स्वास्तिक से छेड़छाड़ : क्या देश को सांप्रदायिकता की आग में झोंकने को आतुर हैं मोदी विरोधी ?

आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार

जब से नागरिकता कानून बना है, मोदी-विरोधी विरोध में इतने अंधे और पागल हो चुके हैं, लगता है सबकी अक्ल पर पत्थर पड़ गए हैं। विरोध करना विपक्ष का जन्मसिद्ध अधिकार है, लेकिन विरोध में हिन्दुत्व के विरुद्ध नारेबाजी लगना कौन-सी दानिशमंदी है? इन उन्मादियों को शायद ये नहीं मालूम कि जिस दिन हिन्दुओं के सबर का पैमाना टूट गया, और इसी तरह इस्लाम विरोधी नारेबाजी होने की स्थिति में क्या होगा? कभी उन्मादियों और इनके समर्थक दलों ने लेशमात्र भी सोंचा है? यह कौन-सा संविधान है, जो दूसरे धर्म के प्रति उत्तेजक नारों की इजाजत देता है? भारतीय संविधान का कौन उल्लंघन कर रहा है? कौन वो शैतानी नेता है, जो प्रदर्शनकारियों को ऐसे उत्तेजक नारे लगाने के लिए समर्थन देकर देश में साम्प्रदायिक आग में झोंकने का प्रयास कर रहा है? क्यों नहीं, ऐसे उत्तेजक नारो पर लगाम लगाई जाती? आखिर CAA के विरोध में हिन्दू-विरोधी नारों का क्या मतलब निकाला जाए?

इसी तरह जब जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में देश-विरोधी नारे लगते हैं, विपक्ष उनके साथ खड़ा हो जाता है, क्यों? ऐसे नेता एवं उनकी पार्टी क्या कभी देशहित कर सकती हैं? आखिर कौन-सी आज़ादी की मंशा है? क्या इस तरह के नारे लगाने वाले और उनको समर्थन देने वाली पार्टियां किसी गुलाम देश में रह रहे हैं? जब प्रदर्शनकारियों द्वारा “हिन्दू से चाहिए आज़ादी”, “हिन्दुत्व की कब्र खुदेगी”, “मोदी-योगी की कब्र खुदेगी” आदि आदि उत्तेजक नारे लग रहे हैं, ‘गंगा-यमुना तहजीब’ की बात करने वाले किस बिल में घुसकर बैठे हैं? क्यों नहीं इन हिन्दू भावनाओं को भड़काने वाले नारों का विरोध करते? ये सब तभी बाहर निकलेंगे, जब दूसरी तरफ से पलटवार होगा। अभी सब कुम्भकरण की नींद में सोये हुए हैं।हकीकत यह है कि जब से देश में तीन तलाक पर पाबंदी, जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 का समाप्त होना, अयोध्या में राममन्दिर पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आदि पर चुप्पी साधे छद्दम धर्म-निरपेक्ष नागरिकता संशोधन कानून बनने पर दिलों में दबी अपनी ज्वाला को प्रकट कर रहे हैं। किस कदर इन उन्मादी नेता और पार्टियों ने मुस्लिम समाज को भ्रमित कर दिया है, वह प्रदर्शनों में लग रहे उत्तेजक नारों से जाहिर हो रहा है।

नागरिकता संशोधन क़ानून (CAA) संसद में पारित होने के बाद से ही भारत के वामपंथियों और मुस्लिमों के लिए एक विवादित क़ानून बन गया है। देश के कई हिस्सों में हिंसक हुई मुस्लिम भीड़ द्वारा विरोध-प्रदर्शन के नाम पर हिन्दू विरोधी नारे और पोस्टर लगाए जाने से लेकर उग्र प्रदर्शन शुरू हो गए हैं। ताज़ा मामले में शाहीन बाग का एक और पोस्टर सामने आया है। इसे पत्रकार, सबा नकवी ने शेयर किया है। इस पोस्टर को देखते ही आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि यह हिन्दू-विरोधी कल्पना से भरा है।

सबा नकवी द्वारा गर्व के साथ शेयर की गई इमेज में तीन महिलाओं को बुर्क़ा पहने और माथे पर बिंदी लगाए दिखाया गया है। इसके अलावा, पोस्टर के नीचे, फ़ैज़ की कविता ‘हम देखेंगे’ शीर्षक से कुछ पंक्तियाँ भी लिखी हुई हैं। अंत में, हिन्दू स्वस्तिक को खंडित कर उसका विघटित रूप दर्शाया गया।

यह पोस्टर स्पष्ट रूप से हिन्दुओं पर इस्लामी वर्चस्व की स्थापना और हिन्दुओं के घृणा जताने की मंशा से ओत-प्रोत है। इसे सीएए विरोधी-प्रदर्शनों का प्रतीक मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। और न ही इसे राजनीतिक विरोध मानकर हवा में उड़ाया जा सकता है।

