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भारतीय संस्कृति

द्रोपदी ने दुर्योधन से नही कहा था-अंधे का अंधा

राकेश कुमार आर्य
युधिष्ठर की सहधर्मिणी महारानी द्रोपदी पर एक आरोप यह भी है कि उन्होंने महाराज युधिष्ठर के राजसूय यज्ञ के अवसर पर दुर्योधन से अंधे का अंधा उस समय कह दिया था जब वह पाण्डवों के नवनिर्मित राजभवन में दिग्भ्रमित होकर सूखे स्थान को गीला और गीले स्थान को सूखा समझकर चल रहा था। प्रसंगवश यह भी स्पष्ट कर दें कि पाण्डवों का यह महल मय नाम के एक कुशल इंजीनियर ने निर्मित किया था, जो कि खाण्डव दाह के समय अर्जुन के संपर्क में आया था। इस कुशल इंजीनियर ने खाण्डव दाह के समय अर्जुन से अपनी प्राण रक्षा की मांग की थी, उसी उपकार के बदले में उसने पाण्डवों का अप्रतिम महल बनाया था, यह इंजीनियर मूल रूप से मेरठ क्षेत्र का रहने वाला था। उसी के नाम पर बाद में पाण्डवों ने मयराष्ट्र बसाया था, जो कालांतर में मेरठ के नाम से प्रसिद्घ हो गया।
अब अपने मूल विषय पर आते हैं। राजा दु्रपद की बेटी द्रोपदी से धर्मराज युधिष्ठर के विवाह की सूचना हस्तिनापुर नरेश महाराज धृतराष्ट्र को सर्वप्रथम महात्मा विदुर ने दी थी। इसके पश्चात जब यह निश्चित हो गया कि पाण्डव जीवित हैं और लाक्षाग्रह में मरने वाले लोग कोई और थे, पाण्डव नही थे, तो पाण्डवों को वापिस लाकर उन्हें आधा राज्य देने का निर्णय हस्तिनापुर की राज्य सभा ने लिया। पाण्डवों को लौटा लाने के लिए हस्तिनापुर के महामंत्री महात्मा विदुर को भेजा गया। महात्मा विदुर पाण्डवों को अपने साथ लाए और राज्य सभा में लिये गये निर्णय के अनुसार महाराज धृतराष्ट्र ने उन्हें आधा राज्य देने की घोषणा कर ते हुए धर्मराज युधिष्ठर को निर्देश दिया कि वह अपने भाईयों के साथ जाकर खाण्डव वन को आबाद कर वहां से अपना राज्य चला सकते हैं।
तब धर्मराज युधिष्ठर ने खाण्डव वन में आकर इंद्रप्रस्थ नामक नगरी से अपने राज-काज का शुभारंभ किया। इंद्रप्रस्थ नगरी राजा इंद्र की नगरी थी, जो कि पाण्डवों से भी पूर्व की थी । कुछ इतिहासकारों का मानना है कि दिल्ली का पुराना किला पाण्डवों से भी प्राचीन काल का है। यह निश्चय ही पुराने इंद्रप्रस्थ नगर के स्वर्णिम काल में कभी निर्मित हुआ होगा।
इंद्रप्रस्थ में आकर राजा युधिष्ठर ने राजसूय यज्ञ का आयोजन किया, जिसमें हस्तिनापुर से दुर्योधन अपने बंधु बांधवों सहित उपस्थित हुआ। इस यज्ञ में दूर-दूर देशों के विभिन्न राजा महाराजा उपस्थित हुए थे। यहां पर दुर्योधन को महल के निरीक्षण के समय तब उपहास का पात्र बनना पड़ा जब वह गीले स्थान पर सूखे स्थान की और सूखे स्थान पर गीले स्थान की अनुभूति कर रहा था। महाभारत में सभा पर्व के 10वें अध्याय में इस घटना का रोचक वर्णन है। राजा दुर्योधन अपने मामा शकुनि के साथ सभा भवन में निवास कर रहा था, उसने उस सभा भवन में उन दिव्य दृश्यों को देखा जो उसने हस्तिनापुर में अब से पहले कभी नही देखा था। एक दिन की बात है राजा दुर्योधन उस सभा भवन में भ्रमण करता हुआ स्फटिक मणिमय स्थल पर जा पहुंचा और वहां जल की आशंका से उसने अपना वस्त्र ऊपर उठा लिया। इस प्रकार बुद्घि मोह हो जाने से उसका मन उदास हो गया, तब वह सभा में दूसरी ओर चक्कर लगाने लगा और एक स्थान पर वह गिर पड़ा। इससे वह मन ही मन बहुत लज्जित हुआ। फिर स्फटिकमणि के समान स्वच्छ जल से भरी सुशोभित बावली को स्थल मानकर वह वस्त्रों सहित जल में गिर पड़ा। इस दृश्य को देखकर भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव इस पर हंसने लगे।
दुर्योधन स्वभाव से अमर्षशील था, अत: वह उनका उपहास नही सह सका। इसके बाद भी वह सूखे स्थान पर कपड़े ऊपर उठाकर चलने लगा इससे उसकी और हंसी हुई।
