पाने वाले लोगों की संख्या में गिरावट आयी है। हमारे ऋषियों ने भौतिक विज्ञान को ज्ञान-विज्ञान की श्रेणी में नहीं माना है। इसलिए आज के भौतिक विज्ञान को ज्ञान-विज्ञान मानकर गर्व में फूले हुए व्यक्ति ज्ञानी-विज्ञानी नहीं कहे जा सकते और ना ही योगसिद्घ महापुरूष ही कहे जा सकते हैं। आज की शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति को महापुरूष या योगसिद्घ महामानव बनाना न होकर बड़ा ‘बिजनैसमैन’ बना देना है। यही कारण है कि हर क्षेत्र में आज ‘बिजनैस’ घुस गया है। तथाकथित योगसिद्घ बाबा भी ‘बिजनैस’ कर रहे हैं। जिससे भारत के अध्यात्म को भी बदनामी झेलनी पड़ रही है। श्रीकृष्ण जी ऐसे योग के विरूद्घ हैं, वे उस योग को मानव जीवन के लिए उपयोगी मानते हैं जो मनुष्य को मोक्ष अभिलाषी बनाकर अर्थात मुमुक्षु बनाकर परमपद की प्राप्ति कराता है।
श्रीकृष्ण जी कह रहे हैं कि हजारों मनुष्यों में से कोई एक व्यक्ति योगसिद्घ होता है अथवा योग सिद्घ होने का प्रयास करता है। जो व्यक्ति अपने इस प्रयास में सफल हो जाते हैं उनमें से भी कोई एक ही मेरे तात्विक रूप को जान पाता है। कहने का अभिप्राय है कि ईश्वरभक्त हो जाना भी ईश्वर के तात्विक स्वरूप को जानने के लिए पर्याप्त नहीं है। ईश्वर को पाने के लिए इससे भी आगे बढऩा होता है। ईश्वरभक्त पीछे रह जाता है और वह अपने अगले स्वरूपों में प्रविष्ट होता जाता है। वह योगसिद्घ बनता है और योगसिद्घ बनकर आत्मसाक्षात्कार करता है और उसी में ईश्वर से भी साक्षात्कार कर लेता है। योग की सीढिय़ां एक ईश्वरभक्त को निरन्तर आगे ही आगे लेती जाती हैं। उसका पहला स्वरूप पीछे छूट जाता है और वह आनन्द के सागर में डुबकी लगाने के लिए आगे बढ़ जाता है।
उस आनन्द सागर में नित्य डुबकी लगाना अलग बात है और उस आनन्द सागर में लीन हो जाना अलग बात है। जो डुबकी लगा रहा है-योग सिद्घ तो वह भी हो गया, पर वह डुबकी लगा रहा है और बाहर निकल रहा है। बस, उसका यह बाहर निकलना ही उसे ‘बाहर की हवा’ लगा देता है। यह ‘बाहर की हवा’ ही वह ‘ऊपरी हवा’ है जो उसको ईश्वर के तात्विक रूप को प्रकट नहीं होने देती है अर्थात उसमें निरन्तर लीन नहीं होने देती है। लोग कहा करते हैं कि अमुक व्यक्ति पर ‘ऊपरी हवा’ है या अमुक व्यक्ति को ‘बाहर की हवा’ लग गयी है। लोग ऐसा कह तो देते हैं पर उसका अर्थ नहीं जानते।
कृष्ण जी कह रहे हैं कि ईश्वर का तात्विक रूप तो प्रकृति के पंचतत्वों और मन, बुद्घि व चित्त में बंटा है। पर यह मेरा ऊपरी रूप है। इसे जड़ रूप भी कहा जा सकता है। यह तो सम्भव है कि दिखायी दे जाए, पर इससे अलग भी मेरा ‘पर’ रूप है। जो जड़ जगत में न मिलकर चेतन जगत में मिलता है। मेरा यह ‘पर’ रूप मेरे अपर रूप से सर्वथा भिन्न है। मैं अपने इसी ‘पर’ रूप से इस संसार को धारण करता हूं। यद्यपि ईश्वर का निज स्वरूप इस ‘पर’ और ‘अपर’ से भी परे है।
श्रीकृष्णजी कहते हैं कि संसार के सब प्राणी इस ‘पर’ और ‘अपर’ से ही पैदा होते हैं। जड़ जगत और चेतन जगत अर्थात चराचर जगत की उत्पत्ति इन्हीं से होती है। प्रकृति और जीव से यह संसार चल रहा है। पर मेरा निज स्वरूप अर्थात ईश्वर इन सबसे अलग है। हां, उसके विषय में यह भी सत्य है कि वह ईश्वर ही इस जगत का मूल है।
इस मूल को श्रीकृष्ण जी ‘प्रणव’ कहते हैं। ‘प्रणव’ ही इस जगत का प्रलय है अर्थात अन्त है। इस प्रकार ईश्वर, जीव और प्रकृति के अजर-अमर होने के वैदिक मत को श्रीकृष्णजी यहां स्पष्ट कर जाते हैं। श्रीकृष्णजी को गीताकार ने वैदिक प्रवक्ता के रूप में स्थापित करने में सफलता प्राप्त कर ली है। यहां पर यह भी ध्यान देने वाली बात है कि जैसे आत्मा का साक्षात्कार कराने में यह शरीर सहायक होता है-वैसे ही परमात्मा का दर्शन कराने में यह जड़ चेतनमयी सृष्टि सहायक होती है।
श्रीकृष्णजी कह रहे हैं कि मुझसे परे ऐसा कुछ भी नहीं है जो जानने के लिए शेष रह जाता हो। संसार के सारे ज्ञान-विज्ञान की सीमा ईश्वर में समाहित है। ईश्वर से परे कोई ज्ञान नहीं, कोई विज्ञान नहीं। जगत का सारा तामझाम उस ईश्वर में ही निहित है और उसमें ऐसा पिरोया गया है जैसे मणियां धागे में पिरोयी जाती हैं। चौथे अध्याय में श्रीकृष्णजी ज्ञान को लेकर कह आये हैं कि इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाली और कोई वस्तु नहीं है। उस ज्ञान को कालान्तर में योग के द्वारा शुद्घान्त:करण द्वारा पुरूष आत्मा से अनुभव करता है। वहीं पर यह भी स्पष्ट किया गया है कि श्रद्घावान ज्ञान प्राप्ति में लगा रहने वाला व्यक्ति और इन्द्रियों को वश में करने वाला व्यक्ति ज्ञान को प्राप्त करके तत्क्षण परमशान्ति को प्राप्त हो जाता है। ज्ञान-विज्ञान की बात कहकर श्री कृष्णजी विद्या प्राप्ति की बात कह रहे हैं। विद्या में शुद्घ विज्ञान ही शेष रह जाता है। इसमें अवैज्ञानिकता और अतार्किकता के लिए कोई स्थान शेष नहीं रह जाता है। जो सत्य है, वही सत्य कहा जाता है और जो असत्य है-उसे असत्य ही कहा जाता है। महर्षि दयानन्द जी महाराज ‘सत्यार्थप्रकाश’ के नवम समुल्लास में कहते हैं कि जिससे पदार्थों के यथार्थ स्वरूप का बोध हो वह विद्या और जिससे तत्वस्वरूप न जान पड़े अथवा अन्य में अन्य की बुद्घि होवे वह अविद्या कहलाती है।”

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