वीर बंदा वैरागी के जीवन का सिंहावलोकन

हिंदुत्व से मुस्लिम बादशाहों की घृणा
डा. ईश्वरी प्रसाद ने लिखा है-”विदेशी हमले के जवाब में मध्यकाल के हिंदुओं की व्यवस्थित सुसंस्कृत और राष्ट्रीय शक्ति का शानदार संघर्ष, देश की सांस्कृतिक अस्मिता को बचाने का प्रेरणा स्रोत रहेगा।”
इस टिप्पणी के आलोक में या संदर्भ में हमें शाहिद रहीम साहब का यह कथन भी ध्यान में रखना होगा-”दरअसल हिंदुत्व को समाप्त करने की राजनीतिक कोशिश 1265 ई. से शुरू हो गयी थी जब शमसुद्दीन अल्तमश की बेटी रजिया सुल्तान, तुर्क सेनानायक अल्तूनिया के महिला विरोध से तंग आकर एक सराय में जा छिपी और वहीं मर गयी। अल्तमश का बेटा नासिरूद्दीन ने उसे भी मार दिया और 1265 ई. में नासिर का सलाहकार गियासुद्दीन बलबन सिंहासन पर बैठ गया। 1287 तक उसने 22 वर्ष हुकूमत की। उसने घोषणा की थी खुदा की अनुपम देन बादशाहत के प्रति वह अपना धर्म समझते हुए कत्र्तव्य पालन करता है जो अपना वैभव, ऐश्वर्य, प्रताप सेना कर्मचारी तथा राजकोष सहित तमाम संपत्ति वगैरह जो कुछ खुदा ने उसे दिया है सब काफिरों मुशरिकों और बुतपरस्तों के विनाश में लगा सके। मजहब ए-इस्लाम के विरोधियों का मूलोच्छेद कर सके। अगर यह मुमकिन न हो तो खुदा और पैगंबर के शत्रुओं को अपमानित करे यातनाएं दें उनकी निजी आस्था और उनके स्वाभिमान का अंत करें और अपने राज्य की परिधि में उनकी सुख संपन्नता उनके मान तथा पदों का नामोनिशान न रहने दें।”
इसका अभिप्राय स्पष्ट है कि हमारे मध्यकालीन स्वतंत्रता सेनानियों का स्वातंत्रय समर देश की सांस्कृतिक अस्मिता को बचाने का स्रोत इसलिए बना कि उन्होंने हिंदुत्व को बचाने का दीर्घकालीन अथक प्रयास और संघर्ष किया। हिंदुत्व से मुस्लिम बादशाहों को कितनी घृणा थी इसका पता हमें शाहिद रहीम की पुस्तक ‘संस्कृति और संक्रमण’ के (पृष्ठ 253) माध्यम से मिलती है। वह लिखते हैं-
”1290 ई. से 1296 ई. तक जलालुद्दीन खिलजी के हाथ में सत्त्ता रही। अपनी मृत्यु से पहले वह बीमार पड़ा। लोग मिलने जाते तो बुखार में भी उठ बैठता और कहता-‘लानत है हमारी बादशाहत पर थू है। हिंदू अब भी जिंदा है, वो सब आज भी मूत्र्ति पूजा कर रहे हैं उनके खून की नदियां क्यों नही बहाई जातीं।”
कुछ अच्छे मुसलमानों की अच्छी पहल
जहां खिलजी जैसे मुस्लिम शासकों की हिंदुओं के प्रति ऐसी भावना थी वहीं कुछ मुसलमान ऐसे भी थे जिन्हें हिंदू और उनकी परंपराएं बड़ी रूचिकर लगती थीं। अकबर को हिंदू धर्म ग्रंथों के विषय में जानकारी देने वाले जाकिर मुहम्मद सलीब कम्बू ने लिखा है-”हर तरफ अमल-ए-सालिह का मुकाबिला है। खुदा के बंदे उसकी इबादत में मशगूल हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि कोई अपने खुदा की मनचाही शक्ल बनाकर सजदा करता है तो कोई खला (वायुमण्डल) की तरफ आंखें बंद करके एक नूर तसब्बुर कर लेता है। मुसीबत यह थी कि इस फर्क से जिल्ले इलाही के मिजाज में फर्क आ गया। यह परेशान रहे अमनो अमान के लिए इस्लाम के लिए।”
