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इतिहास के पन्नों से

भारत की 18 लोकसभाओं के चुनाव और उनका संक्षिप्त इतिहास, भाग 5 , 5 वीं लोकसभा – 1971 – 1977

कांग्रेस में हुए विभाजन के उपरांत इंदिरा गांधी के लिए सत्ता में बने रहना बड़ा कठिन हो रहा था। उन्हें कई प्रकार की चुनौतियां मिल रही थीं। सिंडिकेट उनके लिए सिरदर्द बन चुका था। क्योंकि सिंडिकेट के नेता उनके लिए दिन प्रतिदिन कई प्रकार की चुनौतियां खड़ी करते जा रहे थे। देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना उनके लिए दूसरी बड़ी चुनौती बन चुकी थी। इस सबके अतिरिक्त ‘नेहरू की बेटी’ का सत्ता में बने रहना उनके लिए इन सबसे बड़ी चुनौती थी।
देश की पांचवी लोकसभा अपने कई महत्वपूर्ण निर्णयों और घटनाओं के लिए भारतीय इतिहास में अपना अलग स्थान रखती है। 5 वीं लोकसभा का कार्यकाल 15 मार्च 1971 से 18 जनवरी 1977 तक रहा। यद्यपि भारतीय संविधान में लोकसभा का कार्यकाल 5 वर्ष का निर्धारित किया गया है, परंतु इस लोकसभा का कार्यकाल 1 वर्ष के लिए इंदिरा गांधी के द्वारा अवैधानिक रूप से बढ़ाया गया। स्वाधीनता के बाद के इतिहास में यह पहली घटना थी, जब देश के संविधान को ताक पर रखकर देश की सत्तारूढ़ पार्टी की नेता देश के लोगों पर कई प्रकार के अत्याचार करते हुए शासन चलाने लगी थी। इसी लोकसभा ने आपातकाल के दु:खद दौर को भी देखा।  

इंदिरा गांधी का ‘गरीबी हटाओ’ का नारा

पांचवी लोकसभा का चुनाव फरवरी - मार्च 1971 में हुआ था। इंदिरा गांधी ने अपना तानाशाही दृष्टिकोण दिखाते हुए इस सदन का कार्यकाल दो बार में एक वर्ष के लिए बढ़ाया। जिससे अगली लोकसभा के चुनाव निर्धारित अवधि से लगभग 10 महीने अधिक गुजर जाने के पश्चात हुए। जब यह चुनाव हो रहे थे तो उस समय राज्यसभा के चार वर्तमान सदस्यों को पांचवी लोकसभा के लिए चुन लिया गया था। इस लोकसभा की कुल 521 सीटों के लिए चुनाव हुआ। पिछली लोकसभा में इंदिरा गांधी को कम्युनिस्ट दलों के समर्थन से सरकार चलानी पड़ी थी। उन सारी समस्याओं से मुक्ति पाने के लिए इंदिरा गांधी ने इस बार स्पष्ट बहुमत लाने के लिए 'गरीबी हटाओ' का नारा दिया।

इससे पहले देश दो युद्ध झेल चुका था। जिसके कारण देश में और भी अधिक गरीबी और भुखमरी का साम्राज्य फैल गया था।
इसके उपरांत भी लोगों को इंदिरा गांधी का ‘गरीबी हटाओ’ का नारा बहुत ही आकर्षित करने वाला लगा। देश के गरीब वर्ग के लोगों ने इंदिरा गांधी की बात पर विश्वास किया। उन्हें लगा कि निश्चित रूप से इंदिरा गांधी अपने वचन को निभाते हुए उनकी गरीबी को दूर कर डालेंगी।

