वैदिक सम्पत्ति (चतुर्थ खण्ड) जीविका,उद्योग और ज्ञानविज्ञान

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(ये लेखमाला हम पं. रघुनंदन शर्मा जी की ‘वैदिक संपत्ति’ नामक पुस्तक के आधार पर सुधि पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहें हैं ]

प्रस्तुति: देवेन्द्र सिंह आर्य (चेयरमैन ‘उगता भारत’)

गतांक से आगे…..

इसके आगे राशिचक्र का वर्णन इस प्रकार है-

नाभि यज्ञानां सदनं रयीणां महामाहावमभि सं नवन्त ।
वैश्वानरं रथ्यमध्वराणां यज्ञस्य केतु जनयन्त देवाः ॥ (ऋ० ६।७।२)

अर्थात् यज्ञों की नाभि, धनों का घर, बड़े से बड़े अध्वरों मार्ग और यज्ञ के पताका वैश्वानर को देवता जानते हैं और उसकी स्तुति करते हैं। भूमि के इस मार्ग में भ्रमण करने के कारण जो रातदिन में अन्तर पड़ता है-घट बढ़ होती है, उसका वर्णन इस प्रकार किया गया है-

सदृशीरद्य सदृशीरिदु श्वो दीर्घं सचन्ते वरुणस्य धाम ।
अनवद्यात्रिशतं योजनान्येकका ऋतु परि यन्ति सद्यः ।। (ऋ० १/१२३/८)

अर्थात् आज भी एक समान और कल भी एक समान ही रात मालूम होती है, पर दोनों में महान भेद होता है और वरणस्थान में शीघ्रता के कारण एक एक से तीस तीस योजन का फर्क पड़ जाता है। तात्पर्य यह कि तीस योजन चलने में जितना समय लगता है, उतने ही समय के हिसाब से प्रत्येक रात्रि एक दूसरी से छोटी या बड़ी होती है। इस गणना के अनुसार ही ग्रहण जाने जाते हैं। ऋग्वेद में ग्रहण जानने के लिये यन्त्र बनाने का आदेश दिया गया है।

स्वर्भानोरथ यदिन्द्र माया अवो दिवो वर्तमाना अवाहन् ।
गूळहं सूर्य तमसापवतेन तुरीयेण ब्रह्मणाविन्ददत्रिः ।। (ऋ० ५/४०१६ )

अर्थात् चन्द्रमा की छाया से जब सूर्यग्रहण होता है, तब उसको तुरीययन्त्र से आँख देखती है। इस प्रकार से वेद ज्योतिषज्ञान के खास खास आवश्यक सिद्धान्तों का वर्णन करते हैं। इन सिद्धान्तों के द्वारा मनुष्य अपनी समुद्रीय यात्रा और अनेक प्रकार के अन्नों की फसलें तथा देशदेशान्तर के मौसमों को जान सकता है और व्यापार तथा जीविकासंबंधी आवश्यक ज्ञान प्राप्त कर सकता है।

इस प्रकार के समस्त भावश्यक ज्ञानविज्ञानों ओर कलाओं में ललित कला की भी गणना है। ललित कला में काव्य और संगीत ही प्रधान है। वेदों में काव्य और संगीत का बहुत वर्णन है। अथर्ववेद में काव्य के लिए लिखा है। कि देवस्य पश्य काव्यं ममार न जीर्यति’ अर्थात् परमेश्वर का संसाररूपी काव्य पढ़ो जो न कभी पुराना होता है। और न कभी नष्ट होता है। इसी तरह काव्य और संगीत के लिए ऋग्वेद लिखा है कि-

गायन्ति त्वा गायत्रिणोऽवंग्स्यकं मणिः ।
ब्रह्माणस्त्वा शतक्रत उद्धशमिव ये मिरे ।। (ऋ० १|१०|१)

अर्थात् हे शतक्रत ! तुम्हारे गीत गायत्री आदि गाती हैं, सूर्य पूजा करते हैं और ब्राह्मण तुम्हारे वंश का बखान करते हैं। इस मन्त्र में ऐतिहासिक काव्य के गाने का एक साथ ही वर्णन किया गया है। इसके अतिरिक्त चारों वेद कविता में ही वरिणत हैं और सामवेद तो बिलकुल ही गाने के लिए ही रक्खा गया है। वेदों में वीणावादन का भी वर्णेन पाता है, जिससे स्पष्ट हो जाता है कि वेदों में काव्य और संगीत की शिक्षा प्रचुर परिमाण में है। काव्य और संगीत भी जीवन प्रदान करनेवाले हैं, इसलिए जीविका में ही उनका भी समावेश है। इस प्रकार से जीविकासम्बन्धी विस्तृत ज्ञान वेदों से प्राप्त होता है और ज्ञात होता है कि वेदमन्त्रों के अनुसार उद्योग करनेवाला समाज धनधान्य से पूर्ण रह सकता है । परन्तु प्रश्न यह है कि ऐसे सुखी, सदाचारी और सीधेसादे समाज की रक्षा का प्रबन्ध वेदों ने क्या बतलाया है।
( आने वाले अंक में हम आपको बताएंगे समाज और साम्राज्य की रक्षा के बारे में….)
क्रमशः

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