(‘अमल-ए-सालिह’ पृष्ठ 118, ‘नेशनल लाइब्रेरी’ बांद्रा मुंबई)
कम्बू ने अन्यत्र लिखा है-”अहले हुनूद (हिन्दू) की खुसूसियत है कि वह इबादत में अपने खुदा से दुश्मनों की तबाही नही मांगता (वह कहता है सर्वे भवंतु सुखिन: सर्वेसन्तु निरामया) मों तबर (विश्वसनीय) खुफिया मुखबिरों की इत्तला है कि वह खुशहाली दौलत, ऐशोइशरत के तालिब रहते हैं, ऐसे लोगों की तामदाद बहुत कम है जो जन्नत की ख्वाहिश में दुनिया ठुकरा दें, वह नुकसान पहुंचाने वालों के लिए नुकसान देह है, इंसानों से इंसान का इखलाक रखते हैं। मजहब की ऊंचाईयों का तकाजा यह है कि खुद सुपुर्दगी बजालाने वालों को आजाद करार दे दिया जाए जैसा कि कभी पैगंबर-ए-आजम ने हजरत अनुसुफियान को आजाद किया था।”
मानवतावादी मुसलमानों ने हिंदू की उदारता और मानवतावाद को इसी प्रकार सम्मान के भाव से देखा है। यह अलग बात है कि इन मुट्ठी भर मानवतावादी मुस्लिमों की वहां चलती नहीं है।
वैरागी के जाने के पश्चात हिन्दू समाज की स्थिति
वीर वैरागी के जाने के पश्चात हिंदू समाज की स्थिति पुन: दयनीय हो गयी। बादशाह के अधिकारियों ने और काजियों ने अपने लोगों के माध्यम से उन पर अत्याचार ढहाने आरंभ कर दिये। एक प्रकार से मुस्लिम राज्य की घोषणा कर दी गयी। तानाशाही ढंग से शासन का संचालन किया जाने लगा। हिंदुओं को गंभीर आरोप लगा लगाकर गिरफ्तार किया जाने लगा। हिंदू समाज पूर्णत: नेताविहीन हो गया। इधर-उधर भागकर या छिपकर शरण लेने पर लोग विवश हो गये। बड़े संघर्ष से वैरागी ने जिन मर्यादाओं का सम्मान कराना तत्कालीन शासक वर्ग को सिखाया था वे पुन: टूटने लगीं। हिंदू या सिख अपने त्यौहार भी नहीं मना सकते थे। यूं तो मुगल साम्राज्य बादशाह औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात से ही टूटने-फूटने लगा था पर अभी वह पूर्णत: नष्ट नहीं हुआ था। बादशाह का अंकुश अपने अधिकारियों और काजियों पर से समाप्त होता जा रहा था। जिससे व्यवस्था नाम की कोई चीज नहीं रह गयी थी। ऐसी परिस्थितियों में सामान्यत: अराजकता फैल जाया करती है और अब ऐसी अराजकता से देश दो चार हो रहा था। परिणामस्वरूप हिंदुओं के प्रति लूटपाट की घटनाएं बढ़ीं। सैनिक अभियान तो अब लगभग समाप्त हो गये। हां, डकैतों के अभियान अवश्य हावी हो गये। जिससे हिंदुओं को छिपने के लिए इधर-उधर भागना पड़ा।
सिखों को अपनी भूल का अनुभव हुआ
कई स्थानों पर अपने प्राणों की रक्षा के लिए हिंदुओं ने धर्मांतरण कर स्वयं को मुस्लिम बना लिया। पंजाब में सिखों को अपनी भूल का अनुभव हुआ। उन्हें पता चल गया कि वैरागी के साथ जो कुछ भी किया गया वह उचित नही था। वैरागी उस समय राष्ट्र की भावनाओं का प्रतीक बन चुका था, इसलिए उसके साथ जो कुछ भी किया गया-वह राष्ट्र की भावनाओं के साथ किया गया खिलवाड़ था। समय बड़ी तीव्रता से निकल रहा था। पर लोगों को उतनी ही तीव्रता से अपनी भूलों का पाप बोध भी करा रहा