पाकिस्तान के कर दिए दो टुकड़े

    इंदिरा गांधी ने अपनी लोकप्रियता को बनाए रखने के लिए इसी समय पाकिस्तान से युद्ध कर बांग्लादेश को उससे अलग करने में सफलता प्राप्त की। पाकिस्तान 1947 से ही भारत का परंपरागत शत्रु बन गया था। उसने कई प्रकार से भारत के लिए समस्याएं खड़ी करने का प्रयास किया। कश्मीर के मुद्दे को लेकर वह जहां अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत को घेरने का प्रयास करता रहता था। वहीं वह भारत के साथ 1948 ,1965 और 1971 में तीन युद्ध सीधे लड़ चुका था। 
इंदिरा गांधी ने देश के इस परंपरागत शत्रु से भिड़ने का साहसिक निर्णय लिया और उसके दो टुकड़े करने में सफलता प्राप्त की। निस्संदेह इंदिरा गांधी का यह कार्य साहसिक था, उनके इस साहसिक कार्य से देश में उनकी लोकप्रियता में भी वृद्धि हुई। लोगों ने अपनी नेता के इस देशभक्ति पूर्ण कार्य की खुलकर प्रशंसा की। परंतु उन्होंने जिस प्रकार कई देशों की यात्रा कर बाहरी देशों का समर्थन अपने लिए जुटाने में सफलता प्राप्त की थी, उनका वह समर्थन बांग्लादेश बनने के पश्चात बदल गया।

कारण यह था कि इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान से होने वाले युद्ध से पहले संसार के कई देशों की यात्रा कर उन्हें यह समझाने में सफलता प्राप्त की थी कि पाकिस्तान हमारे साथ छेड़खानी करता रहता है। उसका दृष्टिकोण भारत के प्रति शत्रुतापूर्ण है और वह भारत की क्षेत्रीय एकता और अखंडता के लिए सबसे बड़ा खतरा है।
इंदिरा गांधी की इस बात पर कई देशों का समर्थन भारत को मिला और उन्होंने अपना नैतिक राजनीतिक समर्थन भारत को देते हुए भारत और पाकिस्तान के संभावित युद्ध में दूरी बनाए रखने का आश्वासन भारत को दे दिया। युद्ध के पश्चात पाकिस्तान ने यह दुष्प्रचार किया कि युद्ध की शुरुआत पाकिस्तान की ओर से न होकर भारत की ओर से हुई है। जिसे समझकर जिन देशों ने भारत को समर्थन दिया था वह अब भारत के विरोध में आ गए।

भारत को तोड़ने की तैयारी में जुटा पाकिस्तान

अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की विश्वसनीयता प्रभावित हुई। परिणामस्वरूप अमेरिका, ब्रिटेन और पाकिस्तान जैसे कई देशों ने मिलकर भारत में खालिस्तानी आंदोलन को हवा देने का निर्णय लिया। अगले ही वर्ष आनंदपुर प्रस्ताव पारित हुआ। जिसमें भारत को तोड़कर खालिस्तान बनाने के संबंध में निर्णय लिया गया। वास्तव में भारत में पृथकतावादी सिख आंदोलन के पीछे विशेष भूमिका पाकिस्तान की ही रही है। जिस प्रकार पाकिस्तान को तोड़कर भारत ने अपनी प्रधानमंत्री के नेतृत्व में उसके दो टुकड़े कर दिए थे , उसका प्रतिशोध लेने के लिए पाकिस्तान ने यह षड्यंत्र रचना आरंभ किया।
भारत में खालिस्तानी पृथकतावादी आंदोलन ने देश को आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक कई प्रकार की क्षति पहुंचाने का कार्य किया । हिंदू और सिख दोनों मिलकर रहते आए थे। दोनों के बीच भाई-भाई का संबंध था। परंतु खालिस्तानी आंदोलन ने इस संबंध को कई स्थानों पर बुरी तरह प्रभावित किया। पाकिस्तान ने अपनी टूटन का प्रतिशोध लेने के लिए खालिस्तानी आतंकवादियों को अपना भरपूर राजनीतिक और आर्थिक सहयोग प्रदान किया। जिससे पूरा पंजाब आतंकवाद की भट्टी में जलने लगा।

