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प्रमुख समाचार/संपादकीय

राष्ट्र की प्राणशक्ति हैं संस्कार

जातिवाद के प्रति आपके लगाव ने आपको आपके न्यायपथ से भटका दिया। दूसरा आकर्षण आपके लिए यह था कि आपके, आपकी जाति के लोग भी आपसे यही अपेक्षा करते हैं कि आप अपना निर्णय अपने व्यक्ति के हित में ही देंगे। यदि आप ऐसा करेंगे तो ये आपके अपने लोग आपको सम्मान देंगे और समाज में आपको एक विशेष स्थान मिलेगा। न्याय का गला घोंटकर भी सम्मान का स्थान मिलते देखकर आप सहज रूप में न्याय के हत्यारे बनने के लिए तत्पर हो जाते हैं।

हमने समाज को विखंडित करके रख दिया है। ब्राह्मण समाज, गुर्जर समाज, यादव समाज, जाट समाज, अम्बेडकर समाज आदि न जाने कितने समाज खड़े हो गये हैं। छोटी सोच का छोटा परिणाम है ये। समाज तो केवल मानव समाज होता है। उसमें ये इतने सारे समाज कहां से आ घुसे। पर अब घुस गये हैं तो एक निर्मम सच बनकर हमारे बीच खड़े हैं। राजनीतिज्ञ लोगों को इन कृत्रिम समाजों के माध्यम से बनी बनाई वोट मिल जाती है इसलिए वह अपने स्वार्थवश इस प्रकार के कृत्रिाम समाजों को हवा देते हैं और हर चुनाव में इन कृत्रिम समाजों की दीवारों को मानव समाज में और भी ऊंचा कर जाते हैं। हमें जातिवाद, सम्प्रदायवाद, प्रान्तवाद, भाषावाद और क्षेत्रावाद आदि सब अच्छे लगते हैं, बिल्कुल वैसे ही जैसे एक बच्चे को गाली देना अच्छा लगता है और वह उसे सहज रूप में अपना लेता है। वह अच्छा बनने के लिए अपेक्षित प्रयास और परिश्रम से मुंह चुराता है और हम मानव समाज के निर्माण के लिए अपेक्षित प्रयास और परिश्रम से मुंह चुराते हैं। इसलिए परिणाम सकारात्मक न आकर नकारात्मक ही अधिक आ रहे हैं। हमारे इस नकारात्मक परिवेश के कारण नेताओं का भला हो रहा है और राष्ट्र की हानि हो रही है। हम एकता में विभिन्नता पैदा कर रहे हैं और नेता इस पर प्रसन्न हो रहे हैं।

छोटी-छोटी बातों में भी हम समाज में न्याय संगत व्यवहार के निष्पादन से मुंह चुराते हैं। भीड़ की भावनाओं के अनुसार बोलकर ही हम निकलने का प्रयास करते हैं। मान लीजिए किन्हीं दो वाहनों की परस्पर टक्कर हो जाती है, एक वाहन का चालक स्थानीय है और एक दूसरे प्रान्त का है। गलती स्थानीय चालक की रही है। परन्तु भीड़ दूसरे प्रान्त के चालक को मारना-पीटना आरम्भ कर देती है। सब उसी से वाहन की क्षतिपूर्ति की मांग करते हैं, या गाली-गलौच करते हैं। ऐसी घटनाएं नित्य प्रति होती है। भीड़ की भावनाओं के अनुसार कार्य किया जाता है। हम अन्याय करते हैं और उस अन्याय पर ही हमारे लिए जय-जयकार होने लगती है। इस जय-जयकार की झूठी शान से हम रोज न्याय की हत्या करते हैं। कोई भी मानवाधिकारवादी व्यक्ति या संगठन हमें ये नहीं बताता कि आपने गलत किया है। इस झूठी शान के चलत हम संकीर्ण, संकुचित मानसिकता के बनते चले जा रहे हैं। उत्तर प्रदेश में बिहारी को पीटा जाता है। अधिकांश लोग इस व्यवहार को उचित मानते हैं। सर्वजन हिताय की हमारी सांस्कृतिक परम्परा विलुप्त हो रही है और हम इस दम तोड़ती परम्परा पर भी प्रसन्न हो रहे है। हमारा मानवीय संस्कार हमें भीतर से प्रेरित करता है कि सबके प्रति न्यायपूर्ण भावना रखो। जबकि बाहरी वातावरण अथवा परिवेश कहता है कि भला चाहते हो तो भीड़ की भावनाओं के अनुरूप बोलो और प्रशंसा के पात्र बनो। हम प्रशंसा की चाहत में बह जाते हैं। इस प्रकार अनजाने में ही हम राष्ट्र के एक संस्कार के हत्यारे बन जाते हैं। ये नेता हमारी भावनाओं से खिलवाड़ करते हैं। हमें ये लोग मराठी, बिहारी, गुजराती आदि बनाते हैं पर भारतीय नहीं बनाते। अपने-अपने प्रदेश की शान में ये भाषण झाड़ते हैं और देश के लिए कुछ नहीं बोलते। परिणामस्वरूप जनता भी प्रदेश तक सीमित होकर रह जाती है। उसे प्रदेश से बाहर का कुछ नहीं पता। फलस्वरूप एक भावना प्रधान शब्द व नारे ने बहुत से मराठियों को उग्र बना दिया है। यदि दोनों स्थानों से भारतीयता का शब्द गुंजित होता तो उस पर बंगाल भी गौरव करता और सराहनीय भी। भारतीयत का संस्कार मारा जा रहा है और हम मरने दे रहे हैं। दोषी सभी हैं।

-प्रो. विजेन्द्र सिंह आर्य

‘उगता भारत’ – एक चिंतन
हमने समाज को विखंडित करके रख दिया है। ब्राह्मण समाज, गुर्जर समाज, यादव समाज, जाट समाज, अम्बेडकर समाज आदि न जाने कितने समाज खड़े हो गये हैं। छोटी सोच का छोटा परिणाम है ये। समाज तो केवल मानव समाज होता है।
राष्ट्र में संस्कार : एक प्रस्तुति

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