था। यही कारण था कि पंजाब में सिख पुन: हिंदुओं की सुरक्षा के लिए आगे आये। राजस्थान के कुछ सिखों ने पंजाब पर धावा बोल दिया। उन्होंने हिंदुओं की रक्षार्थ अपना बलिदान देना आरंभ कर दिया। अब उनका नेता चाहे कोई हो या न हो पर गुरूओं के बलिदान उनके लिए प्रणेता और प्रचेता अवश्य बन गये थे। गुरूओं का दिखाया गया मार्ग उनके लिए पूजनीय और वंदनीय बन गया था। जितनी क्षति उनकी हो चुकी थी, अब वह उसकी पूत्र्ति के लिए सचेष्ट और सक्रिय हो उठे।
इन सिखों ने ऐसे मुस्लिमों को और मुगल अधिकारियों को अपना निशाना बनाया जिनके कारण हिंदुओं को पुन: धर्मांतरण के लिए विवश होना पडऩे लगा था। ऐसे मौलवियों का उन्होंने वध करना आरंभ कर दिया जिन्हेांने हिंदुओं को मुसलमान बनाने के फतवे जारी किये थे। उनके आंदोलन ने मुस्लिमों को पुन: यह अनुभव करा दिया कि गुरू परंपरा में सिख के लिए हिंदू की सुरक्षा करना और हिंदुत्व को बचाना प्राथमिकता पर है।
वीर योद्घा भये तारूसिंह
भाई तारूसिंह जैसा वीर योद्घा निकलकर सामने आया और उसने वीर वैरागी के चले जाने से उत्पन्न हुए शून्य को पुन: भरने का प्रयास किया। बड़ी वीरता और शौर्य का परिचय देते हुए उस वीर ने बड़े मनोयोग से हिंदुत्व की रक्षा में स्वयं को समर्पित कर दिया। उसकी वीरता से हिंदुओं को प्राण ऊर्जा मिली। वे उठे-संभले और इस योद्घा के साथ चलने लगे। इस स्थिति को सूबेदार बड़े ध्यान से देख रहा था उसने तारूसिंह के साथ कठोरता का व्यवहार करना आरंभ कर दिया। इस योद्घा तारूसिंह के साथ भाई मणिसिंह भी ऐसे ही वीरता के कृत्यों में लगा हुआ था। हर कार्य में वह तारूसिंह की सहायता करता था। दोनों योद्घाओं की चिंता का एक ही कारण था कि देश को स्वतंत्र कैसे कराया जाए और विदेशी सत्ता को यहां से किस प्रकार खदेड़ा जाए?
कुचल दिया गया तारूसिंह
सूबेदार ने भविष्य की उभरती इस शक्ति का सर कुचलने का निर्णय लिया। उसने भाई तारूसिंह को गिरफ्तार कराने में सफलता प्राप्त कर ली, उसे चरखी पर चढ़ाकर निर्ममता से कुचल दिया गया। भाई मणिसिंह के साथ भी ऐसा ही किया गया पर उस लाल ने भी कोई मलाल नहीं किया और भारत माता की सेवा में सहर्ष अपने बंद कटा लिये। भारत की वीरता ने पुन: अपना कीत्र्ति स्तंभ स्थापित किया और शत्रु ने जिसे केवल खात्मा कह कर अपमानित किया भारत की आत्मा ने उसे खात्मा न कहकर हुतात्मा के रूप में सम्मानित किया।
होते रहे वीर पैदा
वीरों की उत्पत्ति का क्रम अभी भी नही टूटा। दो लाल चले गये तो उनका स्थान लेने के लिए कुछ दूसरे लाल भारत के भाल को संभालने के लिए आगे आ गये। इनके नाम महासिंह मोती, रामदीवान, महासिंह का पुत्र रणजीतसिंह थे। इन्होंने नई योजना बनायी और राजनीतिक रूप से स्वयं को बलशाली बनाने की योजना पर कार्य करना आरंभ कर दिया। शत्रु अभी संभल भी नहीं पाया था कि उसके लिए एक नई चुनौती इन तीनों नायकों ने खड़ी कर दी। इन वीरों ने लाहौर पर हमला बोल दिया और वहां पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया। इनका प्रयास रूका नहीं, निरंतर जारी रहा और ऊंचाईयों के सपने देखता रहा।