भाषा के आधार पर नए राज्यों का गठन

हमें यह बात भी ध्यान रखनी चाहिए कि इंदिरा गांधी ने अपने पहले प्रधानमंत्री काल में 1966 में भाषा के आधार पर पंजाब को तीन भागों में बांट दिया था। जिससे हरियाणा और हिमाचल प्रदेश नाम के दो नए राज्य अस्तित्व में आए। पंजाब उन्होंने सिखों को दे दिया। यहां कई पृथकतावादी संगठन आजादी से पहले से अर्थात 1929 से अलग देश की मांग करते आ रहे थे। इंदिरा गांधी ने खालिस्तानियों की इस मांग को देश के संविधान के भीतर स्वीकार करते हुए यह मान लिया कि अब शायद यह लोग शांत हो जाएंगे। पर ऐसा हुआ नहीं। अपनी मांग को भाषा के आधार पर अलग प्रांत के रूप में देश के नेतृत्व के द्वारा स्वीकार कर लेने के पश्चात खालिस्तानी नेताओं की भूख और बढ़ गई। उनकी इस प्रकार की भूख को पड़ोसी देश पाकिस्तान ने हवा देना आरंभ कर दिया।
इंदिरा गांधी ने हरियाणा और हिमाचल प्रदेश के अतिरिक्त एक केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ भी बनाया था। जिसे पंजाब और हरियाणा की राजधानी बनाया गया। चंडीगढ़ को केंद्र शासित प्रदेश बनाने का कारण यह था कि इस शहर पर पंजाब और हरियाणा दोनों ही अपना अधिकार दिखा रहे थे। फलस्वरुप इसे इन दोनों की राजधानी बनाकर केंद्र शासित राज्य का दर्जा दे दिया गया।

पंजाब में 1969 के चुनाव विधानसभा चुनाव के समय रिपब्लिक पार्टी ऑफ इंडिया के प्रत्याशी जगजीत सिंह चौहान ने भी चुनाव लड़ा था। यद्यपि वह चुनाव हार गए। पर इसके पश्चात वह ब्रिटेन चला गया और उसने खालिस्तानी आंदोलन को वहां से संचालित करना आरंभ कर दिया। बाद में इस नेता ने ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ में खालिस्तानी आंदोलन के लिए धन इकट्ठा करने की मांग करते हुए विज्ञापन भी दिया और विदेश में लोगों को भारत को तोड़ने के लिए उकसाने की गतिविधियों में बढ़ चढ़कर भाग लिया।

खालिस्तान का खूनी आंदोलन

जब 1972 में आनंदपुर प्रस्ताव पारित किए गए तो उसमें कहा गया कि केंद्र सरकार केवल रक्षा, विदेश नीति, संचार और मुद्रा पर अपने अधिकार रखे। शेष सभी मामलों पर राज्य सरकार को अपना स्वतंत्र अधिकार होना चाहिए। इस प्रकार अप्रत्यक्ष रूप से देश को तोड़कर एक नए स्वतंत्र राज्य की मांग इन प्रस्तावों के माध्यम से की गई। दिनांक 13 फरवरी 2022 को “द प्रिंट” में छपे एक लेख के अनुसार ‘पंजाब के खालिस्तानी आंदोलन के कारण 1980 से 1995 के बेच डेढ़ दशक में कुल 21,532 लोग मारे गए जिनमें 8,090 अलगाववादी, 11,796 आम लोग और 1,746 सुरक्षाकर्मी थे. मीडिया पंजाब में हिंसा, जन विरोध, बेअदबी, और ड्रग्स की तस्करी के तमाम मामलों को प्रायः खालिस्तान आंदोलन के आशंकित उभार से जोड़ता है।’
कहा जाता है कि खालिस्तान के नाम पर फैलाये गये आतंकवाद का सबसे बड़ा जिम्मेदार नेता भिंडरावाला था। जिसे इंदिरा गांधी ने ही संरक्षण देकर पाला था। बाद में भिंडरावाला इंदिरा गांधी के हाथ से निकल गया और वह पंजाब में खून की होली खेलने लगा। जब सारा पंजाब खून की होली से रंग गया तो रूस की के0जी0बी0 ने भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को 1984 में इस बात के लिए सचेत किया कि समय रहते सही निर्णय ले लीजिए अन्यथा अब आपका देश टूटने ही वाला है । जैसे ही भारत के टुकड़े होंगे और खालिस्तान नाम का नया देश बनेगा तो उसे कई देश अपनी ओर से राजनीतिक मान्यता देने के लिए तैयार बैठे हैं ।

करना पड़ा ‘ ब्लू स्टार ऑपरेशन’

