जब एक इन्द्र पुरुष अग्नि पुरुष बन जाता है तो क्या होता है?

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महान् सन्त किस प्रकार एक छोटी सी चिन्गारी से आध्यात्मिकता की अग्नि को जला पाये थे?

नू चित्सहोजा अमृतो नि तुन्दते होता यद्दूतो अभवाद्विवस्वतः।
वि साधिष्ठेभिः पथिभी रजो मम आ देवताता हविषा विवासति।।
ऋग्वेद मन्त्र 1.58.1

(नू चित्) निश्चित रूप से अत्यन्त शीघ्र (सहोजा) बल पैदा करने वाला (अमृतः) न मरने योग्य, मुक्ति की अवस्था में (नि तुन्दते) विनम्रता से कार्य करता हुआ (होता) लाने वाला और स्वीकार करने वाला (यत्) जो (दूतः) दूत (अभवत्) है (विवस्वतः) स्व-प्रकाश में स्थापित, परमात्मा (वि – ममे से पूर्व लगाकर) (साधिष्ठेभिः) सबके कल्याण में भाग लेता है (पथिभिः) पथ पर चलता हुआ (रजः) गहरा आकाश (ममे – वि ममे) अत्यन्त सुन्दर बनाता है (आ – विवासित से पूर्व लगाकर) (देवताता) दिव्यता पैदा करने वाला, दिव्य जीवन (हविषा) आहुतियों के साथ (विवासति – आ विवासित) परमात्मा के चारों तरफ व्यापक।

व्याख्या:-
जब एक इन्द्र पुरुष अग्नि पुरुष बन जाता है तो क्या होता है?

ऋग्वदे 1.56 तथा 1.57 सूक्त हमें यह प्रेरित करते हैं कि हम एक इन्द्र अर्थात् इन्द्रियों के सच्चे नियंत्रक बनें। एक बार यह स्तर प्राप्त हो जाये तो:-
1. अतिशीघ्र, निश्चित रूप से (वर्तमान जन्म में या अगले जन्म में बाल्यवस्था के बाद ही) वह इन्द्र बल पैदा करने वाला बन जाता है।
2. मुक्त अवस्था का जीवन जीते हुए वह बड़ी विनम्रता के साथ कार्य करता है।
3. वह परमात्मा का दूत और बड़े बदलाव लाने वाला बन जाता है।
4. वह स्व-प्रकाशमान परमात्मा में स्थापित हो जाता है।
5. वह सबके कल्याण के मार्ग पर चलता है और उसमें भाग लेता है।
6. वह अपने गहरे आकाश को अत्यन्त सुन्दर बना लेता है।
7. वह एक दिव्य जीवन की तरह दिखाई देता है जो अनेक प्रकार से दिव्यताओं को पैदा करता है।
8. वह अपनी आहुतियों के साथ परमात्मा के आस-पास व्याप्त रहता है।
यह सब लक्षण सिद्ध करते हैं कि इन्द्र पुरुष अग्नि बन चुके हैं।

जीवन में सार्थकता: –
महान् सन्त किस प्रकार एक छोटी सी चिन्गारी से आध्यात्मिकता की अग्नि को जला पाये थे?

इस मन्त्र में अनुभूति प्राप्त आत्माओं के लक्षण सूचीबद्ध किये गये हैं जो पहले इन्द्र अर्थात् इन्द्रियों के नियंत्रक बनें और उसके पश्चात् उन्हें परमात्मा की अनुभूति का स्तर प्राप्त हुआ। इसमें कई जन्म लग सकते हैं। महान् अनुभूति प्राप्त सन्त जैसे शंकराचार्य, गौतमबुद्ध, महर्षि दयानन्द सरस्वती, महर्षि रमन आदि अपने जीवन की बाल्यवस्था से ही इन सभी लक्षणों से सुसज्जित हो चुके थे। इससे सिद्ध होता है कि पूर्व जन्मों की तपस्याओं ने उन्हें इन्द्र बनाया और अपने वर्तमान जीवन में वे एक छोटी सी चिन्गारी से ही परमात्मा की अग्नि बन गये और बाल्यावस्था से ही वे आध्यात्मिक प्रेरणाओं के प्रचारक बन गये। अतः अपनी आत्मा की अनन्त यात्रा के पूर्व अन्तिम जीवन में उन्होंने अपनी ऊर्जाओं को निरर्थक भौतिकवादी जीवन में व्यर्थ नहीं गंवाया। ऐसे जीवनों से प्रेरणा लेकर हमें भी कड़ी मेहनत करके अपने अन्दर यह परिवर्तन करना चाहिए कि हम अपनी ऊर्जाओं को निम्न स्तर की गतिविधियों में व्यर्थ न गंवायें बल्कि उच्च चेतना के स्तर पर अपना जीवन जियें।


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