श्रीगुरुजी की शक्तिशाली राष्ट्र की अवधारणा 

प्रवीण गुगनानी,  सलाहकार, विदेश मंत्रालय, भारत सरकार, (राजभाषा) 9425002270 [email protected] 

श्री गुरुजी, माधव सदाशिव राव गोलवलकर शक्तिशाली भारत की अवधारणा के अद्भुत, उद्भट व अनुपम संवाहक थे। श्री गुरुजी के संदर्भ में “थे” शब्द कहना सर्वथा अनुचित होगा, वे आज भी पराक्रमी भारत, ओजस्वी  भारत, अजेय भारत, निर्भय भारत, संपन्न-समृद्ध-स्वस्थ भारत व राष्ट्रवाद भाव के झर-झर बहते निर्झर झरने बने हुए हैं। वे शक्तिशाली भारत के अग्रदूत, संवाहक, प्रणेता के रूप में आज भी हमारे मध्य हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरुजी के संदर्भ में, शक्तिशाली भारत की अवधारणा के सबसे बड़े संवाहक – भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी पुस्तक “श्रीगुरूजी एक स्वयंसेवक” में लिखते हैं – “राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना सन 1925 में डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार ने की थी, लेकिन इसे वैचारिक आधार द्वितीय सरसंघचालक माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर ‘श्रीगुरुजी’ ने प्रदान किया था। द्वितीय विश्वयुद्ध, भारत छोड़ो आंदोलन, आजाद हिंद फौज और नेताजी का देश की आजादी में योगदान, भारत विभाजन, देश की आजादी, कश्मीर विलय, गांधी हत्या, देश का पहला आम चुनाव, चीन से भारत की हार, पाकिस्तान के साथ 1965 व 1971 की लड़ाई—भारत का इतिहास बदलने और बनाने वाली इन घटनाओं के महत्त्वपूर्ण काल में न केवल श्रीगुरुजी संघ के प्रमुख थे, बल्कि अपनी सक्रियता और विचारधारा से उन्होंने इन सबको प्रभावित भी किया था।” शक्तिशाली भारत की श्री गुरुजी की अवधारणा को अटलबिहारी वाजपेयी व नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बनी हुई कोई आधा दर्जन केंद्रीय सरकारों ने मात्र ही स्वीकार नहीं किया; अपितु, इस अवधारणा को उन्होंने अपना गीता-रामायण माना हुआ था।  शक्तिशाली राष्ट्र की गुरुजी की अवधारणा को स्वतंत्रता संघर्ष के मध्य ही कांग्रेस ने, स्वतंत्रता के पश्चात बनी हुई जवाहरलाल नेहरू की सरकार एवं लालबहादुर शास्त्री की सरकारों ने भी स्वीकार किया है। यद्दपि नेहरू ने तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगाने व श्री गुरुजी को जेल में बंदी बनाने जैसा पाप भी किया था किंतु इसके बाद उन्होंने गोलवलकर गुरुजी का अभिनंदन करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को वर्ष 1963 की गणतंत्र दिवस की परेड में भाग लेने हेतु आमंत्रित भी किया था। 
                   वस्तुतः श्री गुरुजी के नेतृत्व काल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की बढ़ती लोकप्रियता, स्वीकार्यता, मान्यता को देखकर जवाहर लाल नेहरू के मन में चिंता व कुटिलता के भाव आने लगे थे। नेहरू जिस प्रकार की छुद्र, अंग्रेज-मुस्लिम परस्त राजनीति किया करते थे, श्री गुरुजी उसके अत्यंत विरुद्ध थे। नेहरू जी ने संघ व श्रीगुरुजी के प्रति चिंता, आशंका व स्वयं हेतु ख़तरे के भाव से ही ग्रसित होकर ही गांधी जी की हत्या के बाद श्रीगुरुजी को गिरफ़्तार कर आरएसएस पर प्रतिबंध लगा दिया था। गांधी जी की हत्या व हत्या के आरोप में संघ पर प्रतिबंध लगाना, आज भी एक उनसुलझा रहस्य ही है। इस रहस्य का एक सूत्र गांधी जी की हत्या के ठीक एक दिन पूर्व के नेहरू के एक भाषण में भी है, जिसमें नेहरू ने संघ को कुचलने की बात कही थी। नेहरू जी का संघ को कुचलने वाला भाषण देना, चौबीस घंटे के भीतर गांधी जी की हत्या होना और संघ पर प्रतिबंध लगाकर श्रीगुरूजी को गिरफ़्तार कर लेना; एक अनसुलझी गुत्थी ही है। 
             विकसित भारत की नेहरू की परिकल्पना पर श्रीगुरूजी का “शक्तिशाली भारत” की योजना कल्पक अत्यंत भारी व परिणामकारी है। तब श्री गुरुजी की यह योजना, नेहरू की, अंग्रेज व मुस्लिम परस्त  नीतियों पर बहुत भारी पड़ती हुई दिखने लगी थी। सार्वजनिक चौक-चौराहों, सड़क-संसद, मठ-मंदिर, व्यावसायिक परिसरों आदि सर्वत्र स्थानों पर श्री गुरुजी की “शक्तिशाली भारत” की योजना की चर्चा में भारतीय न केवल रुचि लेने लगे थे, अपितु, श्रीगुरूजी के प्रति भारतीयों में श्रद्धा का वातावरण बनता जा रहा था। यह सब तब था जबकि, श्रीगुरूजी का प्रत्यक्ष राजनीति से क़तई कोई सीधा संबंध नहीं था। भय इतना था कि नेहरू जी को स्पष्टतः लगने लगा था कि, देश के आगामी प्रथम लोकसभा चुनाव में उनकी सर्वोच्चता को केवल दो लोग चुनौती दे सकते थे। जिन दो लोगों की कहा एक शब्द भी नेहरू के प्रति वातावरण को भारत में दुष्प्रभावित कर सकती थी; वे दो व्यक्ति थे – पहले गांधी जी व दूजे, श्री गुरुजी। 
