सांप्रदायिक सद्भाव और मुस्लिम कट्टरता

पिछले सप्ताह संघ व जमायते-उलेमा-हिन्द के प्रमुखों की एक बैठक दिल्ली में संघ के मुख्य कार्यालय में हुई। देश में साम्प्रदायिक सद्भाव व सौहार्द का वातावरण बनाने के लिए साथ-साथ कार्य करने की कुछ योजनाएं बनाई जाएगी समाचार पत्रों से ऐसे कुछ संकेत मिलें है। इस अभियान की सफलता के लिए यह जानना भी आवश्यक है कि “राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ” का गठन स्व. डॉ हेडगेवार जी व उनके कुछ प्रखर राष्ट्रभक्त साथियों द्वारा किया गया था।
भारतीय संस्कृति व उसके मूल्यों की रक्षार्थ “भारतीयता” को सर्वोपरि मानकर देशवासियों में राष्ट्रभक्ति का संचार करना ही इस संगठन का मुख्य लक्ष्य है। जबकि जमायते-उलेमा-हिन्द को “भारतीय राष्ट्रीयता” के स्थान पर केवल “आक्रान्ताओं की इस्लामिक विचारधारा” का पोषक माना जाता आ रहा है। अधिकांश इस्लामिक शक्तियां भारत में खलीफा का राज स्थापित करके भारत की व्यवस्था को शरीयत के अनुसार चलाना चाहती है। इसके लिये वे लोकतांत्रिक व्यवस्था का अनुचित लाभ उठा कर शांतिपूर्ण अहिंसात्मक व आक्रामक हिंसात्मक आदि अनेक प्रकार के जिहाद का मार्ग अपनाती हैं।
आज गंभीरता से यह भी विचार करना होगा कि पिछले वर्ष जमायते-उलेमा-हिन्द द्वारा जमायते यूथ क्लब बना कर प्रति वर्ष साढ़े बारह लाख की मुस्लिम युवाओं की एक प्रशिक्षित फौज बनाने का निश्चय, क्या उचित है? इस योजना के अंतर्गत दस वर्ष में सवा करोड़ मुस्लिम युवाओं का एक यूथ क्लब या बड़ी फौज बनाने के पीछे कौनसी मानसिकता है? लगभग बीस लाख भारतीय सेनाओं व पुलिसकर्मियों सहित अन्य समस्त सुरक्षाबलों के होते हुए मुस्लिम युवाओं को सैनिक प्रशिक्षण देकर उससे छह गुना अधिक की एक प्रकार से समानांतर सेना बनाना क्या देश के संविधान के अनुसार वैध होगा? क्या यह योजना सभ्य समाज को विचलित व आक्रोशित नहीं करेगी? क्या इससे देशवासियों को भयभीत करके अनावश्यक रूप से देश का वातावरण बिगाड़ने का अपराध नहीं होगा ? हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि कुछ वर्ष पूर्व (24.12.2012) आदिलाबाद (आंध्र प्रदेश) में एमआईएम के विधायक अकबरुद्दीन ओवैसी ने अपने एक विषैले भाषण में हिन्दुओं को चेतावनी दी थी कि 15 मिनट के लिए पुलिस को हटा लो हम 25 करोड़ तुम करोड़ों हिन्दुओं पर भारी पड़ेंगे। यह मुस्लिम कट्टरता का पोषक माता कौशल्या आदि का अपमान करता है और बीजेपी व संघ परिवार आदि को जहरीला सांप बता कर मुसलमानों को भड़काता है। आपको यह भी स्मरण होगा कि इसी मुस्लिम कट्टरता से ग्रस्त चित्रकार मक़बूल फिदा हुसैन अपनी कलम से हिन्दू देवी-देवताओं के अपमानजनक चित्र बना कर भारत में ही सम्मानित होता रहा। परंतु अनेक वर्षो उपरान्त भारतभक्तों के अथक प्रयासों से उसे अपने अंतिम वर्षों में देश के बाहर शरण लेनी पड़ी थी। मुस्लिम कट्टरता का विरोध करने वाले मुख्य लेखक सलमान रश्दी व तस्लीमा नसरीन जैसे लेखकों पर प्रतिबंध लग सकता है परंतु “सहमत” जैसे कट्टरतावाद के पोषक स्वयं सेवी संगठन जब श्री राम व माता सीता पर अनुचित टिप्पणी करते है तो उसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बता कर ऐसे धार्मिक आघातों पर भी कोई दंड नही दिया जाता। ऐसे अनेक विवरण व घटनाएं मिलती है जिसमें साम्प्रदायिक सद्भाव बनाये रखने में मुसलमान नेताओं की कट्टरता ही सबसे बड़ा रोड़ा बन जाती है।