उन्हें इस बात की बड़ी पीड़ा थी कि गुरू परंपरा के अर्थ का अनर्थ हो गया और आज तक के पुरूषार्थ को हमने व्यर्थ कर दिया, केवल अपनी फूट का प्रदर्शन करके।
पंजाब में फिर हुई सिख साम्राज्य की स्थापना
अत: इन लोगों ने लाहौर को जीतकर अपना अभियान आगे बढ़ाया और पंजाब में एक बार पुन: सिख साम्राज्य की स्थापना करने में सफलता प्राप्त की। इनके इस पुनीत और महान कार्य में हिंदू और सिख दोनों ने मिलकर सहयोग दिया। इस प्रकार दोनों वर्गों के लोगों ने मिलकर गुरूओं को और वीर वैरागी को अपनी श्रद्घांजलि अर्पित की।
पर वैरागी के शिष्यों का क्या हुआ ? इस पर भाई परमानंद जी लिखते हैं-”सम्वत 1782 में अमृतसर में दीपावली पुन: मनायी गयी। इस अवसर पर तत्त खालसा और वैरागी के सिख दोनो एकत्र हुए। लाखों रूपये चढ़ावे में आये। तीनों दल उसके हिस्सेदार बनने लगे। मन मुटाव इतना बढ़ गया कि आपस में तलवारें चमक पड़ीं। उस समय उनके मध्य में वृद्घ बाबा कणिसिंह विद्यमान था। वह बोला-‘सुनो यह सत्य है कि वैरागी की मृत्यु ने हमें निर्बल किया है। हम सब किसी काम के नहीं रहे। शत्रु की चालों ने हममें फूट डाल दी है। क्या अब भी तुम आपस में लडक़र कट मरोगे? यदि गुरू गोविन्द सिंह तुम्हारा यह दृृश्य देखें तो क्या कहेंगे?’ इस वक्तृता का सिखों पर प्रभाव पड़ा। सबने कहा-‘जो कुछ आप करो, हमें मंजूर है।’ उसने प्रस्ताव किया-‘कागज के दो टुकड़ों पर वाह गुरू की फतह और दर्शनीय फतह लिखकर दोनों को स्वर्ण मंदिर की सीढ़ी क ेपास पानी में छोड़ दो। यदि दोनों तैरती रहें तो चढ़ावा दोनों का होगा। नहीं तो जो कागज पहले डूब जाए, उसका कोई अधिकार (चढ़ावे पर) नहीं होगा। इस पर दोनों पक्षों को संतोष हो गया। ऐसा ही किया गया। देवयोग से या अन्य कारण से वैरागी का कागज पहले डूब गया। उसके सिख विस्मित रह गये। उनमें से बहुत से फिर तत्तखालसा के साथ मिल गये और जो बचे वे गुमनामी में रहने लगे। इस प्रकार वैरागी के दल का अंत हो गया और बाह्य फूट की आगे बुझ गयी।”
हमारी फूट के लिए ब्राह्मण वर्ग दोषी था
क्षत्रियों में फूट के जिन उदाहरणों को हमें अपने इतिहास में बार-बार देखना पड़ता है, उनके लिए हमारा ब्राह्मण वर्ग उत्तरदायी था। इन लोगों ने भारत की वंदनीय वर्णव्यवस्था का जातीयकरण कर दिया और स्वयं पढऩे-पढ़ाने में लग गये तो उन्होंने क्षत्रियों का कार्य केवल राष्ट्र रक्षा बना दिया। यद्यपि हमारी अशिक्षा के कुछ अन्य कारण भी रहे, परंतु ब्राह्मणों की यह उदासीनता प्रमुख कारण थी। इसका परिणाम यह निकला कि हमारे योद्घा जब किसी बात पर स्वयं ही तलवार खींच लेेते थे तो उसमेें उनकी वीरता की पराकाष्ठा तो दिखती थी, परंतु उनकी न्याय-अन्याय और देशधर्म के प्रति विवेकशक्ति कई बार कहीं नहीं दिखाई देती थी। फलस्वरूप वह न्याय-अन्याय और राष्ट्रहित या अहित में भेद नहीं कर पाते थे। उनके पास जोश तो था पर होश नहीं था। इसी स्थिति का शिकार सिख हो गये और छोटी सी बात पर अपने वैरागी के साथ पुन: अन्याय कर बैठे। अस्तु।