महाभारतकार लिखता है कि तब राज दुर्योधन एक द्वार पर पहुंचते हैं, परंतु खुला हुआ दिखाई देता था। उसके प्रवेश करते ही उसका सिर टकरा गया और उसे चक्कर सा आ गया। तब भीम ने उसे ‘धृतराष्ट्रपुत्र कहकर संबोधित किया और हंसते हुए उससे कहा-‘राजन! द्वार इधर है।’ तब दुर्योधन आगे बढ़ा तो वहां एक द्वार खुला हुआ था जिसे दुर्योधन ने बंद समझ कर उसको दोनों हाथों से धक्का देकर खोलने का अभिनय किया तो द्वार खुला होने के कारण वह द्वार के दूसरी ओर जाकर गिर पड़ा।
महाभारत में सभापर्व में इस घटना का इतना ही उल्लेख है। यहां पर कहीं भी महारानी द्रोपदी के बारे में यह नही लिखा कि वह राजा दुर्योधन को कहीं मिलीं और उन्होंने उनका उपहास किया। राजा धर्मराज युधिष्ठर और महारानी द्रोपदी निश्चय ही उस समय देश-विदेश के विभिन्न राजा-महाराजाओं की आव भगत में लगे हुए थे। यद्यपि अन्य पांडवों के पास भी उस समय अधिक समय नही था लेकिन फिर भी संयोग से वे दुर्योधन को एक स्थान पर टकरा गये जहां भीमसेन ने दुर्योधन को धृतराष्ट्रपुत्र कह दिया। इस शब्द का अर्थ भी व्यंग्य में अंधे का अंधा ही हुआ। लेकिन फिर भी इस व्यंग्य का दोषारोपण महारानी द्रोपदी पर करना कतई न्याय परक नही है। विशेषत: तब जबकि उसकी उपस्थिति तक का संकेत भी महाभारत की इस घटना में नही है।
दुर्योधन जब हस्तिनापुर लौट आया तो उसने अपने अपमान से भरे हृदय की बात अपने मामा शकुनि को बताई। तब उसने कहा कि मैं पांडु पुत्र युधिष्ठर के समीप प्राप्त हुई उस प्रकाशमयी लक्ष्मी को देखकर ईष्र्यावश जल रहा हूं। यद्यपि मेरे लिए यह उचित नही है। मैं अकेला उस राज लक्ष्मी को हड़प लेने में असमर्थ हूं और अपने पास योग्य सहायक भी नही पाता हूं, अत: मृत्यु का चिंतन का करता हूं। मैं उस राज लक्ष्मी को, उस दिव्य सभा को तथा रक्षकों द्वारा किये गये अपने उपहास को देखकर निरंतर संतप्त हेा रहा हूं, मानो अग्नि में जला जा रहा हूं।
दुर्योधन का अपने मामा से यह कथन ही इस भ्रांति का कारण बना कि वह इंद्रप्रस्थ में द्रोपदी से अपमानित होकर लौटा। यहां पर दुर्योधन जिस राज लक्ष्मी की बात कर रहा है, यद्यपि वह राज लक्ष्मी पांडवों का राज्यऐश्वर्य ही था, लेकिन यहां पर व्याख्याकारों ने इसका अभिप्राय द्रोपदी से लगा दिया। जिसे द्रोपदी के साथ अन्याय ही कहा जाएगा।
द्रोपदी को हमारे कथाकारों ने अथवा इतिहासकारों ने इस प्रकार दिखाया है कि जैसे वह एकदम नासमझ उद्दंडी, उच्छृंखल और एक सामान्य महिला से भी कमतर थी। जबकि द्रोपदी ने अपने वैदुष्य का कई स्थलों पर बड़ा सुंदर प्रभावोत्पादक वक्तव्य देकर अच्छे-अच्छे विद्वानों की बोलती बंद की। क्या ही अच्छा होता कि भारत की इस सन्नारी के साथ हम वैसा ही व्यवहार करते जैसे की वह पात्र थी। आज हमें अपने इतिहास के प्रति और अपनी संस्कृति के प्रति किये गये छल और द्रोह के कारण विदेशियों के सामने कई बार लज्जित होना पड़ता है। जिस कारण नई पीढ़ी अपनी संस्कृति से दूर होती जा रही है, ऐसे में आज आवश्यकता है सत्य के मंडन की और असत्य के खण्डन की। इसलिए हमें कलम उठानी चाहिए इतिहास के और संस्कृति के उन मर्मों को छूने के लिए तथा उन्हें सत्यपरक और तथ्यपरक रूप में प्रस्तुत करने के लिए जो विदेशी लेखकों ने या स्वार्थी इतिहासकारों ने या संस्कृत के न जानने वाले कथित विद्वानों ने अपने ढंग से प्रस्तुत किया और हमारी संस्कृति को उपहास का पात्र बनाया। इतिहास के इन गद्दारों को और संस्कृतिद्रोहियों को पाठ पढ़ाने के लिए देश के संस्कृति प्रेमी लोगों को अनुसंधानात्मक दृष्टिकोण से कार्य करने के लिए मैदान में उतरना होगा। रटी रटाई और सुनी सुनाई बातों पर विश्वास करना और हमें बिना किसी तर्क के अगली पीढ़ी को सौंप देना नितांत भ्रामक तो होता ही है, साथ ही जो पीढ़ी ऐसा कर रही है उसके बुद्घिप्रमाद का प्रतीक भी होता है। हमें बुद्घिप्रमाद से बचना होगा।

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