अंतरराष्ट्रीय जगत में अपने विश्वसनीय मित्र रूस के माध्यम से मिली इस सूचना के आधार पर इंदिरा गांधी ने ‘ब्लू स्टार ऑपरेशन’ के माध्यम से पंजाब के आतंकवाद पर अपना नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास किया। देश की सेना को आदेश दिया गया कि वह पंजाब के उन सभी आतंकवादियों का सफाया करे जो देश को तोड़ने के कार्यों में लगे हुए हैं । देश की सेना ने सक्रियता दिखाते हुए देश की रक्षा के लिए पंजाब की ओर प्रस्थान किया गया। सेना ने अमृतसर स्थित स्वर्ण मंदिर को जाकर घेर लिया। जहां आतंकवादियों ने शरण ली हुई थी और उस पवित्र मंदिर को हथियारों का अखाड़ा बनकर वहां पर पूरी तरह से किलेबंदी कर ली थी। ‘आपरेशन ब्लू स्टार’ भारतीय सेना द्वारा 3 से 8 जून 1984 को अमृतसर स्थित हरिमंदिर साहिब परिसर को ख़ालिस्तान समर्थक जनरैल सिंह भिंडरावाले और उनके समर्थकों से मुक्त कराने के लिए चलाया गया अभियान था।

उठाना पड़ा भारी आर्थिक नुकसान

देश ने पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद से निपटने के लिए सीमा पर कंटीले तार लगाने का निर्णय लिया। पी0बी0एस0 द्वारा दिए गए आंकड़ों के अनुसार भारत और पाकिस्तान की सीमा की कुल लंबाई 3,323 किलोमीटर  है। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि इतनी बड़ी सीमा पर तार लगाने में देश को कितना अधिक आर्थिक नुकसान झेलना पड़ा होगा? पर देश की सुरक्षा के लिए यह सब किया गया। इंदिरा गांधी के शासनकाल में भारत-पाक युद्ध ने तो अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया ही साथ ही पंजाब के आतंकवाद ने इसे और भी अधिक खतरनाक स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया।
इंदिरा गांधी महिला सुलभ चरित्र के कारण अपने आप को सदा असुरक्षित सी अनुभव करती रहीं। जिसका परिणाम यह हुआ कि उन्होंने शीघ्रता में कई ऐसे निर्णय लिए जो देश के लिए घातक सिद्ध हुए। पंजाब में पनपे आतंकवाद से वह जिस प्रकार निपटी उसके परिणाम देश के लिए अच्छे नहीं रहे। यहां तक कि 31 अक्टूबर 1984 को उन्हें स्वयं को भी अपना बलिदान देना पड़ा। जब उनकी ही सुरक्षा में तैनात सिख सुरक्षा कर्मियों ने नई दिल्ली में उनके आवास पर उनकी हत्या कर दी।
इंदिरा गांधी जिस प्रकार अपने आपको एक डिक्टेटर के रूप में स्थापित करती जा रही थीं, उससे कांग्रेस पार्टी का भी अहित हुआ। देश की राजनीति पथभ्रष्ट हो गई। जनहित और राष्ट्रहित से ऊपर दलहित हो गया। संवैधानिक तंत्र और व्यवस्था का सरकार की ओर से भरपूर दुरुपयोग किया जाने लगा।