विचार शक्ति की प्रबलता
अब हमें तनिक इस बात पर विचार करना चाहिए कि विचार शक्ति कितनी प्रबल होती है और लेखनी जब उसे धार देती है तो कितने ही लोगों के हृदय में वह आग लगाती चली जाती है। गुरू अर्जुन देव के विषय में हम तनिक विचार करें तो ज्ञात होता है कि उन्होंने बादशाह जहांगीर के कहने पर भी गुरू ग्रंथ साहिब में हजरत मुहम्मद और इस्लाम की प्रशंसा में कुछ नहीं लिखा और बादशाह जिन शब्दों को डलवाना चाहता था उन्हें डालने से इंकार कर दिया। यदि गुरू अर्जुनदेव उस समय चूक जाते और गुरू ग्रंथ साहिब में वही शब्द डाल देते जो जहांगीर चाहता था तो क्या होता? निश्चित रूप से तब पंजाब में गुरू परंपरा के प्रति वह श्रद्घा ना होती जो हमें जहांगीर के जाने के पश्चात भी सदियों तक दिखाई देती रही। वह आंदोलन ना होता जो हमें आज तक गर्व और गौरव के भावों से भर देता है और सिख जाति विश्व की सर्वाधिक वीर जातियों में कभी नहीं गिनी जाती। इसलिए हमें गुरू अर्जुनदेव के साहस का ऋणी होना चाहिए जिनके कारण हमने चाहे जितने कष्ट सहे पर देश की स्वतंत्रता के लिए तथा धर्म की रक्षा के लिए सदैव संघर्ष करते रहे।
प्रतिदिन सौ बंदी मारे जाते थे
इस प्रकार संघर्ष और स्वतंत्रता के प्रति समर्पण गुरू ग्रंथ साहिब ने अपने अनुयायियों को घुट्टी में पिला दिया, जिससे यह देश सदियों तक ऊर्जान्वित रहा। यही कारण था कि विलियम इर्विन जैसे विदेशी इतिहासकार को भी यह लिखना पड़ा कि जब बंदा और उनके 740 अनुयायियों को बंदी बनाकर दिल्ली लाया गया और मुगलों के द्वारा उन पर घोर अत्याचार किये गये तो प्रतिदिन 100 बंदियों को कोतवाली के चबूतरे पर मारा जाता था। दर्शकगण चाहे भारतीय हों, अथवा यूरोपीयन-सिखों के आश्चर्यजनक धैर्य तथा दृढ़ता की प्रशंसा करने में एक मत हैं। अपने गुरू के प्रति उनकी भक्ति अभूतपूर्व थी। उन्हें डर छू तक नही गया था। पहले जान देने की आपस में होड़ सी लग गयी थी। इस्लाम धर्म स्वीकार करने पर अभयदान मिल सकता था। लेकिन कोई भी सिख बंदी अपना धर्म छोडऩे के लिए तैयार न हुआ।
19 जून 1716 के दिन बंदा और उनके प्रमुख साथियों को दण्ड देने के लिए कैद खानों से बाहर लाया गया। नगर के धनी खत्री जो मन ही मन बंदा के सिद्घांतों को मानते थे उनकी मुक्ति के लिए अपना धन लुटाने को तैयार थे लेकिन उनके इस प्रकार के सारे प्रस्ताव ठुकरा दिये गये।
 देशभक्ति का नशा
इसे कहते हैं-वीरता का नशा हो जाना। जब देशभक्ति सिर चढक़र बोलने लगे और व्यक्ति को उठते-बैठते केवल देश दिखायी दे तब ही ऐसा नशा चढ़ा करता है कि देशधर्म के दीवाने मृत्यु के लिए भी ‘पहले मैं -पहले मैं’ का शोर करने लगते हैं।
