देवी अहिल्या महान तपस्विनी थी |*

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वाल्मीकि रामायण में अहिल्या का वन में गौतम ऋषि के साथ तप करने का वर्णन है | वाल्मीकि जी ने पत्थर वाली कथा का वर्णन नहीं किया है । तुलसीदास रचित रामचरितमानस में इस कथा का वर्णन किया गाया है ।
विरोधाभास है, क्या अहिल्या इन्द्र द्वारा छली गयी थी अथवा वह चरित्रवान नहीं थी ?
बालकाण्ड सर्ग ५२ में गौतम के पुत्र शतानंद द्वारा अपनी माता को यशस्विनी तथा देवों में आतिथ्य पाने योग्य कहा है ।
४९\१९ में लिखा है, राम और लक्ष्मण ने अहिल्या के पैर छुए, अतिथि रूप में स्वीकार किया और पाद्य तथा अर्घ्य से उनका स्वागत किया । यदि अहिल्या का चरित्र संदिग्ध होता तो क्या राम और लक्ष्मण उनका आतिथ्य स्वीकार करते ?
बाल कांड में लिखा है,
” स तुषार आवृताम् स अभ्राम् पूर्ण चन्द्र प्रभाम् इव |
मध्ये अंभसो दुराधर्षाम् दीप्ताम् सूर्य प्रभाम् इव ||”
(४९-१५)
” सस् हि गौतम वाक्येन दुर्निरीक्ष्या बभूव ह |
त्रयाणाम् अपि लोकानाम् या। वत् रामस्य दर्शनम् | ”
(४९-१६)
तप से देदीप्यमान रूप वाली, बादलों से मुक्त पूर्ण चन्द्रमा की प्रभा के समान तथा प्रदीप्त अग्नि शिखा और सूर्य से तेज के समान अहिल्या तपस्या में लीन थी ।
सत्य यह है की देवी अहिल्या महान तपस्वीनी थी, जिनके तप की महिमा को सुनकर राम और लक्ष्मण उनके दर्शन करने गये थे । विश्वामित्र जैसे ऋषि राम और लक्ष्मण को शिक्षा देने के लिए और शत्रुओं का संहार करने के लिए वन जैसे कठिन प्रदेश में लाये थे । किसी सामान्य महिला के दर्शन कराने हेतु नहीं लाये थे ।
कालांतर में कुछ अज्ञानी लोगो ने ब्राह्मण ग्रंथों में इन्द्र के लिए प्रयुक्त शब्द “अहल्यायैजार” के रहस्य को न समझ कर इन्द्र द्वारा अहिल्या से व्यभिचार की कथा गढ़ ली ।
प्रथम, इन्द्र को जिसे हम देवता कहते हैं, व्यभिचारी बना दिया । भला जो व्यभिचारी होता है, वह देवता कैसे हुआ ?
द्वितीय, अहिल्या को गौतम मुनि से शापित करवा कर, उसे पत्थर का बना दिया, जो असंभव है ।
तृतीय, उस शाप से मुक्ति का साधन श्री राम जी के चरणों से उस शिला को छुना बना दिया ।
मध्यकाल को पतन काल भी कहा जाता है, क्योंकि उससे पहले नारी जाति को जहाँ सर्वश्रेष्ठ और पूजा के योग्य समझा जाता था, वहीं मध्यकाल में उसे ताड़न की अधिकारी और अधम समझा जाने लगा । इसी विकृत मानसिकता का परिणाम, अहिल्या इन्द्र की कथा का विकृत रूप है ।
सारी समस्या उपनिषदों कि वर्णन शैली को ठीक से न समझ पाने अथवा जानबूझ कर उसे विकृत करने की है. उपनिषदों की व्याख्या शैली आख्यातिक है, जिसमें वेदों में वर्णित किसी बात को समझाने के लिये कथानक के रूप में रूपान्तरित कर कहा गया है |
इन्द्र और अहिल्या की कथा भी, वेदों में आयी प्राकृतिक घटना को उपनिषदकार ऋषि द्वारा घटना का मानवीकरण कर कथानक के रूप में कहा गया है | यहाँ इन्द्र सूर्य है, अहिल्या रात्रि है और गौतम चंद्रमा है | चन्द्रमा रूपी गौतम, रात्रि रुपी अहिल्या के साथ मिलकर, प्राणियों को सुख पहुचाते हैं | इन्द्र अर्थात सूर्य के प्रकाश से रात्रि अहिल्या निवृत हो जाती है, अर्थात गौतम और अहिल्या का सम्बन्ध समाप्त हो जाता है | अर्थात सूर्य के प्रकाश के साथ ही चन्द्रमा छिप जाता है और रात्रि समाप्त हो जाती है |
अहिल्या न तो व्यभिचारिणी थी और न ही उसके साथ किसी ने छल किया था । वह महान तपस्विनी थी, जिनके दर्शनों के लिए और ज्ञान प्राप्ति के लिए ऋषि विश्वामित्र राम और लक्ष्मण को वन में लाये थे ।
वाममार्गीयों द्वारा इस प्राकृतिक घटना को गौतम ऋषि और उसकी पत्नी अहिल्या से जोड़ दिया और वेदों में अश्लीलता का दोषारोपण, ऋषियों व देवताओं को व्यभिचारी और वैदिक धर्म को निकृष्ट सिद्ध करने के लिये किया |
इस प्रकार, अहिल्या, इन्द्र द्वारा बलात्कृत और गौतम द्वारा परित्यक्त नहीं, बल्कि महान, तपस्वी और विदुषी नारी थी |

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