इंदिरा गांधी की विशेषताएं और परमाणु परीक्षण

 कई मानव सुलभ दुर्बलताओं के उपरांत भी इंदिरा गांधी एक अच्छी प्रशासिका थीं। उन्होंने देश के सम्मान को बढ़ाने के लिए भी कई महत्वपूर्ण कार्य किये। 18 मई 1974 को उन्होंने राजस्थान के पोखरण में परमाणु विस्फोट कर सारे संसार को चौंका दिया था। विश्व को पहली बार यह आभास हुआ था कि 1947 में आजाद हुआ भारत किस तेज गति से आगे बढ़ रहा है? इतना ही नहीं, संसार के लोगों को यह भी पता चल गया कि भारत अब अपनी सुरक्षा के प्रति सावधान हो चुका है। इस परीक्षण की सारी तैयारी बहुत ही गोपनीय ढंग से की गई थी। अमेरिका जैसा देश भी यह आभास नहीं कर पाया था कि भारत कुछ बड़ा करने वाला है। जब 18 मई को यह परीक्षण किया गया तो भारत परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र के रूप में विश्व मंचों पर स्थापित हो गया। इसे हम स्वतंत्र भारत के इतिहास में पोखरण-1 के नाम से जानते हैं। देश ने अपनी प्रधानमंत्री के नेतृत्व में बहुत ऊंची छलांग लगाई। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने परीक्षण को 'स्माइलिंग बुद्ध' कहा था। उस दिन बुद्ध पूर्णिमा थी। जिस महात्मा बुद्ध के नाम पर अहिंसावाद को फैलाकर देश के भीतर एक अनावश्यक तेजहीनता का भाव पैदा हो रहा था, उसे बुद्ध पूर्णिमा के दिन ही दूर कर दिया गया। मानो उस दिन ऊर्जावन्त राष्ट्र ने यह निश्चय किया कि अब हम नए जोश, नए उत्साह और नई उमंग के साथ आगे बढ़ेंगे। पोखरण-1 परीक्षण को एक और नाम ‘हैप्पी कृष्ण’ भी कहा जाता है।
उस समय परमाणु अनुसंधान संस्थान भाभा एटॉमिक अनुसंधान केंद्र के निदेशक राजा रामन्ना थे। उन्हीं की देखभाल में यह परमाणु परीक्षण किया गया था। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के इस साहसिक निर्णय से उनकी अपनी प्रतिष्ठा और सम्मान में तो वृद्धि हुई ही साथ ही भारत की प्रतिष्ठा में भी वृद्धि हुई। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत को सम्मान मिलना आरंभ हुआ। विश्व नेताओं ने भारत की बात को सुनना आरंभ किया। गुटनिरपेक्ष आंदोलन में भी नव प्राणों का संचार हुआ। अब से पहले इस आंदोलन की बात को विशेष सम्मान नहीं दिया जाता था। पर अब इसकी बात को सुना जाने लगा।

इंदिरा गांधी के ऐतिहासिक निर्णय

इंदिरा गाँधी ने 19 जुलाई 1969 को भारत में 14 वाणिज्यिक बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया। तत्कालीन परिस्थितियों में उनकी यह भी एक बहुत बड़ी उपलब्धि मानी जाती है। इंदिरा गांधी ने अपने इस ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण निर्णय से भारत की अर्थव्यवस्था को समाजवादी विचारधारा के साथ जोड़ने का प्रयास किया। अपने इस निर्णय के संबंध में इंदिरा गांधी की मान्यता थी कि ऐसा करने से ग्रामीण आबादी के किसान वर्ग के लिए बैंकिंग सेवाओं और ऋण सुविधाओं तक उनकी पहुंच आसान की जा सकेगी। इसके अतिरिक्त इंदिरा गांधी ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 291 और अनुच्छेद 362 में आजादी पूर्व की भारतीय रियासतों के शासकों को दिए जा रहे ‘प्रिवी पर्स‘ को भी बंद कर दिया। जब देश आर्थिक तंगी से गुजर रहा था, तब राजकोष पर पड़ने वाले इस अनुचित और असंवैधानिक आर्थिक बोझ का कोई औचित्य नहीं था। अपने इस महान और ऐतिहासिक निर्णय को सेवा चढ़ाने के लिए इंदिरा गांधी ने 1971 में भारतीय संविधान में 26 वां संशोधन किया। अनेक प्रकार की चुनौतियों का सामना करते हुए  इंदिरा गांधी ने अपने द्वारा चुनाव के समय लगाये गये गरीबी हटाओ के नारे की ओर भी विशेष ध्यान दिया।