यह भावना लखनऊ की उस नवाबी संस्कृति से कहीं अधिक उत्तम और श्रेष्ठ है-जिसमें खाने के लिए व्यक्ति किसी दूसरे से कहता है-‘पहले आप’, लेकिन यह ‘पहले आप’ वाली तहजीब ‘पहले मैं’ वाली संस्कृति से कहीं हीन है, क्योंकि नवाबों की इस कथित संस्कृति में कुछ मिल तो रहा है, पर यहां तो जीवन दिया जा रहा है और वह भी स्वेच्छा से। सात्विक वीरता का वैसा अनुकरणीय उदाहरण है।’
मैकालिक ने लिखा है कि ”बंदा और उसके साथियों को मृत्यु का लेशमात्र भी भय नहीं था। वे पहले प्राणदण्ड प्राप्त करने के लिए एक दूसरे से होड़ लगाते थे। यह घृणित कार्य एक सप्ताह तक चलता रहा। बंदा की बारी तीन मास पश्चात 19 जून 1716 को आयी। जल्लाद ने उसके बालक पुत्र के टुकड़े-टुकड़े करके उसका मांस बंदा के मुख में ठूंस दिया, किंतु बंदा लेशमात्र भी विचलित न हुआ। मुहम्मद अमीन खां ने जब बंदा से पूछा कि तुम इतने सज्जन हो फिर तुमने संसार के प्राणियों को दु:खी करके अपने ऊपर यह आपत्ति मोल क्यों ले ली? तब बंदा ने बड़े धैर्य के साथ उत्तर दिया-जब संसार में कुछ मनुष्य सीमा से बाहर चले जाते हैं तो ईश्वर उन दुष्टों को दंडित कराने के लिए मुझ जैसे प्राणी को जन्म देता है।”
क्या कहते हैं इतिहासकार
इर्विन का कहना है कि ‘पहले बंदा की सीधी आंख निकाली गयी, फिर बांई, फिर उसके हाथ पैर काटे गये। आग में तपायी हुई लाल संडासी से उसका मांस चीरा गया और अंत में सिर काट दिया गया।’
इतिहासकार खफीखां ने लिखा है कि-‘ये (बंदा और उसके साथी) पापी कुत्ते लूट, मारकाट और बड़े छोटे सभी परिवारों के बालकों को बंदी बना और उन्हें पृथ्वी पर पटक कर मारने और गर्भवती स्त्रियों को चीरने, मकानों में आग लगाने और निर्धन घनी सभी का सर्वनाश करने में लग गये।’
खफी खां ने जहां यह लि खा है वहीं उसने बंदा की प्रशंसा करते हुए लिखा है-‘मुसलमान सेनाएं बड़ी कठिनाई से काफिरों के आक्रमणों का सामना कर सकीं। धन, सामान, घोड़े, हाथी सब काफिरों के हाथ में चले गये और इस्लाम की सेना का एक भी योद्घा ऐसा न बचा जिसके पास पहने हुए कपड़े तथा अपने शरीर के अतिरिक्त कुछ भी बचा हो।’
देश में उस समय क्रांति का परिवेश क्यों बना? इस पर विचार करते हुए खफी खां ने ही लिखा है-‘अब सब समझदार और तजुर्बेकार लोगों को यह साफ तौर से मालूम हो गया है कि कालक्रम के अनुसार राजकाज में विचार शून्यता आ गयी है, और किसानों की रक्षा करने, देश की समृद्घि को बढ़ाने और पैदावार को आगे ले जाने के काम बंद हो गये हैं। लालच और दुव्र्यवहार से सारा देश बर्बाद हो गया है। कमबख्त अमीनों, आमिलों की लूट-खसोट से किसान पीसे जा रहे हैं, दरिद्र किसानों की औरतों के बच्चों की आहों का कर जागीरदारों के सिर है, भगवान को भूले हुए सरकारी अफसरों की सख्ती जुल्मोसितम और बेइंसाफी इस दर्जे तक बढ़ गयी है कि अबर कोई इसके सौवें हिस्से का भी वर्णन करना चाहे तो उसकी बयान करने की ताकत विफल हो जाएगी।’
(इरफान हबीब, एग्रेरिमन सिस्टम ऑफ मुगल इंडिया पृष्ठ 315-16)

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