हिजाब पहने और माथे पर बिंदी लगाए महिलाओं के इस पोस्टर को देखकर ऐसा भी लगता है कि मुस्लिम समुदाय हिन्दू महिलाओं को किस नज़रिए से देखता है। पहली नज़र में ऐसा भी प्रतीत होता हो सकता है जैसे यह पोस्टर कश्मीर से है, जहाँ कश्मीरी हिन्दू महिलाओं का बलात्कार इस्लामी ताकतों द्वारा किया गया और फिर उनकी उनकी हत्या कर दी गई। इसके अलावा, यह पोस्टर मुस्लिमों के अत्याचार के उस दौर का भी खुला चित्रण करती है जिसके तहत कश्मीर में हिन्दू पुरुषों को धर्म परिवर्तन, पलायन या मरने के अलावा अपनी महिलाओं को बलात्कार और मुस्लिम बनाने के लिए छोड़ने तक के लिए मजबूर किया गया।

मुस्लिम महिलाओं की इमेज के ठीक नीचे फैज़ की कविता का शीर्षक ‘हम देखेंगे’ तो लिखा था, लेकिन उसके नीचे की पंक्तियों को बदल कर नई पंक्तियों को गढ़ा गया। इसके अनुसार,

जब ज़ुल्म-ओ-सितम मोदी-शाह के,

खाक में मिल जाएँगे,

जनता के एक इशारे पे,

सब कुर्सी से उतारे जाएँगे,

लाज़िम है कि हम देखेंगे।

इस पोस्टर के अंत में, हिन्दुओं के पवित्र स्वास्तिक चिन्ह को खंडित कर उसके विघटित रूप को दिखाया गया था।

बीते दिनों सीएए के ख़िलाफ़ हुए दंगों में देश ने मुस्लिमों की भीड़ का एक अलग ही चेहरा देखा गया। ये याद रखने वाली बात है कि खुद को भारत का नागरिक कहने वाले लोग एक तरफ देश में धर्मनिरपेक्षता की दुहाई देते हैं, वहीं दूसरी तरफ ये लोग हिन्दुओं से आजादी की माँग कर रहे थे। और हिन्दू विरोधी नारों के साथ उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, दिल्ली में हिंसा और दंगा कर रहे थे। ख़िलाफत 2.0 का संदेश दे रहे थे और ला इलाहा इल्लल्लाह के नारे लगा रहे थे।

एक बात और ध्यान दिला दें कि हिन्दू घृणा से सने शाहीन बाग़ इलाक़े में सीएए और एनआरसी के ख़िलाफ़ ‘जिन्ना वाली आज़ादी’ जैसे नारे लगाए गए थे। इस दौरान ऐसे पोस्टर भी देखे गए जिनमें हिन्दू धर्म की तुलना नाज़ीवाद से और स्वास्तिक का दुरुपयोग करते हुए विखंडित दिखाया गया।

दिलचस्प बात यह है कि सीएए विरोधी-प्रदर्शनों में ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ के जमकर नारे लगाए गए। पवित्र हिन्दू स्वास्तिक की इमेज को कलंकित किया गया, इसकी तुलना नाज़ी हैकेन क्रुज़ से की गई है। बता दें कि ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ का शाब्दिक अर्थ ‘अल्लाह के सिवाय कोई ईश्वर नहीं’ है। जिसका किसी भी राजनीतिक प्रोटेस्ट से कोई लेना-देना नहीं है।

स्वास्तिक को इस्लामवादी हमेशा से ही हिटलर हैकेन क्रुज़ के साथ जोड़ने की कोशिश करते हैं। जबकि सच्चाई यह है कि ख़ुद हिटलर ने कभी भी हास्ट क्रूज़ के लिए स्वस्तिक शब्द का इस्तेमाल नहीं किया, लेकिन आतंकी संगठन आईएसआईएस ने ला इलाहा इल्लल्लाह को अपने झंडे में शामिल किया।

हिन्दू घृणा से सने पोस्टर

नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी का विरोध करने के नाम पर सड़कों पर उतरी भीड़ को बीते दिनों हमने दंगाइयों में बदलते देखा। हमने देखा कि किस तरह संविधान को बचाने के नाम पर तोड़फोड़, आगजनी जैसी घटनाओं को अंजाम दिया गया। पुलिस पर उपद्रवियों द्वारा हमले किए गए। बम फेंकने का प्रयास हुआ। सरेआम गोली चलाई गई। करोड़ों की सार्वजनिक संपत्ति को नष्ट किया गया आदि-आदि। इन सबके अतिरिक्त एक जो चीज़ इन प्रदर्शनों और दंगों में सबसे आम देखने को मिली, वो थी- हिंदुओं के प्रति घृणा।

जामिया मिलिया इस्लामिया हो या जेएनयू; शाहीन बाग हो या अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, हर जगह सीएए-एनआरसी के ख़िलाफ़ हुए प्रदर्शनों में हिंदूघृणा से लबरेज पोस्टर दिखाई दिए। कहीं हिंदुओं को कैलाश भेजने की बात हुई, कहीं ख़िलाफ़त 2.0 को काली स्याही से दीवार पर लिख दिया गया। जोर-जोर से ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ के नारे लगे और पूरी दुनिया में ‘ऊँ’ के चिन्ह को अपमानित करते हुए पोस्टरों में ‘फक हिंदुत्व’ लिखा गया।

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