निःसंदेह भारत सहित विश्व का इतिहास इस तथ्य का प्रमाण है कि कभी भी साम्प्रदायिक सौहार्द एक तरफा नहीं हो सकता। यह स्पष्ट है कि सामुहिक मुस्लिम कट्टरता ही साम्प्रदायिकता को जन्म देती है। उनका दर्शन विश्व में अपने को अन्य सभ्यताओं से श्रेष्ठ मानता है। ऐसे स्थिति में कोई गैर मुस्लिम आगे बढ़ कर मुसलमानों को गले लगाकर कब तक आत्मघात सह कर ठगा जाता रहेगा? अनेक परिस्थितियों में गैर मुस्लिम समाज जिसको काफ़िर भी कहा जाता है, समझौता कर लेते है परंतु अंत में उनके साथ विश्वासघात ही होता आया है।
मैं बार-बार यह कहता व लिखता रहा हूँ कि जब तक इस्लामिक विद्याओं व उनके दर्शन की पुस्तकों में आवश्यक संशोधन नही होगा तब तक जिहाद को मिटाना व साम्प्रदायिक सद्भाव बनाना अत्यधिक कठिन है। इन विपरीत परिस्थितियों में जब साम्प्रदायिक सौहार्द बनाने कि संघ और जमायते उलेमा के प्रमुख मिलकर प्रयास करने की बात करते हैं तो सर्वप्रथम उन्हें यह सोचना होगा कि कुरान की वह आयतें जो घृणा व वैमनस्यता फैलाती है उनको कैसे हटाया जाए? साथ ही शिक्षा पद्धति का भी भारतीयकरण करना होगा। जब बचपन से ही मुसलमानों में मजहबी शिक्षा के कारण “हिन्दू-मुस्लिम” पहचान बनने लगती है तो एक समान राष्ट्रीय पहचान बनाने में सफलता कैसे मिलेगी? यह कैसी शिक्षा है जो “ऐ ईमानवालों” जैसे शब्दों से ही अन्य धर्म व सभ्यता के लोगों को बे-ईमान बना देती है? जबकि हिन्दू समाज “जियों और जीने दो” में विश्वास करता है। “वसुधैव कुटुम्बकम” के मंत्र को मानता आ रहा है। हिंदुत्व में कोई अलगाववादी दर्शन है ही नहीं इसमें समस्त जीव मात्र के कल्याण की कामना से कार्य करने की प्रेरणा मिलती है। परंतु इस्लामिक शिक्षाओं में गैर मुस्लिमों के विरुद्ध “जिहाद” का जनून बचपन से ही भरा जाता आ रहा है। ऐसी असमानताओं व विरोधी विचारधाराओं के होते हुए हिन्दू-मुस्लिम सौहार्द बनाना अत्यधिक कठिन है। इतिहास में भी अनेक बुद्धिजीवियों व नेताओं ने इस विषय पर कार्य किया परंतु परिणाम शून्य रहा। कब तक इस साम्प्रदायिक सद्भाव की मृगमरीचिका में ऐसे प्रयास किये जाते रहेंगे?
श्रीमान विलियम ग्लैडस्टोन 19 वीं शती में चार बार ब्रिटेन के प्रधानमंत्री रहे का कुरान के संबंध में विचार था कि जब तक धार्मिक पुस्तकों में ऐसी बातें रहेंगी तब तक दुनिया में शांति नही होने वाली। दिल्ली के मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट श्री जिले सिंह लोहाट ने भी कुरान के विषय में किये गये अपने एक ऐतिहासिक निर्णय (31 जुलाई 1986 ) में उल्लेख किया था कि “कुरान की कुछ आयतें बहुत ही खतरनाक और घृणास्पद होने के कारण मुसलमानों व अन्य समुदायों के बीच भेदभाव व द्वेष का निर्माण करती हैं”। विश्व के अनेक नेताओं ने भी साम्प्रदायिक सद्भाव का अभाव व
वैश्विक जिहाद (इस्लामिक आतंकवाद) का मुख्य कारण इस्लामिक शिक्षाओं द्वारा बढ़ती मुस्लिम कट्टरता को ही माना है। विश्व को दो भागों दारुल-इस्लाम व दारुल-हर्ब में देखने के मूर्खतापूर्ण इस्लामिक महत्वाकांक्षा का जब तक विश्वव्यापी खंडन व प्रबल विरोध नही होगा तब तक साम्प्रदायिक सद्भाव बना कर विश्व शांति स्थापित करना असंभव होगा।

यह सर्वविदित ही है कि जन्नत के काल्पनिक सपने दिखा कर मुस्लिम समाज के मासूम बच्चों व निर्दोष युवाओं को भड़का कर आत्मघाती (फिदायीन) बना कर इस्लामिक आतंकवाद से वैश्विक शांति भंग हो रही है। गैर मुसलमानों का धर्मान्तरण करना या उन पर उनकी अंतिम सांस तक इसके लिए अत्याचार करना अब सभ्य समाज स्वीकार नहीं करेगा। अतः उन मुल्लाओं और मदरसों पर अंकुश भी लगना चाहिये जो अमानवीय व क्रूरतम अत्याचारों के लिए जिम्मेदार ऐसे आतंकवादी बनाने के लिए निरतंर सफल हो रहे हैं। इसलिए इनकी जिहादी मानसिकता में परिवर्तन लाना एक उत्तम उपाय है।
आज केंद्र में एक सशक्त राष्ट्रवादी शासन के होने से भारत की संस्कृति व धर्म की रक्षार्थ अनेक सकारात्मक व आवश्यक कार्य हो सकते हैं। ऐसे में ऐतिहासिक तथ्यों को समझते हुए भी साम्प्रदायिक सौहार्द बनाने के लिए राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ व जमायते-उलेमा-हिन्द का संयुक्त प्रयास कितना सार्थक होगा अभी कहना कठिन है। लेकिन ऐसे समझौतों के दुष्परिणामस्वरूप इस्लामिक शक्तियों का दुःसाहस बढ़ सकता है। उस स्थिति में “टुकड़े-टुकड़े गैंगों” व “भारत की बर्बादी तक जंग रहेगी जारी” एवम “इस्लामिक झण्डा लहरा कर पाकिस्तान जिंदाबाद” के नारे लगाने वालों को नियंत्रित कैसे किया जा सकेगा?
विनोद कुमार सर्वोदय
(राष्ट्रवादी चिंतक व लेखक)
गाज़ियाबाद

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