                 श्रीगुरूजी के कृतित्व को नेहरू जी व  भारत की समूची जनता ने, भारत-कश्मीर विलय में उनकी भूमिका से देख लिया था।  प्रसिद्ध लेखक, संदीप बोमज़ाई, -“डिसइक्यिलीब्रियम : वेन गोलवलकर रेसक्यूड हरि सिंह” में लिखते हैं, “सरदार पटेल के कहने पर श्रीगुरूजी ने 18 अक्तूबर, 1947 को महाराजा हरि सिंह से भेंट की और विलय को संभव बनाया।” महाराजा हरिसिंह ने गोलवलकर से कहा, “मेरा राज्य पूरी तरह से पाकिस्तान पर निर्भर है। कश्मीर से बाहर जाने वाले सभी रास्ते रावलपिंडी और सियालकोट से गुज़रते हैं। मेरा हवाई अड्डा लाहौर है। मैं भारत से किस तरह संबंध रख सकता हूँ।”
श्री गुरुजी ने उनसे कहा, “आप हिंदू राजा हैं। पाकिस्तान के साथ विलय के बाद आपकी हिंदू प्रजा पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ेगा। सही है कि आपका भारत के साथ इंफ़्रा विकसित नहीं है किंतु इसे बनाया जा सकता है। आपके कश्मीर के हित में अच्छा यही होगा कि आप भारत के साथ अपने राज्य का विलय कर लें।” आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कश्मीर में जो इंफ़्रा निर्मित कर रहे हैं, वह श्री गुरुजी के इन विचारों का क्रियान्वयन ही है। अरुण भटनागर की पुस्तक, “इंडिया: शेडिंग द पास्ट, एम्ब्रेसिंग द फ्यूचर, 1906-2017” में भी श्रीगुरुजी की कश्मीर विलय में भूमिका, का उल्लेख है। 
                 स्वातंत्र्योत्तर भारत में तो फिर  जैसे श्रीगुरुजी की “शक्तिशाली भारत” की अवधारण से लोग ऐसे प्रभावित होने लगे थे कि उनके प्रति श्रद्धा का ज्वार उमड़ने लगा था। 1965 के “भारत चीन युद्ध” में भी गुरुजी से तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने नीतिगत व सामरिक विषयों पर परामर्श करके कुछ नीतियां तय की थी। जनप्रिय प्रधानमंत्री अटलजी तो श्रीगुरूजी के समकक्ष कभी कुर्सी पर नहीं बैठते थे व नीचे ही स्थान ग्रहण करते थे।
            गोवा मुक्ति आंदोलन व गोवा के भारत विलय में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका उनकी “शक्तिशाली भारत की अवधारणा” का ही परिणाम था। गोवा मुक्ति आंदोलन में उस समय की कांग्रेस नीत भारत सरकार की भूमिका राष्ट्रहित की पीठ में ही छुरा घोपने वाली थी। गुरुजी ने तब कहा था, “गोवा में पुलिस कार्रवाई करने और गोवा को मुक्त कराने का इससे ज्यादा अच्छा अवसर कोई न आएगा। भारत सरकार ने गोवा मुक्ति आन्दोलन का साथ न देने की घोषणा करके मुक्ति आन्दोलन की पीठ में छुरा मारा है। भारत सरकार को चाहिए कि भारतीय नागरिकों पर हुए इस अमानुषिक गोलीबारी का प्रत्युत्तर दे और मातृभूमि का जो भाग अभी तक विदेशियों की दासता में सड़ रहा है, उसे अविलम्ब मुक्त करने के उपाय करे।”
         राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ व वामपंथियों में मूलतः वैचारिक मतभेद है व कम्युनिस्ट स्वभावतः ही संघ को पानी पी पी कर कोसते रहे हैं। श्रीगुरूजी अपनी “शक्तिशाली भारत” की अवधारणा के प्रति इतने समर्पित थे कि वे कम्युनिस्ट्स के प्रति भी राष्ट्रहित में समन्वयक की दृष्टि रखते थे। श्रीगुरूजी कार्ल मार्क्स के प्रति कहा करते थे कि, “भारतीय कम्युनिस्ट्स ने कार्ल मार्क्स के साथ अन्याय किया है। मार्क्स केवल भौतिकतावादी नहीं थे, वे नीतिशास्त्र में भी विश्वास रखते थे। श्रीगुरुजी मानते थे कि, कार्ल मार्क्स को “क्रूड मटिरियलिस्टिक” मानना  भारतीय कम्यूनिस्टों की बड़ी भारी गलती है । 
           श्रीगुरूजी “शक्तिशाली भारत”
के अपने विचार के क्रियान्वयन हेतु सभी वैचारिक पद्धतियों के सत्व-सार को खोजते व उससे समन्वय बनाते दिखते थे। “शक्तिशाली भारत” ही श्रीगुरूजी का लक्ष्य रहा है। 

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