पांचवी लोकसभा और आपातकाल की घोषणा
इंदिरा गांधी ने अपने शासनकाल में और विशेष रूप से पांचवी लोकसभा के कार्यकाल में 25 जून 1975 को देश में आपातकाल की घोषणा की। उस समय देश के राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद थे। देश के राष्ट्रपति नहीं चाहते थे कि इंदिरा गांधी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर देश में आपातकाल की घोषणा करें। पर इंदिरा गांधी ने देश के राष्ट्रपति की एक नहीं सुनी। वह उस दिन रात्रि में स्वयं चलकर राष्ट्रपति भवन पहुंची और वहां से तब तक नहीं लौटीं जब तक कि देश के राष्ट्रपति ने आपातकाल लागू होने संबंधी कागजात पर अपने हस्ताक्षर नहीं कर दिए। इंदिरा गांधी के शासनकाल का यह बहुत ही अंधकार पूर्ण पक्ष है। इस समय उनके बेटे संजय गांधी ने अपने आप को संविधान से ऊपर स्थापित कर अनेक प्रकार के अत्याचार पूर्ण कार्य किये। लोगों की जबरदस्ती नसबंदी कराई गई। जिससे इंदिरा गांधी शासन की बहुत अधिक बदनामी हुई। भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाते हुए अपने विरोधी नेताओं को इंदिरा गांधी ने जेल में डलवा दिया। वहां उन पर अनेक प्रकार के अमानवीय अत्याचार किए गए। प्रेस की स्वतंत्रता को समाप्त कर दिया गया। लोगों के संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों को समाप्त कर दिया गया। सारे देश में लोकतांत्रिक संस्थाओं का हनन किया गया और सारा परिवेश तानाशाही पूर्ण हो गया।

पांचवी लोकसभा के चुनाव में कांग्रेस की स्थिति

जब पांचवी लोकसभा के चुनाव संपन्न हुए थे तो इंदिरा गांधी की पार्टी को 352 सीटें प्राप्त हुई थीं। जब आपातकाल की घोषणा की गई तो इंदिरा गांधी ने लोकसभा में अपने इस विशाल बहुमत का दुरुपयोग करना आरंभ कर दिया। उस चुनाव में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ( मार्क्सवादी ) 25 सीट लेकर दूसरे स्थान पर रही। उसके बाद भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और द्रविड़ मुनेत्र कड़गम ( डीएमके ) 23 सीटों पर विजय प्राप्त कर सकी।
इस चुनाव में 48% के लगभग महिला मतदाता थीं। पांचवी लोकसभा के आम चुनावों पर कुल11 करोड़ 60 लख रुपए खर्च हुआ था।
1971 के आम चुनाव के समय इंदिरा गांधी ने रायबरेली से जीत प्राप्त की थी। उस समय उन्होंने अपने प्रतिद्वंदी राजनारायण को एक लाख से भी अधिक मतों से पराजित किया था। राजनारायण ने उनके इस चुनाव को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के समक्ष चुनौती दी। राजनारायण उत्तर प्रदेश के वाराणसी के रहने वाले थे । उन्हें एक प्रखर समाजवादी नेता के रूप में जाना जाता था। राजनारायण की ओर से न्यायालय के समक्ष अधिवक्ता शांतिभूषण उनका पक्ष रख रहे थे। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के समक्ष राजनारायण ने इंदिरा गांधी पर सरकारी मशीनरी और संसाधनों के दुरुपयोग और भ्रष्टाचार का आरोप लगाया था। राजनारायण के अधिवक्ता शांतिभूषण ने न्यायालय को बताया कि प्रधानमंत्री के सचिव यशपाल कपूर ने राष्ट्रपति द्वारा उनका इस्तीफा मंजूर होने से पहले ही इंदिरा गांधी के लिए काम करना आरंभ कर दिया था, जो कि सरकारी मशीनरी के दुरूपयोग का पुख्ता प्रमाण था।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय का निर्णय

 इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जगमोहन लाल सिन्हा ने अपने निर्णय में माना कि इंदिरा गांधी ने सरकारी मशीनरी और संसाधनों का दुरुपयोग किया है। इसलिए जनप्रतिनिधित्व कानून के अनुसार उनका सांसद चुना जाना अवैध है। न्यायालय ने 12 जून 1975 के अपने निर्णय में यह भी स्पष्ट कर दिया कि इंदिरा गांधी अगले 6 वर्ष तक कोई भी चुनाव नहीं लड़ पाएंगी। इसके पश्चात इंदिरा गांधी के पास अपने पद से त्यागपत्र देने के अतिरिक्त अन्य कोई उपाय नहीं था। कहते हैं कि उन्होंने त्यागपत्र देने का मन भी बना लिया था। परंतु जब वह इस संबंध में अपने विश्वसनीय मंत्रियों और अधिकारियों के साथ विचार विमर्श कर रही थीं तो उनके बेटे संजय गांधी ने उन्हें एकांत में ले जाकर समझाया कि

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